सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 4 मई 2011

हनुमान तेरा आसरा # 3 5 9

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हनुमान तेरा आसरा 

(गतांक से आगे) 

महापुरुष कहते हैं  कि ,सच्चे साधक का एक ध्येय, एक इष्ट और एक गुरु होना चाहिए !आसरा - आश्रय, भी मात्र एक का ही लेना उचित है ! सागर पार करने को केवल एक सुदृढ़ नौका चाहिए ,अनेकों नौकाये हो कर भी काम नही आयेंगी ! मानते हैं , लेकिन क्या करें/ जब तक हमारी  अपनी सद्वृत्तियों के अनुरूप हमे हमारी मंजिल तक ले जाने वाला या हमारा पथ प्रशस्त करने वाला सद्गुरु नहीं मिलता ,तब तक  हम डगमगाते रहते हैं ! जब हमारा भाग्योदय होता है ,तब हमे सदगुरु मिलते हैं जो हमारी स्थिति के अनुरूप , हमे हमारे इष्ट का परिचय देते हैं, अथवा अपने किसी सुयोग्य सहयोगी  के पास उनकी कृपा मागने के लिए भेज देते हैं  ! मेरे  साथ ऐसा  ही हुआ !

शैशव में जननी माँ बनी हमारी पहली इष्ट ,पहली गुरु, पहली मार्ग दर्शक ! बाल्यावस्था में  ही, मुझे अपने पैरों  पर खड़ा कर के उन्होंने आंगन के महाबीरी ध्वजा वाले हनुमान जी को सौंप दिया ! गुरु मन्त्र दिया कि " कभी भी , कहीं भी ,अँधेरे में डर लगे , रास्ते में कुत्ता पीछा करे, भूत प्रेत का भय सताए तो  हनूमानजी को याद कर लेना , उनसे केवल इतना ही कहना की हे  " हनुमान जी -

को नही जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो ?: 
काज कियो बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देहि बिचारो 
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहीं जात है टारो 
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु  संकट होइ हमारो 

फिर तुम्हारा डर पल भर में फुर्र से उड़ जायेगा ! "

अम्मा से मिला यह गुरु मन्त्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ ! जब कभी भय ने सताया ,हमने "उनको" याद  किया और बात बन गयी ! इसके बाद अम्मा की बात गाँठ बांधे मैं एक के बाद एक मंजिल पार करता गया ! आत्म कथा के पिछले अंकों में बता चुका हूँ की कैसे "पनकी" वाले हनुमान जी की कृपा से मुझे खानदानी मुंशीगीरी का पेशा छोड़ कर कोई टेक्नीकल काम सीखने की प्रेरणा मिली ! यही नहीं मेरी अभिलाषा पूरी करने के लिए श्री  हनुमानजी की ने  मुझे भारत की उस जमाने की सर्वश्रेष्ठ युनिवर्सिटी B H U  के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी में out of turn - most unexpectedly बिना किसी सोर्स या शिफारिश के एडमिशन भी दिला दिया ! अपना तो एक ही सोर्स था , और अपने को भरोसा भी एक हनुमंत का ही था अन्य किसी का नहीं !  

वाराणसी में पढाई के दौरान पूरे समय अम्मा द्वारा नियुक्त हमारे इष्ट श्री हनुमान जी  हमारे अंग संग रहे ! उन्होंने एक से एक भयंकर दावानल में ,मुझ पर कोई आंच न आने दी ! इन घटनाओं में मेरे साथ मेरे अनेकानेक अतिप्रिय घनिष्ठ  मित्रगण ,सगे सम्बन्धी मेरे ही जैसे १७-१८ वर्ष के अन्य प्रदेशों और सुदूर साउथ अफ्रिका आदि विदेशों से आये अनेकों सहपाठी , युवक-युवतियां तथा गुरुजन सभी शामिल हैं ! जिनका अभी यहाँ उल्लेख करना मुझे उचित नहीं लग रहा है ! विद्याध्ययन  के दिनों में वाराणसी में मेरे साथ अनेकों ऎसी अनूठी घटनाएँ घटीं जिन पर विश्वास करना स्वयम मेरे लिए कठिन होता यदि मैं खुद ही उसका गवाह न होता !

प्रत्येक अवसर पर श्री हनुमान जी ने अपना वरद हस्त मेरे मस्तक पर रख कर मुझे  विजय श्री दिलवायी ! हमारा हनुमंत- भरोसा दिन प्रति दिन दृढ़ ही होता गया !

(ये सारी घटनाएँ अति रोचक हैं !  १९४०-५० के भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे युवक युवतियों के रहन सहन चाल ढाल पर प्रकाश डालतीं हैं लेकिन इन कथानकों में मेरे भागीदार अधिकांश साथी अब तक यह संसार छोड़ चुके हैं, और फिर किसी की सम्मति के बिना उसके विषय में कुछ भी कहना मेरे प्यारे पाठकों , मुझे प्रभु से मिल रहे अभी के संकेतों के मद्देनजर अनुचित लग रहा है ! इसलिये अभी उनके विषय में  कुछ नहीं बोलूँगा लेकिन जैसे जैसे "ऊपर वाले" से आदेश मिलेगा, आत्म कथा में उनका समावेश करूंगा)

क्रमशः
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने माँ ही पहली इष्ट, गुरु और मार्ग दर्शक है| धन्यवाद|

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  2. आप बिलकुल सही बातें कहते हैं मेरी माँ भी बहुत बहादुर हैं किन्तु मैं बहुत डरपोक और भगवान की पूजा करके भी मेरा डर नहीं निकलता इसके पीछे कारण मेरा भगवान में कम विश्वास है आपका विश्वास ही है जो आपको जीवन में इतने साहस से कठिनाइयों से लड़ने का साहस देता है.माँ का मन्त्र तो अचूक होता ही है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. .

    आदरणीय भोला जी ,

    इश्वर में मेरी अटूट आस्था है। उनकी कृपा से सभी सुख , खुशहाली एवं निर्भयता मिली है ।

    .

    उत्तर देंहटाएं

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