सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 6 नवंबर 2011

शरणागति

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शरणागत वत्सल परमेश्वर
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"ईश्वर" है तो एक ही परन्तु उसके अनेकों रूप हैं , उसकी अनंत विभूतियाँ हैं !
एक ही फिल्मी कलाकार जैसे भिन्न फिल्मों में अलग अलग नामों से ,भिन्न भिन्न वस्त्राभूष्ण पह्न कर , भिन्न मेकप-मेकओवर करके ,भिन्न भिन्न किरदार निभाता है
उसी प्रकार "ईश्वर" नामक सत्ता के भी अनेक स्वरूप हैं ,अनेक नाम हैं !
ब्रह्म , परमात्मा, राम , कृष्ण , शिव ,शक्ति ,गोड ,खुदा अल्लाह
या ऐसे ही अन्य कितने ही नाम , जिस एक सत्ता के हैं ,
वह "ईश्वर" है
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"ईश्वर" "परमात्मा" "खुदा" "गोड" कहो या "राम"
शरणागत उसके रहो जो चाहो कल्याण

दिखलाएगा "प्रभु" तुम्हे अंधियारे में राह
बिन मांगे दे जायगा जो पाने की चाह

(भोला)
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प्रियजन ,सर्वशक्तिमान ईश्वर को पूरी तरह ठीक ठीक से न तो जाना जा सकता है ,न उसके वास्तविक स्वरूप को देखा ही जा सकता है ! लेकिन इस कारण यह नहीं समझ लेना चाहिए कि "ईश्वर" है ही नहीं ! हमे हवा भी तो नहीं दिखती ,लेकिन हम् सब उसे जानते और मानते हैं ! वैसे ही "ईश्वर"भी है लेकिन वह हमारी आँखों से हमे दिखायी नहीं देता है !

हम् सांसारिक पदार्थों को देखते ही यह मान लेते हैं कि उनको बनाने वाला कोई व्यक्ति तो अवश्य है हालाँकि अधिकतर हमे इन पदार्थों के साथ उनके निर्माता नज़र नहीं आते हैं ! वैसे ही हमारी इस सुंदर सृष्टि का निर्माता भी कोई "अति चतुर शिल्पी" है जिसकी लुभावनी कृति हमे आजीवन दिखती रहती है लेकिन हम् उस 'कुशल सृष्टि निर्माता' को अपने इन "नेत्रों" से देख नहीं पाते हैं ! इस संसार का निर्माता, "ईश्वर" , अपनी इस विशाल कृति (समग्र सृष्टि) को सुचारू रूप से नियमपूर्वक चला भी रहा है ! जरा सोंच कर देखें कि इस संसार में पल पल कितनी ऐसी चमत्कारिक घटनाएँ होती रहती हैं ,जिनके होने का कारण किसी की समझ में नहीं आता ! बड़े बड़े ज्ञानी भी इन चमत्कारों के घटने का वैज्ञानिक रहस्य समझ नहीं पाते ! ऐसे चमत्कारों में ही हमे उस निराकार चिन्मय अविनाशी सर्वशक्तिमान ईश्वर की सत्ता के दर्शन होते हैं तथा उसके सामिप्य एवं निकटता का आभास होता है !

"ईश्वर की सत्ता" ,यदि जीवधारियों को ऐसे समझ में न आये तो वह सत्ताधारी "परमात्मा " , सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वयम ही हमे , कभी ठोकर लगा कर ,कभी झटका देकर , कभी प्यार और दुलार से अपनी विशालता ,अपनी महानता अपनी कृपालुता से परिचित करा देते हैं ! सोच रहा हू आपको इस संदर्भ की एक कथा सुनादूं , ----लीजिए सुनिए :

अभी कुछ दिन पूर्व यहाँ उत्तरी अमेरिका के इस राज्य में जहां हम् रहते हैं , बर्फ का एक भयंकर तूफ़ान आया ! तेज हवाओं के साथ भुरभूरे बर्फ के गोले आकाश से गिरे जिनकी चोट से यहाँ के सैकड़ों वर्ष पुराने बड़े बड़े पेड़ समूल उखड गए ,उनकी मजबूत भारी भारी शाखाएं उड़ कर ,मकानों , सवारी गाड़ियों ,बसों मोटर कारों पर और बिजली के खम्भों पर जा गिरीं !पूरे के पूरे नगर "बिजली विहीन" हो गए ! कुछ स्थानों में तो तीन चार दिनों तक बिजली नहीं आयी !हजारों नागरिको को घर छोडना पड़ा !इन बर्फीली रातों में बिना रोशनी ,बिना 'हीटिंग' के कहीं भी रह पाना असम्भव है ! ऐसे में बर्फीली सर्दी से जीवनरक्षा हेतु काफी नगरवासियों को सरकारी शेल्टर्स में रहना पड़ा और अनेक पास के नगरों के मोटलों, होटलों ,और दोस्तों रिश्तेदारों के घर चले गए !

