सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 30 जून 2010

OUR PRAYERS

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हमारी प्रार्थना 


निज अनुभव --गतांक से आगे

प्रार्थना हमारी अंतरात्मा की पुकार है .जब ह्म आर्त भाव से प्रभु को पुकारते है , वे हमारी पुकार अवश्य सुनते हैं .हम चाहे अपने देश में ,हों या विदेश में ,चाहे घर में हों या मंदिर में,पूरी आस्था और विश्वास से की हुई प्रार्थना के प्रसाद स्वरूप प्रार्थी का हृदय आनंद के अमिय रस से भर जाता है. .दक्षिणी अमेरिका  की पोस्टिंग में जो भारतीय मूल के वेस्ट इंडियन हमे मिले और उनके साथ जो सत्संग का सौभाग्य मिला वह अविस्मरनीय है.उनकी प्रार्थना उनके भजन उनके कीर्तन ऐसे थे जो सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत में प्रचलित रहे होंगे .डेढ़ दो शताबदी पहले जो कुछ उनके पूर्वज, जहाज़ों पर सवार होने से पहले ,भारत में गाते बजाते थे, आज उनके बाल बच्चे केवळ उतना ही जानते थे

केवल एकाध ही ऐसे थे जिन्हें भारत जाने का अवसर मिला था.इत्तेफाक से हमारे दोनों ही सत्संगी साथी 
भारत आ चुके थे .एक ने तो भारत में श्री औरोबिन्दो आश्रम ,( ओरोविल पोंडिचेरी) में श्रद्धेया माता जी के दर्शन भी किये थे और उनकी शिक्षाओं से बहुत प्रभावित भी हुए थे.,एक दिन के सत्संग में उन्होंने भारत में सीखा हुआ एक भजन सुनाया :-


सर्जन विसर्जन  तुम्हीं विश्वकर्ता
तुम्हीं विश्व ज्योति में हो प्राण भरता  
तुम्हीं काल के काल तुम्हीं शक्तिधारी 
स्वीकारो स्वयं वन्दना अब हमारी 

दया धर्म की मन में ज्योति जगाओ 
जीवंत पंथ मेरा प्रभु जगमगाओ 
हरो पाप मेरे भरो भाव भक्ति 
मुझे नाथ दो अपनी तुम दिव्य शक्ति 

मुझे  मोह माया के सागर  से तारो 
मेरे   काम और क्रोध को नाथ मारो 
अहंकार मेरा हरो शक्तिदाता 
मेरा कोटि कोटि है वंदन विधाता

उपरोक्त शब्द बिलकुल वैसे हैं जैसे पुरातन काल में भारत के ऋषि मुनियों ने ,परमपिता  की कृपा प्राप्ति के लिए अपनी रिचाओं के द्वारा परमात्मा के श्री चरणों पर अर्पित किये थे.. इन रिचाओं के द्वारा उन  देवपुरुषों ने प्रभु से  दिव्य जीवन की मांग की और उनसे प्रार्थना की क़ि वह उन्हें धर्म की राह पर चलाए और उनके सारे पाप मिटा दे ,उन्हें मोह माया के बंधन से मुक्त करे तथा उनके स्वभाव से अहंकार,काम,  क्रोध आदि विकारों का नाश करदें.


प्रियजन,हमने ये भजन भारत में नहीं सुना था.लेकिन यह ह्म सब को इत.ना अच्छा लगा क़ि उसी समय, हमारे बड़े पुत्र ने ,इस के शब्द ,अपनी भजन की कोपी में नोट कर लिये..यह बात १९७५-७६ की है.आज ३५ वर्ष बाद भी ,यहाँ  यू एस  में ,वह कोपी जिसमे यह भजन लिखा है अभी तक सुरक्षित है तभी तो मैं आज उसके शब्द आपको बता सका हूँ.


अपने पारिवारिक सत्संग की प्रार्थनाएँ क्रमशःआपको बताता रहूंगा. अभी प्रार्थनाओं के फल स्वरूप प्राप्त प्रभु की कृपा का वर्णन करना शुरू भी नहीं कर पाया हूँ.जैसे ही उन का आदेश मिलेगा शुरू हो जाउंगा..


निवेदक:  व्ही.एन. श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 29 जून 2010

OUR PRAYERS

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हमारी प्रार्थना 


निज अनुभव - साउथ अमेरिकन पोस्टिंग 



आज प्रातः उठते ही इंटरनेट पर मेल देखा .एक पत्र था ओटवा (केनेडा) से चिरंजीव पराग जी का . उन्होंने मेरे कल के लेख के सन्दर्भ में टिप्पणी की है .बात यह है क़ि पराग उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हैं जिन्होंने बहुत बचपन में जब वह साफ़ साफ़ बोल भी नहीं सकते थे तब अपनी तोतली बोली में वह प्रार्थना सीखी थी .उन्हें आज भी जब वह लगभग ४० वर्ष के हो गये हैं ,यह प्रार्थना पूरी की पूरी याद है  वह उसका प्रसार अधिक  से अधिक प्रवासी भारतीयों के बीच करना चाहते हैं  पराग को निजी अनुभव से  यह पूरा विश्वास है क़ि राम परिवार की प्रार्थना करने से व्यक्ति टेंशन मुक्त हो जाते हैं .


पराग ने राम परिवार की दैनिक प्रार्थना के दो विशेष प्रकरण की याद  हमे दिलायी .उनमे से एक है परमार्थ निकेतन में नित्य प्रातःकाल होने वाली प्रार्थना का एक विशेष अंश. राम- परिवार की प्रार्थना में उपरोक्त उन्ही सूत्रों का स्मरण किया जाता था..ये  सूत्र  परिवार के सबसे छोटी उम्र के बच्चों से कहलाये जाते थे..एक बच्चा बोलता था और उसके पीछे, परिवार के अन्य बच्चे- बूढ़े उसका कहा हुआ वचन दुहराते थे..बच्चा लीडर होता था बाकी सब फ़ोलोवर .लीडर बनने की इच्छा बच्चों को उत्साहित करती थी . सभी बच्चे मन लगा कर प्रार्थना कंठस्थ करते थे जिससे क़ि  यदि वे लीडर बनाये गये तो कहीं उन्हें नीचा न देखना पड़ जाये . सब पूरी तैयारी से प्रार्थना सभा में आते थे. प्रार्थना के लिए कंठस्थ किये वचन ,जीवन भर के लिए उनके आचरण में संम्मिलित हो गये .  प्रार्थना के वे विशेष उपदेशात्मक सूत्र नीचे लिख रहा हूँ. 
श्री १०८ श्री स्वामी एकरसानंद जी सरस्वती से प्राप्त दस उपदेश.
पहला .  संसार को स्वप्न वत जानो.
दूसरा.    अति हिम्मत रखो.
तीसरा.   अखंड प्रफुल्लित रहो,दुःख में भी 
चौथा .    परमात्मा का स्मरण करो ,जितना बन सके.
पांचवा.    किसी को दुःख मत दो,बने तो सुख दो.
छठा.      सभी पर अति प्रेम रखो.
सातवाँ.   नूतन बालवत स्वभाव रखो .
आठवाँ.   मर्यादानुसार चलो.
नवां .      अखंड पुरषार्थ करो, गंगा प्रवाहवत , आलसी मत बनो. 
दसवां.    जिसमे तुमको नीचा देखना पड़े,ऐसा काम मत करो..

