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आज का आलेख

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन - # 2 9 7

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हनुमत कृपा - अनुभव                                                      साधक साधन साधिये 

साधन-"भजन कीर्तन"                                                                         ( २ ९ ७ )

"भजन साधना"

"भजन साधना"  से आध्यात्म के क्षेत्र में सच्चे साधक के लिए कोई भी उपलब्धि असंभव नहीं इस बात पर मुझे पूरा विश्वास है ! बात केवल इतनी  है कि जहाँ मैं अपने निजी साधारण अनुभव भी पूरे भरोसे के साथ आपको बता सकता हूँ ,दुसरे लोगों के अनुभव उतने भरोसे से नहीं बता पाउँगा ! इसी से मैं अपने संदेशों को अपने निजी अनुभवों तक ही सीमित रखता हूँ !

मेरे जीवन में "भजन साधना" का शुभारम्भ 

पिछले सन्देश में मैंने आपको कुछ ऐसे ही दिव्यआत्माओं के नाम बताये जिन से प्रेरणा पाकर मैंने अपनी किशोरअवस्था में ही गायन के क्षेत्र में फिल्मी गीतों के साथ ही भजनों को और पारम्परिक गीतों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी ! १८ वर्ष की अवस्था में  हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्धयन के दौरान (१९४७ - १९५१ में)मैं केवल मुकेश जी और जनाब  रफी साहेब के फिल्मी गाने ही गाता था ! पर वहीं मुझमे एक चमत्कारिक परिवर्तन हुआ !

उन्हीं दिनों मुझे बी.एच. यु. में आयोजित संगीत मार्तण्ड ठाकुर ओमकार नाथ जी के एक शास्त्रीय   संगीत के कार्यक्रम में वालन्टिअरिन्ग के बहाने शामिल होने का अवसर मिला!    जाड़े की वह पूरी रात  मैंने शून्य से उतरती पूर्ण चन्द्र की शीतल ओस सनी सजल किरणों में भींज कर काटी ! ठाकुर जी के स्वरों की गर्माहट ने उस शीतल रात्रि को इतना गरमा दिया था कि किसी को भी कोई ठिठुरन नहीं हुई ! उनके सधे हुए स्वरों के उतार चढ़ाव से हम सब श्रोताओं के रोम रोम एक विचित्र सिहरन से थिरक गये और हम सबकी आँखों से झरती गर्म अश्रु धारा से वह सारी महफिल गरमा गयी ! संगीत से प्रवाहित आनन्द -रस से सभी अपनी सुध -बुध  भूल गये ! श्रोताओं  की  सारी रात पंडित ओमकारनाथजी  की हृदय की गहराइयों को छूने  वाली  संगीत -कला का आनन्द लेते हुए कट गई ! 

प्रातः कालीन सूर्य की सुनहरी किरणे नीलाकाश में  पूर्व दिशा से झाकनें  को उद्धयत हो  रहीं थीं ! बचे हुए प्रबल संगीत प्रेमी पंडाल से उठने को तैयार न थे ! पर समापन तो होना ही था ! श्रोताओं के विशेष अनुरोध पर पंडित जी ने सूरदास जी का वह पद गाया जिसका उल्लेख मैंने अपने पिछले सन्देश में किया है --

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
भोर  भयो  गैयन  के  पाछे  मधुबन  मोहि   पठायो !
चार  पहर  बंसी  बन    भटक्यो  साँझ परे घर आयो !!
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यह ले अपनी लकुटी कमरिया बहुत ही नाच नचायो ,
सूरदास तब  बिहंसि  जसोदा , ले उर  कंठ   लगायो !!
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सूरदास जी की इस रचना में माता यशोदा और बालक कृष्ण के बीच हुई नोकझोंक में जो     जो भाव प्रगट हुए पंडित जी ने अपने कंठ से उन सब भावों का अलग अलग शास्त्रीय   राग-रागिनियों और पारंपरिक धुनों द्वारा ऐसा सजीव  चित्रण  किया कि श्रोतागण को ऐसा लगा जैसे वे "नंदालय" के आंगन में बैठे हैं और वह "बाल लीला" उनके सन्मुख ही  हो रही है ! वहां का सारा वातावरण परमानन्द मग्न हो गया !

अनुमान लगाओ प्रियजन ! कि उस पल वहां उपस्थित हम सब संगीत प्रेमियों की मनः  स्थिति कैसी रही होगी ?  सबकी छोडिये , मेरी सुनिए मुझे  तत्काल जो आनंद मिला था वह प्रत्यक्ष कृष्ण दर्शन से किसी भांति कम न था ! यह आनंद वैसा ही था जैसा कदाचित मेरी अम्मा को तब प्राप्त हुआ था जब मैं ५-६ वर्ष का था और मैंने उन्हें "ध्यान" में अपने बालगोपाल के दर्शन के बाद मुस्कुराते हुए देख लिया था (विस्तृत वर्णन पहिले दे चुका हूँ)

इसके अतिरिक्त पंडित जी के उस कार्यक्रम ने मेरे मन में भजन गायन के भाव जागृत  करा दिए और संगीत के लिए एक नयी उमंग ऊर्जा मुझमें प्रवाहित हो गयी !

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निवेदक :- वही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 

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