सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

गुरुवार, 31 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 4

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अनुभवों का रोजनामचा 

संत शिरोमणि - परम हनुमंत भक्त - बीसवीं शताब्दी में श्री हनुमान जी के अवतार  
                                                    
नीम करौली बाबा 

परम प्रिय पाठकगण , हम सब ही अपने जीवन में पल पल प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा के अनूठे अनुभव करते रहते हैं ! कठिनाई यह है कि हम अपने प्रिय लगने वाले अनुभवों का कारण और कर्ता ,स्वयम अपने आप को मान बैठते हैं और  उस प्रिय उपलब्धि के लिए किसी के प्रति आभार व्यक्त करना तो दूर रहा हम उसके लिए अपने प्यारे प्रभु को भी धन्यवाद  नहीं देते हैं ! दूसरी ओर जीवन में घटने वाली प्रत्येक अप्रिय घटना को प्रभु द्वारा किया अन्याय समझकर हम  अक्सर उस परम कृपालु प्रभु को बुरा भला ही कहते रहते हैं ! 

हमारे बाबा नीम करौली ने बड़े बड़े चमत्कारी कृत्य किये ,जिनके कारण विश्व के जाने माने मनीषियों और हनुमत - भक्तों नें उन्हें बीसवीं सदी के साक्षात् श्री हनुमान जी का अवतार तक घोषित कर दिया ! सत्य तो यह है कि अपनी रहनी करनी में बाबा ने कहीं भी स्वयम को कर्ता  नहीं माना और न जनता -जनार्दन को मानने दिया ! वह जब तलक इस धरती पर बिचरे  एक अति साधारण जीव के समान अपने "परम इष्ट" (  हनुमान जी के भी इष्ट ) "श्री राम" जी को ही सिमरते रहे और जिज्ञासु जनसाधारण से भी केवल "राम नाम" का ही सिमरन , ध्यान और जाप करवाया ! हनुमानजी की भंति ही तन्मय हो कर राम धुन के प्रेमोन्माद में रम कर नाचते गाते रहे !प्रियजन , हनुमान जी के समान ही सिया राम की जोड़ी हृदय सिंहासन  पर बैठाए वह हर घड़ी "राम नाम का जाप" किया करते थे ! 

राम दुवारे  तुम  रखवारे , होत  न  आज्ञा  बिनु  पैसारे
सब सुख लहें तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना 

गोस्वामी तुलसीदास के उपरोक्त कथन को सत्य करते हुए बाबा ने ,हनुमानजी की तरह  सब आर्त जनों के काम बनाये ,पर कभी भी यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह उपकार या कृपा उन्होंने की !उन्होंने कभी भी अपने को कर्तानहीं माना !  उन्होंने पेशकार के समान  सब दुखियों की अर्जियां "श्री राम" दरबार में पेश कीं ! अर्जियों पर निर्णय और कार्यवाही श्री राम जी के इच्छानुसार ही होती थी! उनके ऐसे कृत्यों से इस कथन की पुष्टि हुई कि वह सचमुच इस युग के साक्षात श्री हनुमान जी के अवतार थे ! उपरोक्त विधि से बाबा की कृपा से उन सभी व्यक्तियों का कल्याण हुआ जो कभी भी उनके सम्पर्क में आये !

प्रियजन ,  मैं भारत के उसी क्षेत्र (यू पी) का हूँ जो बाबा की प्रमुख लीला स्थली है जहाँ पर बाबा का जन्म हुआ और जहाँ वह समाधिस्थ हुए ! इस क्षेत्र में बाबाजी की प्रेरणा और आशीर्वाद से हनुमानजी के अनेक अतिभव्य मन्दिर निर्मित हुए ! हमारे कानपूर में भी बाबा द्वारा एक विशाल हनुमान मंदिर का निर्माण हुआ ! सुना है बाबा ने स्वयम उसका  उद्घाटन किया और उसके बाद हजारों कानपुर वासियों के साथ बैठ कर प्रसाद पाया ! उस विशेष दिन जो कुछ भी  हुआ वह एक दिव्य चमत्कार था ! उस चमत्कार की कथा,जो मैंने सुनी आपको सुनाने जा रहा हूँ !

जब कानपूर के मन्दिर का उदघाटन होने को था बाबा उन दिनों प्रयाग (इलाहबाद) में थे ! बाबा के साथ के लोगों ने बाबा को याद दिलाया कि उन्हें कानपूर में मन्दिर का उदघाटन करना है और वहां के भक्त उत्सुकता से बाबा की प्रतीक्षा कर रहे होंगे ! अस्तु उन्हें वहां जाना चाहिए ! बाबा उनकी बात अनसुनी कर के भीतर के कमरे में जा कर लेट गये ! लोगों ने उन्हें कुछ देर बाद उसी  कमरे में कम्बल ओढ़े गहरी नींद में सोये हुए देखा ! उस दिन सुबह से देर रात तक वह चौकी से उठे ही नहीं ! सारे दिन रात उन्होंने कुछ खाया पिया नहीं ! थक हार कर लोगों ने यह सोच कर कि शायद बाबा अस्वस्थ हैं उसके बाद बाबा से कुछ कहा भी नहीं !

अगले दिन कानपूर से एक जीप पर बड़े बड़े बर्तनों में भर कर उद्घाटन का प्रसाद ले कर कानपूर के कुछ भक्त आये ! उन्होंने आते ही पूछा " बाबा आ गये न ? कल उदघाटन के बाद बाबा वहां रुके नहीं, जल्दी में लौट आये थे ! हमें आदेश दे आये थे कि इलाहबाद वालों के लिए "प्रसाद" हम आज पहुंचवा दें ! सो हम आप सब के लिए प्रसाद ले आये हैं ! कहाँ हैं बाबा ?" ! इलाहाबाद के भक्त आश्चर्य चकित थे ! बाबा ने इलाहाबाद छोड़ा नहीं था , बाबा अपनी कोठरी से पूरे दिन पूरी रात निकले तक नहीं थे और कानपूर वाले कह रहे थे कि उन्होंने कल मंदिर का उद्घाटन किया था ,हज़ारों भक्तों के साथ पायत में बैठ कर लंगर खाया था ! वास्तव में ये दोनों बातें ही सत्य थीं ,बाबा एक ही समय में दोनों जगह मौजूद थे ! दोनों जगह के प्रत्यक्ष दर्शी बाबा के परम भक्त थे जिन्हें झुठलाना असंभव था !

एक साथ कई कई जगहों पर ,एक ही समय में मौजूद होना ,केवल वैसे असाधारण जीव ही कर सकते हैं जिन्हें आठ में से एक विशेष दिव्य सिद्धि प्राप्त होती है ! हमारे बाबा आठों  सिद्धियों के धनी थे ! जीवन भर उनके चमत्कारों द्वारा यह प्रदर्शित होता रहा ! एक बड़ा उपन्यास तैयार हो जायेगा यदि बाबा के सब चमत्कारों को अंकित किया जाये !

प्रियजन ! यह एक घटना मेरे अपने शहर कानपूर की थी इसलिए मेरे " प्रेरणास्रोत प्यारे प्रभु " ने मुझे पहिले उसकी ही याद दिलाई और मैंने आपको सुना भी दी ! अभी तो इसके अतिरिक्त और बहुत सी कहानियाँ याद आ रही हैं , देखिये "वह" कल क्या लिखवाते हैं !

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क्रमशः
निवेदक :- व्ही . एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 30 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 3

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अनुभवों का रोजनामचा 

एक गृहस्थ संत , परम हनुमंत भक्त 

"नीम करोली बाबा" 

सिद्ध महापुरुषों की दिव्य शक्ति और उनके सामर्थ्य को पहिचान पाना और उसकी सीमा को आंकना हम साधारण जीवधारियों की क्षमता से परे ही नहीं अपितु कल्पना से भी परे है ! ऐसा अद्भुत चमत्कार पहिले कभी सुनने में नहीं आया था जैसा "रेल रोको" आन्दोलन उस नौजवान संत ने एक अकेले अपने बल से कर के दिखा दिया था ! जब यह घटना घटी थी मैं उन दिनों एक ऐसे स्कूल में पढ़ता था जिसके संचालक अपनी धार्मिक कट्टरता के  कारण ऎसी घटनाओं की सत्यता स्वीकार करना निरी मूर्खता मानते थे , पर मुझे इसकी सत्यता का पूरा विश्वास था क्योंकि हमारे चाचा जी इस के प्रत्यक्ष दर्शी थे !

कुछ दिनों बाद अखबारों में यह पूरी घटना सविस्तार छपी ! सरकार और रेल कम्पनी के अधिकारियों के बयान भी प्रकाशित हुए ! इसके बाद समस्त विश्व में इस घटना की चर्चा जोर शोर से हुई और अधिक से अधिक लोगों को इस पर विश्वास हुआ !  