व्यवहार जगत में उपरोक्त दसों सूत्र  मनुष्यों के चारित्रिक भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं. पर इनमे से यदि एक,दसवां सूत्र ही भली भांति अपना लिया जाये तो फिर व्यक्ति का कल्याण सुनिश्चित ही समझें.चिरंजीव पराग ने इस दसवें सूत्र का उल्लेख अपने  मेल में किया है


राम परिवार की  पारम्परिक प्रार्थनाओं के विषय में बहुत कुछ कहना है.पूरी पूरी प्रार्थनाएं आपको बताऊंगा. धीरे धीरे . अभी इतना ही 


निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"



सोमवार, 28 जून 2010

FAITH & SURRENDER win HIS GRACE

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जनम दिया जिसने तुझे ,जो पल पल रहा सभार -
नहीं     तजेगा   वह   तुझे   भव  सागर  में   ड़ार .


निज  अनुभव - साउथ अमेरिकन पोस्टिंग 




हिंद महासागर से अतलांतिक की गोद में लहराते , नील वर्ण उत्तुंग तरंगो वाले करेबियन सागर तट तक की यात्रा जिस हरि की शुभेच्छा से हुई , वह कृपालु पालनहार प्रभु हमें  और हमारे परिवार को अवश्य कोई विशेष लाभ दिलाने के लिए ही इस देश में  यहाँ लाया है. हमें  लाभ ही लाभ होगा ,हमारा कोई अनर्थ नहीं हो सकता  .हमें  इस का पूरा भरोसा था.


तुलसी दास जी का  एक सूत्रात्मक कथन है " चाहे भौतिक जगत की बात हो अथवा आध्यात्मिक  जगत की,,बिना विश्वास के सिद्धि नहीं मिलती और ऐसा विश्वास केवल हरि भजन से ही उपलब्ध होगा ."

कवनिऊ सिद्धि क़ि बिनु बिस्वासा ,
बिनु हरि भजन न भव भय नासा . 

सांसारिक जीवन में वस्तु,व्यक्ति,परिस्थिति,पर विश्वास रखना अभीष्ट है इससे मन और बुद्धि को बल मिलता है ,चिंता मिटती है और आत्म शक्ति प्रबल होती है. सद्गुरु तथा परमात्मा पर अटूट भरोसा रखने वालों को  सफलता और प्रसन्नता का प्रसाद मिलता  है  प्रभु कृपा पर ,मेरा निजी विश्वास और मुझसे कहीं अधिक मेरी धर्मपत्नी कृष्णाजी और हमारे पाँचो बच्चों का भरोसा ही था जो उन दिनों हमारा संबल था .प्रियजन .जानते हैं कहां से ऐसा आत्मबल ह्म सब को मिला था. हमे यह अडिग विश्वास हमारी दैनिक  प्रार्थना से प्राप्त हुआ था.नित्य प्रति ह्म अपने अधिष्ठान के सन्मुख बैठ कर प्रार्थना करते थे क़ि " हे देवाधिदेव हमे ऎसी बुद्धि और शक्ति दो क़ि ह्म अपना कर्तव्य पालन लगन उत्साह और प्रसन्न चित्त से करते रहें. मुझसे कोई ऐसा कर्म न हो जो मेरे विवेक के विरुद्ध हो. " हमारे बच्चे (जो तब ८ से १६ वर्ष के थे) यह प्रार्थना उस दिन से  बोल रहे  थे जिस दिन से उन्होंने बोलना शुरू किया था. जन्म से ही यह प्रार्थना करते करते इसमें निहित सूत्र , उनके हर कर्म में जीवंत था.


हमारी यह प्रार्थना हमारे उन वेस्ट इंडियन भारतीयों को इतनी भायी क़ि केवल यही प्रार्थना सुनने और हमारे साथ मिल कर इसका उच्चारण करने के लोभ से (जैसा वे जोर जोर से कहते थे) वे दोनों सपरिवार हमारे साथ बैठ कर सत्संग करने को सदा ही उत्सुक रहते थे.


शेष अगले अंकों में 


निवेदक:- व्ही  एन  श्रीवास्तव  "भोला".

रविवार, 27 जून 2010

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सत संगत  के  तीन आयाम
सतचिन्तन,चर्चा, शुभ काम .




राम परिवार के  पारिवारिक सत्संग में ,वर्षों पूर्व  ब्रह्मलीन प्रज्ञाचक्षु श्री स्वामी  शरणानंद जी महाराज ने जीव को प्रभु की विशेष कृपा से प्राप्त ,सत्संग से  मिलने वाले तीन लाभों का उल्लेख किया था..उन्होंने कहा था क़ि सत्संग से प्राप्त होने वाला पहला लाभ है सत्चिन्तन का अवसर ,दूसरा है चिंतन किये हुए विषय पर आपसी चर्चा और अन्तत:चिन्तन और चर्चा से प्राप्त ज्ञान के आधार पर अपना भविष्य का  कार्यक्रम निश्चित करना. सत्संग के अतिरिक्त प्रभाव बताते हुए स्वामी जी ने मानस में से संत तुलसी की यह चौपाई  सुनाई  थी  :-

मति कीरति गति भूति भलाई  ,जब जेहि जतन जहां जेहिं पाई
 सो जानब सत्संग प्रभाऊ      लोकहु बेदु न आन उपाऊ  

जीव ने जिस समय,जहाँ कहीं से,किसी भी यत्न से जो भी बुद्धि,कीर्ती,संपत्ति ,विभूति और ,भलाई पायी है वह सब सत्संग के ही प्रभाव से प्राप्त हुई समझनी चाहिएहमारे ढाई वर्ष के उस साऊथ अमरीकन प्रवास में हमें उन दो सज्जनों से मिलने के बाद एक लम्बे पारिवारिक सत्संग का आभास होने लगा. ह्म प्रत्येक सप्ताह  सपरिवार कहीं न कहीं मिलते.कभी किसी मन्दिर में ,कभी किसी सत्संग भवन में अथवा किसी न किसी  के घर में दीवाल पर लगीं हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों के सामने बैठ कर श्रीमद भगवत गीता और तुलसी के राम चरित मानस का पाठ करते.  भारत के गाँव के चौपालों में जैसे पारम्परिक  ढंग से रामायण गाई जाती है उन्ही धुनों मैं ये लोग भी ऊंचे स्वरों से बड़े प्रेम से इस ग्रन्थ का पाठ करते थे. वे रोमन लिपि में छपी अंग्रेज़ी अक्षरों वाली पुस्तकें पढ़ते थे.  एक शब्द का भी शब्दार्थ वे नहीं जानते थे .भावार्थ तो दूर की बात थी. पर वे रामायण की  पूरी कथा जानते थे. रामजन्म से लेकर बनवास से लौटने के बाद अवध में राम-राज्य स्थापित होने तक की एक एक मार्मिक घटना वे जानते थेरामायण गाते समय उनकी दशा विचित्र हो जाती थी.उनकी आँखों से झर झर आंसू झरते रहते थे.उनका कंठ अवरुद्ध हो जाता था. यह ऎसी दशा थी जैसी भारत में पंडित रामकिंकर जी महराज अथवा अयोध्या के स्वामी सीताराम सरन जी के रामायण पाठ के समय प्रेमी रामभक्तों  की हो जाती थी. उन दोनों को उस स्तिथि में देख कर ह्म भी रोमांचित हो जाते थे.आनंद का स्फुरण हमारी नस नस में होने लगता था .संत मिलन का यह दिव्य प्रसाद -अति दुर्लभ है और प्रभु की असीम कृपा से ही मिल सकता है. तुलसी के शब्दों में


