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आज का आलेख

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जन्तर मन्तर का 'प्रेम महायज्ञ' # 3 4 0 - 0 5

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भारत में 
जन्तर मन्तर का 
प्रेम महायज्ञ 

प्रेम - करुणा - सेवा - भक्ति 

दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले १०० घंटों से हो रहे विशाल "प्रेम महायज्ञ" के 'चल चित्र' यहाँ यू.एस. ए. के टी.वी न्यूज़ चेनल्स पर देख रहा हूँ ! उन्हें देख कर कानपूर में राष्ट्रपिता   "बापू" और "आचार्य विनोबा भावे जी" से सम्बन्धित वैसे ही चल चित्र सहसा मेरे स्मृति पटल पर उभर आये ! दोनों ही चित्रों में मुझे दिखा ,कोने में दुबका सहमा खड़ा एक "अन्डर टीन्स" बालक अपनी टोली के साथ ! बापू के यज्ञ में १५ वर्ष से छोटा था और विनोबाजी के यज्ञ के समय लगभग १८ वर्ष का !

क्षमा प्रार्थी हूँ ६०-७० वर्ष पुरानी घटनाओं के घटने का सही समय दिन तारीख़ नहीं याद रख सका,पर उन घटनाओं के अपने अनुभव नहीं भुला पाया हूँ ! आज जब मैं उन द्रश्यों की पुनरावृति पुनः अपनी आँखों से देख रहा हूँ ,निज अनुभव सुनाने की इच्छा जगी है ! 

बापू का एक प्रेम यज्ञ जो मैंने देखा 

कुरुक्षेत्र में पार्थ के सारथी कृष्ण के समान, निःशस्त्र निष्काम भाव से "सोनार बांग्ला" के जातीय धार्मिक हिंसा में जूझती जनता को हिंसा त्याग कर प्रेम से मिलजुल कर रहने का  सन्देश देने को 'बापू' दिल्ली से कोलकता जा रहे थे ! मैं १४-१५ वर्ष का रहा हूँगा ! मोहल्ले के एक कोंग्रेसी 'लेबर' नेता का लडका हमारा सहपाठी था ! उसने बताया कि बापू की ट्रेन कानपूर होकर जा रही थी और स्टेशन पर भीड़ को सम्हालने के लिए वह कोंग्रेस सेवादल के स्वयंसेवकों के साथ स्टेशन जा रहा था ! मैं भी उसके साथ चल कर  "बापू" के दर्शन कर सकता था ! पिताश्री से आज्ञा मिल गयी सो मैं उसके साथ निकल पड़ा !

घर से स्टेशन तक का रास्ता आदमी औरतों और बच्चों से ऐसे भरा था जैसे सावन के पहले सोमवार को गंगा स्नान के लिए परमट और सरसैया घाट की ओर जाने वाली सडकों पर स्नानार्थियों की भीड़ होती  है ! मेले जैसा वातावरण था ! ऐसा लग रहां था  जैसे सारा का सारा नगर ही कानपूर स्टेशन में समा जाना चाहता है ! हवा के झोके में जैसे पीपल के पत्ते छन भर में कहीं से कहीं पहुच जाते हैं वैसे ही स्टेशन के निकट पहुच कर हमे पैर भी नहीं चलाने पड़े और हम प्लेटफोर्म पर पहुंच गये ! क्या यह कोई जादू था ?

ट्रेन प्लेटफोर्म में दाखिल हुई ! जैसे जैसे ट्रेन आगे बढी जन समुदाय सैलाब की तरह आगे की ओर बढने लगा ! इतनी जबर्दस्त लहर चली कि उसमे हलके फुल्के शरीर वाले अनेकों दर्शनार्थी या तो कंधों पर लद गए या ----------  प्रियजन न पूछिए उनका क्या हुआ !  मैं सौभाग्यशाली था मुझे "प्यारे बापू" के दर्शन तो हुए पर उसके बाद जो हुआ उसकी याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े होने लगे हैं !

क्या नशा था, क्या दीवानापन था ? लोग पागलों की तरह उस तीसरे दर्जे के डिब्बे की ओर भाग रहे थे जिसपर एक तिरंगा लहरा रहा था और जिसके दरवाजे पर "बापू" खड़े थे ! मुझे दर्शन हो चुके थे, मैं भीड़ से निकल कर किनारे जाना चाहता था ! मैं हल्का फुल्का था ,रेले में अपने आप को सम्हाल न पाया ,मेरे पैर मेरा बोझ ढो न सके ,मैं लडखडा कर गिर गया और मेरे शरीर को लांघ लांघ कर न जाने कितने लोग गुजरे और कितनों के चरण चिन्ह मेरे अंग-प्रत्यंग पर बने नहीं कह सकता ! मेरा वह दोस्त गांवं का हट्टा कट्टा कुश्ती लड़ने वाला पहलवान था ! मेरे अचानक अंतर्ध्यान होने से वह चिंतित हुआ और जब थोड़ी देर बाद उसने मेरी दुर्दशा देखी , उसने झुक कर बमुश्किल तमाम मुझे उठाया और अन्य स्वयंसेवकों की मदद से  फर्स्ट एड करवा कर मुझे घर पहुंचा गया !

प्रियजन , राष्ट्र पिता बापू के प्रति भारत के आम जनता की यह पागलों जैसी प्रीति ही थी जिससे भय खाकर इतनी आसानी से ,अँगरेज़ बोरिया बिस्तर बांध कर अपने "यूनियन जैक" के साथ शांति पूर्वक भारत छोड़ कर चले गये ! यदि भारतवासियों में यह "प्रेम" की ताकत न होती तो अस्त्र शस्त्र के बल से क्या हम कभी उन्हें हरा सकते थे ? 

आचार्य विनोबा भावे जी के दर्शन की कथा इससे अधिक रोचक होगी - उसमे मुझे कोई आघात नहीं लगा था ! उसमे प्रेम है , संगीत है और भारतीय जन समुदाय की वैसी ही प्रेम-उन्मत्तता है जैसी "बापू" के प्रति थी !

आप भारतवासियों ने भी तो उस श्रेणी के "प्रेम" की एक अति जीवंत झांकी पिछले ५-६ दिनों में नईदिल्ली के 'जन्तर मन्तर' पर देख ली है ! कल उस पर भी अपनी जानकारी के अनुसार थोडा प्रकाश डालूँगा !

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क्रमशः 
निवेदक :  व्ही .एन. श्रीवस्तव "भोला"
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1 टिप्पणी:

  1. काकाजी आप ने सही ही लिखा है !आज समाज को बदलने का समय आ गया है ! यह तभी होगा जब सभी प्रेममय हो जाये !प्रणाम !

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