रविवार, 12 फ़रवरी 2012

हमारी "संगीत शिक्षा"


 "भक्ति संगीत" से 
हमारी संगीत शिक्षा  
का श्रीगणेश 
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हमारे  " प्रेरणा स्रोत" -"प्यारे प्रभु" ने , मेरी  पिछली "संगीत" विषयक चर्चा का प्रारम्भ , "फिल्मी आयटम गीतों" से ही क्यूँ करवाया , इसका मूल कारण तो "वह"ही जाने ! इस विषय में मैं आपको ये साफ साफ बता देना चाहता हूँ कि १९५० के दशक के बाद मुझे जीविकोपार्जन के चक्कर में ,अधिक फिल्में देखने का मौका ही नहीं मिला !  आप ही अनुमान लगाएं , ऐसे में आयटम गीतों के विषय में मेरा ज्ञान कितना सीमित होगा और उन पर प्रकाश डालना मेरे लिए कितना कठिन होगा और कितना कठिन होगा मेरे लिए ऐसे विषय पर कोई सार्थक वक्तव्य देना ! फिर भी मजबूर था -

क्या करता ?  हूँ तों "उनका" मोल लिया गुलाम ! कैसे टालता आदेश "उनका" ? उनका  डिक्टेशन तों लेना ही था ! सो , जो भी "उन्होंने" बोला ,मैंने टंकित कर दिया !

सच्चाई यह है कि बहुत छुटपन से ही मुझे अश्लील शब्दों वाले गीत सुनना या स्वयं गाना अच्छा नहीं लगता था !    क्यूँ ?  

इसके कई कारण हो सकते हैं जिनमे सर्व प्रमुख है यह , जो मुझे अब - ८२ सर्दियाँ झेल लेने के बाद समझ में आया है - वह है  , "मेरे जीवात्मा"'  द्वारा जन्म जन्मान्तर से संचित किये प्रारब्ध एवं संस्कारो  का 'क्यूमिलेटीव' प्रभाव तथा मेरे इस जन्म की सारी कारगुजारी - अर्थात मेरी इस मानव काया द्वारा , इस जन्म में किये सभी उचित तथा अनुचित कर्मों का लेखा जोखा ]   !

सच पूछिए तों ,गुरुजनों एवं मातापिता के आशीर्वाद  ,उनकी सिखावन , उनकी बहुमूल्य दीक्षा [ जिन्हें हम अक्सर अधिक महत्व नहीं देते है ,वह ही ] , हमारे 'प्रारब्ध' तथा "पूर्वजन्म के संस्कारजनित" कुप्रभावों से आजीवन  हमारी रक्षा करते  हैं !  और हम हैं कि बेकार  के ढकोसलों में पड़े अपनी निजी मूर्खताजन्य असफलताओं के लिए काल,कर्म और ईश्वर को दोषी ठहराते रहते हैं ! तुलसी ने सत्य ही कहा है कि ऐसे असफल व्यक्ति :

सो परत्र  दुःख पावई  सिर धुन धुन पछताइ  
कालहि  कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाइ 

चलिए आगे की कथा सुन लीजिए ;-

१९३० के दशक के अंत तक भारत के कुछ बड़े नगरों में ही "रेडियो" की सुविधा  उपलब्ध थी ! टेलीविजन का तों कहीं नामोनिशान भी नहीं था ! समृद्ध घरों में मनोरंजन का एक मात्र साधन होता था "ग्रामाफोन" तथा उनपर बजने वाले 'कुत्ता छाप' - "एच एम् वी" के रिकोर्ड [तवे] !  प्रियजन , विश्व युद्ध [द्वितीय] से पूर्व के उन दिनों में ,तीस चालीस रुपयों में "हिज मास्टर्स वोयस" के 'ग्रामाफोन' और चार चार आने में तवे मिला करते थे !

हमारे  पिताश्री  एक ब्रिटिश फर्म के उच्चाधिकारी थे ! गर्मियों के सालाना वेकेशन के बाद इंग्लेंड से लौटने वाले उनकी कम्पनी के अँगरेज़ अधिकारी बाबूजी के लिए "क्वेकर्स ओट मील " की शीशियाँ और हम बच्चों के लिए  'मेड इन इंग्लेंड'- कम्पटे और "मोर्टन" ' की चोकलेट , तथा ब्रिटानिया बिस्किट कम्पनी के मीठे "डाइजेस्टिव बिस्किट" और खारे "क्रीम क्रेकर्स" के टीन के डिब्बे लाते थे ! अक्सर बाबूजी के मित्र - स्मिथ साहेब , इंग्लेंड में सुंदर 'पैकिंग' में भरी हुई  ,भारत की बेशकीमती 'चाय' वापस भारत में लाकर भारतीयों को ही भेट में देते थे !  मुझे याद है एक बार बड़े भैया के लिए वह छर्रों के साथ एक 'एयरगन' भी लाए थे !