               संत विसुद्ध मिलहिं पर तेही  
              चितवहिं  राम कृपा करि जेही

शेष अगले अंकों में.

निवेदक:- व्ही एन  श्रीवास्तव  "भोला"... 
"

शनिवार, 26 जून 2010

"SATSANG" -- the powerful detergent

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संतमिलन सुख का गंगाजल 
न्हायधोय मन करलो निर्मल 
निज अनुभव-साऊथ अमेरिकन पोस्टिंग

प्रियजन.  सात समुद्र पार के जिस पिछड़े देश में ह्म़ारी पोस्टिग हुई वहाँ की तत्कालीन सरकार अपनी प्रगति के लिए भारत से सब प्रकार के सहयोग की अपेक्षा रखती थी पर विडम्बना यह थी क़ि वह सरकार अपने देश के  भारतीय मूल के नागरिकों को उनके बेसिक अधिकारों से वंचित रखती थी.आपको विश्वास न होगा क़ि  रोटी-कपड़ा-मकान जैसी मौलिक सुविधाओं पर भी उस सरकार ने ऐसे नियन्त्रण लगा रखे थे क़ि उन बहु संख्यक अधिक समृद्ध भारतीय मूल के नागरिकों को मजबूर हो कर अतिरिक्त मूल के अल्पसंख्यक नागरिकों के शासन में अपनी प्राचीन संस्कृति वेशभूषा  खानपान और धर्म तक बदलना पड़ रहा था .हाँ वहाँ की  परिस्तिथि सचमुच ही अति विषम थी. चलिए वहाँ का हाल बता ही दूँ:-.

भारतीय मूल के निवासी अधिकतर शाकाहारी थे .उस देश की सरकार  ने आलू प्याज तथा गेंहूँ की काश्तकारी तक पर निषेध लगा रखा था इनका आयात  भी वर्जित था.गाय का दूध तक मिलना दूभर था ,बीफ हर चौराहे पर मिल जाता था.प्रत्यक्ष रूप में वह सरकार भारतियों के प्रति भेद भाव रखती थी..मांस न खाने वालों को यदि दूध ,आलू -प्याज़ और रोटी का आटा भी न मिले तो क्या खिला कर वह अपने छोटे छोटे बच्चों को जिलाए ?  हमे भी इससे समस्या थी. पर छोडिये इन दुखदायी बातों को. डिप्लोमेटिक श्रेणी के विदेशी नागरिक होने के कारण हमे अनेकानेक सुविधायें मिलीं थीं. हमारा काम तो किसी तरह चल ही गया पर देखा आपने मैं पुनः संसारिकता में उलझ गया. माया छलनी किसी को नहीं बक्सती, मैं किस खेत की मूली हूँ ?

काली घटाओं में जैसे कभी कभी दामिनी की दमक जगमगाहट भर देती है वैसे ही वहाँ के,भारतीय मूल के दो विशिष्ट नागरिकों से मिलने के बाद हमारा वहाँ का शुष्क जीवन रसमय हो गया.ये दोनों ही सज्जन, दो तीन शताब्दियों पूर्व उस देश में भारत से आये पूर्वजों के वंशज थे. ये दोनों ही  अपनी भारतीय हिन्दू संस्कृति को अपने जीवन से विलग नहीं कर पाए थे.उनके साथ उठ बैठ कर हमे जो सुख मिला, संत तुलसीदास ने ऐसे ही  सुख के विषय में कहा है:,

नहि दरिद्र सम  दुःख जग माहीं 
संत मिलन सम सुख जग नाहीं.

प्रियजन,परमानन्द प्राप्ति की कथा प्रारम्भ हो गयी है.आगे आगे देखिये  होता है क्या? .

निवेदक: व्ही एन श्रीवास्तव  "भोला" 

शुक्रवार, 25 जून 2010

LOVE-DEVOTION -BLISS

Print Friendly and PDF प्रेम-भक्ति-परमानन्द
निज अनुभव (अमेरिकन पोस्टिंग)


प्रियजन अब तक ह्मने अपने साऊथ अमेरिका के जो अनुभव बताये वह केवल भौतिक उपलब्धियों के विषय में थे जो भारतीय आध्यात्म की दृष्टि में निम्न कोटि की जानी जाती हैं. हमारी भौतिक प्रगति केवल हमारे सांसारिक सुख-समृद्धि की बृद्धि की द्योतक है. इससे अधिक और  कुछ नहीं.


हमे यह दुर्लभ मानव जन्म  इसलिए नही मिला  क़ि ह्म केवल धन संचय करें और ऐशो आराम में यह अनमोल जीवन रत्न लुटा कर ,खाली हाथ वापस चले जाएँ . इस जीवन में हमे ऎसी कमाई करनी चाहिए जिसके सहारे ह्म भौतिक सुख के साथ आत्मिक आनंद उठा सकें और अपना अगला जन्म भी संवार सकें. 


तुलसी कृत राम चरित मानस में ,मर्यादा पुरुषोत्तम अयोध्या नरेश श्री राम ने  प्रजाजनों को संबोधित करते हुए उन्हें मानव जन्म  का विशेष उद्देश्य इस प्रकार बताया :


एही तन को फल विषय न भाई  . स्वर्गउ   स्वल्प  अंत  दुखदाई.
नर तनु पाई विषय  मन   देहीं .   पलटी   सुधा ते शठ  विष लेहीं  
जो  परलोक   इहाँ   सुख चहहू .  सुनु मम वचन हृदय दृढ गहऊ
बैर  न विग्रह आस न त्रासा         .सुखमय ताहि  सदा सब आसा .
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा           तृण सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा
भक्ति सुतन्त्र सकल सुख खानी.  बिनु सत्संग  न  पावहीं प्रानी  



"प्रेम की पराकाष्ठा है भक्ति". सब प्राणियों का जीवन प्रेममय हो . सब एक दूसरे से ऐसा व्यवहार करे जिसमे न किसी से द्वेष हो न शत्रुता ;न किसी से कोई अपेक्षा हो न कोई दुराशा. सब को सभी प्राणी निजी संबंधियों के समान प्रिय लगने लगें. समस्त सृष्टि आनंदमयी  हो जायेगी. .


