सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

jAI JAI JAI KAPISUR # 2 0 6

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हनुमत कृपा 
पिताश्री के अनुभव

प्रियजन ! पिताश्री के जीवन पथ का अंधकार दूर कर उसे जगमगा देने वाले वह प्रकाश पुँज स्वरूप बाबाजी उन्हें अनायास ही आजमगढ़ कचहरी के कुँए पर मिले और अपना कार्य सम्पन्न करके जैसे प्रगट हुए वैसे ही अंतर्ध्यान भी हो गये ! लेकिन उन्होंने जो भी   भविष्यवाणी की वह अक्षरशः सच निकली ! 

भडभूजे ने जिस कागज की पुड़िया में प्रसाद के लिए गुड़ चना दिया उसी में वह इश्तहार छपा था जो पिताश्री के भाग्योदय का प्रथम प्रवेश द्वार सिद्ध हुआ ! बाबाजी कैसे जानते थे क़ि अपनी हड़बडाहट  घबड़ाहट में पिताश्री वह इश्तहार देखते हुए भी उतनी  बारीकी से नहीं पढ़ पाएंगे जितनी गंभीरता से उसे बड़े पिताश्री पढ़ेंगे ! 

कौन थे वह अजनबी ? बड़े पिताश्री तो उन्हें तभी पहचान गये थे पर तब नयी उम्र के मेरे पिताश्री इतनी जल्दी यह मानने को तैयार नहीं थे ! लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया और एक एक कर करके उन अजनबी बाबाजी की कही हुई बातें सच होती गयी ,उन्हें भी विश्वास हो गया क़ि वह आगंतुक कोई अन्य नहीं ह्मारे कुलदेवता श्री हनुमान जी ही थे !

और हाँ जब उस घटना के लगभग २०-२५ वर्ष बाद मेरे बालपन में पिताश्री ने स्वयं अपना यह अनुभव सुनाया तब शुरू में हमे भी इस बात पर विश्वास करना कठिन लगता था !लेकिन जैसे जैसे मैंने होश सम्हाला ,बड़ा हुआ,मुझे भी इस का विश्वास हो गया क़ि वह देवदूत जो उसदिन  ह्मारे पिताश्री के समक्ष अवतरित होकर उनका मार्ग दर्शन कर गया वह अवश्य ही "परम" का कोई विशेष अंश रहा होग़ा ! मेरे प्रिय पाठकगण ! उसी परम की कृपा से मुझे अपने जीवन के प्रारंभ में ही यह सुबुद्धि मिल गयी और अति सहजता से यह रहस्य समझ में आगया था !

आप सब भी अपने अपने इष्ट में अटल विश्वास रखें ,अपना धर्म समझ कर अपने कर्म 
करते रहें ! आपके इष्ट अवश्य ही आपको अनुग्राहित करेंगे !

प्रियजन ! वयस जनित (उम्र की वजह से ) अस्वस्थता के कारण हो सकता है किसी दिन मै अपना संदेश प्रेषित न कर पाऊँ ,पर विश्वास दिलाता हूँ क़ि राम का यह काम जो हमने 
नवजीवन पाने के बाद उनके ही आशीर्वाद और प्रेरणा से प्रारंभ किया है ,करता रहूँगा ,जब तक "वह"हमे विवेक बुद्धि और समुचित शक्ति देते रहेंगे .

उनके एहसान की लम्बी ये दास्ताँ आइये ह्म सभी गुनगुनाते रहें    
खतम होगी नहीं जब तलक सांस है आप सुनते रहें ह्म सुनाते रहें 

राम राम 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"           
दिनांक ३०/३१ अक्टूबर २०१० (मध्य रात्रि USA East time)

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