मैंने जब होश सम्हाला ,४  - ५ वर्ष की अवस्था में [ १९३३ - ३४  ] मैंने ऐसे ही इंग्लेंड से आयातित एक "एच एम् वी '' का बड़ा वाला ग्रामाफोन अपने घर में देखा था !

उस ग्रामाफोन पर , घर के ,बड़े लोग [ हमारे बच्चन चाचा और ताऊजी के बेटे जगन्नाथ भैया , जो कोलेज की पढाई के लिए बलिया से आकर हमारे साथ ही रहते थे ], बाबू जी की गैर मौजूदिगी में , मौका मिलते ही उस ग्रामाफोन में चाभी भर कर ,रिकोर्ड बजाने लगते थे और हम बच्चे , दूर से ही ,कान लगाये हुए उस बाजे से निकलता संगीत सुना करते थे !

संयोगवश , शायद पूर्व जन्म के संस्कार एवं प्रारब्ध के कारण हमारे परिवार के बच्चों पर "वीणापाणी माँ सरस्वती" की असीम कृपा थी ! बड़े भैया , बड़ी दीदी  तो  गाते ही थे,मैं भी अपनी अस्फुट  बोली में उन रेकोर्डों के स्वर में स्वर मिला कर उनपर छपे गाने सीख लेता था ! अब सुनिए, हमारे तत्कालीन 'संगीत गुरु', "पंडित ग्रामाफोन जी महाराज" ने हमे तब क्या क्या सिखाया था ?

शुरू शुरू में उस ग्रामाफोन के साथ थोड़े से ही रिकोर्ड आये थे ! मुझे याद है उनमे दो सेट नाटक  के थे - [१] वीर अभिमन्यू / जयद्रथ वध , [२], बिल्वमंगल सूरदास ! टीन के दो रंगीन डिब्बों में ये तवे बहुत सम्हाल कर रखे गए थे !

इन दो 'ड्रामों' के अलावा थोड़े से संगीत के तवे भी थे ! एक जिसे हम बार बार सुनते थे वह था , उस जमाने के मशहूर संगीतज्ञ पंडित नारायण राव व्यास द्वारा गाये गीत का ! वह गीत उस छोटी उम्र में ही मेरा मन छू गया था , तभी तो आज ८० वर्ष बाद भी वह मुझे सस्वर याद है :[सुविधा मिलती तो गा कर सुना देता] अभी उसका मुखड़ा ही देख लीजिए -

भारत हमारा देश है , हित उसका निश्चय चाहेंगे -
और  उसके हित के कारण हम कुछ न कुछ कर जायेंगे 

 कितने उच्च विचारों से भरा हुआ है यह गीत ,आपही देखें !  


देश प्रेम के उस रिकोर्ड के साथ भक्ति रस के भी कई रिकोर्ड थे ! 
इन रेकोर्डों में ,बंगाल की किसी भद्र महिला गायिका के द्वारा गाये हुए 
श्रद्धा भक्ति से ओतप्रोत ,"मीराबाई" के चंद बड़े अच्छे भजन थे !

(१) मेरे तों गिरिधर गोपाल दूसरा न कोई 
(२) राना जी ,मैं तों गिरिधर के घर जाऊं 
(३) प्यारे दर्शन दीजो आय 
(४) दरस बिना दूखन लागे नैन     


इनके अतिरिक्त ठाकुर ओंकार नाथ जी , पंडित विनायक राव पटवर्धन जी , पंडित डी. वी  पलुस्कर जी तथा बिस्मिल्लाह खां साहब के शास्त्रीय संगीत के भी तवे थे ! उनके गायन में शब्दों की न्यूनता के कारण बचपन में हम उनका उतना आनंद नहीं उठा पाते थे !

इस प्रकार मीरा बाई के उपरोक्त भजनों द्वारा हमारे प्रथम संगीत गुरु  'पंडित ग्रामाफोन जी महराज' ने हमारी कलाई पर पहला गंडा बाँधा !

