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आज का आलेख

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

सत्य साईँ बाबा # 3 5 5

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सत्य साईँ बाबा 
अंतिम दर्शन

बाबा का यह चित्र मैंने नहीं खींचा है ! लेकिन यह चित्र वह है जो मेरे अंतस्तल पर पिछले ३०-४० वर्षों से इतनी ही स्पष्टता से जैसे का तैसा अंकित है ! मेरे इस लेख श्रंखला में इस का ऐसे ही अवतरित हो जाना भी एक चमत्कारिक बात है ! (प्रियजन, अभी बहेकुंगा  नहीं पर इस चमत्कार की चर्चा जरूर करूंगा , जल्दी ही ) , अभी आगे बढ़ता हूँ :

दर्शन न हो पाने से हम पांचो उदास थे ! कितनी आस लगा कर आये थे हम सब ? सभी कुछ न कुछ पाने की उम्मीद लगाये थे ! सब की भिन्न भिन्न आकांक्षाएं थीं ! सम्भवतः हम पाँचों की आकांक्षाएं भी आपस में एक दुसरे से टक्कर ले रहीं थीं ! ( अन्तोगत्वा मेरा यह अनुमान सच ही निकला - लेकिन इस विवाद में अभी नहीं पडूंगा - "आत्म कथा" में  कभी न कभी भेद खुलेंगे ही ) ! आप आगे की कथा सुनना चाहते हैं ,पहले वह पूरी कर लूं!

अति दुखी मन से हम उस प्लाट तक पहुचे जहाँ हमने गाड़ी पार्क की थी ! वहां फाटक पर एक मोटा सा अलीगढ़ी ताला लटक रहा था ! शायद  वाचमैंन भी बाबा का दर्शन करने के लिए पंडाल की ओर चला गया था ! हमें  दफ्तर के लिए बहुत देर हो रही थी ! बड़ी उलझन में थे हम सब ! कहीं कोई खाली टेक्सी भी नहीं दिख रही थी ! सहयोगी सब तरफ टेक्सी खोजने के लिए गये ! हम दोनों - (कृष्णा जी और मैं) एक पुराने बरगद के नीचे पत्थर के चबूतरे पर बैठ गये ! टेक्सी नहीं मिली , तीनो सहयोगी लौट आये ! यह तय हुआ की गाड़ी वहीं छोड़ दी जाय , शाम को ले ली जायेगी ! बाहर रोड पर टेक्सी मिल जाएगी उससे हम चारों सीधे ऑफिस चले जायेंगे और कृष्णा जी वहां से बस द्वारा घर चली जायेंगी !

हमारे सहयोगियों में से एक जो बाबा के परम भक्त थे उन्होंने सुझाया की वापस जाने से पहले एक बार पंडाल की तरफ देख कर नमस्कार कर लेना चाहिए ! हमने पीछे घूम  कर 
प्रणाम किया और चल दिए ! कहीं से आवाज़ आई ! दूर से भाग कर आता भैया वाचमैन कह रहा था ," सेठ बिगेर दरसन के जाय रहे हन ?"  हम उसके पीछे पीछे फाटक तक लौट आये ! उसने ताला खोला ! हम प्लाट में दाखिल हुए ! इत्तेफाक से तब तक सडक के एक  तरफ इस वाले प्लाट और दूसरी तरफ कई गलियों के पीछे बने बाबा के कमल के फूल जैसे गुम्बद वाले नये सेंटर के बीच कोई इमारत नहीं खड़ी हुई थी ! वाचमैन ने वह गुम्बद हमे दिखाया और उधर देखते हुए  प्रणाम किया ! हमारे लिए इशारा था कि हम भी गुम्बद को प्रणाम कर लें ! बाक़ी चारों ने फटाफट औपचारिकता निभा कर प्रणाम कर लिया और फुर्ती से गाड़ी में बैठ गये ! मैं बाहर ही रहा !

कार का दरवाजा खोलते खोलते मैं सोच रहा था , "एक बार पंडाल को प्रणाम किया , अब साईँ सेंटर के गुम्बद को करूं ? ! हम जिन "सत्य साईँबाबा" का दर्शन लाभ करने के लिए  सबेरे से परेशान हैं ,वो दर्शन ही नहीं दे रहे हैं"! उसी क्षण जैसे किसी अज्ञात शक्ति ने मेरे दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जोड़ दिए ! मैं सीधा खड़ा होगया और मेरी आँखें बंद हो गयीं ! कुछ पल को मेरी आँखें मुंदी ही रहीं --और जब खुलीं तब ----

एक आश्चर्यजनक चमत्कार हुआ

मेरी आँखों के ठीक सामने , साईँ सेंटर की खुली छत पर , नीले आकाश के तले "सत्य साईँ बाबा " अपने दाहिने हाथ से अभय दान की मुद्रा बनाये हमे चिंता मुक्त कर रहे थे ! आँखे खुलते ही मेरे मुंह से अनायास ही निकला , "जै हो साईँ बाबा की जै हो " !  मेरी आवाज़ सुनते ही कृष्णा जी और मेरे तीनों सहयोगी कार से बाहर निकल आये और बाबा को देखते ही हम पाँचों हर्षोल्लास से नाच उठे ! उधर पंडाल में हज़ारों भक्त आतुरता से बाबा के आगमन की प्रतीक्षा करते रहे और इधर एकांत में बाबा ने हम पांचो को विशेष दर्शन दे दिया ! हम धन्य हो गये !     

अब इस चित्र का चमत्कार 

लेख में लगाने के लिए  साईँ के चित्र की खोज हो रही थी ! मैंने पुत्र राघव जी से मदद मांगी  !गूगल इमेज से सर्च करके उन्होंने जो चित्रों का एक छोटा सेट निकाला उसमें से   बार बार एक विशेष चित्र उभर कर बाहर आ रहा था ! यह चित्र वह था जिसमे 'बाबा' का दाहिना हाथ अभय दान की मुद्रा में दिख रहा है -- वही मुद्रा जो हमने ४० वर्ष पहले मरोल में देखा था !इसके आलावा वही नीला आकाश वही स्वरूप जो तब से आज तक मेरे मन में बसा है! आप माने या नहीं माने हम दोनों पति - पत्नी के लिए बाबा का यह विशेष दर्शन 
अब तो और भी अविस्मर्णीय बन गया है !

"बाबा कहीं नहीं गये" ऐसा एक नहीं सैकड़ों भक्तों ने आज उनको श्रद्धांजली देते हुए कहा ! यह परम सत्य है ! आज वह हमारे बीच नहीं हैं फिर भी विश्व भर से उनके चमत्कारों के समाचार अभी भी आ रहे हैं ! 

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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जे.एन.जी की तरह आज मैं भी आपको काकाजी कह रही हूँ और मैं भी ये मानती हूँ की सच्चे मन से जो भी माँगा जाये वह ज़रूर मिलता है आप सभी सच्चे मन से साईं बाबा के दर्शन के लिए गए थे और यह वे अपने अंतर्मन से देख रहे थे और इसीलिए उन्होंने आपकी मनोकामना पूरी की .आपने हमें भी उनसे मिलवाया इसके लिए हम आपके बहुत बहुत आभारी हैं.

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  2. जो सच्चे मन से किसी को याद करता है मिलता जरुर है| धन्यवाद|

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  3. काकाजी प्रणाम ....बहुत सुन्दर यादें ! कुछ दिन बाद ..मै कुछ तस्वीर आप को इ-मेल करूंगा, आज समय नहीं है !धन्यबाद

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