अस्तु आइए ह्म भी सांसारिक सुख सम्पदाओं और विषय भोगों का विष त्याग कर अब सत्संग का प्रेमामृत पान करें और सकल मंगलाकारिणी "भक्ति" तथा परमानन्द के अधिकारी बन जाएँ.


प्रियजन.  हमारा यह साऊथ अमेरिकन प्रवास अनेकानेक ऎसी चमत्कारिक घटनाओं से भरा हुआ है जिनमे सत्संगो के प्रसाद स्वरूप मिली भक्ति की शक्ति ने हमे भयंकर संकटों से उबारा और कितनी ऎसी उपलब्धियां प्रदान कीं जिन्हें ह्म साधारण स्थिति में कभी नहीं पा सकते थे..


धीरे धीरे सब बताउंगा ,थोड़ी प्रतीक्षा और कर लें..


निवेदक: व्ही एन श्रीवास्तव  "भोला"

गुरुवार, 24 जून 2010

HIS grace + ones EFFORT= SUCCESS

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"प्रभु कृपा" व् "निज-पुरूषार्थ"से सिद्धि
   



प्रियजन , यह बिलकुल सच है क़ि मैं कोई इकलौता ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ जो  पढ़ाई   के लिए लन्दन गया या जिसे साऊथ अमेरिका के एक पिछड़े देश में औद्योगिक विकास हेतु भेजा गया.और जिसे वहाँ अनेकों ऎसी सुविधाएँ मिलीं जो उसे उसके अपने देश में नहीं उपलब्ध थीं. 

संसार में अनगिनत ऐसे व्यक्ति हुए हैं जो विषम से विषम परिस्थिति  में जन्म ले कर भी अपने आत्म विश्वास और पुरुषार्थ के बल से भौतिक प्रगति के शिखर तक पहुँच गये .मैं .विदेश के अरबपति  वारेनबुफेट्स ,बिल गेट्स और कार्लोस स्लिम के विषय में अधिक नहीं जानता,,पर इसी श्रेणी के भारत में ,उन्नीसवीं शताब्दी (१८५७ के   स्वतंत्रता संग्राम के  बाद) जन्मे अनेक महापुरुषों के विषय में खूब जानता हूँ जो घर बार छोड़ कर , केवल एक लोटा डोरी लिए जीविकोपार्जन करने निकले और वह कर दिखाया जो कोई सोच भी नहीं सकता था .ऐसे घरानों में सबसे अधिक सराहनीय है.गुज़रे जमाने के उद्योगपति सेठ घनश्यामदास बिरला जी और उनका परिवार, धीरुभाई अम्बानी और उनके दोनों पुत्ररत्न .इसके अतिरिक्त टाटा समूह, लक्ष्मी मित्तल ,नारायण स्वामी ,स्वराज पौल ,जिंदल, माल्या ऐसे अनेक उद्योगपति हैं जिन्होंने सराहनीय भौतिक प्रगति की है और देश का गौरव बढाया है .
  
उपरोक्त सभी उद्योग पतियों की अप्रत्याशित प्रगति के पीछे है उनका आत्म विश्वास, उनका अपना पुरषार्थ एवं अथक परिश्रम.  इसके अतिरिक्त इन सभी व्यक्तियों के पास एक अन्य गुण भी है,वह है उनकी "इष्ट भक्ति"और अपने इष्ट पर उनका अखंड भरोसा हमारे समय के एक अतिशय सफल उद्योग परिवार के मुखिया ने मुझे बताया था  क़ि " अपने इष्ट का  स्मरण कर के कार्य प्रारम्भ करो और फिर देखो कैसी कैसी प्रेरणाएं आप से आप आतीं हैं.इष्ट स्वयम आपका मार्ग दर्शन करते  हैं , आपका बोझा निज काँधे पर ले लेते हैं और आप सफल हो जाते हैं,  इष्ट को भुलाया तो अनिष्ट होगा."

आवेदक: वही एन  श्रीवास्तव  "भोला"

NIJ ANUBHAV GAATHA (prathm katha)

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माँ का आशीर्वाद 
प्रथम विदेश यात्रा 
अमेरिकन पोस्टिंग 


अमरीकी पोस्टिंग (१९७५) के विषय में बात करते करते १९६२ में अम्मा की अंतिम घड़ी तक वापस आगया था. फिर मन में यह   विचार आया क़ि सबसे पहले अम्मा की शुभ कामनाओं और आशीर्वाद से की हुई अपनी प्रथम  विदेश यात्रा की कहानी आपको सुना दूँ  आपको यह बतला दूँ क़ि उस पहली यात्रा की कल्पना और उसके विषय में मेरे मन में तीव्र उत्कंठा कब और कैसे जागृत हुई और कैसे  तात्कालिक परिस्थियों में असंभव लगने वाली यह घटना (पढ़ायी के लिए मेरी इंग्लेंड यात्रा) अचानक घट भी गई 
मैं अपने जून २१  के लेख  में क़ह रहा था क़ि जब १९६२  में मेरी प्यारी माँ अपने जीवन के अंतिम पडाव पर थीं.ह्म सब उनको कीर्तन सुनाते थे .और वह अपने नैनो से बूंद बूंद प्रेमाश्रु  बहा कर अपने मन मन्दिर में बाल पन से बिराजे लड्डू गोपाल के चरण पखारतीं रहतीं थीं.इतनी प्रबल थी उनकी हरि प्रीति .यूँ  ही भजन कीर्तन सुनते सुनते उन्होंने एक दिन मुझे अपने से चिपका लिया (मेरे पास उस दिन.की वह फोटो अभी भी है)और मेरे कान में धीरे से बोलीं "होखी बबुआ कुल होखी ,तू पढ़े खातिर बिलायत जइब ,तोहार सीसा के बडका चुका बंगला होखी ,बड़का बडका बिलायती कार पर तू घुमबा." अचानक माँ को कैसे मेरे बचपन में मुझे दिया हुआ वह आशीर्वाद, संसार छोड़ते समय याद आगया .तब उनसे पूछ न सका क्योंकि  उसी शाम ---अम्मा यह संसार छोड़ कर अपने गोपालजी के धाम चली गयीं.   और फिर ---------.

अम्मा के निधन के साल भर के भीतर ही मैंने एक कार खरीद ली और तब ही मेरे पास लन्दन से सूचना आयी क़ि मेरा एडमिशन वहाँ के एक टेक्निकल कालेज में हो गया है और मुझे शीघ्रातिशीघ्र लन्दन पहुच कर अपनी पढ़ायी शुरू करनी है.