सरकारी आदेश से उसी स्थान पर जहां उन सिद्ध संत का चिंमटा भूमि में गड़ा था एक नये स्टेशन की " नींव" पड़ी और उस स्टेशन का नाम "नींव करोरी स्टेशन" पड़ा ! यह स्थान  पश्चिंमी यू पी  के फरुक्खाबाद  जिले में  है ! यहीं पर उस नौजवान संत ने कुटिया बना कर अपनी किशोर अवस्था में श्री हनुमानजी की आराधना की थी ! कुछ समय बाद वह यहाँ से  पुनः अपने गाँव अकबरपुर वापिस आगये  जहाँ उन्होंने  अपने पिताश्री के आदेश का पालन करते हुए "गार्हस्थ तथा संत जीवन" का एक साथ  निर्वहण किया ,अपने समस्त  सांसारिक उत्तरदायित्व निभाये  ! तदनंतर सन १९५८ में उन्होंने सदा के लिये घर गृहस्थी का परित्याग कर दिया और लोक कल्याण हेतु देश- विदेश का भ्रमण करने निकल पड़े !

बाबा के अनेक नाम थे ! पिताश्री पंडित दुर्गा प्रसाद शर्मा जी द्वारा दिए "लक्ष्मी नारायण" नाम से तो उन्हें बहुत कम लोग जानते हैं ! बाबाने अपने भ्रमण के दौरान विभिन्न स्थानों पर जो अनूठे चमत्कार किये उनके आधार पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा विदेशों में उन्हें अनेकों नामों से पुकारा जाने लगा ! उनके ऐसे प्रत्येक नाम से जुड़ी है कोई न कोई  चमत्कारिक कथा ! इन नामो में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ,"तलैया बाबा","डंडी बाबा", "चमत्कारी बाबा" "तिकोनिया बाबा" तथा "महाराज जी" और  कहीं कहीं पर कुछ लोग उन्हें "लक्ष्मणदास" के नाम से भी जानते हैं ! अवसर मिला और प्रेरणा हुई तो वो कहानियाँ भी सुनाऊंगा !

अपने स्नेही जनों द्वारा दिए गये विभिन्न नामों में से बाबा ने स्वयम जिस नाम को  मान्यता दी वह था "बाबा नीब करोरी'!  इसका प्रमाण यह है कि जहाँ कहीं  भी उन्होंने हस्ताक्षर किये उन्होंने "बाबा नीब करोरी" ही लिखा है ! पाश्चात्य -जगत में वे "बाबा नीब करोरी "और "नीम करोली बाबा" के नाम से ही प्रसिद्ध रहे !

सन १९६० -७० के दशक में बाबा की ख्याति और मान्यता देश की सीमाओं को लांघ कर सात समुन्द्र पार योरप , अमेरिका ,मेक्सिको आदि पाश्चात्य देशों में फैली ! इन देशों के   अनेकों प्रतिष्ठित नागरिकों ने बाबा की मंत्रणा से "हनुमत भक्ति " को अपनाया ! उन विदेशी हनुमान भक्तों के "बाबा" के द्वारा दिए नाम हैं , रामदास ,कृष्णदास ,भगवानदास और सगीतज्ञ जय उत्तल  तथा सुप्रसिद्ध सिने कलाकार जूलिया रोबर्ट्स आदि ! इन भक्तों ने केवल हनुमत भक्ति ही नहीं की बल्कि इन्होने बाबा को हनुमान का अवतार भी माना ! कुछ निष्ठावान  भक्तों ने तो "बाबा" में "श्रीहनुमानजी" के प्रत्यक्ष दर्शन  किये ! 

स्वतंत्र भारत सरकार के तत्कालीन डिफेन्स मिनिस्टर डोक्टर कैलाश नाथ काटजू ने बाबा जी को साक्षात् हनुमानजी की मंगलमूर्ति माना ! काटजू जी को विश्वास हो गया था कि बाबा आठों सिद्धिया प्राप्त कर चुके हैं ! उन्होंने बाबा द्वारा अधिकृत "अणिमा", "प्राप्ति", "महिमा" , "वशित्व" अदि सिद्धियों की चर्चा करते हुए प्रयाग में एक सार्वजनिक सभा में यह घोषणा की थी कि बाबा साक्षात हनुमानजी के अवतार हैं और मानवता के प्रति दया और करूणा के कारण सबकी पीड़ा हरने और जन जन का मंगल करने के लिए धरती पर अवतरित हुए हैं ! काटजू जी के समक्ष "बाबा" द्वारा अनेक चमत्कार हुए थे ! 

मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण ! यह सर्व मान्य सत्य है कि भारतभूमि योग भूमि है! यहाँ के योगियों की चमत्कारी सिद्धियों के विषय में समझ पाना असम्भव सा प्रतीत होता है !  पर मेरे प्रियजन मुझे अपने जीवन के ८२ वर्षीय लम्बे अनुभव के आधार पर  यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि इस संसार में साधारण से साधारण दिखने वाला जीवधारी भी परमात्मा का अंश होने के नाते एक सिद्ध महात्मा ,दिव्यात्मा , देवपुरुष अथवा परमात्मा का अवतार भी हो सकता है अस्तु किसी का तिरस्कार न करो :

तुलसी या  संसार में  सबसे मिलिए  धाय,
ना जाने किस वेश में नारायण मिल जायं!

क्रमशः 
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निवेदन: श्रीमती (डोक्टर) कृष्णा  एवं   व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 29 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 2

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अनुभवों का रोजनामचा 
नीम करौली बाबा 

(गतांक से आगे )

ट्रेन में बैठे सरकारी अधिकारी महोदय परिस्थिति से अवगत हो चुके थे ! वह इंजिन को निश्चल करके रेल गाड़ी को रोक देने वाले उस देहाती व्यक्ति की दिव्य शक्ति और अद्भुत सिद्धियों से भी परिचित थे !उन्होंने ट्रेन के गोरे गार्ड को उस सिद्धपुरुष की असीमित शक्ति के विषय में समझाने का भरपूर प्रयत्न किया जिसमें उन्हें  काफी दिक्कत भी हुई लेकिन ५-७ मिनिट की बहस के बाद अन्ग्रेजियत का नकलची वह देसी टी टी ई और वह एंग्लो इण्डियन गार्ड उनकी सलाह मान कर उस जगह तक गये जहाँ जाने की सलाह वह सरकारी अधिकारी उन्हें दे रहे थे !

रेल की पटरी से अलग चौरस भूमि पर ,एक नीम के पेड़ के नीचे एक साधारण किसान सा दीखने वाला वह व्यक्ति शांति  से बैठा मस्ती में कीर्तन कर रहा था :

दीन बंधू दीना नाथ डोरी मेर्री तेरे हाथ 
डोरी मेरी तेरे हाथ लाज मेरी तेरे हाथ 
मेरे राम तेरे बिन देगा कौन दास का  साथ 
दीन बंधू दीनानाथ आय बचाले मेरी लाज 
डोरी मेरी तेरे हाथ ============

ग्राह सों गज लियो छोड़ाई , द्रोपदी की लाज बचाई ,
हमरी बारी रहे लोकाई , कुञ्ज बनन  में आज ,
दीन बंधू दीना नाथ लाज मोरी तेरे हाथ ,
डोरी मेरे तेरे हाथ =============

( बाबा का पारम्परिक कीर्तन संशोधित ) 

गोरा गार्ड और टी टी ई जब वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा पेड़ के नीचे बैठा ,धूनी रमाये एक मस्त सा देहाती जिसके मुख मंडल पर एक अद्भुत ज्योति और स्तम्भित कर देने वाली    अपूर्व शान्ति थी ! उस साधारण से दिखने वाले देहाती के असाधारण व्यक्तित्व ने उन्हें सम्मोहित कर लिया ! वे कुछ क्षण के लिए ठगे से खड़े रह गये  ! सुधि आने पर दोनों ने उस व्यक्ति को प्रणाम किया ! वह व्यक्ति अपनी स्वाभाविक आडम्बर रहित उदासीनता के साथ मस्ती में झूम झूम कर हरि कीर्तन की धुन गुनगुनाता रहां ! रेल अधिकारी कुछ भी कहते उत्तर में  वह व्यक्ति ऊपर बाहें फैला कर बड़ी तन्मयता से केवल इतना ही कहता रहा --"डोर मेरी तेरे हाथ , दीन बन्धु दीना नाथ ,लाज मेरी तेरे हाथ " ! इस बीच टी. टी. ई. उनसे बोलता रहा लेकिन ऐसा लगा उस व्यक्ति ने उसकी एक भी बात नही सुनी !   

अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी वहाँ ! जनता में से किसी ने टी टी ई के कान में कुछ कहा
जिसके बाद उसने अपनी वर्दी वाली टोपी उतार कर अपना सिर धूनी रमाये व्यक्ति के चरणों पर रख दिया ! वह दिव्य स्वरूपवान अबोध एवं सहज बालको से हावभाव स्वभाव वाला व्यक्ति बिलकुल अप्रभावित अडिग ज्यों का त्यों बैठा रहा ! तभी यात्रियों में से एक ने उस व्यक्ति के पास जा कर कहा " भैया लक्ष्मण दास , सुन लो न ,कि क्या कह रहे हैं टिकट बाबू !" अपने गाँव के जमुना परसाद की जानी पहचानी आवाज़ सुन कर जैसे उस व्यक्ति की तन्द्रा टूटी ! आँखे खोल कर उसने चारों ओर देखा और फिर उसने टिकट बाबू की पूरी बात सुन ली !

