सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 1 9 7

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हनुमत कृपा 
पिताश्री के अनुभव 
क्या किसी को,कभी भी निराश किया है ,ह्मारे संकटमोचन विक्रमबजरंगी श्री हनुमानजी ने ? यूं तो अवश्य ही ह्म सब "उन्हें" भली भांति जानते-मानते हैं, फिर भी यदि किसी को कोई शक है तो वह थोड़ा सा, बस ज़रा सा  प्रेम "उनसे" करें और देखे कि कैसे "वह" उस व्यक्ति के निजी जिरह बख्तर बन कर प्रतिपल उसके अंग संग रह कर जीवन भर उसकी रक्षा तथा सहायता करते रहते हैं !ह्म और कुछ न करें ,केवल यह एक  प्रार्थना यदि मनही मन अपने इष्ट देव से करते रहें तो हमारा कार्य सिद्ध हो जायेगा !
"जयजयजय हनुमानगोसाईं ,कृपा करहु गुरुदेव  की नाईं"
संसार के सब धर्मों के सार्वजनिक देवस्थानों की यदि गिनती की जाये तो उनमें  सबसे बड़ी संख्या हनुमानजी के मन्दिरों की ही होगी और इन मंदिरों में जमा होने वाले  प्रेमी भक्तों की गणना कर पाना तो मानो असंभव ही है ! विश्व भर में नागरिकों के घरों में यदि  ह्म "उनके" चित्र , मूर्तियों और ध्वजाओं की गिनती करने का प्रयत्न करें तो यह गिनती भी कभी पूरी  नहीं हो पायेगी ! इसके अतिरिक्त यह भी सर्वविदित सत्य है क़ि संसार के सभी धार्मिक प्रकाशनों में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली और गायी जाने वाली भक्ति रचना गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री हनुमान चालीसा है ! प्रियजन , ऐसा क्यों है ?
हनुमान जी, बिना बुलाये वहाँ पहुँच जाते है जहां उनके "प्रेमी" जन उन्हें प्रेम से याद करते हैं ,जी हाँ केवल याद करते हैं , आवाज़ लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती ! जरा सोच कर कहें ,क्या है कोई अन्य देवता ऐसा ,जो इतनी सरलता से अपने प्रेमीजनों की उदासी दूर 
कर उन्हें पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देता है,उन्हें बल ,बुद्धि और विद्या प्रदान कर, सन्मार्ग पर चला देता है ,उनकी आत्मशक्ति को प्रबुद्ध करता है ! नहीं  न ! प्रियजन,सुगमता से   निर्भय बना सकने वाली दिव्यशक्ति हमें श्री हनुमत भक्ति से ह़ी उपलब्ध होगी !चलिए कथानक आगे बढायें --
किम्कर्तव्यविमूढ़ से ह्मारे पिताश्री आजमगढ़ कचहरी के पिछवाड़े वाली कच्ची सड़क पर स्थित प्राचीन कुँए की लखौरी ईटों वाली खंडहर हो रही जगत पर उदास बैठे थे !मुगलों या अवध के नवाबों के जमाने के उन खण्डहरात की तरह ह्मारे पिताश्री को उनके अपने भविष्य के सपनों का भग्नावशेष भी उतनी ही बेतरतीबी से बिखरा हुआ वहाँ दिखायी दे रहा था !वहाँ बैठे बैठे वह मुन्सफी की ओर से आनेवाले अर्दलियों ,वकीलों ,मुवक्किलों से नजर चुरा रहे थे कि कोई उन्हें पहचान कर भैया से उनकी शिकायत न कर दे ! उनके इष्ट देव की कृपा से उस समय उनकी जान बच गई क्योंकि कचहरी बंद हो गयी थी और उस सडक पर आवाजाही खत्म सी हो गयी थी ! तभी --
किसी ने पीछे से पिताश्री के कंधे पर हल्के से थपथपाया ! चौंक कर पीछे देखा तो कुछ इत्मीनान हुआ ,वह व्यक्ति उनके जज भैया का परिचित न था ! सम्हल कर पिताश्री ने उस  आगंतुक से पूछा " कहिये, क्या बात है ?" !ठेठ अवधी भोजपुरी में वह बोला " आप कहो बाबू ,आपकेर कौन बात है ,जोन आप  इहाँ उहाँ ,लुक्का छुप्पी खेल रहे होऊ! जावो घरे लौट जाओ"! स्थानीय जज साहब के छोटे भाई थे ,चुप क्यों रहते ,थोड़े अभिमान से पिताश्री ने उन्हें उत्तर दिया " ह्म कहीं भी उठें बैठें, तुमसे क्या ,तुम पानी पीयो और अपना रास्ता पकड़ो" !आगंतुक ने भी कुछ गुस्से के साथ उनसे कहा " बाबू कौउ तुम्हार रस्ता देखत होई और तुम इहाँ मुंह छुपाये बैठ हो ,जाओ घरे लौट जाओ "! पिताश्री चौंक गये !कौन है यह अजनबी जो इतना अपनत्व दिखा रहा है और इतनी गम्भीरता से उन्हें आदेश दे रहा है ?   पिताश्री पुनः चिंता में डूब गये !



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