मैं तब रक्षा मंत्रालय के एक आयुध बनाने वाले कारखाने में काम करता था. मुझे दो वर्ष के लिए स्टडी लीव मिल सकती थी  लेकिन  इसी बीच एक पड़ोसी देश ने भारत पर आक्रमण कर दिया .कर्मचारियों को लीव से वापस बुलाया जाने लगा,नये लोगों की भर्ती शुरू हो गयी. .ऐसे में मुझे स्टडी लीव कौन देता?नीचे से ऊपर तक मैं जिन जिन से क़ह सकता था मैंने कहा ,पूरी कोशिश कर ली ,पर कुछ नहीं हुआ .सब ने मना कर दिया

पर मुझे विश्वास था क़ि जब अम्मा का एक वचन सत्य हुआ ,(मेरा एडमिशन लन्दन में हो गया) तो उनका सम्पूर्ण कथन ही सच होगा.हुआ भी ऐसा ही एक दिन कारखाने के जनरल मेनेजर ने मुझे अपने ऑफिस में बुला कर कहा क़ि मिनिस्ट्री ने मेरी दो वर्ष की स्टडी लीव सेंक्शन करदी है इतनी विषम परिस्तिथि में यह सब हुआ कैसे? इसका उत्तर न मेरे पास था न मेरे जी एम् महोदय को ही ज्ञात था. इस प्रकार मेरी प्यारी माँ का आशीर्वाद उनके जाने के एक वर्ष के अंदर ही सत्य हो गया.मैं लन्दन पहुँच गया ,पढ़ायी चालू हो गयी.लन्दन में रहने को जो हॉस्टल मिला उसमे चारो ओर शीशे ही शीशे थे .

प्रियजनों अपने घर में ही माता पिता और गुरुजनों के स्वरुप  में साक्षात् हमारे इष्ट देव  विराजमान हैं. बस शीश झुका कर  दर्शन करना है. उनका आशीष पाना  है.


निवेदक : व्ही एन  श्रीवास्तव "भोला"

बुधवार, 23 जून 2010

NIJ ANUBHAV (Posting in America )

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निज अनुभव गाथा 


अमेरिका की पोस्टिंग 
गतांक से आगे 

मेरे प्यारे प्रभु ने कैसी कैसी सुविधाएँ हमें, उस दूर देश में प्रदान की, उनका उल्लेख करते हुए मैंने कहा था क़ि उनकी सारी क़ि सारी कृपाओं का वर्णन करना मेरी सीमित क्षमता के बाहर है. पर उसी सन्दर्भ में मुझे एक बात अभी याद आयी जो बहुत पुरानी है,पर बताउँगा जरूर . बचपन से मेरी माँ मुझे दुलराते हुए अक्सर कहा करती थी क़ि "हमार भोला ता विलायत में पढ़ी,ओकरा पासे बड़ा बड़ा गाड़ी होखी ,और ऊ बड़का चुक्के सीसा के बंगला में रही, देख लीहा तू सब लोग" . १९३०-३६ के बीच जब अम्मा ने यह वचन कहे थे हमारा परिवार बहुत संपन्न था . तब हमारे बाबूजी ,एक ब्रिटिश कम्पनी के विशिष्ट श्रेणी के अधिकारी थे. उन्हें वो सारी सुविधाएँ प्राप्त थीं जो विलायत से आये अंग्रेजों को मिलती थी  उस जमाने में अम्मा की यह सोच समयानुकूल थी और उनके आशीर्वाद का फलीभूत होना सुनिश्चित लगता था.
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इस बीच सेकंड वर्ल्ड वार छिड़ गयी और बाबूजी ने वह कम्पनी छोड़ दी. बिजनेस में बहुत घाटा हुआ .तंगी के दिन आये. तब ह्म केवल ८-१० वर्ष के थे ..पर मैं अपनी प्यारी माँ का वह आशीर्वाद,,भूल न पाया .मुझे पूरा विश्वास था -क़ि मेरी देवी स्वरूपिणी माँ का वचन कभी खाली नहीं जा सकता. १९६२ में अम्मा को एकाएक भयंकर द्रुतगामी केंसर रोग ने घेर लिया और डॉक्टरों ने उन्हें केवल एक पखवारे का मेहमान घोषित करदिया.इस विषय में एक बात और उल्लेखनीय है --इतनी भयंकर पीड़ा झेलते हुए अम्माँ ने अपने बच्चों को चिंतामुक्त रखने के लिए ये जाहिर होने ही नहीं दिया क़ि उन्हें कितनी  पीड़ा है .सदैव वह मुस्कुराती रहतीं थीं .
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हमारी माँ के जीवन के अंतिम दो तीन दिन शेष थे. एक दिन प्रातः वह बाहर बरामदे की बड़ी आराम कुर्सी में बैठीं थीं.  पीडाओं की मंजूषा उन्होंने अपने हृदय में संजो रखी थी.एक  अनूठे तेज से जगमगाते उनके चेहरे में आगे के उनके दो दांत मोतियों की तरह चमक कर  उनके  मन में संग्रहीत परमानंद चहू ओर फैला रहे थे. निकट भविष्य में आने वाले संकट से ह्म सब अवगत थे ,अस्तु अम्मा को पल भर के लिए भी अकेले नहीं छोड़ते थे. ह्म सब  अपने काम काज से छुट्टी ले कर उन्हें घेरे रहते थे .उन्हें भी अच्छा लगता था. ह्म उन्हें कीर्तन सुनाते थे..वह स्वयम कुछ बोल  नहीं पातीं थीं लेकिन उनकी आँखों से प्रेमाश्रु टप टप टपकते  रहते  थे  


शेष कल 


निवेदक:व्ही एन  श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 22 जून 2010

NIJ ANUBHAV GAATHA (prathm katha)

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करूँ बयान कहाँ तक प्रभु जी मैं तेरे उपकार 
मेरा यह कागज़ छोटा है तेरी कृपा अपार 
(शनिवार  १९ जून २०१० के आगे)

लिखने बैठता हूँ तो एकके बाद एक ,"प्रभु -कृपा" की असंख्य मधुर स्मृतियाँ अन्तर पट पर उमड़ने लगतीं हैं. उलझ जाता हूँ उनमें . मदद के लिए कुलदेवता को पुकारता हूँ "जय  हनुमान ज्ञान गुन सागर ",बल-बुद्धि-बिद्या प्रदायक श्री हनुमान जी विलम्ब नहीं करते. उनकी प्रेरणा से लेखन पुन: शुरू हो जाता है .

किसी के अभिशाप, परमपिता की कृपा से हमारे लिए आशीर्वाद बन जाते हैं.  आज के  संसार में  प्रगति का माप दंड हैं  भौतिक उपलाब्धियाँ . किसने कितना धन जमा किया .कितनी और कौन सी कारें हैं उसके पास ?वह कैसे घर में रहता है ? प्रगति के ये प्रत्यक्ष लक्षण दूर से ही नजर आ जाते  हैं . आध्यामिक उन्नति अति सूक्ष्म होने के कारण ,स्थूल नजरों से,साधारण प्राणियों को दिखायी नहीं देती .  

