शनिवार, 4 सितंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR ( Sep.3/4 '10)


हनुमत कृपा -निज अनुभव 
गतांक से आगे 

प्रियजन !  कल मैं उस प्रकाशपुंज का वर्णन कर रहा था जो मैंने हॉस्पिटल के इंटेंसिव केअर यूनिट में उस रात्रि में देखा था जिसे डॉक्टरों ने मेरे जीवन के लिए अति क्रिटिकल घोषित कर दिया था . अवश्य ही उस रात मेरे सभी स्वजन अपने अपने इष्ट देवों को मनाने की अथक चेष्टाओं में लग गये होंगे. परिवार वालों का हाल कैसा होग़ा  और कृष्णा ,श्रीदेवी ,प्रार्थना,नम्रता ,नंदिनी और माधव बेटे की  मनः स्थिति कैसी होगी और उनकी वह  काली रात कैसे कटी होगी आप धर्मात्मा जन भली भांति आँक लेंगे मेरे अनुमान से केवल प्रार्थना ,प्रार्थना और प्रार्थना ही हुई होगी.(संकट कट जाने के बाद ज्ञात हुआ क़ी देश विदेश में कितने स्वजनों  ने उन दिनों इस तुच्छ प्राणी के जीवन रक्षा हेतु प्रार्थनाएं कीं ) .

पवित्रात्माओं की पूरी आस्था और अटूट विस्श्वास  से की हुई प्रार्थना कदापि अनसुनी  नहीं रहतीं. आप सब की प्रार्थनाओं के फलस्वरूप ही आज इस मानव तन का  हृदय 
स्पन्दित है और इसका स्वास प्रस्वास एवं अंग प्रत्यंग गतिशील है. प्रियजन ! सच पूछिये मुझे तो ऐसा  लगता है जैसे उस रात का "ज्योति पुँज" जो अचेतन अवस्था में मुझे दिखई  दिया था उसका उद्गम भी आप सब के समर्पित हृदय में ही है.

हाँ, प्रियजन, मैं उस भव्य प्रासाद के पूरी तरह खुले हुए प्रमुख द्वार पर खड़ा था .मुझे ऐसा लग रहा थ जैसे उस द्वार के दोनों  विशाल पल्ले ,बांह फैलाए ,उस महल में मेरा स्नेहिल स्वागत कर रहे हैं .इस समय मन में एक धुन गूंज रही है .अभी सुना दूँ,कल तक कहीं भूल न जाऊं,इस डर से.धुन के शब्द हैं :-

राम धाम में स्वागत करने सद्गुरु खुद आयेंगे ,
बांह थाम कर  तेरा तुझको "उन" तक पहुंचाएंगे 

आज की रचना के बोल से ऐसा लगता है जैसे वह भव्य राजमहल "राम धाम"ही रहा होग़ा  
"What a wishful thinking  ? Any way. भाई अब है तो है .मैं मजबूर  हूँ,,प्रेरक वह परम शक्ति जो करवाए करता रहूंगा.

भटक रहा हूँ,कहीं खो न जाऊं ,इसलिए यहीं रुकने में भलायी है.कल फिर मिलूंगा.

निवेदक:- व्ही, एन. श्रीवास्तव ""भोला "   
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