सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

साधन- भजन कीर्तन # 2 8 7

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हनुमत कृपा - अनुभव                                                      साधक साधन साधिये

साधन- भजन कीर्तन                                                                              (२८७)

क्षमा प्रार्थी हूं , प्रियजन , मैंने अपने पिछले संदेश # २८६ में कुछ  वो बातें दुहरा दीं जो  मैं अपने २८५ वें संदेश में लिख चुका था ! पर उससे यह सिद्ध हो गया कि मेरे २८६ वें संदेश में लिखी एक यह बात कि "मेरी स्मृति मुझे धोखा दे रही है" ,परम सत्य है !

ऐसा लगता है कि , यहाँ चौबीसों घंटे , अपने चारोँ ओर बर्फ के ऊँचे ऊँचे सफ़ेद  टीले और घर के  कम्पाउंड के  घास के मैदानों , पेड़ पौधों और छत  पर जमी  २ से ४ फीट मोटी बर्फ की परतों को  ४० - ५० दिनों से लगातार देखते देखते , मेरे मस्तिष्क का "ग्रे मसाला " भी अब बर्फ जैसा धवल हो गया है ! ऐसे में किस से शिकायत करुं === 
  
                            कोई     शिकवा     न   गिला     है   "उनसे"            
                           वही लिक्खा है जो "श्री राम" ने लिखाया है !!
                                    टोक देते तो क्या बिगड़ जाता   ---
                                    मेरा  संदेश  ही    सुधर  जाता !!
                                    दे गये पर "वही"मुझको धोखा         
                                    हाय  कैसा समय  ये  आया है!! 
                           वही लिक्खा है जो "श्री राम" ने लिखाया है  !! 
                                                  (भोला)  
पाठकगण,  प्रमुख सम्पादक हैं "वह" , सर्व अधिकार सुरक्षित है उनके हाथों में ! उन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग क्यों नहीं किया ? संदेश के अनावश्यक ,असत्य और अनुचित अंशों को उन्होंने क्यों नहीं मिटा दिया ? ह्म तो उनसे ही पूछ रहे हैं कि उन्होंने मुझसे वह सब लिखवाया ही क्यों ? भैया ये सब वही जाने ! आप और ह्म क्यों व्यर्थ में माथा पच्ची करें ! चलिए यदि आपने मुझे क्षमा  कर दिया हो ,तो आगे बढ़ा जाये !

सद्गुरु स्वामीजी महराज के दर्शन मुझे  उस पंच रात्रि सत्संग के बाद दुबारा नहीं हुए ! एक वर्ष में ही महाराज अपने इष्ट परमप्रभु श्री राम के "परम धाम"चले गये ! ग्वालियर से बाबू  दादा दिल्ली पहुँच गये , इनका  तार मेरे पास आया , पर एक तो देर हो गयी थी दूसरे  मेरे पास उन दिनों ऎसी सुविधा और साधन भी नहीं थे कि जा पाता ! मैं हरिद्वार भी नहीं पहुँच  पाया ! मन मसोस कर रह गया ! वह मन जिसमे श्री स्वामी महाराज ने   " राम नाम " के सदाबहार वृक्ष का बीज बो दिया था ! हर ऋतू में पुष्पित -फलित  रहने वाले राम नामी पौधे ने मेरे मन में जड़ पकड़ ली थी ! मैंने कैसे जाना , सुनिए ---

उनदिनों मैं अपने करिअर के सबसे  निचले स्तर पर था ! मेरे एक दूर के रिश्तेदार जिन्हें उनके सौहार्द , सौजन्य और सहयोग के कारण मैं अपना बड़ा भाई  मानता था उन दिनों कानपुर में ही भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी थे ! उनमें एक विशेषता थी - वह यह क़ि वो एक वास्तविक "राम भक्त" थे ! अपने इस गुण के कारण वह मुझे अतिशय  प्रिय व आदरणीय लगते थे !

मैं नया नया दीक्षित हुआ था और मेरी धर्म पत्नी कृष्णा जी मुझसे ९- १० वर्ष पूर्व स्वामी जी महाराज द्वारा ही दीक्षित हुईं थीं ! मेरे दीक्षित होने के बाद ह्म दोनों ने नियमित रूप से आराधना करने का विचार क़िया !-अपने दैनिक कार्यक्रम में समय निकाल कर ह्म अपनी नवजात गुडिया श्रीदेवी को गोद में लेकर , जब भी ,जहाँ भी मौका मिल जाता था अपना भजन कीर्तन जाप और अमृतवाणी  का पाठ कर लेते थे ! 

ऐसे में एक दिन जब हमदोनों  अमृतवाणी का पाठ कर रहे थे  मेरे वही वाले बड़े भैया आ गये ! कृष्णाजी ने उन्हें अमृतवाणी की एक प्रति दे दी !उन्होंने भी  ह्मारे साथ पूरी अमृतवाणी गायी ! समापन पर उन्होंने गदगद कंठ से कहा " भोला !इस पुस्तिका में तो समस्त आध्यात्म का निचोड़ भरा पड़ा है ,कहाँ मिलती है यह ? मुझे दोगे ? मैं इस का नित्य प्रति पाठ करूँगा ! इसमें  तुलसी रामायण में प्रतिपादित "रामनाम " की  महिमा की पुष्टि होती है जिसका पाठ मैं नित्य प्रति करता हूँ ! सुनो " और उन्होंने मानस के राम-बाल्मीक़ि प्रसंग से हमें   सुनाया 

मन्त्रराज   नित जपहि तुम्हारा , पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा !!
तुम तें अधिक गुरुहि जिय जानी ,सकल भाय सेवहि सनमानी !

जाहि न चाहिअ  कबहु  कछु   तुम संन सहज सनेहू !
बसहु  निरंतर  तासु  मन सो राउर निज गेहू !!
                                                   -------------------
क्रमशः 
निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"


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