उत्तर में उस साधारण से दिखने वाले महात्मा ने कहा " हम का करी बाबू , गाड़ी तो तुम चलावत हो , तुम्हार मर्जी जिनका चाहो चढाओ ,जिनका न चाहो उतार देव, जब चाहो जहाँ चाहो रोकि दो , जहाँ न चाहो न रोको ! मालिक हो भाई आप तो ! दिन दिन भर इन्तिज़ार के बाद गाड़ी आवत है, कभू रुकत है कभू नाही रुकत है ! गाँव वालन के तकलीफ का कोऊ पूछ्न्हार नाहीं है ! गाड़ी आगे बढ़ावा चाहत हो तो इहाँ, बिलकुल इहाँ जहाँ हमार चिमटा  गड़ा है नीवं डारो करोरी ईटन की और इहें टेशन बनवाओ ,ई हाल्ट वाल्ट नाहीं चली "

तब तक पहले दर्जे में बैठे वह सरकारी अफसर भी वहाँ आगये ! रेल के गार्ड से बात करके  उन्होंने विश्वास दिलाया कि वह जिला मुख्यालय और कमिश्नरी के द्वारा सरकार और  रेल कम्पनी को चिट्ठी लिखवायेंगे और साल  के अंत तक वहां स्टेशन बन जायेगा !

आस पास के गाँव के यात्री प्रसन्न हो गये ! गार्ड ने सीटी बजाई ! सब यात्री यथास्थान चले गए ! हरी झंडी दिखाई ! इंजिन ने भी आवाज़ लगाई ! पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई ! एक बार फिर सलाह मशविरा हुआ ! पता चला कि वह महात्मा तो गाड़ी में चढ़े ही नहीं ! गार्ड और टी टी ई पुनः दौड़ कर उनके पास गये ! उन्हें आदरसहित  रेलगाड़ी में बिठाया ! उनके बैठ जाने के बाद गार्ड ने एक बार फिर सीटी बजाई , झंडी दिखाई , इंजिन ने भी तीन बार चलने का ऐलान किया , और गाड़ी चल भी दी !  गाड़ी के हर एक डिब्बे में " बाबा नीम करोरी" के जयकार की ध्वनि गूँज गयी !

इस घटना के बाद यह दिव्य गुण सम्पन्न संत जिन्होंने अपनी  अनूठी  सिद्धि के बल पर शक्तिशाली रेलवे इंजिन को घंटो के लिए निकम्मा कर दिया समस्त विश्व  में "बाबा नीव् करोरी" के नाम से विख्यात हुए ! भाषा के हेर -फेर से वे कहीं कहीं नीम करोली बाबा के नाम से भी पुकारे गये !

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श्रीहरि प्रेरणानुसार कल आगे बढ़ेंगे ! आज इतना ही !
निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग : श्रीमती (डोक्टर) कृष्णा "भोला" श्रीवास्तव 
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सोमवार, 28 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 1

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अनुभवों का रोजनामचा   

हनुमानजी के परम भक्त - साक्षात् हनुमान जी के अवतार 


 Maharajji 

संत शिरोमणि "नीम करोली बाबा"

रेलगाड़ी से सम्बन्धित हनुमत कृपा का अपना एक अन्य अनुभव मैं आपको सुनाना चाहता था कि मेरे 'प्रेरणा स्रोत' ने मेरे विचारों की धारा को एक महान संत के जीवन की ओर मोड़ दिया और मुझे सुझाव दिया कि अपना निजी अनुभव सुनाने से पहले मैं आपको "महान हनुमंत भक्त" बाबा नीब करोरी की रेलयात्रा से जुड़े एक चमत्कार से आपको अवगत  करा दूं  ! पिछले सन्देश में मैंने वह कहानी शुरू भी कर दी थी !

मेरे चाचाजी ने सुनाया था की एक नौजवान संत जो देखने में सौम्यता की साकार मूर्ति लग रहे थे ,जिनमे न कोई आडम्बर था न कोई दिखावा और जिनका परिधान केवल एक मोटी धोती तथा एक कम्बल था एक दिन रेल द्वारा प्रथम श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे ! उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकिट न होने के कारण टिकिट चेकर ने रेल मार्ग में पड़ने वाले एक 'झंडी वाले' ( FLAG)  स्टेशन पर गाड़ी रुकवाकर उन्हें जबरदस्ती डिब्बे से नीचे उतार दिया ! आगे क़ी थोड़ी कथा आप सुन चुके हैं की उसके बाद कैसे वह गाड़ी उस स्थान से आगे नहीं बढ़ रही थी और कैसे गोरे गार्ड साहेब स्वयम इंजिन पर चढ़ कर भाफ का प्रेसर चेक कर रहे थे ! अब आगे सुनिए :

सफेदपोश गोरा गार्ड और इंजिन ड्राइवर बड़ी देर तक जूझते रहे ! उन्हें इंजिन में कोई भी तकनीकी खराबी नजर नहीं आई , वे चकित थे की , सब कुछ ठीक ठाक होते हुए भी वह इंजिन उस गाड़ी को एक इंच भी आगे या पीछे क्यों नहीं खिसका पा रहा था ! सभी चिंता में थे की ऐसा क्या हो गया जो पटरी पर खड़ी गाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रही थी !

ट्रेन में एक उच्च सरकारी अधिकारी भी सफर कर रहे थे जिन्हें कमिश्नरी में किसी ज़रूरी पेशी के लिए समय से पहुचना था ! इधर ये गाड़ी थी जो आगे बढने का नाम नहीं ले रही थी !उनके डिब्बे में गाडी के इंजिन क़ी भयंकर स्वास प्रस्वास और जोर जोर से हाफ्ने क़ी हाहाकार तथा कभी कभी उसके पहियों के सरकने की चीत्कार सुनाई दे जाती थी ,पर गाड़ी वहीं क़ी वहीं खड़ी रह जाती थी ! साहेब का वर्दीपोश अर्दली अपने servant classs के डिब्बे से निकल कर साहेब क़ी जी हुजूरी में इर्द गिर्द टहल  रहा था ! साहेब ने उसे निकट बुलाकर आदेश दिया " मोहम्मद जरा तहकीकात करिये की आखिर माजरा क्या है , यहाँ इतनी देरी क्यों लग रही है "! मोहम्मद मियां ने पांच मिनट में अपनी रिपोर्ट साहेब बहादुर के आगे पेश कर दी ! साहेब खिडकी से बाहर झांक कर प्रतीक्षा करने लगे की कोई  रेल का  अधिकारी सामने से गुज़रे तो उसे वह बता सकें की समस्या क्या है और उन्हें क्या करना चाहिए जिससे गाड़ी आगे बढ़ सके !

इत्तेफाक से थोड़ी देर में थके हारे हताश निराश गोरे गार्ड साहेब और उस ट्रेन के प्रमुख टिकेट चेकर महोदय आगे इंजिन से हारी मान कर ट्रेन के पीछे गार्ड के डिब्बे क़ी और जाते दिखाई दिए ! सरकारी अधिकारी ने उन्हें रोका और गोरे गार्ड को अपने पास बैठा कर उससे कुछ बातें कीं !

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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव " भोला"
सहयोग : श्रीमती (डॉक्टर) कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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रविवार, 27 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 0

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 


दुनिया वालों की नजर में पिताश्री को शनिदेव की कुदृष्टि के कारण कष्ट थे ! लेकिन वास्तव में उन्हें कोई कष्ट महसूस नहीं होता था ! वह अपने इष्टदेव श्री हनुमान जी की क्षत्रछाया में सदा आनंदित ही रहते थे ! जब कभी हम बच्चे और अम्मा तनिक भी दुखी दीखते वह हमें  समझाते और कहते थे कि, " बेटा जब "उन्होंने'" दिया हमने खुशी खुशी ले लिया , आज वापस मांग लिया तो हम दुखी क्यों हो रहे हैं ? मैंने किसी गलत तरीके से कमाई नहीं की थी ये बात 'उनसे' अच्छी तरह और कौन जानता  है ? हमे "उनकी" कृपा पर पूरा भरोसा है ! आप लोगों की भी सारी आवश्यकताएँ और उचित आकांक्षाएँ वह समय आने पर अवश्य पूरी करेंगे ! आप लोग भविष्य की सारी चिंता उन पर ही छोड़ दें !" 

नीम करौली बाबा 


मै वो कथा कहने जा रहा था जिसमे एक अन्य रेल दुर्घटना में श्री हनुमान जी ने मेरे ऊपर एक बार और कृपा की थी ! तभी कदाचित हनुमान जी की ही प्रेरणा ने मेरा ध्यान 'उनके' एक अति चमत्कारी भक्त की और घुमा दिया ! मुझे याद आयी वह विशेष घटना जिसने मानवता को एक ऐसे दिव्य संत से परिचित कराया जो कालान्तर में नीम करोली अथवा नीव करोरी बाबा के  नाम से विश्व विख्यात हुआ!लीजिये पहले वह कथा ही सुन लीजिये 


यह घटना भारत के स्वतंत्र होने से पहले की है ! मैं बहुत छोटा था ! मेरे एक चाचाजी उन दिनों मैनपुरी (यु.पी) में रहते थे , वह इस घटना के प्रत्यक्ष दर्शी थे मैंने उनसे ही यह कथा सुनी थी !चाचा जी ने बताया की एक दिन वह रेल में शिकोहाबाद से कहीं जा रहे थे ! एक बहुत छोटे बिना प्लेटफार्म वाले "halt" पर उनकी ट्रेन अकारण ही काफी देर के लिए खड़ी हो गयी !इंजिन ड्राइवर की लाख कोशिशो के बावजूद भी उसका कनेडियन इंजिन गाड़ी खींचने में असमर्थ हो गया था ! बार बार भट्टी में कोयला झोका गया , स्टीम का दबाव पूरा लगा दिया गया , गाड़ी टस से मस नहीं हुई ! 


