सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 17 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 0

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अनुभवों का रोजनामचा 

आत्म कथा 


भारत में विदेशी शासकों द्वारा देश भक्त भारतीयों पर की हुई बर्बरता की कहानियां विदेशी इतिहासकारों नें भी नहीं छुपायीं ! कलकत्ते का "ब्लैक होल" जिसमें तत्कालिक सरकार ने एक छोटी सी कोठरी  में अनेकों भारतीयों को बंद किया और उन्हें एक एक सांस के लिए मोहताज करके  तड़प तड़प  कर मरने को छोड़ दिया , क्या कोई भारतीय कभी भी भुला सकता है ? कानपुर के "मेमोरिअल वेल" को तो मैंने भी देखा है ,कहते हैं कि उस कुँए मे सैकड़ों लोगों को ढकेल कर लाशों से उसे पाट दिया गया था ! ठीक से याद नहीं कि उसमें विदेशी शासकों के समर्थकों की लाशें थीं अथवा देश भक्तों की !  इतना भव्य मेमोरिअल विदेशियों ने किस उद्देश्य से बनवाया और स्वतंत्रता के बाद देशी सरकार ने उसे क्यों तुड़वाया इस पर भी मैं कोई प्रकाश नहीं डाल पाऊंगा क्योंकि प्रियजन न तो मैं इतिहासकार हूँ न पोलिटीशियन !

प्यारेप्रभु के आदेश से "उनके" ही सञ्चालन में "उनकी" ही मन्त्रणा और प्रेरणा से उनकी कृपा से उपलब्ध संसाधनों के द्वारा , इस "बड़े सौभाग्य से पाए मानव तन " से जितना कुछ ,"अपने राम को रिझाने के बहाने - स्वान्तः सुखाय " बन पाता है , केवल उतना ही करता हूँ ! ( देखा आपने फिर कर्तापन का अहंकार ? भैया मैं कुछ नहीं करता ! मेरी  क्या औकात है ,सच पूछो तो जितना "वह" मुझसे करवा लेते हैं वह ही सम्पूर्ण हो पाता है ) 

इस ऐतिहासिक "ब्लैक  होल" की याद इसलिए आयी क्योंकि उस दिन की , तीन  नम्बर की लखनऊ कानपूर (3 LCपेसेंजर रेलगाड़ी के  सभी तीसरे दर्जे के डिब्बे "ब्लैक होल" के प्रतिरूप बने हुए थे ! और मित्रों उनमें  से एक डिब्बे में था आपका यह "राम का  प्यारा" शुभाकांक्षी मीत !

ज़िन्दगी और मौत के कगार पर खड़े उस ट्रेन के सैकड़ों यात्री अपने इष्ट देवों को मना रहे थे , मुस्लमान भाई "अल्लाह" को, सिक्ख भाई " वाहे गुरु " और "बाबा जी" को तथा हिन्दू भाई अपनी अपनी मान्यतानुसार विविध देवी देवताओं को तथा उनके भी "इष्ट" सर्वव्यापी 'ब्रह्म' को मना रहे थे जो प्रत्येक जीवधारी के रोम रोम में रमा हुआ है !


रोम रोम पर आसीन सर्वशक्तिमान ब्रह्म के होते हुए स्वजनों कौन हमारा एक बाल  भी बांका कर सकता है ? एक हाल की कथा सुना देने की प्रेरणा हुई है : 


२००८ के अंत में,भारत के एक हस्पताल के एसी युक्त ,प्रदूषणों से मुक्त ,साफ सुथरे आई. सी.यू. में मेरे जीवन रक्षा के प्रयास चल रहे थे ! सांस का आवागमन बनाये रखने के लिए "ओक्सीजन मास्क" और electric shock का प्रयोग हो रहा था ! एक रात "कोमा" के बाहर आते ही मैं कुछ बडबड़ाया जिसे ड्यूटी नर्स ने एक पुर्जी पर नोट कर लिया !प्रियजन  अगले प्रातः धर्म पत्नी कृष्णा जी ने वह पर्ची पढ़ी , उसमे लिखा था 


रोम रोम 'श्रीराम' बिराजें धनुष बाण ले हाथ 
माता सीता लखनलाल अरु बजरंगी के साथ  
( आये कोई लगाये हाथ )

यहीं समाप्त करने का आदेश है , स्थानीय मारुती मन्दिर में जाना है ! वहां भजन कीर्तन  होंगे ! मैं तो अभी की प्रेरणानुसार , वहां पर प्राक्रतिक आपदाओं से जूझते जापान के दुखी  नागरिकों की सुरक्षा के लिए मन ही मन प्रार्थना करूँगा ! मेरे अतिशय प्रिय पाठक गण आप से अनुरोध है ,कृपया यह सन्देश पढ़ते समय इस प्रार्थना में मेरा साथ अवश्य दें   ! आपके सहयोग से मेरी भी अर्जी वहां तक पहुँच जायेगी ! धन्यवाद !

और हाँ , कोई चिंता मन में लेकर न सोइयेगा !-मुझे कुछ भी नहीं हुआ , न तब १९४५ में और न २००८ की बीमारी में ! भैया ,विश्वास करो ,धरती से ही पत्र भेज रहा हूँ ,अभी शून्य तक नहीं पहुंचा ! कल रेल गाड़ी वाली कहानी और होस्पिटल की वह रचना पूरी करूंगा , यदि हाई कमांड से आज्ञा हुई ! 

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क्रमशः 
निवेद्क: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सम्मानीय श्रीवास्तवजी..जय जय राम ।
    मेरा आपसे दो बातों के लिये अनुरोध है । 1 आप अपने ब्लाग में follow me गैजेट फ़ालोअर्स के लिये जोङ
    लें । जिससे लोग आपके ब्लाग तक आसानी से पहुँच सके । 2 आप एक सम्मानित बुजुर्ग और प्रभुभक्ति के बारे में लिखते हैं । अतः आपके ब्लाग पर कोई अभद्र या आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं करेगा । इसलिये आप अपने ब्लाग से "माडरेशन" हटा दें । ताकि टिप्पणीकर्ता अपनी टिप्पणी को तुरन्त देख सके ।
    और बाकी..आपकी आत्मकथा बहुत ही रोचक सफ़र कर रही है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस प्रार्थना में हम सब आप के साथ हैं| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप को किस तरह से संबोधित करू ..समझ में नहीं आता...मैंने राजीव जी को गुरूजी शब्द से संबोधित किया , तो उन्होंने मुझे कहा की -शाव जी..आप मुझे राजीव जी ही कहा करें !उस समय मुझे लगा था की मैंने एक नए गुरु को खो दिया ..किन्तु अब आप के पोस्ट पर आने के बाद लगा की ..मैंने एक दूर देश में बैठे गुरु को पा लिया है !वैसे मेरा यह स्वाभाव है की जो मुझे पसंद आते है , उन्हें अपना गुरु कहते नहीं झिझकता !मै भविष्य में आप के पोस्ट पर हमेशा आऊंगा और अपनी टिपण्णी भी दूंगा ..समयवश कभी - कभी न दे पौ तो नाराज न होए क्योकि मै जिस ड्यूटी से जुड़ा हूँ..उसमे आराम करने में ही समय कम पड़ जाता है ! मै भी बजरंग वली को बहुत मानता हूँ ! आप ने बिलकुल जिवंत याद दिला दी !होली की शुभ कामनाये ! ॐ साईं...दीर्घायु की कामना के साथ..आप का ..गोरख नाथ साव !

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