आम इंसान के  दृष्टिकोण से देखें तो हमारी विदेशी पोस्टिंग  से हमें जितना सांसारिक आर्थिक ,सामाजिक और आध्यात्मिक लाभ हुआ उतना न इससे पहले कभी हुआ था न 
उसके बाद होने की कोई संभावना ही थी .

मुंबई में तब ह्म सात प्राणी  दो कमरे वाले एक साधारण से फ्लैट में रहते थे . मैं वहाँ से बस द्वारा लोकल स्टेशन जाता था  फिर ट्रेन में घंटे  भर धक्के खाते हुए ऑफिस पहुँचता  था. पाँचो बच्चे दो दो बस बदल कर  घंटेभर धक्कम धक्का करते स्कूल जाते थे . और धर्म पत्नी (जो  कानपूर दिल्ली में घर  से बाहर नहीं निकलतीं थीं)  यहाँ पर घरखर्च चलाने में मेरी मदद करने के लिए नौकरी करती थीं.उन्हें सरकारी अफसरों को हिन्दी भाषा सिखाने के लिए एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक दिन भर यहाँ से वहां भटकना पड़ता  था. भारत में ईमानदारी से जीने वालों का जीवन तब ऐसा ही था ,कदाचित आज भी कुछ वैसी ही परिस्थिति होगी  वहां की.

प्रियजन ,मेरे उपरोक्त कथन को आप मेरा गिला-शिकवा न समझिये..मुझे तो उस स्थिति में भी अपने ऊपर प्यारेप्रभु की अनंत कृपा का अनुभव हो रहा था. आप पूछेंगे कैसे 
इस लिए क़ि मैं, तब भी अपने को उतना ही सौभायशाली मानता था जितना आज मानता हूँ. मेरे परिवार के सभी स्वजनों ने (बच्चों और उनकी मा) ने मेरे साथ जितना सहयोग
क़िया वह असाधारण था. किसी ने हमारी परवरिश में किसी प्रकार की कमी की शिकायत कभी भी नही की --उलटे वो सब मुझे ईमानदारी से अपने कर्म करने को प्रोत्साहित करते रहे. कभी कोई कलह या मनमुटाव तक नही हुआ. आप ही कहें यह मेरा सौभाग्य नहीं तो
और क्या है? प्यारे प्रभु को बहुत बहुत धन्यवाद ,कोटिश प्रणाम 

अब विदेश में प्यारेप्रभु ने जो कुछ हमे दिया वह बता दूँ.. नहीं  बताऊंगा तो स्वयम मेरा ही मन मुझे कोसेगा और कहेगा "दुःख की गाथा गाय के सुख का दियो भुलाय" (कठिनाइया सब बता दीं लेकिन जो सुविधाएँ भविष्य में प्रभु कृपा से मिलीं वह बताना भूल गये). तो लीजिये वह सब भी बता ही दूँ. 

भारत की मध्यम वर्ग की एक रिहायशी कोलिनी के पुराने से दो कमरे के फ्लैट.से निकल कर ४८ घंटे में ह्म साऊथ अमेरिका के एक देश की राजधानी में अतलांतिक सागर तट पर वहा के मिनिस्टरों तथा सरकार के ऊँचे पदाधिकारियों के लिए निर्मित कोठिओं में से एक फर्निश्ड कोठी में बस गये. उस कोठी के विषय में जितना कहूँ कम होगा इसलिए अभी नहीं फिर कभी बताउंगा. पर आप ही सोच कर देखें.इतना चमत्कारिक बदलाव  प्रभु कृपा के अतिरिक्त और कैसे हो सकता है.यही नह़ी मैंने जीवन में किसी तरह की कोई ऐयाशी नही की लेकिन घर के गराज में कार रखने का शौक मुझे बचपन से था  रख ही सकते थे .
छोटी तनख्वाह में कार मेंटेन करना असंभव था. दर्शन मात्र से प्रसन्न हो जाते थे.पहली  नयी प्रीमियर कार १९७४ में सरकारी कोटे से मिली और मैंने दफ्तर से लोन लेकर खरीदी पर  वह भी एक वर्ष में ही भारत छोड़ने से पहले निकालनी पड़ी.,प्रियजन मुझसे बुद्धू  पर होने वाली यह प्रभु- कृपा तो देखिये -१५ दिनों के भीतर ही मेरे इष्टदेव हनुमानजी ने मुझे एक ब्रांड निउ टोयोटा करोला (१९७६ मॉडल )दिलवा दी. ह्म अपनी कार पर बैठ कर ही होटल से सरकारी कोठी तक आये .   देखा आपने मेरे इष्ट की कृपा का चमत्कार

शेष बहुत कुछ है .प्रियजन आगे देखते रहिये उनकी अनंत कृपाओं का चमत्कार 

निवेदक: व्ही एन  श्रीवास्तव "भोला"



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सोमवार, 21 जून 2010

FATHERS DAY - a special prayer

Print Friendly and PDF एक स्पेशल प्रार्थना

                                     फादर्स  डे
               परम पिता परमात्मा से एक विशेष प्रार्थना 

विश्व के पुरातन एवं आधुनिक लगभग सभी धर्म ग्रंथों में इस श्रृष्टि के सिरजन,पालन और संघार करने वाले सर्वशक्तिमान भगवान को "पिता " क़ह कर पुकारा गया है. .हिन्दू धर्म ग्रन्थों में "परम पिता" और ईसाई पुस्तकों में उसी को  "होलीफादर" कहा जाता  है 

ह्म इन्ही "पिता"के श्रीचरणों में आज अपनी ये प्रार्थना अर्पित कर रहे हैं. 
(राधा स्वामी - दयालबाग़ के सौजन्य से श्री राम परिवार में यह वर्षों से गायी जाती है).

प्रार्थना                                      

तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता मुझे ऐसा दृढ बिस्वास हो
क़ि मन में मेरे सदा आसरा तेरी दया व् मैहर की आस हो. 
("Beloved  Father  Bless me with an unfaltering FAITH in your GRACE so that I always depend upon your kindness.)


चढ़ आये जो कभी दुःख की घटा या पाप करम की होये तपन
तेरा नाम रहे मेरे मन बसा ,तेरी दया व् मेहर क़ि आस हो. 
तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता ----------------------------------
(If clouds of misery compel me to adopt unholy practices may I be reminded to remember your name inviting your GRACE).