ट्रेन का एंग्लो इंडियन गोरा गार्ड बार बार सीटी बजा कर हरी झंडी दिखा रहा था ! जब बहुत देर तक गाड़ी आगे नहीं बढी तब उसने एक टी सी को ड्राईवर के पास दौड़ाया ! ड्राइवर ने अपनी बेबसी बता कर टी सी को गार्ड के पास वापस भेज दिया ! काफी देर तक बेचारा  टी. सी., 'शटल कोक' की तरह आगे पीछे भागता रहा ! बौखलाकर गोरा गार्ड स्वयम इंजिन पर चढ़ कर अपने हाथ से इंजिन चालू करने का प्रयास करने लगा ! पर गाड़ी नही चली !


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आज इतना ही ,पाठकों ,गाड़ी कल चल जायेगी और कहानी भी आगे बढ़ जायेगी !
निवेदक: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 26 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 9

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा

काशी से आये चचेरे भतीजे जिन्हें उम्र में बड़े होने के कारण मैं 'बड़े भैया' सा आदर देता था  और उनके अन्य साथियों  के साथ पनकी में श्री हनुमान जी का दर्शन करके मैंने भी उन लोगों के साथ वहीं पनकी की कुछ औद्योगिक इकाइयों का भ्रमण किया !

तभी पड़ी मेरे भविष्य की वह 'करोड़ों' की "नींव" जो श्री हनुमंत कृपा से मुझे प्राप्त हुई !

उन दिनों मेरे बाबूजी ( पिता श्री ) विद्वान् ज्योतिषियों के मतानुसार ,"शनि देवता" के दोहरे प्रहार झेल रहे थे ! पहला प्रहार था "शनि की महादशा" का जो उन्हें १९३६ से दुखी कर रहा था  और दूसरा था "साढ़े साती" का जो अब उनके जले पर नमक जैसा प्रभाव छोड़ रहा था ! पिताश्री को "शनि" के उग्र प्रभाव ने एक विश्व विख्यात ब्रिटिश कम्पनी का स्थायी ऊंचा ओहदा , जिसपर वह निश्चिन्तिता से पिछले १० -१२ वर्षों से काम कर रहे थे ,एक झटके में छोड़ देने को मजबूर कर दिया ! 


चाटुकार मित्रों के बहकावे में आकर उन्होंने अपनी समस्त जमा पूंजी लगाकर अपनी ही दो लघु  इकाइयों की स्थापना की जिनमें नुकसान ही नुकसान हुआ ! यही नहीं उनकी कोई अतिरिक्त योजना भी सफल नहीं हुई ! मैं इतना छोटा था कि  चाह कर भी किसी प्रकार उनकी मदद नहीं कर पा रहा था ! मेरे सगे बड़े भइया,जो काशी से आये इन चचेरे भैया के हमउम्र थे , तब (१९४२-४३ में ) बम्बई  में रेडिओ इंजीनिरिंग की पढाई करने गये थे ! रेडिओ का कोर्स उन् दिनों उतना ही महत्वपूर्ण था जितना आज कल न्यूक्लिअर या इलेक्ट्रोनिक इंजीनिरिंग है ! साथसाथ क्योंकि वह देखने में बहुत आकर्षक थे और मधुर कंठ के धनी थे, वह बंबई के फिल्म जगत में भी अपना भाग्य आजमाते रहते थे !( पूरा विवरण पहले भी दे चूका हूँ ) ! इत्तेफाक से अन्तोगत्वा उनके हाथ भी कोई सफलता नही आई ! और पिताश्री हर तरफ से असफलता का ही सामना करते रहे ! इस प्रकार 'गुरु' की महादशा में  पूरा "राज योग" भोगने वाले परिवार को 'शनि महराज' ने निर्धनता के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया !
दुनिया वालों की नजर में पिताश्री को शनिदेव की कुदृष्टि के कारण कष्ट थे ! लेकिन वास्तव में उन्हें कोई कष्ट महसूस नहीं होता था ! वह अपने इष्टदेव श्री हनुमान जी की क्षत्रछाया में सदा आनंदित ही रहते थे ! जब कभी हम बच्चे और अम्मा तनिक भी दुखी दीखते वह हमें  समझाते और कहते थे कि, " बेटा जब "उन्होंने'" दिया हमने खुशी खुशी ले लिया , आज वापस मांग लिया तो हम दुखी क्यों हो रहे हैं ? मैंने किसी गलत तरीके से कमाई नहीं की थी ये बात 'उनसे' अच्छी तरह और कौन जानता  है ? हमे "उनकी" कृपा पर पूरा भरोसा है ! आप लोगों की भी सारी आवश्यकताएँ और उचित आकांक्षाएँ वह समय आने पर अवश्य पूरी करेंगे ! आप लोग भविष्य की सारी चिंता उन पर ही छोड़ दें !" 

प्यारे प्रभु ने कहा " वत्स ! अनुकरणीय है तुम्हारे पिताश्री की रहनी ! सुख एवं दुःख दोनों ही स्थिति में तुम्हारे पिता मेरे प्रति गहन अनुराग,विश्वास,अवलंब और भरोसा बनाये रहे किसी दशा में भी उनकी मेरे प्रति प्रीतिऔर निष्ठां  शिथिल नहीं हुई !जरा सोच कर देखो "   

"उनका" आदेश पालन करके मैंने सोचा और पाया कि सचमुच ही उतनी कष्टप्रद स्थिति में भी पिताश्री ने अपने कुलदेवता श्रीहनुमान जी का अवलम्ब  नहीं छोड़ा ! बुरे दिनों में भी वह नित्यप्रति  हनुमान चालीसा और अष्टक का पाठ उतनी ही भक्ति के साथ करते रहे  जितनी भक्ति से ओतप्रोत हो कर  वह अपने अच्छे दिनों में करते थे ! उनकी प्रार्थना में हमें  कभी भी किसी प्रकार का आक्रोश अथवा गिला शिकवा और पीड़ा की प्रतीति नहीं हुई ! वह पूर्ववत उसी विश्वास के साथ श्री हनुमान जी से कहते रहे :

कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नही जात है टारो
बेगि हरो हनुमान महा प्रभु जो कछु संकट होंयं हमारो 
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तुम्हारो

सांसारिक दृष्टि में उनका जीवन कष्टप्रद था, क्योंकि जो व्यक्ति अनेको नौकर चाकरों से
घिरा रहता था, अब स्वयम हाथ में झोला लटका कर बाज़ार जाता था !जिसके घर में आने जाने वालों और भिक्षा देने के लिए ठेलों में लाद कर महीने भर का खाने पीने का सामान आया करता था उसके घर मे अब रसोई बनते समय गली की दूकान से सामान मंगवाना पड़ता था  !जो व्यक्ति मक्खन जीन के सूट पहनता था वह अब मोटी धोती और कुरता पहन कर सब जगह आता जाता था !उनकी विशेषता यह थी कि उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं आई और उन्होंने कभी किसी व्यक्ति को अपनी उस दुर्दशा का कारण नही बताया ! उलटे परिवार के और सदस्यों को वह यह शिक्षा देते रहते थे कि ,शत्रु मित्र , मान अपमान ,सुख दुःख ,शीत एवं उष्णता में 'प्रभु विश्वासी' व्यक्तियों को सम रहना चाहिए ! गीता जी का यह श्लोक वह अक्सर हम सब लोगों को सुनाया करते थे ! 

समः शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो:
शीतोष्णसुख दू:खेषु समःसंग विवर्जित:
(श्रीमद भगवद्गीता - १२/१८) 

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला" 
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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

गुरु बिन कौन संभारे ( Bhola_Bhajans) # 3 2 8

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गुरु वन्दना

गुरु बिन कौन संभारे ,को भव सागर पार उतारे ?

टूटी फूटी नाव हमारी पहुंच न पायी तट पर, 
जैसे कोई प्यासा राही भटक गया पनघट पर,  
पास खड़ा गुरु मुस्काता है ,दोनों बांह  पासारे
वो भवसागर पार उतारे --गुरु बिन कौन-----

मेरे राम मुझे शक्ती दे , मन में मेरे दृढ़ भक्ती दे,
राम काम मैं करूं निरंतर राम नाम चित धारे
वो भवसागर पार उतारे -- गुरु बिन कौन -----

जीवन पथ की उलझन लख कर, रुक ना जाना राही थक कर ,
अपना साथी राम निरंजन हरदम साथ हमारे 
वो भवसागर पार उतारे -- गुरु बिन कौन -----
(भोला) 
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श्री हनुमंत कृपा कथा सुना रहा था ! आज का सन्देश टाईप करने को "ब्लोगर इन ड्राफ्ट " पर गया यो देखा की  मेरे द्वारा २००१ में रेकोर्ड किया हुआ गुरु वंदना का यह भजन मेरे किसी पुत्र अथवा पुत्री ने "यूं ट्यूब" के द्वारा आज के मेरे ब्लॉग के ड्राफ्ट में पहले से ही  ड़ाल दिया है ! किसको धन्यवाद दूं ? बड़ी बेटी श्री देवी भारत में हैं दुसरे और तीसरे राम और राघव यहीं पर हैं ! इन तीनों में से कोई एक है ! जो भी हो मैं इसे फ़िलहाल अपने प्रभु की इच्छा और इशारा मान कर इसे आपकी सेवा में प्रेषित किये दे रहा हूँ !


