सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

JAI JAI JAI KAPI SUR # 182

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हनुमत कृपा 
निज अनुभव

संत तुलसीदास कृत वन्दना की ये चौपाइया लिखते समय मेरे मन में सतत अपने इष्ट देव का सिमरन चल रहा था ! ऐसे में  मेरे अंतरात्मा ने विश्वास दिलाया "भाई ! हमारे प्यारे प्रभु श्री रामजी तो करुणानिधान हैं !वह अकारण  ही आर्त जन पर कृपा करते  हैं, तुझे भी निराश नहीं करेंगे !" और हुआ भी वैसा ही , उन्होंने मेरी पुकार सुन ली !तभी तो वही कम्प्यूटर और वही मैं ,आज कैसे बिना किसी अवरोध के फटाफट संदेश लिखते जा रहे हैं !एक बात बताऊँ ऐसे में अब यह डर लगता है कि कहीं फिर किसी की नजर न लग जाय !( भाई मेरी अम्मा कहा करतीं थीं कि हमें  अक्सर अपनी ही नजर लगा करती है!  ह्म स्वयं ,जीवन में छोटी छोटी सफलता पा कर अहंकारवश ऐसा इतराने लगते हैं कि हमें  संसार में कोई भी अपने जैसा दिखता ही नहीं और फिर हमें  अपनी ही नजर लग जाती है अस्तु अहंकार से बचो )


प्रियजन!एक बार फिर प्रियतम प्रभु का मन में सिमरन कर के मैं अपने "निज अनुभव" के समापन का दृश्य प्रस्तुत करने का  प्रयास कर रहा हूँ ! तो सुनिए और देखिये .....


मैं वह यंत्र हाथ में लेकर उस पशु कंकाल की ओर जा रहा था कि आसमान से अचानक उतरे उस नन्हे फरिश्ते ने मुझे रोक लिया ! जिद करने लगा कि मैं वह यंत्र उसे दे दूँ! खेलने को नहीं !,वह उस यंत्र से वही कार्य कर दिखाना चाहता था जिसे अपने जन्मजात संस्कारों और धार्मिक आस्थाओं के कारण मैं नहीं करना चाहता  था!


उसके इसरार के कारण मैं बड़े धर्म संकट में पड़ गया था ! उस देश का एक आठ दस साल का वह नन्हा बालक ,वह बिजली से चलने वाला धारदार यंत्र चलाना चाहता है !कैसे विश्वास करता क़ि वह यंत्र जिसका विकास योरप में उसी वर्ष हुआ था और वह उस देश में कुछ दिन पहिले ही आयात  किया गया था वह बालक चला पायेगा !                     


यह विश्वास करना कठिन ही क्यों असंभव था कि वह छोटा बालक वह यंत्र चला पायेगा पर मुझे तो वह एक देवदूत सा ही दीख रहा था जिसे परम प्रभु ने मेरी सहायता करने को अवतरित किया हो !

मन में स्वधर्म और तत्कालिक स्वकर्म का द्वंद छिड़ा रहा !एक ओर भगवान श्री राम से प्राप्त यह मन्त्र कि "भावना से कर्तव्य ऊंचा है" मुझे यह प्रेरणा दे रहा था कि मैं आस्था और धर्म की भावनाओं का परित्याग कर उस पशु कंकाल पर वह यंत्र चला कर अपना कर्तव्य निभाऊँ!और दूसरी ओर यह विचार क़ि  यह बालक भी तो अपने इष्ट की प्रेरणा से ही वह काम कर दिखाने की जिद कर रहा होगा ! मैं असमंजस में पड़ा हुआ कुछ पल को स्थिर खड़ा रह गया !

क्रमशः 
निवेदक :व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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