यह काम जो हमने है सर लिया करें मिल के ह्म तेरे बाल सब,
तेरा हाथ जो ह्म पर रहे सदा तेरी दया व् मैहर क़ि आस हो.
तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता ------------------------------------
(We- Your loving children be enabled to carry out the jobs assigned to us, as a team, and your BLESSINGS be always available to us.. )


मनसा वाचा कर्मना सब को सुख पहुचाऊ 
अपने मतलब कारने दुक्ख न दे तू काहु
यदी सुख तू ना दे सके तो दुःख काहू ना दे 
ऎसी रहनी जो रहे सो ही आत्म सुख ले
(May we be enabled to serve with our heart & soul the needy,to make them feel happy Our acts should not cause pain to any one.If we are not able to make any one happy we   have no right to cause pain to others Those who follow this divine principle will be blessed ) 


आज इतना ही ,कल से निज अनुभव की कथा फिर चालू हो जायेगी  


निवेदक:व्ही एन.श्रीवास्तव "भोला"

रविवार, 20 जून 2010

JAI JAI JAI KAPI SOOR

Print Friendly and PDF निज अनुभव गाथा -
आगेप्रथम कथा- गतांक से
                                                   
   लाल देह लाली लसे अरु धर लाल लंगूर 
                                        जय जय जय कपि सूर 


होटल की छत से पूरी राजधानी का सिंघावलोकन किया.दूर दूर तक लकड़ी के मकान हर मकान में दो दो तीन तीन गाड़ियाँ लेटेस्ट मॉडलकी  जापानी कारें और इसके अतिरिक्त लगभग सभी मकानों के शिखर पर लहराते लाल झंडे.कौतूहल  वश होटल के स्टाफ से जब पूछा तब पता चला क़ि वे झंडे कुम्युनिस्ट  पार्टी के नहीं  थे बल्कि उन हिन्दू धर्मावलम्बियों के थे जो सभी श्री हनुमान जी के उपासक थे और जिन्होंने अपने आंगन में अति आदर सहित अपने इष्ट की ध्वजा लगा रखी थी. 


श्री हनुमान जी ने कृपा कर के हमें  उस अमेरिकन देश में बुला लिया था जहां अनेकों  घरों  में रोज़ सुबह-शाम शंख नाद के साथ घंटे घडियाल   बजते थे ,हनुमान चलीसा का पाठ होता था और हनुमान जी की आरती होती  थी. आप अनुमान लगा सकते हैं क़ि भारत से हज़ारों मील दूर साऊथ अमेरिका में अपने चारों तरफ बजरंग बली की ध्वजा  का दर्शन कर के हमें   कितना आनंद आया .इस आशा से क़ि यहाँ  घड़ी घड़ी सत्संगका लाभ मिलता  रहेगा  हम अपने आप को अतिशय धन्य और भाग्यवान पा रहे थे .जिस पोस्टिंग को हमारे सहयोगी  हमारे  लिए अभिशाप जान कर मन ही मन हर्षित थे और इसके उलटे ,इधर विदेश में हमारी ये पोस्टिंग हमें अति सुखद लग रही थी. एक विशेष आनंद की अनुभूति हमे वहां हो रही थी .जी करता था क़ि प्रभु के इस विशेष अनुग्रह के लिए हम उन्हें पल पल हार्दिक धन्यवाद देते रहें.


हाँ एयर पोर्ट में कस्टम क्लियरेंस के समय हमारा परिचय भारतीय मूल के एक कस्टम अधिकारी से हुआ था. उन्होंने हमें अपने घर डिनर पर आने की दावत दी ,वहाँ  उनकी बेटी ने हमें  भोजपुरी भाषा में एक अनसुना हनुमान भजन सुनाया . देश से इतनी दूर अपनी भाषा सुन कर हृदय द्रवित हो गया ,वह भाषा जो आज भारत में परिहास का विषय बनी हुई है और उपेक्षित है आज  अमेरिका में इतने प्रेम से गायी  जा रही है. वह भजन था:


जेकरा आगन में झूलेला झंडा श्री हनुमान के  
ओकरा ना होखेला पीड़ा भव रोगन के बान से    .  


ओकर काज सबे बनि जाला,महाबीर गुन गाइ के 
आवागमन  छुड़ा  दीहें ऊ    भव सागर से तारि के.


राम दुआरा दूर अपारा ,  कइसे  पहुँचीं जन बि सहारा 
अर्जी सबके तू पहुंचा द ,  प्रभु के सब कर हाल बता द                                       


भजन  तुहार  राम के  भावे , राम सदा तुम्हरे गुन  गावे  
कृपा करो हे संकटमोचन अरज करें हम जल भर लोचन.  


क्रमशः  
निवेदक:व्ही.एन. श्रीवास्तव "भोला"











शनिवार, 19 जून 2010

NIJ ANUBHAV GATHA--pratham katha

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निज अनुभव गाथा -- प्रथम कथा 


हनुमानजी की सिफारिश से राम कृपा प्राप्ति 


गतांक से आगे 

गुरुजन की मन्त्रणा और कुलदेवता श्री महावीर हनुमान जी के आशीर्वाद से ह्म आजीवन सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते रहे.प्रभु कृपा से किसी प्रकार का कोई भी प्रलोभन हमें सत्य पथ से डिगा नहीं सका. ह्म अपना कर्तव्य पालन पूरी लगन से और उत्साह से "राम काज"समझ कर करते  रहे. काम को ही हमने पूजा माना  .कर्तव्य पालन ही हमारा धर्म बना रहा. 


अपनी विदेश पोस्टिंग को भी मैंने "हरि इच्छा"मान कर सहर्ष स्वीकार कर लिया .सब से सलाह कर के ,पूरे परिवार ने एक मत हो स्वीकार किया क़ि वर्तमान परिस्थिति में हमारे लिए ऑफिस की " काजल क़ी कोठरी" से बाहर निकल जाना ही उचित है .सब जानते थे की ऑफिस के हमारे वे  सहयोगी जिन्हें हमारी अनुशासन प्रियता से कष्ट है एक न एक दिन हमारे चरित्र पर काजल की एक रेख लगवा ही देंगे.


जब ऑर्डर आये उस दिन ही हमलोग हाजीअली के निकट स्थित  अपने कुलदेवता महावीर श्री हनुमान जी के मन्दिर गये,उन्हें धन्यवाद देने. सच मानिये उनकी कृपा के  बिना  बोम्बे ऑफिस के दूषित वातावरण से हमें  छुटकारा मिलना असंभव था.अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए ह्म सबने समवेत स्वर में हनुमान चालीसा का इतना भाव पूर्ण गायन किया क़ी वहां उपस्थित सभी भक्तजन गदगद होगये. पुजारी जी ने  श्री हनुमान जी के आशीर्वाद स्वरूप उनके चरणों से दो फूल उठाकर ह्म दोनों के माथे  से  लगाये .ह्म धन्य धन्य हो गये. हमें  अपने कुलदेव की आज्ञा मिल गयी  .अस्तु,,,,,.

हमने बखुशी भारत छोड़ना स्वीकार किया .यह निर्णय लेने में हमारा पूरा परिवार हमारे साथ था.सबने पूरा सहयोग दिया. बच्चे निजी प्रयास से ही अपने स्कूल लीविंग और ट्रांसफर सर्टिफिकेट ले आये.कृष्णा जी के रिसर्च सुपर्वाईजर मान गये ,उन्हें विदेश में अपनी रिसर्च चालू रखने कीअनुमति  उन्होंने दे दी. उधर मैंने विदेशी सरकार से डाइरेक्ट बात चीत कर बच्चों का एडमिशन उस देश के सबसे अच्छे स्कूल में करवा लिया . समय पर सब कुछ हो गया. विदेशी सरकार ने ह्म सातों के लिए एयर टिकेट भी तत्परता से भेज दिए. 