१०-११ वर्ष पुरानी अति साधारण वीडिओ टेप रेकोर्डिंग थी , उसको ड़ी वी ड़ी में परिवर्तित किया गया है और अब यूट्यूब और ब्लोगर के द्वारा आपके पास भेजा जा रहा है ! आपको कुछ ठोक पीट करनी पड़ेगी और विशेष कष्ट उठाने पड़ेंगे तब आप इसे पूरा सुन पायेंगे !  क्षमा  करियेगा !

इसमें चित्र हैं मेरे एकमात्र सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज ,दिवंगत श्री प्रेमजी महराज और वर्तमान गुरुदेव डोक्टर विश्वामित्र जी महराज के ! इनके अतिरिक्त श्री श्री माँ आनंदमयी जी तथा श्री स्वामी अखंडानंद जी महराज ('विपुल' मुम्बई ) के भी चित्र हैं! इन सभी सिद्ध महात्माओं ने मेरे ऊपर समय समय पर जो विशेष कृपा करी है उन के स्मरण मात्र से मेरा हृदय इस समय भी द्रवित हो रहा है ! माँ आनंदमयी की अति विशेष कृपा का विस्तृत विवरण मैं अपने पिछले संदेशों में दे चका हूँ , श्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज के सानिध्य में जो अपनापन मुझे महसूस हुआ था शब्दों में अंकित कर पाना   मेरे लिए इस समय अति कठिन लग रहा है !भविष्य में यदि प्यारे प्रभु आदेश देंगे प्रेरणा देंगे तो आपको अवश्य सुनाऊंगा !

हनुमंत कृपा कथा जो अधूरी छूट गयी है वह यदि "उनका" आदेश हो गया तो अगले अंकों में पूरा कर दूंगा ! 

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निवेदक :  व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
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गुरुवार, 24 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 7

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अनुभवों  का  रोजनामचा 

आत्म कथा
मेरा यह निजी अनुभव १९४२ -४३ का है ! मैं ८ वीं कक्षा में पढ़ता था ! महात्मा गांधी का "असहयोग"  तथा "अंग्रेजों भारत छोडो" आन्दोलन देश भर में जोर शोर से चालू हो चुका था !जगह जगह पर , गरम दल के देश भक्त युवक तोड़ फोड़ भी कर रहे थे ! पूर्वी यू. पी. में उपद्रव अधिक हुए थे !यहाँ तक कि कुछ दिनों के लिए हमारा बलिया जिला स्वतंत्र हो गया ! जिलाधीश महोदय ने जिला जेल का दरवाज़ा खुलवाकर सब आन्दोलनकारी कैदियों को आज़ाद कर दिया और उनके नेता चीतू पण्डे के हाथ जिले की बागडोर सौंप कर जिले के काम काज से अपने हाथ धो लिए !हाँ , बहुत दिनों तक नहीं चला बलिया में वह अपना राज ! शायद एक सप्ताह के अंदर ही गवर्नर ने केप्टन स्मिथ के नेतृत्व में फ़ौजी हमला करवा कर बड़ी बर्बरता से आन्दोलनकारियों का दमन कर दिया ! काफी दिनों के बाद हमने समाचार पत्रों से यह जाना जब लखनऊ से यू.पी के गवर्नर सर मौरिस हेलेट ने ब्रिटिश सरकार  को यह समाचार दिया कि " अंग्रेज़ी फौजों ने बलिया फिर से फतेह कर लिया "! समाचार के  अंग्रेजी के शब्द हमे अभी तक याद हैं ,'British Forces Conquer Ballia" !उधर बलिया में हमारे हरवंश भवन के परिवार वाले पूर्वजों पर क्या बीती उनको कितने कष्ट झेलने पड़े फिर कभी बताउंगा!
अभी पहले आपको वह हनुमत कृपा का अनुभव बता दूँ !
दुर्गापूजा की छुट्टियों में यूनिवरसिटी के फाइनल इम्तहान देने वाले टेक्निकल विद्यार्थी औद्योगिक इकाइयों का भ्रमण करने निकलते हैं ! ऐसे ही एक टूर पर मेरे एक हनुमान भक्त बड़े भैया बनारस यूनिवरसिटी के विद्यार्थियों के साथ कानपूर आये ! इत्तेफाक से उनके टूर के दौरान मंगलवार पड़ा और वो हम सब को भी अपने साथ लेकर पनकी में श्री हनुमान जी के दर्शन करने गये !
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उन सभी बी. मेट. के विद्यार्थियों ने उतनी ही श्रद्धा भक्ति से पनकी में श्री हनुमान जी के दर्शन किये जितनी श्रद्धा से वे परीक्षा के दिनों में अपने गेट के निकट ही स्थित संकटमोचन मन्दिर के हनुमान जी का दर्शन वन्दन करते थे ! पनकी मन्दिर में मैं भी उनके साथ खड़ा खड़ा यह मनाता रहा कि हनुमान जी दया कर मुझ पर ऎसी कृपा करे कि समय आने पर मैं भी उन लोगो की तरह ही,  बी.एच.यू के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी में दाखिला पा सकूं ! 

प्रियजन उनलोगों की अर्जियां मंजूर हुई ,सब को हनुमान जी ने न केवल उच्च अंकों से पास करवाया वे सब भैया लोग अच्छी अच्छी नौकरियां भी पा गये ! समय आने पर मैं भी उस यूनिवर्सिटी के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी में भर्ती हो गया !

प्रियजन, आप सोचोगे इसमें श्री हनुमान जी ने कौन सी विशेष कृपा किसी पर की ?वहां  बी.एच.यू. में  प्रति वर्ष ही सैकड़ों विद्यार्थी भर्ती होते हैं और  सैकड़ों ही पास होकर अच्छी अच्छी सेवाओं में लग जाते हैं ! आपकी सोच दुरुस्त हैं ! उन दिनों उस उम्र में मेरी भी सोच कुछ ऎसी ही थी ! पर आज , तब से ६० -६५  वर्ष बाद मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ   कि हम सब लोगों के साथ तब जो कुछ भी हुआ वह इस कारण हुआ कि हमारी अर्जी पर श्री हनुमान जी ने इतनी ज़ोरदार पैरवी की कि 'परम दयालु देवाधिदेव परमेश्वर' को हमें वह सब देना ही पड़ा जो वह सुदृढ़  'नींव' थी जिस पर हमारे भविष्य की इतनी खूबसूरत  इमारत खड़ी हो पायी और सच पूछिए तो जिसके कारण हमारा जीवन सार्थक हो गया !

मैं भूला नहीं हूँ कि उस दिन जो विशेष कृपा श्री हनुमान जी ने हमारे ऊपर की वह आप को बतानी है !वह कथा तो मैं आपको आज कल में बताउंगा ही लेकिन जीवन  भर जो कृपा उन्होंने मेरे ऊपर की है उसकी "नींव" है "उनके"उस दिन का दर्शन प्रसाद !



बुधवार, 23 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 6

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 

रेल यात्रा से सम्बंधित श्री हनुमान जी की एक और कृपा का अनुभव सुन लीजिये ! 


मेरा यह निजी अनुभव १९४२ -४३ का है ! मैं ८ वीं कक्षा में पढ़ता था ! महात्मा गांधी का "असहयोग"  तथा "अंग्रेजों भारत छोडो" आन्दोलन देश भर में जोर शोर से चालू हो चुका था !जगह जगह पर , गरम दल के देश भक्त युवक तोड़ फोड़ भी कर रहे थे ! पूर्वी यू. पी. में उपद्रव अधिक हुए थे !यहाँ तक कि कुछ दिनों के लिए हमारा बलिया जिला स्वतंत्र हो गया ! जिलाधीश महोदय ने जिला जेल का दरवाज़ा खुलवाकर सब आन्दोलनकारी कैदियों को आज़ाद कर दिया और उनके नेता चीतू पण्डे के हाथ जिले की बागडोर सौंप कर जिले के काम काज से अपने हाथ धो लिए !हाँ , बहुत दिनों तक नहीं चला बलिया में वह अपना राज ! शायद एक सप्ताह के अंदर ही गवर्नर ने केप्टन स्मिथ के नेतृत्व में फ़ौजी हमला करवा कर बड़ी बर्बरता से आन्दोलनकारियों का दमन कर दिया ! काफी दिनों के बाद हमने समाचार पत्रों से यह जाना जब लखनऊ से यू.पी के गवर्नर सर मौरिस हेलेट ने ब्रिटिश सरकार  को यह समाचार दिया कि " अंग्रेज़ी फौजों ने बलिया फिर से फतेह कर लिया "! समाचार के  अंग्रेजी के शब्द हमे अभी तक याद हैं ,'British Forces Conquer Ballia" !उधर बलिया में हमारे हरवंश भवन के परिवार वाले पूर्वजों पर क्या बीती उनको कितने कष्ट झेलने पड़े फिर कभी बताउंगा!