इस संगीत शिक्षा का 'होम वर्क' प्रतिदिन  हमारी अम्मा हमसे करवा लेती थीं ! वह फुर्सत के समय हमसे मीरा के उपरोक्त भजन सुना करतीं थी ! इस प्रकार अम्मा को  भजन सुनाने से  हमारा संगीत का रियाज़ होता था और हमारी अम्मा का "नाम सिमरन" !

क्रमशः

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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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8 टिप्‍पणियां:

Deepak Saini ने कहा…

जय श्री राम

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर संस्मरण। धन्यवाद।

G.N.SHAW ने कहा…

काकाजी और काकी जी को प्रणाम !मैंने भी ग्रामोपों देखें है ! पुराने वक्त के अजब संगीत साधन ! कुछ बातें जैसे चाकलेट और क्रीम की बिस्कुट को ध्यान दे तो हमें जरुर पता चलता है की हम विश्व में कितने पीछे है ! काकाजी आपके संस्मरण पढ़ने में विचित्र आनंद मिलता है !

Bhola-Krishna ने कहा…

प्रियवर , जय श्री राम ! हमारे गुरुमंत्र - "राम" की याद दिलाने वाली आपकी उत्साहवर्धक टिप्पडी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक आभार !इधर १०-१५ दिनों से "उन्होंने" मुझे छुट्टी दे रखी है, न् कोई प्रेरणा देते हैं और न् कोई नया सन्देश ही 'डिक्टेट' कर रहे हैं ! कैसे मनाएं "उन्हें" ? कुछ मदद करिये , "दीपक जी" , प्रकाश की एक किरण इधर भी भेज दीजिए !

Bhola-Krishna ने कहा…

गोरखजी ! विलम्ब से उत्तर दे रहा हूँ , क्षमा प्रार्थी हूँ ! "क्रीम क्रेकर" बिस्कुट के विषय में बताऊँ ! १९३०-४० में हम जब बलिया जाते थे तब कभी कभी हमारी अम्मा यह बिस्कुट ,बलिया के फुहारे वाले गोल चौराहे के साहू जी की किराने की दूकान से मंगवाकर हमे खिलाती थी ! आपको विस्मय हो रहा होगा कि बलिया का बाज़ार तब -उस जमाने में भी इम्पोर्टेड मॉल रखता और बेचता था ! आज कल बलिया के क्या हाल हैं ? आप लास्ट कब गए वहाँ ?

Bhola-Krishna ने कहा…

प्रियवर, कमेन्ट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक आभार !आज कल कलम थम गयी है , ऊपरवाले "बॉस" न् प्रेरणा भेज रहे हैं न् "डिक्टेट" ही कर रहे हैं !हाथ पर हाथ धरे बैठा हूँ ! कुछ मदद करें !

Anil ने कहा…

आदरणीय बुआ और फूफा जी ,

सादर चरण स्पर्श ! जय सीता राम !

आप अपने हर लेख की शुरुआत में यह लिखते है कि प्रभु ने आज जो लिखाया वही लिख रहा हूँ . सच पड़कर मन प्रफुलित हो जाता है और प्रभु से यही मांगता हूँ कि मेरी बुद्धी भी ऐसी ही करे कि मुझे भी लगे कि जो कुछ भी में कर रहा हूँ वह

"प्रभु आज्ञा से ही किया और उसी में मेरा कल्याण निहित है "

एक बार स्वामी जी ने कहा था, और शायद मेरी सोच भी अक्सर ऐसी ही हो जाती है ------

" जब किसी मनुष्य का नौकर उसकी किसी चीज़ को ले लेता है तो उसको बहुत गुस्सा आता है .
पर उस प्रभु की महत्ता देखिये कि,
आज का मानव उस परमेश्वर की हर चीज़ पर अपना हक़ जताता है
पर प्रभु फिर भी मुस्कुराते रहते है
और अपने बच्चे पर कभी नाराज़ नहीं होता "

आदरसहित
अनिल

Bhola-Krishna ने कहा…

प्रिय अनिल बेटे , हमने जो गुरुमंत्र ३० वर्ष की अवस्था में पाया वो आप सब ३-४ वर्ष की उम्र से ही अपने जीवन में उतार चुके थे ! आज आपकी रहनी में ये सब सद्गुण रच बस गए हैं ! प्यारे प्रभु की कितनी कृपा है !