मंगलवार, 25 मई 2010

श्री हनुमान जी की प्रत्यक्ष कृपा

कृपा के उदाहरण - गतांक से आगे

आज मंगलवार के लिए विशेष
श्री हनुमान जी की प्रत्यक्ष कृपा

पिछले अंक में बचपन की आप बीती घटना बतायी थी. आज अपने जन्म से पहले की एक घटना बता रहा हूँ इसलिए क़ि मुझे पूरा विश्वास है क़ि यह कथा अक्षरश: सत्य है. प्रियजन. मैंने इसकी सत्यता के जीवंत प्रमाण स्वयं अपनी आँखों से देखे हैं इसलिए इसे सुनाने का साहस कर रहा हूँ .

आज से लगभग एक डेढ़ शताब्दी पहले की बात है. हमारे पूर्वज बलिया सिटी में बस चुके थे. आज जैसी भव्यता तो अवश्य ही नही होगी उन दिनों पर कम से कम कोठी की बाहरी मर्दाना बैठक तो अवश्य ही ज़ोरदार रही होगी जहाँ हमारे बाबा -परबाबा तहसील वसूली के लिए दरबार लगाते रहे होंगे . हाँ तो शायद उन्ही दिनों ,१८८० - १८९० में घटी होगी, यह प्रत्यक्ष हनुमंत -कृपा दर्शाती ,चमत्कारिक घटना.

कचहरी में गरमी की छुट्टियाँ हो गयी थी. अग्रेज़ी सरकार के देशी मुलाजिम भी छुट्टियाँ बिताने इधर उधर जा रहे थे.. कोई अपने गाँव, कोई अपनी रिश्तेदारी की शादी में शामिल होने और कोई सुसराल में सासू अम्मा के हाथ की स्वादिष्ट जलेबी और पूरी - आलू दम का भोग लगाने की योजना बना रहा था .

अपनी कोठी हरवंश भवन के मरदानखाने में रोनक इस लिए थी क़ि बड़े मालिक (तहसीलदार साहब )अपने चंद मित्रों के साथ तीरथ यात्रा पर निकलने वाले थे. उस समय बाबाजी , कोठी के बड़े आँगन में महाबीरी ध्वजा के सन्मुख , हाथ जोड़े , आँख मूंदे खड़े यात्रा से सकुशल वापस आ पाने के लिए प्रार्थना कर रहे थे . आगन में दूर एक कोने में खड़ी दादी माँ भी सजल नेत्रों से कुछ ऎसी ही प्रार्थना कर रहीं थीं. वह बहुत दुखी थीं .बाबा उन्हें इस यात्रा में अपने साथ क्यों नहीं ले जा रहे थे ? यह प्रश्न उनको बार बार कचोट रहा था..पर बाबा जी से कौन पूछे. सब उनसे छोटे थे .


शेष कथा कल सुनाऊंगा.


--निवेदन: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

3 टिप्‍पणियां:

vivek ने कहा…

प्रभु बाकि की कथा कहाँ हैं .. किर्पया आगे बातें की क्या हुआ कैसे हुआ

सादर
विवेक श्रीवास्तव

Bhola-Krishna ने कहा…

विवेक बेटे , प्यार से तुम्हे विक्की कहूँगा ! अस्वस्थ हूँ , यादास्त भी कमजोर हो गयी है , जैसी प्रेरणा होती है लिख देता हूँ , बेटा आपके प्रश्न का सामान्य उत्तर अभी दे रहा हूँ !

बेटा हनुमत कृपा तो हम सब पर प्रति पल बरसती रहती है ,उनकी कृपा के बिना तो कुछ भी हो नहीं सकता ! उनकी कृपा न होती तो हम यहाँ अमेरिका में न होते और आप जहां भी हैं वहाँ नहीं होते ! उनकी कृपा का आनंद लूटिये !

हाँ , आपने जहां तक मेरे ब्लॉग पढे हैं उसके आगे के आलेख पढिये , आपको शायद पूरी कथा मिल जायेगी . न मिले तो मुझे सीधा पत्र लिखें ! दे पाया तो उत्तर दूँगा , नहीं तो क्षमा याचना कर लूँगा ! प्रसन्न रहिये ," उन्हें" उनकी कृपाओं के लिए धन्यवाद देते रहिये ! आपको और आपके परिवार को बहुत आशीर्वाद ! - भोला बाबा / नाना

Bhola-Krishna ने कहा…

विवेक बेटे , प्यार से तुम्हे विक्की कहूँगा ! अस्वस्थ हूँ , यादास्त भी कमजोर हो गयी है , जैसी प्रेरणा होती है लिख देता हूँ , बेटा आपके प्रश्न का सामान्य उत्तर अभी दे रहा हूँ !

बेटा हनुमत कृपा तो हम सब पर प्रति पल बरसती रहती है ,उनकी कृपा के बिना तो कुछ भी हो नहीं सकता ! उनकी कृपा न होती तो हम यहाँ अमेरिका में न होते और आप जहां भी हैं वहाँ नहीं होते ! उनकी कृपा का आनंद लूटिये !

हाँ , आपने जहां तक मेरे ब्लॉग पढे हैं उसके आगे के आलेख पढिये , आपको शायद पूरी कथा मिल जायेगी . न मिले तो मुझे सीधा पत्र लिखें ! दे पाया तो उत्तर दूँगा , नहीं तो क्षमा याचना कर लूँगा ! प्रसन्न रहिये ," उन्हें" उनकी कृपाओं के लिए धन्यवाद देते रहिये ! आपको और आपके परिवार को बहुत आशीर्वाद ! - भोला बाबा / नाना