अभी पहले आपको वह हनुमत कृपा का अनुभव बता दूँ !

दुर्गापूजा की छुट्टियों में यूनिवरसिटी के फाइनल इम्तहान देने वाले टेक्निकल विद्यार्थी औद्योगिक इकाइयों का भ्रमण करने निकलते हैं ! ऐसे ही एक टूर पर मेरे एक हनुमान भक्त बड़े भैया बनारस यूनिवरसिटी के विद्यार्थियों के साथ कानपूर आये ! इत्तेफाक से उनके टूर के दौरान मंगलवार पड़ा और वो हम सब को भी अपने साथ लेकर पनकी में श्री हनुमान जी के दर्शन करने गये !

आज इतना ही , शेष कल :


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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 22 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा #325

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 




अप्रेल २०१0 से शुरू कर आजतक अपने ३२४ संदेशों में मैंने एकेवाद्वितीय परमेश्वर परमकृपालु देवाधिदेव की ऎसी महती कृपाओं  का विवरण दिया है जिसे 


स्वयम मैंने तथा  मेरे निकटतम उन विशिस्ट परिजनों ने अनुभव किया है जिन पर मैं अपने आप से भी अधिक विश्वास करता हूँ ! 

मेरी न पूछिये ,मैंने तो अपने अस्सी-दो-बयासी वर्ष के जीवन का एक  एक पल केवल " प्रभु की करुणा " के सहारे ही जिया है ! मैंने अपने जीवन में मात्र संकट की घड़ी में ही नहीं वरन हर पल ही " उनका" वरद हस्त अपने मस्तक पर फिरता महसूस किया है ! 

लेकिन कृपा अनुभवों की अगली कथा अब मैं कहाँ से  शुरू करूँ  मुझे अभी समझ में नहीं आ रहा है ! 


प्रतीक्षा कर रहा हूँ "उनकी" एक ऎसी "प्रेरणा" की , जो अभी ही मेरी स्मृति पटल पर मेरे जीवन की कोई एक ऎसी विशेष घटना अंकित कर दे जिसका जग जाहिर हो जाना   अब "उन्हें" मंजूर है ! जब तक उनका इशारा होता है चलो ---

आपको याद दिला दूँ : वह कहानी नवेम्बर २००८ की है ! प्रियजनों ! निश्चय ही आप मेरी पत्नी तथा अन्य निकटतम स्वजनों के समान ही कहोगे कि मुझे उस घटना की याद बार बार नहीं करनी चाहिए ! पिछले २ वर्षो से इन सब को समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि मानव को यह सत्य एक पल को भी नहीं भुलाना चाहिए कि आज नहीं तो कल हम सब को यह नश्वर मानव तन त्याग कर  परम धाम जाना ही है ! मैंने अनेकों संत महात्माओं से ऐसा सुना है ! मेरी अपनी नासमझ बुद्धि तो इसे मान गयी है ! चलिए छोड़ें यह विषय !

मैंने उस सन्देश में छोटी सी भूमिका के बाद एक रचना की केवल प्रथम पंक्ति लिखी थी ! आज वह पूरी रचना बता रहा हूँ जिससे आपको मेरी तत्कालिक मन:स्थिति का ज्ञान हो जायेगा ! शायद आपको याद हो लम्बे कोमा के दौरान होश आने पर मैंने होस्पिटल के आई सी यूं में इसकी प्रथम दो पंक्तियाँ बड़बड़ाईं थीं  :-

 रोम रोम श्री राम बिराजें धनुष बाण ले हाथ
मात जानकी लखन लाल औ महाबीर के साथ 

वंदन करते राम चरण अति हर्षित मन हनुमान
आतुर रक्षा करने को सज्जन भगतन के प्रान
अभय दान दे रहे हमे करुणा सागर रघुनाथ
रोम रोम श्री राम बिराजें धनुष बाण ले हाथ

मुझको भला कष्ट हों कैसे क्यूँ कर पीर सताये
साहस कैसे करें दुष्टजन मुझ पर हाथ उठाये
अंग संग जब मेरे हैं मारुति नंदन के नाथ
रोम रोम श्री राम बिराजे धनुष बाण ले हाथ

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निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 21 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 4

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अनुभवों  का  रोजनामचा  
आत्म कथा 


ॐ 
अतुलित बल धामम  हेम शैलाभदेहं 
द्नुज बन कृशानुम ज्ञानिनाम अग्रगण्यम  
सकल गुण निधानं वानरानाम धीशम    
रघुपति प्रिय दूतं वातजातं नमामी 
ॐ श्री हनुमंताय नमः ॐ 
ॐ 

रेलगाड़ी के उस खचाखच भरे डिब्बे के सभी यात्री अपने जीवन की आशा छोड़ चुके थे और अपने अपने इष्ट देवों को, अपनी  प्राण रक्षा की कामना से पूरी श्रद्धा-और विश्वास के साथ सच्चे मन से याद कर रहे थे ! मुसलमानों को कयामत के नजारे और हिन्दुओं को प्रलय के भयंकर दृश्य उस घने अंधकार में भी नजरों के आगे उभरते दृष्टिगोचर हो रहे थे ! वहां उस रेल के डिब्बे में मरणासन्न इंसानों की आवाज़ नहीं बल्कि विशुद्ध आत्माओं की मूक पुकार गूँज रही थी ! महापुरुषों ने बताया है कि प्रभु को छप्पन भोगों से अधिक प्रिय है भक्तों द्वारा भेंट की हुई उनके शुद्ध हृदय की प्रार्थना , श्री राम ने कहा ही है :

निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा

मुसलमानों ने अपने अल्लाह और हिन्दुओं ने अपने प्यारे परमेश्वर के समक्ष अपने शुद्ध और निर्मल मन समर्पित किये ! रेल के डिब्बे में हमारा हनुमान चालीसा  पाठ उसी भाव से चल रहा था जैसे बचपन में अम्मा की गोद में उन के मुख से सुनते थे ,घर के आंगन में महाबीरी ध्वजा के तले पूरे परिवार के साथ सामूहिक स्वर में गाते थे और कभी कभी स्कूली परीक्षा  पास करने पर "पनकी" के हनुमान मन्दिर में उनकी मूर्ती के आगे गाया  करते थे !  
ट्रेन में उस समय हम गा रहे थे :

संकट से हनुमान छोडावें ,मन क्रम बचन ध्यान जो लावे
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संकट कटे    मिटे सब पीरा , जो  सुमिरे  हनुमत    बलबीरा 
================          =================
जय जय जय हनुमान गुसाईं ,कृपा करो गुरुदेव की नाईं 
================           =================
तुलसीदास सदा  हरि चेरा   ,  कीजे नाथ हृदय महं  डेरा 

पवन  तनय  संकट  हरन  मंगल  मूरत रूप 
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप 
  

हनुमान चालीसा के समाप्त होते ही यात्रियों में से किसी ने "हनुमान अष्टक" का पाठ  शुरू कर दिया ! तभी मुझे अपने बचपन की एक बात याद आयी ! मैं ७  वर्ष का था जब  मेरे बाबूजी पर शनि गृह की विशेष कृपा हुई ! उन के जीवन में शनि की महादशा के साथ साथ साढे साती का भी दुसह प्रभाव पड़ा ! उनके  ज्योतषियों और आध्यात्मिक ज्ञानी सलाहकारों ने उन्हें अन्य पूजा पाठ के उपायों के साथ साथ हनुमत-भक्ति पर अधिक समय लगाने की सलाह दी ! बाबूजी के तो इष्ट ही हनुमत लाल थे !वह हनुमान चालीसा का पाठ किये बिना अन्न का एक  दाना भी मुंह में नहीं डालते थे ! पंडितों की सलाह से उन्होंने तब से हनुमान अष्टक का पाठ भी शुरू कर दिया ! हमारे कानो में अब अष्टक के पद दिन में कई कई बार पड़ने लगे ! लगभग १० वर्षों तक हम बाबूजी के मुख से वह पाठ  सुन कर ही उठते बैठते  रहे ! हमे भी उसकी बहुत सी पंक्तियाँ कंठस्थ हो गयीं प्रमुखत:
उसकी प्रथम पंक्ति  ज़रा देखिये वह पंक्ति हमारी तत्कालिक स्थिति का कितना यथार्थ चित्रण कर रही थी , हमारे भी तो चारो और घना अँधेरा छाया था :


बाल समय रवि भक्ष लियो तब तीनहु लोक भयो अंधियारों 
उस समय हमारे 'रवि' का भी कोई भक्षण कर गया था ! हम सब भी भयंकर अँधेरे में थे ) 
और जैसे ही अष्टक का निम्नांकित अंतिम दोहा गाया गया 

लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लंगूर 
वज्रदेह दानव दलन जय जय जय कपिसूर

उसी पल एक चमत्कार सा हुआ ,डिब्बे की खिडकियों के बाहर से कालिमा के स्थान पर हनुमान जी की लालिमा झांकने लगी! थोडा समय और लगा, लगभग १५-२० मिनिट में वह महाबीरी लाली सूर्य के उज्जवल प्रकाश में परिणित हो गयी ! बाहर का वायुमंडल भी शुद्ध हो गया ! खिड़कियाँ दरवाजे खोल कर सब यात्रिओं ने जीवन दायनी ताज़ी हवा का
आनंद लिया ! हम पुनर्जीवित हो गये !

