सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 8 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 1 3

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हनुमत कृपा 


पिताश्री के अनुभव

चलिए कथा आगे बढायें ,कुछ पिछली बातें भी ,याद दिलाने के लिए दुहराउंगा! लगता है आज श्री हनुमान जी प्रसन्न हैं,और आगे की कथा सुनाने की आज्ञा वह दे रहे हैं !सुनिए 
जज,मजिस्ट्रेट, एडवोकेट,वकील मुख्तियार अध्यापको के परिवार के,और श्री चित्रगुप्त वंशीय मुंशियों के होनहार सपूत हमारे पिताश्री "रंगरेज़"  बनने जा रहे थे !खानदान में ,पडोसिओं में ,जाति बिरादरी वालों में.काफी मजाक उड़ा !हितेषियों ने सहानुभूति जताते हुए भोजपुरी भाषा में कहा " राम राम कायथ हो के रंगरेजी करिहें ! ई ता अच्छा भेल की महाबीर जी के किरपा से इनके बियाह भा गईल बा ,ना ता के  देत इनका के आपन लडकी   HE IS LUCKY AS HE IS ALREADY MARRIED,OTHERWISE HE WOULD HAVE REMAINED A BACHELOR FOR ALL HIS LIFE.WHO AMONGST KAYASTHAS WOULD HAVE GIVEN  HIS DAUGHTER TO THIS 'RANGREZ' ? )  स्वयं मेरी माँ  ने ऎसी बातें घर के आँगन में जमा हुई सहांनुभूती दर्शाती बिरादरी  की महिलाओं से बहुत दिनों तक सुनीं!  ऐसा था हमारे समाज का चिंतन और ऐसी थीं हमारी मान्यताएं तब उस जमाने -१९१५-१६ में !


मैं जब १९५० में हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के COLLEGE OF TECHNOLOGY से ग्रेजूएशंन कर के घर आया तब  मेरे जीवन में भी कुछ ऎसी ही समस्या आ गयी जैसी मेरे पिताश्री को रंगरेजी की पढायी करते समय हुई थी.! ऐसा हुआ था क़ि ---मैं अपने परिवार का छोटा और अविवाहित पुत्र था इस कारण,सर्विस पर मुझे कानपूर से कहीं दूर भेजने के लिए घर वाले तैयार न थे ! और हालत यह थी क़ि उन दिनों पूरे विश्व के "जॉब मार्केट" में भयंकर मंदी चल रही थी ! अपने देश मे आज़ादी प्राप्ति के बाद के ३ वर्ष में ,१९५० तक मंत्री बने नेताओं की कृपा से आवश्यकता से अधिक लोग सरकारी कामों में लग चुके थे ! कानपूर की निजी कम्पनिया और मिलें भी बंद हो रहीं थीं ! कहीं भी नौकरियां उपलब्ध नहीं  थीं ! हमारे पिताश्री की कम्पनी में मुझे टाइम पास करने के लिए एक जॉब ऑफर किया गया जो मैंने अस्वीकार कर दिया ! इस प्रकार कितने महीने गुजर गये !

महीनों की बेकारी के बाद एक सरकारी LEATHER FACTORY  से मुझे OFFICERS APPRENTICE की जॉब का ऑफर आया ! परिजन भूले नहीं थे क़ि पिताश्री की रंगाई की  पढाई के पीछे कितना हल्ला गुल्ला मचा था ! मेरे "चरम शोधन" कार्य में लगने पर मेरा क्या हश्र होगा इसकी चिंता सबको सताने लगी ! लोगों को यह  डर लगने लगा क़ि यदि चमडा कारखाने में गया तो भोला कुंवारा ही रह जायेगा !बिरादरी में कोई उसको अपनी कन्या नहीं देगा!पर मैं जानता था क़ि  "संकटमोचन श्री हनुमान जी" जो भी करेंगे हमारे लिए हितकर होगा!! मेरी अर्जी उनके दरबार में लगी हुई थी !

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