तब तक हमारे पूरे परिवार ने कभी एक साथ हवाई यात्रा नहीं  की थी. मेरा एक स्वप्न था क़ि मैं कृष्णा जी और बच्चों के साथ कभी  हवाई जहाज़ से योरप अमेरिका जा सकूँ. ,उन्हें विश्व भ्रमण करवा पाऊँ. प्रियजन आप समझ सकते हैं क़ी उन दिनों ,भारत सरकार की, ईमानदारी से सेवा करने वाले अफसरों के लिए अपनी  सीमित तनख्वाह में ऐसा कर पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव था. पर मेरा वह सपना साकार हो रहा था . आप सोचकर देखें ,क्या इतने थोड़े समय में इतना सब कुछ हो जाना अंग्रेजी  में जिसे कहते हैं "ह्यूमेनली पोसिबिल"  है.?  नहीं ना. यह सब हनुमान जी की सिफारिश पर श्री रामजी की कृपा से ही हुआ था..बताएँ क्यों .हमने चालीसा गायन में यह सम्पुट लगाया था ......... 


                  "हमारी ये अर्जी श्री राम को पहुँचइयो हनुमान  
                   हमारे राम जी से राम राम  कहियो   हनुमान"   


प्रियजन हनुमान जी ने हमारी अर्जी राम जी तक पहुंचा दी. राम कृपा होनी ही होनी थी . हो गयी.  बोलिए "राम भक्त श्री हनुमान की जय "


निवेदक: व्ही.एन.श्रीवास्तव "भोला"

गुरुवार, 17 जून 2010

NIJ ANUBHV GAATHAA

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निज अनुभव - प्रथम कथा    

मैं वर्णन करने चला ,श्री हरि  के  उपकार     
महावीर करिके कृपा दो मति बुद्धि सुधार  ,

परम पिता ने ह्म पर जो सबसे महती कृपा की है वह है "हमें  मानव जन्म देना",दूसरी कृपा  यह  क़ि हमें ऐसे"हरि-विश्वासी पूर्वज" दिए और ऎसी "दयामयी कृपामयी प्रेममयी "माँ " दी.  प्रियजन  यह एक ऐसा सत्य है जिसे हमें सदैव याद रखना चाहिए .और परमात्मा  को उनके इस अनुग्रह के लिए जितना बन पाए .जब भी बन पाए धन्यवाद देते रहना चाहिए.

असंख्यों में से एक "निज अनुभव":-

१९७४ -७५ में मेरी पोस्टिंग  बोम्बे (आज की मुम्बई )में थी .मैं वहां पर भारत सरकार के एक अति कमाऊ (श्वेत एवं श्याम दोनों ही वर्ण का धन उपार्जन करने की क्षमता वाले) विभाग के क्षेत्रीय अधीक्षक का कार्य भार सम्हाले था. मेरे दरवाज़े "कामधेनु" बंधी थी. पर मेरे सीनियर्स और सबोर्दिनेट्स सब ही मुझसे दुख़ी थे .उन्हें यह कष्ट था क़ि "ये दुष्ट न तो स्वयम पीता है और न पीने देता है" जैसा संभावित था हुआ. ऑफिस में ,नित्य प्रति मेरे विरुद्ध कुचक्रों की रचना शुरू हो गयी. क़ि कैसे "कामधेनु" हमारे खूटे से खोल कर  किसी खाने पीनेवाले अफसर के द्वार पर बांध दी जाये जिससे न्यायसंगत विधि  से बटवारा कर के अधिक से अधिक सरकारी बिरादरान के बालबच्चों को दुग्धपान का सुअवसर प्राप्त हो तथा बाबू लोगों के अपने  मयखाने  भी चलते  रहे जहां वे प्रेम से अपने सीनियर्स को खिला पिला कर अपनी अगली तरक्की का मार्ग प्रशस्त करें.प्रियजन  उन दिनों भारत के सरकारी दफ्तरों का दस्तूर ही ऐसा था. हमारे जैसे अपवादी, साल दो साल में इधर उधर ट्रांसफर कर दिए जाते थे. 

हाँ बौम्बे में मेरे ऊपर चलाया हुआ उनका वह कुचक्र सफल हुआ. सबने मिलजुल कर वहाँ से मेरा पत्ता साफ़ करवा दिया.उन्होंने मेरा खूटा उखाड़ फेका. दुधारू कामधेनु जहाँ की तहाँ रही. स्कूल के एकेडेमिक सेसन के बीच नोवेम्बर के महीने में राष्ट्रपति  महोदय ने प्रसन्न होकर ,तरक्की के साथ मेरी पोस्टिंग दक्षिणी अमेरिका के एक अति पिछड़े देश में कर दी. मुझे भारत सरकार की ओर से उस देश के औद्योगिक विकासके  हेतु उनका सलाहकार नियुक्त कर दिया गया.और दस दिन के भीतर वहाँ पहुँच जाने का आदेश भी पारित कर दिया गया. 

उस समय हमारे पांचो बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ रहे थे, और उनकी माँ हिन्दी संस्थान में अपनी नौकरी के साथ साथ बोम्बेयूनिवर्सिटी में पी एचडी की थीसिस लिख रहीं थीं .जैसा क़ि आम है,यहाँ ऑफिस में किसी को हमारी  चिंता नहीं थी.सच पूछो तो वह सब हर्षित थे.उन्हें अब खुले आम बेधडक "कामधेनु" को दुहने का मौका मिल रहा था. 

हमारे बौम्बे के दफ्तर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक किसी को फ़िक्र नहीं  थी क़ि बेचारा "व्ही  एन",इतने थोड़े समय में ,अपनी बम्बई की जमी जमाई गृहस्थी उजाड़ के ,बच्चों की पढाई बंद करवा के और,धर्मपत्नी द्वारा हाल में ही ज्वाइन की हुई नौकरी छुड़वा के तथा उनकी थीसिस रुकवा के ,किस प्रकार साऊथ अमेरिका जा पायेगा ?.

इंग्लेंड में पढायी ख़तम कर के जब मैं भारत लौटा था और यह ऊँची नौकरी ज्वाइन करने दिल्ली जा रहा था मेरे गुरुजनों ने आगाह  किया क़ि इस काम में मुझे अत्याधिक प्रलोभन झेलने होंगे . उनका कहना था ,यदि मैं उन्हें झेल पाया तो ऊँची से ऊँची कोई वह गद्दी नहीं है जिसे मैं न पा सकूं. पर उसके लिए मुझे एक पूर्णतःअनुशासित ,सत्यव्रती तथा  न्यायशील जीवन जीना  होगा  (शेष कल).

निवेदक:  व्ही.एन. श्रीवास्तव  "भोला"

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