सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 30 जुलाई 2011

घर घर में मीरा # ४१०

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मीरा की प्रेमा भक्ति

नन्ही राज कुंवरि मीरा को तो उसका जन्म जन्म का साथी मिल गया ! इस प्रिया - प्रियतम मिलन से भारत भूमि पर "भग्वद भक्ति" की एक नूतन परम्परा -"प्रेमा भक्ति" का बीज अंकुरित हुआ ! उस बीज से उगे वृक्ष के पत्र पुष्प एवं फलों से ,लाभान्वित हुईं देश की करोड़ों गृहस्थियां ! क्या हुआ ?

साधारण (आम) परिवारों की बड़ी और छोटी हर उम्र की बहू बेटियाँ अब निःसंकोच अपने घर आंगन - गलियारों में ठुमक ठुमक कर मन लुभावने नृत्य तथा गायन से अपनी माताओं , सासू माँओं , दादियों नानिओं का मनोरंजन करने का साहस करने लगीं ! उनका कार्यक्रम अधिकतर मीरा की भक्ति रचनाओं पर तथा मीरा की ही भावनाओं को संजोये पदों एवं लोक गीतों पर आधारित होता ! प्रियजन ! "पग घुघरू बाँध मीरा नाची " और " मीरा मगन भई हरी के गुण गाय" जैसे प्रेम पूरित कार्यक्रम निरा मनोरंजन नही करते थे अपितु , कितनी ही बुज़ुर्ग माताओं को ध्यान मग्न कर देते थे ! ऐसे कार्यक्रम में उन्हें अपने बीते दिनों और वर्तमान के मधुर अनुभवों की स्मृति के साथ साथ अपने परम कृपालु "इष्ट" की भी याद आ जाती थी जिनकी कृपा से उन्हें जीवन में आनंद की वैसी बहुमूल्य घड़ियाँ प्राप्त हुईं !

प्रियजन , गुरुजनों ने कहा है कि अपनी सारी उपलब्धियों के लिए "प्रभु" को धन्यवाद देना अथवा किसी अन्य मतलब से भी अपने "इष्ट" को सप्रेम याद करना ही "उपासना" है !

उपरोक्त कथन मेरे अपने जीवन के , ८२ वर्षों के निजी अनुभव पर आधारित है ! मेरी दादी और मेरी अम्मा ने भी अपने अपने घर पारिवार में , अपनी बाल्यावस्था में कुछ ऐसा ही अनुभव किया था और हमारी बाल्यावस्था में हमे सुलाने और जगाने के लिए उन्होंने भी मीरा के वैसे ही पद गाये थे !

अपने जीवन की अंतिम घड़ियों में केन्सर जैसे भयंकर रोग को झेलते हुए हमारी माँ ने हम बच्चों से , प्रेम भक्ति की वैसी ही रचनाएँ सुनीं ! मीरा के उन पदों का माधुर्य ही था जिसने हमारी माँ को उन दुसह पीडाओं को हंस कर झेलने की शक्ति दी ! उनका मनोबल इतना सशक्त कर दिया कि अंतिम क्षणों तक वह मुस्कुराती ही रहीं और मुस्कुराते हुए उन्होंने हमे जो आशीर्वाद दिए वे आजीवन हमे आनंदित करते रहे !

हम आपको मीरा का एक वैसा ही पद बताते हैं जिसे १९४५ में , हमारी छोटी बहन माधुरी ने १० वर्ष की अवस्था में अपने स्कूल की नृत्य नाटिका में मीरा का किरदार निभाते हुए गाया था ! नाटिका में ,यह पद गाते गाते मीरा ने द्वारिका के रणछोड जी के मंदिर में प्रवेश किया और फिर सदा सदा के लिए अपने प्रियतम कृष्ण की हो कर वहीं अन्तर्ध्यान हो गयी ! हमारी अम्मा को यह भजन अतिशय प्रिय था , अपनी अंतिम घडी में उन्होंने मीरा का यह ही पद सुनने की इच्छा व्यक्त की ! हम चारों भाई बहेंन तथा हमारे पूरे परिवार ने मिल कर वह भजन गाया जिसे मुस्कुराते मुस्कुराते सुनते हुए हमारी अम्मा भी अपने गोपाल जी में प्रवेश कर गईं !

दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

जल बिनु कमल चन्द्र बिनु रजनी ,वैसे तुम देखे बिनु सजनी
आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन ,बिरह करेजो खाय
दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

दिवस न भूख नींद नहीं रैना ,मुख सों कहत न आवे बैना
कहा कहूँ कछु समुझ न आवे, मिल कर तपत बुझाव दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

क्यों तरसाओ अंतरयामी , आय मिलो किरपा करो स्वामी
मीरा दासी जनम जनम की ,पडी तुम्हारे पाय
दर्शन दीजो आय प्यारे , तुम बिन रह्यो न जाय

अम्मा के जाने के बाद भी हम लोग यह भजन अक्सर गाते थे ! उपरोक्त चित्र में हम सब कानपूर के दवारका धीश मंदिर के प्रांगण में यह भजन गा रहे हैं ! मेरे साथ गा रही है मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी , बेटी प्रार्थना ,और उसकी सहेलियां ,कानपुर की सुप्रसिद्ध गायिका सुश्री अंजना भट्टाचार्य (अब बडोदा में) और मेघना श्रीवास्तव (अब लखनऊ / मुम्बई में ) !

क्रमशः
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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव
सहयोग : सम्पूर्ण भोला परिवार
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2 टिप्‍पणियां:

  1. काकाजी प्रणाम ! कल ही आप की याद आई थी , सोंचा था काकाजी के लेख पढ़े कई दिन हो गए और कुछ आप के अस्वस्थ होने की याद आ गयी ! किन्तु भगवान सब कुछ सुनते है , दिल से याद किया और आज आप का यह प्रिय लेख जो आप के परिवार को ही नहीं बल्कि आप की माता जी का भी प्रिय भजन था , पढ़ने को मिल गया ! दिल को बहुत शान्ति मिली ! जीवन में क्या कुछ है , जो दूर बैठे लोगो में भी प्यार के अंकुर बो देता है ! काकाजी आप से बहुत कुछ प्रेरणा और सिखाने को मिलता है !आज का यह मीरा के प्रेम मय लेख बहुत कुछ कहता है !

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  2. प्रियवर गोरखजी ,
    आपने समय निकाल कर मुझे याद किया ,आभारी हूँ ! धन्यवाद ! भैया "प्रभुजी" की असीम करुना और आप जैसे प्रियजनों की शुभ कामनाओं के बल पर सर्वत्र आनंद ही आनंद लूट रहा हूँ ! व्याधियों की पीड़ा सुखद लगती है जब "उनका" वरद हस्त मस्तक पर फिरता महसूस होता है और आप जैसे स्वजनों के सन्देश मिलते हैं ! सांसारिक कर्मों के साथ साथ ,हरि चिंतन करते रहिये ! परमानंद लूटिये ! राम कृपा आप पर सदा बनी रहे !
    भोला काका + कृष्णा काकी

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