सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
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के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
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हनुमान चालीसा

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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 12 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 1 5

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 

मनुष्य के जीवन के हर बीते पल में प्रभु की अहेतुकी कृपा हुई होती हैं और उसके वर्तमान में भी प्रति क्षण उस पर श्री हरि कृपा होती ही रहती है ! विडम्बना यह है की हम मानव ये समझते हैं कि जो  हुआ वह मेरे द्वारा  हुआ , मेरे कारण हुआ और उसे र्मैने किया ! देखा आपने मैं भी मैं और मेरे के चक्कर में पड़ गया ! आखिर हूँ तो क्षुद्र बुद्धि वाला मानव ही !

चलिए आप के साथ बैठ कर अपने निजी अनुभवों का रोजनामचा खोल कर पढूं ! बहुत बचपन के कुछ अनुभव जिनके कारण छुटपन से ही मेरा झुकाव करुनाजनित प्रेमभक्ति  की ओर हो गया था ,मैं पहले के अनेक संदेशों में बता चुका हूँ !

आज १५-१६ वर्ष की अवस्था में झेले कल के जापानी सुनामी की तरह की ही ( उस समय  भयानक लगने वाली ) १९४५-४६ की एक निजी अनुभव कथा आपको सुनादूं !

जब की ये कथा है तब भारत का विभाजन नहीं हुआ था !पूरा हराभरा पंजाब अपना था !मैं अविभाजित पंजाब के गुजरात जिले के एक गाँव में गया था ! एक डेढ़ महीने तक हमने वहां गुल्लू के खू दा ठंढा पानी पिया था ! मुन्शियाँ दे कार दी खुल्ली छत पर मंजी पर बैठ कर घर के तंदूर में सिकी घर की चक्की पर पिसी , अपने खेत के गेंहूँ के आटे की ताज़ी ताज़ी रोटियों का मज़ा लूटा था ! रोज़ सुबहो शाम बढिया से बढिया शहरी ड्रेस में सज धज कर खेतों की खुली हवा में बबूल के दातुन दांतों में दबाये ,टहलटहल  कर ,उगते -डूबते सूरज के झुटपुटे में ,गोला बना कर एक जगह बैठ कर बातें करते करते हमने  अपना दूसरा अति आवश्यक नित्य कर्म पूरा किया था ! आनंद ही आनंद लूटा था हमने  वहां !और उस दिन मैं उस सुखद यात्रा से लौट रहा था !

गुजरात शहर से लाहौर , अमृतसर , अम्बाला जंक्शन होते हुए हम तूफानी रफ्तार वाली   पंजाब मेल से यू पी के लखनऊ तक आराम से पहुंच गए ! लखनऊ से कानपूर पहुँचने के लिए हम जी.आई.पी.रेलवे की पेसिंजर गाड़ी में सवार भी हो गये ! गाड़ी लखनऊ से बन कर चलती थी बिलकुल खाली थी ! हम आराम से बैठ क्या समझो , लेट ही गए ! लेटते ही  पलकें झपकने लगीं ! सत्यपाल की बेबेजी बगल में बैठीं थीं थोड़ा खिसक कर उन्होंने मुझे सोने भर की जगह भी दे दी ! 

जून के अंतिम दिन थे ,गरमी हद तक पहुँच चुकी थी !तब ट्रेन के निचले दर्जे में पंखे नहीं 
होते थे ! बूढ़ी बेबे जी हाथ से पंखा झल कर मुझे आराम से सुला देना चाहती थीं !

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आप कहोगे इसमें कौन सी "हरि कृपा" हुई मुझ पर -- कल होगी ,थोड़ी प्रतीक्षा करिए :
निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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