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आज का आलेख

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

श्री श्री माँ आनंदमयी

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श्री श्री माँ आनंदमयी 

प्रेरणा स्रोत - पूर्ण समर्पण   


निज अनुभव 


जब जीवन की हर एक घट्ना ही प्यारे प्रभु की रचना जान पड़े जिसके दर्शन से आनंद ही आनंद की अनुभूति हो,तब आप ही कहें क्या भूला जाये ,क्या याद रखा जाये, कहाँ से शुरू किया जाये और कहाँ समापन किया जाये. मेरी समस्या यही है.पर अब अधिक प्रतीक्षा नही करवाऊंगा .चलिए शुरू हो जाता हूँ .
.
प्रियजन  ब्रह्म्लीना श्री श्री माँ आनंदमयी ने एक सत्संग सभा में ( मुझे तब ऐसा लगा था ,मुझे ही संबोधित कर के) एक अति महत्वपूर्ण सूत्र उजागर किया था .हमारी उस समय की मनःस्थिति में माँ का बताया सूत्र ,सोलह आने मेरी शंका का समाधान कर गया था.आज पुनः मैं शंकित हूँ मेरी समझ में यह नहीं आ रहा  है क़ी मैं कहाँ से शुरू करूं .मुझे आज फिर श्रधेया माँ के उस कथन की याद आ गयी है.मुझे विश्वास है क़ी उनका वह सूत्र मेरी आज की समस्या भी हल कर ही देगा.आप जानना चाहेंगे माँ ने क्या कहा था. मेरे प्रिय जन उन्होंने कहा था :-


" जब यह न समझ सको क़ी क्या लिखूँ,क्या बोलूँ ,निराश हो कर अपनी कलम फेककर अकर्मण्य हो बैठ मत जाओ..पिताजी .अपनी कलम और जोर से पकड़ कर कागज़ पर उतार दो.और फिर पढो क़ी कागज़ पर क्या लिखा गया: (माँ ने मुझे ही संबोधित करके पूछा था-मैं अवाक था, हंसते  हुए उन्होंने फिर कहा) क्या पढोगे पिताजी ,तुमने तो कुछ लिखा ही नहीं. हाँ तुमने कुछ नहीं लिखा -- कीन्तू ओई गोपाल सोब कीशू लीखे दीयेचें - वो ऊपर वाला भोगवान ने सब लिख दिया. पर लिखा.क्या ? शून्य -शून्य पिताजी ,आपनी आमी सौबे शून्यो आची ,शेई गोपालजी आमादे आप्नाये जानाच्चेंन ,(she said that with out HIS GRACE we are all big CIPHERs That is what HE the LORD tells us through  the inked impression left by the point of your pen on the paper.)वह कहती गयीं "प्रभु इस  प्रकार हमे हमारी शून्यता और असमर्थता का एहसास करा देते हैं. उसके बाद तुम्हे क्या करना है आमी तोमाय बोलबो"


माँ ने फिर कहा "ऎसी स्थिति में तुम्हारे पास केवल एक रास्ता है , अपने आप को पूरी तरह प्रभु की  शरण में समर्पित कर देने का.और उनसे प्रार्थना करने का क़ी प्रभु हमे ऎसी बुद्धि और शक्ति दो क़ी ह्म अपना कार्य  भली भाँती सम्पन्न कर सकें.जब अपना खालीपन (शून्यता) प्रभु को बताओगे प्रभु तुरत ही तुम्हारी झोली नूतन ज्ञान से भर देंगे.प्रेरणाएं उमड़ घुमड़ कर तुम्हारे पास आ जायेंगी, इस प्रकार,प्रभु कृपा से आप का कार्य सफलता से संपन्न हो जाएगा.


यह  हमारा १९७४-७५ में हुआ "निज अनुभव" है जब माँ बम्बई आयीं थीं और उनका प्रवचन पूर्वी अंधेरी में हुआ था.


इसी प्रकार ऊपर से प्रेरणाएं मिलती रहेंगी और मैं आपको अनुभव सुनाता रहूंगा.अभी इतना ही.


निवेदक: व्ही.  एन. श्रीवास्तव "भोला"
जाएगा.

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