सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 21 अगस्त 2010

JAI JAI JAI KAPI SOOR (21/8/10)

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हनुमत  कृपा - निज अनुभव
गतांक से आगे.

अनुभवी चिंतकों का कहना है क़ी किसी भी कार्य की सफलता में, ईश्वरीय-कृपा का योगदान उसके कर्ता के पुरुषार्थ से कहीं अधिक होता है. अपने अनुभव के आधार पर मेरा दृढ़ विश्वास है क़ी मेरी समस्त सफलताओं का मूल कारण केवल "उनकी कृपा" है. भाई  मैं यह भलीभांति जनता हूँ क़ी कार्य करने की क्षमता भी तो हमे  "उनकी" कृपा से ही मिलती   है और "उनकी" कृपा  प्राप्ति का एकमात्र साधन है, "उनसे" हार्दिक प्रार्थना करना

होस्पिटल में मेरे ऊपर "उनकी " कृपा पल पल  हो रही थी.पहले दिन से आखरी दिन तक, मुझे मिला स्नेह पूर्ण उपचार ,पांच सितारे की एयर कन्डीशन युक्त सुख सुविधा ,चौबीसों घंटे की एक्सपर्ट नर्सिंग सर्विस तथा कठोर अनुशासन प्रिय हार्वर्ड स्कूल के स्नातक प्रमुख विशेषज्ञ डोक्टर  दीपक तलवार की अति विशिष्ट सेवाएं.

प्रियजन ये सब सांसारिक सुख तो मेरी इस माटी क़ी काया को.उस हॉस्पिटल में मिले पर जो परमानंद मेरी आत्मा को ,उन २५-३० दिनों में वहाँ प्राप्त हुआ उल्लेखनीय तो है पर शब्दों में उसे बयान कर पाना मेरे लिए कठिन लग रहा है. अपनी सुप्तावस्था में देखे चलचित्र के वे अंश ही मैं बता पाउँगा जो जागने के बाद भी  मेरे मानस पटल से लोप नहीं हुए थे. हाल में धर्म पत्नी कृष्णाजी ने वैसी ही एक घटना की याद मुझे अभी दिलायी.  

होस्पिटल में एक प्रातः मैंने उन्हें बताया था -"मैं अभी सीधे हरिद्वार के साधना सत्संग से लौट कर आया हूँ, वहाँ नित्य   मुझे महाराज जी के अति निकट बैठने का सौभाग्य मिलता था.  एक दिन ऐसा  हुआ , मैं नत मस्तक हो उन्हें  प्रणाम कर रहा था तब महाराजजी ने बहुत स्नेह से मेरे मस्तक का स्पर्श किया .उस स्पर्श मात्र ने मेरे मन को परमानन्द से भर दिया और मैं महाराज जी के श्री चरणों पर अपना सिर  रख कर बिलख बिलख कर काफी देर तक रोता रहा.जब सिर  उठाया ,महाराज जी ने रूमाल से अपने चरणों पर गिरे मेरे अश्रु बूंदों को पोंछ कर वह  रूमाल  मुझे दे दिया". कृष्णा जी को यह कथा सुनाते  समय भी मैं गद गद हो गया था ,मेरे नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये थे और मैं आंतरिक आनंद से .पूर्णतः रोमांचित हो रहा था..

महराज जी का यह स्वप्नदर्शन मेरी किसी प्रार्थना के फलस्वरूप तो नहीं हुआ होगा. मैं अचानक ही ऐसा लायक कैसे हो गया जो  महाराज जी का इतना सारा स्नेह मुझे एकबारगी मिल गया..अवश्य ही मुझे यह उपलब्धि मेरे परम स्नेही गुरुजनों के आशीर्वाद और परम प्रिय स्वजनों की दुआओं और प्रार्थनाओं  के कारण ही हुई  होगी 


अभी अभी मेरा उपरोक्त संदेश पढ़ कर कृष्णा जी ने मुझे फिर याद दिलाया क़ी उसी सायं काल हमे  इंटेंसिव केअर यूनिट के एकांत से छुट्टी मिली और मुझे एक प्राइवेट केबिन में रखा गया.जहाँ कृष्ण जी एक अतिरिक्त हेल्प के साथ ह्मारे पास वहीं होस्पिटल में रह सकतीं थीं  क्या यह मुझे ,पिछली रात प्राप्त ,श्री महाराज जी के दिव्य स्वप्न दर्शन के फलस्वरूप  प्राप्त  हुआ.? आप ही निर्णय करें बड़ी कृपा होगी. 


हाँ एक और आश्चर्य जनक बात हुई .मैं यह संदेश लिख रहा था क़ी सिंगापुर से परम प्रिय अनिल का फोन आया. उन्होंने बताया क़ी पिछले सप्ताह श्री महाराज जी सिंगापूर आये थे और वह अति स्नेह से हमे याद कर रहे थे. इए पर मुझे याद आया क़ी एक बार भारत यात्रा में मैंने महाराज जी से कहा था क़ी पत्र लिख कर मैं उनका अनमोल समय नष्ट नहींकरना चाहता  लेकिन मैं कहीं भी हूँ ,एक पल को भी उन्हें भूल नहीं पाता और मुझे उनका दिव्य दर्शन दूर विदेश में भी हर घड़ी होता रहता है  उत्तर में महाराज जी ने हंस कर कहा था ."प्रेम एक तरफा नहीं होता श्रीवास्तव जी "  मैं धन्य हो गया था.......क्रमशः .


निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव  "भोला"
.  .
. ..

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