सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

शरणागति

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शरणागतवत्सल हैं राम

बचपन से सत्संगों मैं एक भजन सुनता आया हूँ:
मेरे राम
"सुनते हैं तेरी रहमत दिन रात बरसती है"
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उपरोक्त कथन अक्षरशः सत्य है ! "प्रभु कृपा" की ,"उनके" रहमत की अमृत वर्षा ,सृष्टि के कणकण पर ,कायनात के ज़र्रे जर्रे पर ,समग्र चराचर जगत पर सतत होती है और इसका अनुभव भी सबको होता है ,लेकिन अधिकतर स्वार्थी जीव ,सांसारिकता के ताप से प्रभुकृपा की उन "अमृत बूंदों" के सूखते ही ,उस वृष्टि को भूल जाते हैं और साथ साथ अपने उस उदार "प्रभु" को भी भुला देते है जिसने अति करुणा कर भूकम्पों , तूफ़ानों तथा सुनामी जैसी बड़ी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में उन जीवों के जान-माल की रक्षा की है !

परन्तु सच्चा "शरणागत" जीव" आजीवन न तो अपने प्यारे प्रभु को भूलता है और न उसके द्वारा किये हुए उपकारों को ही ! जीवन के हर क्षण में वह अपने सिर पर "प्यारे प्रभु" के वरद हाथों के सुखद स्पर्श का अनुभव करता है और अपने "इष्ट" के प्रति उसकी प्रीति दिन पर दिन गहरी होती जाती है !

सद्ग्रंथों से हमने जाना कि परमात्मा की अपरम्पार कृपा का जितना अनुभव द्वापर युग में ब्रजवासियों ने किया वैसा शायद ही किसी अन्य ने कभी किया हो ! बाल्यकाल में ही गोकुल पर पड़े भयंकर संकटों में श्रीकृष्ण ने सभी बृजबासियों की जीवन रक्षा की ! तृणावर्त के कोप से उठे बवंडर से, "देवेश इंद्र" के क्रोध के कारण उठे "जल प्रलय" - सात दिवसीय मूसलाधार वर्षा से और दावानल ,वज्रपात और ओलों की बौछार जैसी आपदाओं से बालक कृष्ण ने सब बृजवासिओं तथा गौधन की रक्षा की !

द्वापर में ,श्री कृष्ण से निःस्वार्थ स्नेह करने वाले ,तन मन धन से कृष्ण को समर्पित तथा उनके पूर्णतः शरणागत हुए ब्रजवासियों ने कृष्ण की अहेतुकी कृपा का मधुर अनुभव किया तथा कुरूप "कुब्जा" को अपने चरणों के स्पर्श मात्र से अतिसुंदर बना दिया ! वैसे ही त्रेतायुग के अवतार "श्रीराम" ने शिलारूपणी सती अहिल्या का तथा भीलनी शबरी का उद्धार किया !

त्रेता या द्वापर युग में ही नहीं ,आज कलियुग में भी प्रभु अपना वह "यदा यदा धर्मस्य---" वाला वादा ईमानदारी से निभा रहे हैं ! आज भी "वह" हम जीवधारिओं को भयंकर विपदाओं में सुरक्षित रखके तथा कुछेक को ऐसी दुर्घटनाओं के द्वारा ही मुक्ति प्रदान करके मानवता पर कृपा कर रहे हैं ! हमे ऐसी घटनाओं से ही ,प्रभु के प्रभुत्व का दर्शन होता है !

प्रज्ञाचक्षु स्वामी शरणानंद जी कहते थे "'प्रत्येक घटना में प्यारे प्रभु की कृपा का दर्शन करो !सब प्रकार से उन्हीं के हो कर रहो ! उनकी मधुर स्मृति को ही अपना जीवन समझो ! जिन्होंने सरल विश्वास पूर्वक प्यारे प्रभु की कृपा का आश्रय लिया वे सभी पार हो गए ,यह निर्विवाद सत्य है '! जिस व्यक्ति को अपने "इष्ट" "सद्गुरु" अथवा किसी संत महात्मा पर अगाध श्रद्धा हो , उन पर अटूट विश्वास हो और उनसे गहन प्रीति करता हो तथा उसे एकमात्र अपने "उन्ही" इष्ट का आश्रय हो तो वह् निश्चय ही अपने इष्ट का कृपा पात्र बन जाता है और अपने इष्ट की छत्र छाया में वह सांसारिक आपदाओं के भय से मुक्त हो जाता है ! उसके जीवन का एक एक क्षण सुखद और शांतिमय हो जाता है ! महापुरुषों का कथन है कि इस कलिकाल में जीवों को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने अपने "इष्ट" के साथ गहन निस्वार्थ "प्रेम" करना चाहिए जिसके फलस्वरूप वह "प्यारे प्रभु" की मंगलमय अहेतुकी कृपाप्राप्ति के अधिकारी बन जायें !

प्रियजन हमारा प्यारा इष्ट कभी भी अपने शरणागत का किसी प्रकार का अनिष्ट होने नहीं देता ! भगवान राम के परम स्नेही भक्त गोसाईं तुलसीदास ने निज अनुभव के आधार पर ही कहा है :

तुलसी सीता राम को दृढ़ राखे विश्वास
कबहुक बिगरत ना सुने रामचन्द्र के दास
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उस बर्फीली तूफानी रात ,करुनानिधान "प्रभु" ने हमारे परिवार की रक्षा की !
"प्रभु" की कृपा अनंत है ;"उनकी" लीला अपरम्पार है ;
"उनके" अनत उपकारों का मूल्य हम किसी प्रकार चुका नहीं सकते
अब तो मैं अपने "प्यारे प्रभु" से वैसी ही प्रीति करते रहना चाहता हूँ
जैसी "स्वामी विवेकानंद" बनने से पहले "नरेंद्र" अपने इष्ट देव से करते थे,
नरेन्द्र भाव विभोर हो ठाकुर के मंदिर में बंगला भाषा में कुछ इस भाव के गीत गाते थे:

तुझसे हमने दिल है लगाया ,जो कुछ है सो तू ही है
हर दिल में तू ही है समाया ,जो कुछ है सो तू ही है


तू धरती है तू ही अम्बर , तू परबत है तू ही सागर
कठपुतले हम तू नटनागर , जड़ चेतन सब को ही नचाया
तुमसे हमने दिल है लगाया

साँस साँस में आता जाता ,हर धड़कन में याद दिलाता
तू ही सबका जीवन दाता , रोम रोम में तू ही समाया
तुमसे हमने दिल है लगाया

बजा रहा है मधुर मुरलिया , मन ब्रिंदाबन में सांवरिया
हमको बना गया बावरिया , स्वर में ईश्वर दरस कराया
तुमसे हमने दिल है लगाया

(शब्दकार - स्वरकार - गायक:-- "भोला")
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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला
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3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ....प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा
    अति सुन्दर

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  2. रेखा बेटी , काश "उनसे" ऐसी गहन प्रीति कर पाता कि पराकाष्ठा तक पहुंच सकता ! दुआ करिये कि इस दासानुदास पर "वह" कृपा करते रहें ! धन्यवाद
    ++++++
    दीपक जी ,श्री राम जी की असीम कृपा आप पर सदा ऐसी ही बनी रहेगी! इसी प्रकार उनकी जयकार करते रहें !धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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