सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

दैनिक प्रार्थना

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ईश्वर की कृपा प्राप्ति के लिए
मानस में प्रतिपादित संत लक्षणों को अपनाकर
श्री कृष्ण के प्रिय बनो
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महापुरुषों का कथन है कि मानव जीवन का समग्र उत्थान करके उसे परमानंद से परिपूरित कर देने के लिए "ईश्वर" का "कृपा पात्र" बनना आवश्यक है ! इस परिप्रेक्ष्य में योगेश्वर श्री कृष्ण ने श्रीमदभागवत गीता के निम्नांकित श्लोकों के द्वारा अर्जुन को बताया कि "ईश्वर" का "प्रेमपात्र" बनने के लिए तथा 'परमानंद' की प्राप्ति के लिए जीव को क्या क्या करना है तथा उसे अपने जीवन तथा आचार व्यवहार में किन किन गुणों का समावेश करना होगा !

audio

श्रीमद भगवत गीता के उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ

जो करुणावान जीव ,मद - ममता से रहित , सुख-दुःख से परे, बिना द्वेष के , सब जीवों से मैत्री भाव रखता है , क्षमाशील है तथा मन बुद्धि से मुझमे लगा पूर्णतः संतुष्ट ,दृढ़ निश्चयी तथा संयमी वह "मुझे" ("इष्ट"/भगवान को ) अतिशय प्रिय है !! (१२/१३-१४) !! जो जीव किसी को क्लेश न दे और न स्वयम किसी से क्लेश पाए ,जो भय ,क्रोध, हर्ष , विषाद आदि से मुक्त हो ,वह जीव मुझे बहुत प्यारा है !! जो जीव पवित्र , पक्षपात एवं इच्छा रहित ,चतुर, सर्व आरम्भ त्यागी हैं , वे मुझे अति प्रिय हैं !!१२/१५-१६)!!जो जीव किसी से द्वेष नहीं करता, जो फालतू की कामनाओं से मुक्त है और छोटी छोटी बातों से न तो हर्षित होता है न शोकाकुल होजाता है और जो जीव अपने कर्मों के शुभ और अशुभ सभी फलों को"मुझे" समर्पित कर देता है ,वह भक्त मुझे बहुत प्यारा लगता है !! जो शत्रुओं और मित्रों से सम व्यवहार करता है , जिसको सम्मान और अपमान एक से लगते हैं ,जिसे "सुख-दुःख" और "सर्दी - गर्मी" , समान लगते हैं , जो आसक्ति रहित है ,ऐसा मतिमान जीव मुझे प्रिय है !!
वह जीव जिसे "निंदा - प्रशंसा सम प्रतीत हो ,जो अधिक न बोले और जिसकी बुद्धि उसे बहुत भटकाए नहीं तथा सांसारिक विषयों के प्रति जिसका अधिक लगाव न हो ऐसा बुद्धिमान जीव मुझे अतिशय प्रिय है !! (१२/१७-१८-१९)

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राम चरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी संतजनों के विविध लक्षणों का निरूपण किया है ! इन्हें अपनाकर जीव अपने 'इष्ट' का प्रेम पात्र बन कर उनकी अहेतुकी कृपा का अधिकारी बन जाता है ! "उत्थान पथ" के आज की प्रार्थना में इनका समावेश है :


प्रियजन ! आइये रामायण के इस अंश का गायन सुनें :


यदि हम इनमें से कुछ गुण अपनी साधना तथा दैनिक जगत व्यवहार में उतार पाते हैं तो योगेश्वर श्रीकृष्ण तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के प्रिय पात्र बन सकते हैं !
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव 'भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा जी, श्री देवी,प्रार्थना, माधव
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