अब थोडा हंस लीजिये ! सूर्य के प्रकाश में जब हमने अपने चारों ओर देखा तो रेल का वह डिब्बा सुग्रीव की मरकट सेना के सैनिकों से भरा हुआ दिखा ! धूल की इतनी मोटी तह हर चेहरे पर जमी थी कि किसी को भी पहचान पाना कठिन था !

प्रियजन ! हनुमत कृपा की यह कथा अब यहीं समाप्त कर रहा हूँ ! कल "उनके" आदेश तथा "उनकी"प्रेरणा से कोई और कथा प्रारम्भ होगी ! अभी आज की राम राम स्वीकारें !

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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव  "भोला"
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रविवार, 20 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 3

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा

मुझे अपने कुछ पाठकों के कमेंट्स पढ़ कर लगा जैसे वे स्नेहीजन मुझे एक बहुत दुखी और निराश व्यक्ति सा देखते हैं.? मेरे प्रति उनकी करुना के लिए मैं उनका अति आभारी हूँ ! पर आप ही बताओ मेरे प्रियजनों कि क्या मेरा "चीफ सम्पादक" ," वह ऊपर वाला" , किसी कीमत पर मेरा कोई ऐसा सन्देश प्रकाशित करेगा जिसमे नैराश्य का एक अक्षर भी हो ? आप जानते हैं ,मैं "उसकी" प्रेरणा से उसका "प्रेम -भक्ति" का सन्देश आप सब तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ ! मेरे पिछले ३२२ सन्देश वास्तव में "उसकी" ही स्वीक्रति से जन जन में आश विश्वास जगा कर मानवता को भविष्य की आशंका, चिंता और निराशा के भय से मुक्त करवा देने के उद्देश्य से प्रेरित है ! सूरदास जी श्याम के गुलाम हो कर कितने प्रसन्न थे : 
सब कोउ कहत गुलाम श्याम को सुनत सिरात हियो 
सूरदास हरि जू को चेरो जूठ्न खाय जियो 
हमें नन्द नंदन मोल लियो 
फिर राम का दास होकर भला मैं क्यों उदास हूँ 
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आज  इस समय यहाँ USA  और कनाडा में होली का दिन है ! आज मुझे कुछ लिखने की इच्छा नहीं थी ! पर आ गया "उनका"आदेश ! 'पराधीन सपनेहु सुख नाही '! ( कोई ये न  समझे कि मैं वाकयी में दुखी हूँ ? भाई ! होली है तो कुछ "ऊपर वाले" से भी छेड़ छाड़ तो की जा सकती है न ?) वह बृज का रसिया कान्हा ,क्या कम नाटक बाज़ है ? ब्रिज की सब गोप गोपियों को होली पर नाचने गाने के लिए अपने डिस्को में आने की दावत दे कर वह, श्रीमान 'डी जे' महोदय स्वयं लापता हो गये ! गोपियों ने गाया :

न जाने कहां छिप गया कृष्ण काला,
अभी तो यहीं था यशोदा का लाला ,
नहीं तन का केवल ,वो मन का भी काला ,
सताता है सबको अकारण अकाला 
'भोला' 

आज होली के दिन नटखट कान्हा की याद दिलायी मेरे एक नटखट कनेडियन 'नाती' ने ! (अब यहाँ के बच्चे पूछेंगे 'नाती' what ? Must be some naughty guy ?) !  मेरा उत्तर होगा " हाँ था कभी लेकिन अब तो वो बाल बच्चों वाला गब्बर बन गया है ,पर अब भी वह मेरा नाती grand child तो है ही'!


कान्हा की याद दिला कर उसने फरमाइश भी कर दी " नाना आप  होली के दिन , अशोक विहार दिल्ली में जो होली के गीत गाते थे , अब अपने प्रपोत्रों को भी सुना दीजिये ! अब तो आप ब्लॉग पर भी गाने लगे हैं ,उस पर ही गा दीजिये !  वो भी आप को देख सुन लेंगे और हमारी भी बचपन की यादें ताज़ी हो जायेंगी !"
  
तो फिर एक बार शूटिंग हुई ! केमेरा और साउंड रेकोर्डिंग तथा मजीरा वादन नाती जी की नानी डाक्टर कृष्णा जी ने की , गायक है आपका यह बूढा पोपट - तोता - सुग्गा 'भोला'!

बिरज में धूम मचायो कान्हा 
कैसे कि जाऊं अपने धामा  





मैं न कवि हूँ ,न गायक ! बच्चों के मनोरंजन के लिए और स्वान्तः सुखाय, "इष्टदेव" की  स्वीकृत से थोड़ी  तुकबंदी कर लेता हूँ ,थोड़ा बहुत  गा बजा लेता हूँ !
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निवेदक : व्ही . एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 19 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 2

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अनुभवों  का  रोजनामचा 

आत्म कथा  

जून १९४५ की लक्खंनवाल (गुजरात - अविभाजित पंजाब ) से कानपूर तक की यात्रा का विवरण चल रहा था ! कलकत्ते के "ब्लैक होल" से भी अधिक भयानक और वास्तविक  कालिमा भरे रेल के डिब्बे में मेरे साथ साथ जीवन की आखिरी सांस लेते सैकड़ों यात्रियों की दुर्दशा का हाल बता रहा था ! 


अपने ग्रुप में मैं उम्र में सबसे छोटा था !पहली बार अपने "भोजपुरी" परिवार  से इतनी दूर एक विशुद्ध पंजाबी-भिन्न भाषा, संस्कृति, रहन सहन और धार्मिक मान्यता वाले परिवार के साथ डेढ़ महीने की लम्बी यात्रा पर गया था !मेरे मित्र का तो पूरा परिवार उसके साथ था ,केवल मैं ही एक ऐसा था जो अपने परिजनों को दूर से ही प्रणाम कर इस असार संसार से विदा होने जा रहा था !


उस छोटी अवस्था में ( १५ वर्ष का था मैं तब ) मेरी कोई निजी पुण्य की कमाई होने का प्रश्न ही नहीं था ! उस समय तक अपनी एकमात्र सम्पत्ति थी माता पिता एवं पितामहों से विरासत में मिली उनकी पुन्यायी और उनके संस्कारों की धरोहर ! बचपन में 'भागवत' के एक प्रसंग में अम्मा से सुना था कि पान्डु पत्नी महारानी कुंती ने अपने भतीजे श्री कृष्ण से एक विचित्र "वर" माँगा था :" मुझे प्रति पल इतने कष्ट दो कि मैं 'तुम्हे' एक पल को भी भुला नहीं पाऊँ "! यहाँ रेल के डिब्बे में इतने कष्ट झेलते हुए हम 'उन्हें' कैसे भुला पाते ? परिवार की याद आते ही मेरे को अपने परिवार के 'इष्टदेव' श्री हनुमान जी महाराज की याद  का आ जाना स्वाभाविक ही था !


विक्रम बजरंगी महाबीर जी महराज जिनकी लाल ध्वजा पताका हमारे पैत्रक घर 'हरवंश भवन', बलिया के आँगन में आज भी लहराती है ,भला "उन्हें" कैसे भुलाता मैं ? हमारे पितामहों तथा पिता और हमारी पीढी के बड़े 'कजिन' इलाहबाद शाखा के बड़े भैया पर "उनके" द्वारा समय समय पर की हुई कृपा की कथाएं एक एक कर के याद आयीं ! 


कैसे साक्षात प्रगट होकर उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे एक परदादा जी का मार्ग दर्शन कर के उन्हें अन्याय से मृत्यु दंड पाने से बचा लिया ! एक दूसरे पितामह को "उन्होंने" उनके परलोक गमन की पूर्व सूचना देकर सावधान किया और "उनके" ही कथनानुसार हमारे उन दादा जी  ने श्री जगन्नाथ पुरी में त्रिमूर्ति के समक्ष ही प्राण त्यागा ! ( विस्तार से पितामहों की कथाएं पहले दे चुका हूँ इसलिए दुहराउंगा नहीं ! कृपया पिछले सन्देश पढ़लें )


रेल के डिब्बे में प्राण रक्षा की कोई सम्भावना ही नहीं थी ! हमारा दम घुट रहा था  किसी पल कुछ भी हो सकता था ! सभी यात्रिओं को अब एक मात्र ईश्वर का सहारा था !अपने अपने ढंग से अपने अपने इष्टदेव को सब ही याद कर रहे थे !मैंने भी अपने इष्ट देव को मनाने की प्रक्रिया चालू की ! मैंने मन ही मन कहा :


श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार 
वरनऊ रघुबर बिमल यश जो दायक फल चार 
बुद्ध हीन तन जान के सुमिरों पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार  

और फिर हनुमान चालीसा का पाठ चालू हो गया ! तब १५ वर्ष की अवस्था में मैंने  कैसा गाया था ,कह नहीं सकता ! लेकिन आज "उनकी" आज्ञा से  ८ २  वर्ष की अवस्था में मैं आपको सुनाने का प्रयास कर रहा हूँ ! आपके मन मन्दिर के इष्टदेव मेरी यह अर्जी सुनें और हम सब पर अपनी ऎसी ही कृपा दृष्टि सर्वदा बनाये रखें कि हम सब मिल जुल कर उनका सिमरन इसी प्रकार करते रहें !

