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शुक्रवार, 17 जून 2011

गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ # 3 8 7

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गुरु की कृपा न कभी भुलाऊँ 
गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ
ऎसी सुमति हमे दो स्वामी

"भोला"
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परमगुरु "प्रभु श्री रामजी" के आदेश से , श्री राम शरणंम , लाजपत नगर , नई दिल्ली ,के दिव्य प्रांगण में, ब्रह्मलीन गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी महाराज एवं , सद्गुरु  श्री प्रेम जी महाराज तथा  वर्तमान गुरुदेव डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज के पावन संगत  में व्यतीत किये इस जीवन के कुछ अविस्मरनीय क्षणों के मधुर संस्मरण आपकी सेवा में प्रस्तुत करने की प्रेरणा हुई और मैं U S A में आयोजित इस वर्ष के खुले सत्संग के अपने दिव्य अनुभव लिखने बैठ गया !

कल वाले सन्देश में मैंने कहा था कि एक रविवासरीय सत्संग के बाद गुरुदेव डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज ने परम श्र्दध्येय श्री स्वामी जी महाराज के श्री चरणों का एक चित्र अपने वरद हस्त से हमे (मुझे और कृष्णा जी) को प्रदान किया ! चित्र देते समय महाराज जी ने मेरे गुरु संबंधी भजनों को इंगित कर के कहा "आप बहुधा बाबा गुरु के श्री चरणों की   चर्चा अपने भजनों में करते हैं , ये चित्र ले जाएँ " (शब्द ठीक से याद नहीं हैं क्षमा प्रार्थी हूँ . उस समय हमारी सजल आँखों के साथ साथ शायद हमारे कान भी बंद हो गये थे )

आइये आपको अपनी वह रचना बताऊँ जिसक़ी ओर गुरुदेव डॉक्टर विश्वमित्रजी महाराज का  इशारा था !

गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ , ऎसी सुमति हमे दो दाता !!
(स्वामीजी महराज के शब्दों में हमारा एकमात्र हितकारी शुभचिंतक "दाता" "राम" है)

इस  भजन  को  सुनने  के लिए आप श्री राम शरणम् के ऑडियो डाउनलोड पेज  से "गुरु चरनन में ध्यान लगाऊं" लिंक को क्लिक करें . 
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गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ , ऎसी सुमति हमे दो दाता 

मैं अधमाधम , पतित पुरातन , किस विधि भव सागर तर पाऊँ 
ऎसी दृष्टि हमे दो दाता , खेवन हार गुरू को पाऊँ
गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ

गुरुपद नख की दिव्य ज्योति से, अपने मन का तिमिर मिटाऊँ 
गुरु पद पद्म पराग कणों से , अपना मन निर्मल कर पाऊँ 
गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ

शंख नाद सुन जीवन रण का , धर्म युद्ध में मैं लग जाऊं ,
गुरु पद रज अंजन आँखिन भर ,विश्व रूप हरि को लाख पाऊँ ,
गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ

भटके नहीं कहीं मन मेरा , आँख मूँद जब गुरु को ध्याऊँ,
पीत गुलाबी शिशु से कोमल, गुरु के चरण कमल लख पाऊँ 
गुरु चरनन में ध्यान लगाऊँ

"भोला"
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प्रियजन इस रचना की अंतिम पंक्ति   :
"पीत गुलाबी शिशु से कोमल, गुरु के चरण कमल लख पाऊँ "
से सम्बंधित अनुभव मैंने गुरुदेव श्री विश्वामित्र जी महाराज को बताया था !
 आइये आज आपको भी बता दूँ :

१९५९ में श्री स्वामी जी महाराज से ग्वालियर (मुरार) में डॉक्टर बेरी के पूजा गृह में अकेले ही नाम दीक्षा प्राप्त करते समय मैं एक अज्ञानी व अबोध नवयुवक इतना भयभीत और  नर्वस था कि जमीन पर दुसरे आसन पर ठीक मेरे सामने बैठे श्री स्वामी जी महाराज की ओर देखने का साहस मुझमे नहीं था ! मेरी आँखें बंद हो रहीं थीं और जब पल दो पल को खुलती थीं तो मुझे केवल स्वामी जी के दो चरण ही नजर आते थे , जिनका चित्रण मैंने अपनी रचना की उपरोक्त पंक्ति में किया है ! 

प्रियजन, मेरे लिए तो श्री स्वामी जी के वे दोनों चरण ही मार्गदर्शक हैं!, 

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निवेदक :  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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