सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 4 जुलाई 2011

हमारे सद्गुरु # 3 9 7

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मेरो मन राम हि राम रटे रे

सद्गुरु कौन ?



महापुरुषों का कथन है और मेरा अनुभूत सत्य भी कि जिस "व्यक्ति विशेष" के दर्शन से नेत्र तृप्त हों , जिसके वचन अति कर्ण प्रिय लगें, जिसकी मनोभावनाएँ, जिसके दिव्य विचार एवं उच्च आदर्शों को बिना बिचारे मान लेने को जी चाहे ,वही आपका सद्गुरु  है !जिसकी हर क्रिया अनुकरणीय प्रतीत हो , जिसके निकट से किसी कीमत पर भी दूर जाने को जी न चाहे, वही आपका सद्गुरु है !वह व्यक्ति जिसके सानिध्य से आपके अंतःकरण में आनंद की तरंगें प्रवाहित होने लगी , मेरे परमप्रिय स्वजनों वह महापुरुष  ही तुम्हारे लिए, परमपिता परमात्मा द्वारा नियुक्त इस जन्म का तुम्हारा सद्गुरु है ! अस्तु अब अधिक विलम्ब न करो ; पहचान लो उनको ! दौड़ो और उनके चरण कमलों को अति दृढ़ता से पकड़ कर अपना जीवन सफल कर लो !

हमारे सद्गुरु :

हमारे परम सौभाग्य से , हम दोनों को (कृष्णा जी और मुझे) आज से लगभग ६० वर्ष पूर्व ही मिल गये थे  हमारे सद्गुरु परम श्रद्धेय श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज और उन्ही की श्रंखला के अंतर्गत स्वामी जी के बाद श्रद्धेय श्री प्रेमजी महराज और उनके बाद आस्तिक भाव की अभिवृद्धि की परंपरा में पुर्णतः समर्पित , आज श्री राम शरणम के वास्तविक उत्तराधिकारी डॉक्टर विश्वामित्र जी महराज ! 

आपने सुना ही होगा, हम श्री रामशरणम् , लाजपत नगर, के साधक गर्व से डॉक्टर साहिब के इस दिव्य त्रिकोणीय व्यक्तित्व को जिसमे उनकी, तथा स्वामीजी एवं प्रेमजी महराज की झांकी एक ही आसन पर आसीन नजर आती है - "थ्री इन वन"  कहते हैं !  हम दोनों को ही नहीं, सच पूछिये तो अनेको पुराने साधकों को  डोक्टर साहिब के नैसर्गिक हावभाव और उनकी रहनी सहनी में, हमारे आदि गुरु स्वामी जी महराज जिन्हें डॉक्टर साहिब अति श्रद्धा भक्ति से "बाबा गुरु" कह कर संबोधित करते हैं , उनकी छवि साफ साफ झलकती दृष्टि गत होती  है ! 

जून २०११ में , अमेरिका में आयोजित इस त्रिदिवसीय खुले सत्संग के दिन ज्यों ज्यों निकट आते गये  हमारे  मन की उद्विग्निता प्रबल होती गयी, हमारा उत्साह दिन दूने रात चौगुने उछाल मारने लगा ! पूरे दो वर्ष बाद हमे महाराज जी के श्री स्वरूप का दर्शन होगा उनके सानिध्य में बैठने का सुअवसर मिलेगा , मधुर वाणी में उनका सारगर्भित प्रवचन तथा भजन और कीर्तन सुनने को मिलेंगे तथा यदि संभव हुआ तो मुझे महराज जी को अपनी नवीनतम भक्ति रचना सुनाने का सौभाग्य प्राप्त होगा इस कल्पना और संकल्प के विचार मात्र से हमारा मन पुलकित हो रहा था , एक अद्भुत आनंद की अनुभूति हो रही थी ! एक प्रेमी भक्त को इससे अधिक अन्य कुछ पाने की लालसा नहीं होती !

न जाने किस अंत: प्रेरणा से मुझे प्रतीक्षा के इन दिनों में रह रह कर अपना एक बहुत ही पुराना भजन याद आ रहा था ! यह भजन वह था जो मैंने , ३० - ३५ वर्ष पूर्व, गुरुदासपुर पंजाब के एक खुले सत्संग में, श्री प्रेम जी महराज की उपस्थिति में  गाया था ! उन दिनों मैं तुलसी, मीरा , सूर , कबीर , दादूदयालमलूकदास आदि के भजन ही गाया करता था. अस्तु उस दिन मैंने प्रेमजी महराज के सामने गाई , प्रेम दीवानी मीरा बाई की एक अनूठी राम भक्ति से परिपूरित  भक्ति रचना :-

मेंरो मन राम ही राम रटे रे  

राम  नाम  जप लीजे  प्राणी  कोटिक  पाप  कटे  रे
जनम जनम के खत जू पुराने ,नाम ही लेत फटे रे
मेंरो मन राम ही राम रटे रे  

कनक  कटोरे  अमृत  भरिया ,पीवत  कौन  नटे  रे 
मीरा के प्रभु हरि अविनाशी तन मन  ताहि  पटे   रे 
मेंरो मन राम ही राम रटे रे 

(तब की रेकोडिंग तो उपलब्ध नहीं है लेकिन आपको कभी यह भजन सुनाऊंगा अवश्य

अभी भी याद है कि कार्यक्रम के बाद गुरुवर श्री प्रेमजी महराज ने मुझे गले लगा कर नेत्रों से प्रवाहित प्रेमाश्रु की अमृत वर्षा में मुझे नख-शिख भिंगो दिया था ! मेरा रोम रोम धन्य हो गया था ! मेरा हृदय  प्रेम भक्ति के सुरस से परिपूरित हो छलछला कर मेरे  नेत्रों से  बह निकला था !  एक अद्भुत आनंद का अनुभव  मुझे उस अवसर पर  हुआ था !

हाँ तो , आज उस दिव्य अनुभव के ३०-३२ वर्ष के बाद , एक बार फिर मुझे USA के इस खुले सत्संग में अपने गुरु जी के समक्ष यही भजन गाने का जी कर रहा था ! अवश्य ही किसी  देवी  प्रेरणा  से  यह विचार मेरे मन में आया होगा !  इस भजन को एक पर्ची पर नोट करके अपने कुरते के ऊपर वाले पॉकेट में रख कर , मैं सत्संग की हर सभा में जाने लगा ! पर मुझे भजन गाने का मौक़ा ही नहीं मिला !

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हरि इच्छा एवं कम्प्यूटर जी के असहयोग आन्दोलन के कारण 
यह आलेख अति विलंबित गति से आगे बढ़ पा रहा है
क्षमा प्रार्थी हूँ 
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क्रमशः  
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती डोक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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