उस शाम जब वह बर्फीला तूफ़ान आया हमारे पुत्र के घर दिवाली की पार्टी चल रही थी !उसके 'ड्राइववे' में आठ दस कारें खड़ी थीं !तूफान के आसार नज़र आते ही दूर के मेहमान लौट गए! निकट के दो चार बचे थे ! इस बीच तूफ़ान ने जोर पकड़ लिया ! तूफानी हवाएं रुख बदल बदल कर उस एक मंजिली इमारत (रेंच हाउस) पर चारों दिशाओं से आक्रमण करने लगीं ! मकान के चारों ओर ऊंचे ऊंचे पेड़ थे जिन्होंने शताब्दियों के अपने जीवन काल में सैकड़ों ऐसे तूफान झेले थे लेकिन उस रात का तूफान उनके सहन शक्ति के परे था ! चटक चटक कर उनकी शाखाएं टूट कर इधर उधर उडी जा रहीं थीं !

मोमबत्तियां उन तेज हवाओं को कब तक झेलतीं और कब तक घने अंधकार को मिटा पातीं ? मोटी, छोटी खुशबूदार ,मोमबत्तियाँ तो यहाँ हर घर में मिल जाती हैं पर वो सब ही एक एक कर बुझ चुकी थीं ! सारा घर घने अँधेरे में डूबा पड़ा था ! बिजली से चलने वाला सेंट्रल हीटिंग का बोयल्रर भी बंद हो गया था !,धीरे धीरे सारा घर ठंढा हो रहा था ! बाहर का तापमान शून्य अंश सेल्सियस से नीचे उतर चुका था ! तूफानी हवा के झोंकों में भूकम्प के समान डोलता घर अब धीरे धीरे ठंढा हो रहा था ! किसी का भी अब वहाँ अधिक समय तक रुक पाना खतरे से खाली नहीं था !

मोबाईल और लेंड लाईन, सभी फोन बंद पड़े थे ! किसी होटल या किसी दोस्त या रिश्तेदार से बात ही नहीं हो पायी ! ऐसे में ,उतनी रात में कहीं और जाने का सवाल ही नहीं था ! किसी तरह घर के सभी स्लीपिंग बेग्स , ब्लेंकेट और लिहाफ इकट्ठा कर के रात गुजारने के अलावा कोई और चारा नहीं था !

रात भर हवाएं सायं सायं करके चलती रहीं ,पेड़ों की शाखायें टूट टूट कर ड्राइव वे पर गिरती रहीं ! बीच बीच में छत पर जोर के धमाके होते रहे ! ऐसा लगता था जैसे पेड़ों की भारी भारी शाखाएं टूट कर छत पर गिर रही हैं ! कहाँ और घर के किस हिस्से पर या ड्राइव वे में किस "कार" पर ,"प्रायस" पर या नयी वाली टोयोटा "लेक्सस" पर , या व्हीलचेयर एक्सस वाली बड़ी वेंन पर ; किसी को बाहर निकल कर यह देखने का साहस भी न था !

क्रमशः
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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6 टिप्‍पणियां:

  1. ओह बहुत खतरनाक हालात रहे होंगे पढकर ही लग रहा है तो जिन्होने भुगता है उनका क्या हाल रहा होगा समझ आ सकता है। आगे का इंतज़ार है।

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  2. काकाजी प्रणाम - जिवंत लेखनी के दृश्य आँखों पर नाच गए ! ये सब हमारे कर्मो और ईश्वरीय दें है ! मै रामेश्वरम में गया था और वहा के लोगो से पूछा तो उन्होंने बताये की सुनामी के समय चेन्नई से कन्याकुमारी तक काफी नुकशान हुए किन्तु रामेश्वरम में उसके अंश कम दिखे ! यह भी एक शिव शक्ति ही है !

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  3. अगले पार्ट का इंतजार है, सांसे रुकी है
    बहुत जीवंत चित्रण किया है आपने

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  4. हे भगवान् - वे लोग ठीक हैं न ? इश्वर की कृपा रही न ?

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  5. वाकई मौसम ने इस बार खतरनाक खेल खेला। कई बार बिजली कटना भी ज़रूरी होता है वर्ना गिरी हुई लाइनों में प्रवाहित बिजली भी खतरनाक हो सकती है। आशा करता हूँ कि पानी के पाइप सुरक्षित रहे हों। भगवान की कृपा से अभी मौसम साफ़ है। अपना ख्याल रखिये।

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  6. परमप्रिय सभी पाठकगण ,राम राम .
    हम् सब स्वस्थ और सकुशल हैं !अब तो प्यारे प्रभु के प्रति अपना आभार व्यक्त करना शेष है ! तुलसी के शब्दों में केवल यह कह सकता हूँ " हे अशरण शरण दीनबन्धु ,"राम" ,
    "नाथ सकल साधन मैं हीना ! कीनी कृपा जान जन दीना !!
    अब कछु नाथ न चाहिय मोरे ! दीनदयाल अनुग्रह तोरे !!
    प्रभु की कृपा भयहु सब काजू ! जन्म हमार सफल भा आजू !!
    अब प्रभु कृपा करहु एही भांती, सब तजि भजन करहूँ दिन राती !!"
    दासानुदास -- "भोला"

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