  

प्यारे प्रभु प्रेमियों , अब थक गया हूँ !आज यहीं समाप्त करता हूँ ! कल फिर मिलूंगा यदि "उनकी"आज्ञा हुई !

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निवेदक: 
व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 1

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अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 

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आज प्रातः काल से ही होली की शुभ कामनाओं के मेल आने लगे ! मन पर ,भूचाल और  सुनामी से प्रताड़ित जापान की पीड़ा भरपूर कब्जा जमाये थी ,कुछ और सोचने समझने या लिखने का सामर्थ्य ही न था ! लिखने बैठा तो निम्नांकित होली का जवाबी सन्देश ही लिख पाया !  पाठकगण अस्तु "रामेच्छा" मान कर , उनकी भेजी प्रेरणा समझ कर मैं अपना आज का सन्देश इस से ही शुरू करता हूँ !
                                 




परम प्रिय स्वजन 
सब को ही होली की राम राम  
कितने भाग्यवान हैं हम सब ,खेल रहे मिल जुल कर होली
   और कही पर धधक रही जनता  के अरमानो   की होली 
कही घुल रहा रङ्ग रुधिर का सागर के जल मे अति गहरा
   और कही टेसू गुलाब के रंग  रन्गी जनता की टोली
 
प्रियजन खेलो रंग , मचाओ धूम ,नगर मे घूम घूम कर
मन मे करते रहो विनय ,"""प्रभु खोलो अब तो करुणा झोली
कष्ट हरो करुणाकर स्वामी ,जग के सारे ,दुखी जनो के"
मानवता ,मिल जुल कर ,जिससे ,खेल सके हम सब से होली

भोला - कृष्णा 




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प्रियजन अपने भारत की तो परम्परा है "परहित" ! हमारे संतों और गुरुजनों ने  सिखाया  है कि "परहित सरिस धरम नहीं भाई " और अपनी पौराणिक प्रार्थना है:: 

ॐ सर्वेषाम स्वस्तिर भवतु , सर्वेषाम शांतिर भवतु ,
सर्वेषाम पूर्णंम  भवतु ,  सर्वेषाम मंगलम भवतु

सर्वे भवन्तु सुखिनः ,सर्वे सन्तु निरामयः  
सर्वे भद्राणि पश्यतु ,माँ कश्चती दुख्भाग्भ्वेती

(प्यारेप्रभु ! सबका कल्याण हो ! सबको शांति प्राप्त हो ! सबमें पूर्णता आये ! सब सौभाग्यशाली हों !! मेरे नाथ !
सब सुखी हो !सब योग्य हों ! सब परस्पर एक दूसरे का भला चाहें ! कोई भी दुःख से पीड़ित न हो !!)

ॐ शांति शांति शांति ॐ
ॐ आनंद आनंद आनंद ॐ


( भीतर शांति 
बाहर शांति ! सर्वत्र शांति !!


सर्वत्र आनंद ही आनंद !!)

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प्लीज़ ऐसा न सोचो कि टाल रहा हूँ ,या भूल गय हूँ ! ऐसा कुछ नहीं है ! भाईया, यह रेलगाड़ी की घटना पिछले ६६ वर्षों से आज तक याद रख सका हूँ ,तो दो दिनॉ में कैसे भुल जाउंगा ! भरोसा रखिये सारी कहानी सुनाऊंगा ! जरा वह मेरे "ऊपर वाले गार्ड साहेब"  हरी झंडी तो दिखाएँ ! बस उसकी ही प्रतीक्षा कर रहा हूँ !

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निवेदक: :व्ही .एन. श्रीवास्तव "भोला'
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गुरुवार, 17 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 0

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अनुभवों का रोजनामचा 

आत्म कथा 


भारत में विदेशी शासकों द्वारा देश भक्त भारतीयों पर की हुई बर्बरता की कहानियां विदेशी इतिहासकारों नें भी नहीं छुपायीं ! कलकत्ते का "ब्लैक होल" जिसमें तत्कालिक सरकार ने एक छोटी सी कोठरी  में अनेकों भारतीयों को बंद किया और उन्हें एक एक सांस के लिए मोहताज करके  तड़प तड़प  कर मरने को छोड़ दिया , क्या कोई भारतीय कभी भी भुला सकता है ? कानपुर के "मेमोरिअल वेल" को तो मैंने भी देखा है ,कहते हैं कि उस कुँए मे सैकड़ों लोगों को ढकेल कर लाशों से उसे पाट दिया गया था ! ठीक से याद नहीं कि उसमें विदेशी शासकों के समर्थकों की लाशें थीं अथवा देश भक्तों की !  इतना भव्य मेमोरिअल विदेशियों ने किस उद्देश्य से बनवाया और स्वतंत्रता के बाद देशी सरकार ने उसे क्यों तुड़वाया इस पर भी मैं कोई प्रकाश नहीं डाल पाऊंगा क्योंकि प्रियजन न तो मैं इतिहासकार हूँ न पोलिटीशियन !

प्यारेप्रभु के आदेश से "उनके" ही सञ्चालन में "उनकी" ही मन्त्रणा और प्रेरणा से उनकी कृपा से उपलब्ध संसाधनों के द्वारा , इस "बड़े सौभाग्य से पाए मानव तन " से जितना कुछ ,"अपने राम को रिझाने के बहाने - स्वान्तः सुखाय " बन पाता है , केवल उतना ही करता हूँ ! ( देखा आपने फिर कर्तापन का अहंकार ? भैया मैं कुछ नहीं करता ! मेरी  क्या औकात है ,सच पूछो तो जितना "वह" मुझसे करवा लेते हैं वह ही सम्पूर्ण हो पाता है ) 

इस ऐतिहासिक "ब्लैक  होल" की याद इसलिए आयी क्योंकि उस दिन की , तीन  नम्बर की लखनऊ कानपूर (3 LCपेसेंजर रेलगाड़ी के  सभी तीसरे दर्जे के डिब्बे "ब्लैक होल" के प्रतिरूप बने हुए थे ! और मित्रों उनमें  से एक डिब्बे में था आपका यह "राम का  प्यारा" शुभाकांक्षी मीत !

ज़िन्दगी और मौत के कगार पर खड़े उस ट्रेन के सैकड़ों यात्री अपने इष्ट देवों को मना रहे थे , मुस्लमान भाई "अल्लाह" को, सिक्ख भाई " वाहे गुरु " और "बाबा जी" को तथा हिन्दू भाई अपनी अपनी मान्यतानुसार विविध देवी देवताओं को तथा उनके भी "इष्ट" सर्वव्यापी 'ब्रह्म' को मना रहे थे जो प्रत्येक जीवधारी के रोम रोम में रमा हुआ है !


रोम रोम पर आसीन सर्वशक्तिमान ब्रह्म के होते हुए स्वजनों कौन हमारा एक बाल  भी बांका कर सकता है ? एक हाल की कथा सुना देने की प्रेरणा हुई है : 


२००८ के अंत में,भारत के एक हस्पताल के एसी युक्त ,प्रदूषणों से मुक्त ,साफ सुथरे आई. सी.यू. में मेरे जीवन रक्षा के प्रयास चल रहे थे ! सांस का आवागमन बनाये रखने के लिए "ओक्सीजन मास्क" और electric shock का प्रयोग हो रहा था ! एक रात "कोमा" के बाहर आते ही मैं कुछ बडबड़ाया जिसे ड्यूटी नर्स ने एक पुर्जी पर नोट कर लिया !प्रियजन  अगले प्रातः धर्म पत्नी कृष्णा जी ने वह पर्ची पढ़ी , उसमे लिखा था 


रोम रोम 'श्रीराम' बिराजें धनुष बाण ले हाथ 
माता सीता लखनलाल अरु बजरंगी के साथ  
( आये कोई लगाये हाथ )

यहीं समाप्त करने का आदेश है , स्थानीय मारुती मन्दिर में जाना है ! वहां भजन कीर्तन  होंगे ! मैं तो अभी की प्रेरणानुसार , वहां पर प्राक्रतिक आपदाओं से जूझते जापान के दुखी  नागरिकों की सुरक्षा के लिए मन ही मन प्रार्थना करूँगा ! मेरे अतिशय प्रिय पाठक गण आप से अनुरोध है ,कृपया यह सन्देश पढ़ते समय इस प्रार्थना में मेरा साथ अवश्य दें   ! आपके सहयोग से मेरी भी अर्जी वहां तक पहुँच जायेगी ! धन्यवाद !

और हाँ , कोई चिंता मन में लेकर न सोइयेगा !-मुझे कुछ भी नहीं हुआ , न तब १९४५ में और न २००८ की बीमारी में ! भैया ,विश्वास करो ,धरती से ही पत्र भेज रहा हूँ ,अभी शून्य तक नहीं पहुंचा ! कल रेल गाड़ी वाली कहानी और होस्पिटल की वह रचना पूरी करूंगा , यदि हाई कमांड से आज्ञा हुई ! 

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क्रमशः 
निवेद्क: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
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