सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

JAI JAI JAI KAPI SOOR (Aug.12 ,2010)

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हनुमत कृपा-निज अनुभव 
गतांक से आगे 


नवम्बर २००८ भारतीय इतिहास का एक अति मलिन पृष्ठ है. बहुत परेशानियाँ उठायीं थीं देशवासियों ने उस वर्ष, इस महीने के आखिरी दिनों में.एक बहुत शर्मनाक और निराशा जनक चित्र उभरा था उस २६ नवम्बर २००८ की रात ,हमारे देश की  तत्कालिक आतंरिक सुरक्षा तैयारियों की.


इत्तेफाक से उन दिनों ह्म वहीं भारत में थे . २५-२६ नवंबर के लगभग हमे अपना भारत भ्रमण संपन्न कर के मुंबई पहुंचना था जहाँ से हमे बोस्टन के लिए सीधी  उड़ान पकड़नी थी.इन सभी हवाई यात्राओं का पूरा इंतजाम पहिले से ही किया जा चुका था. और इनके कनफर्म एयर टिकेट महीनों पहिलेअमेरिका में ही बनवा लिए गये थे.


जैसे जैसे भारत छोड़ने के दिन निकट आ रहे थे बचे खुचे काम पूरे करने का प्रेशर बढ़ रहा था.पर दूसरी ओर जहाँ अक्टूबर नवम्बर में दिल्ली का मौसम कुछ ठंडा होना चाहिए था वहाँ सडी ऊमस भरी गर्मी और उस पर कारों    कार्खानों का प्रदूषण,और धूल धक्कड़ से भरा वायुमंडल.ह्म दोनों को ही सांस लेने में काफी दिक्कत होने लगी थी. पर काम तो पूरे करने ही थे.    


जो भजन रेकोर्ड होने थे उनके लिए  रेकोर्डिंग स्टूडियो और म्यूजिक अरेंजर का चुनावहोगया .शेडूल के मुताबिक काम चालू भी हो गया लेकिन इस बीच मुझे सांस लेने में कष्ट के साथ साथ खांसी जुखाम और हल्का ज्वर  रहने लगा जैसे तैसे भतीजी प्रीति,बहु बेटी अमिता ,बेटे माधव और उसकी बिटिया नन्दिनी की मदद से रेकोर्डिंग पूरी हुई .ह्म बहुत प्रसन्न थे क़ी इस रेकोर्डिंग में ह्मारे परिवार की   तीन पीढ़ियों  ने मेरा  सह्योग दिया था.. ह्मने मिलजुल कर  अपने परिवार के इष्ट देव श्री हनुमान जी की चालीसा भी अपनी पारिवारिक - पारंपरिक धुन -" हमारे राम जी से राम राम कहियो जी हनुमान "के साथ  रेकोर्ड कर ली थी.


तब तक अमेरिका की उड़ान  पकड़ने के लिए हमारे मुम्बई पहुचने का दिन भी आगया वहाँ पर मेंरे बड़े भैया का पूरा परिवार और मेरी छोटी बहन माधुरी रहती हैं,उनसे मिलना ह्म़ारे लिए  बहुत आवश्यक था.दो तीन वर्ष के अंतराल पर भारत आया था उनसे बिना मिले कैसे वापस जा सकता था.


पूर्व निर्धारित  कार्यक्रम के अनुसार हमे उस  दुर्भाग्यपूर्ण २६ नवम्बर को मुम्बई में ही रहना था
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आगे की कथा फिर कभी.


निवेदक : व्ही. एन.  श्रीवास्तव. "भोला".















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