सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 27 अगस्त 2012

कलिकाल के ढोंगी 'गुरू'

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इस कलिकाल के ढोंगी 'गुरू' तो भारत के सभी देहातों, कस्बों, नगरों के सड़कों पर ,गली कूचों में, विद्यालयों में, वेश्यालयों में, सिनेमा घरों में, गैर कानूनी शराब उतारने वाली भट्टियों के आस पास ,गांजा अफीम क्रय विक्रय केन्द्रों के इर्द गिर्द ,नाना स्वरूपों में नाना प्रकार की वेश भूषा में , गीध के समान मंडराते तथा दिशाहींन पथ-भूले राही के समान भटकते हुए मिल जाते हैं
प्रियजन  अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ !

बलियाटिक हूँ और विधिना के विधान से मैंने अपना ग्रेजुएशन भी पूर्वी यू.पी. के , 'बी .एच. यू', वाराणसी [  तत्कालीन 'बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ] से किया था !! डंके की चोट पर कह सकता हूँ कि वाराणसी के घाटों पर ,वहाँ की पतली सकरी गलियों में .रिक्शे अथवा इक्के पर सवार होकर नगवा से गुदौलिया जाते समय मैंने कलिकाल के ऐसे 'गुरु'जनों की जितनी परिभाषाएं सुनीं,  जितने स्वरूप देखे उनको बयान कर पाना कठिन ही नहीं ,असम्भव है, 

एकाध फिर भी सुना ही देता हूँ !  

एक आध्यात्मिक सत्संग में गया जिसके जजमान एक धनाढ्य सेठ जी थे !  व्यास पीठ रिक्त होते ही सेठ जी उस् पर साधिकार आसीन हो गये [ क्यूंकि वह उनकी निजी सम्पत्ति थी उनकी अपनी आराम कुसी थी ] ! कुर्सी पर बैठ कर उन्होंने अपने अनेकों सेवकों में से एक को नाम से पुकारा , उत्तर न मिलने पर एक अन्य को निकट पाकर डपट कर बोले -

"क्यूँ 'गुरू' बहरे हो गये हो क्या ? " ! और फिर अपनी  नंगी टाँगें दिखाते हुए गुस्से से बडबड़ाये   "गुरूजी ! क्या अब हमे हाथ जोड़ कर बोलना पडेगा ? या स्टाम्प पेपर पर लिख कर देना पडेगा  , मेरी चप्पल उठाकर लाइये !" 

देखा आपने भारत में शिष्यों को चप्पल उठा कर पहनाने वाले 'गुरु' भी उपलब्ध हैं ! 

वाराणसी ही क्यूँ पूर्व के सभी प्रदेशों में यह "गुरु" सम्बोधन बहुत आदर से नहीं किया जाता है ! "गुरु"  शब्द के इस अवमूल्यन का एकमात्र कारण है इस 'कलिकाल' में दिखावटी ,धन के लोभी , व्यापारी प्रवृत्ति के सर्व दुर्गुण संपन्न "गुरुजन' का प्राकट्य ! तुलसी ने कहा ही था -

कलिमल  ग्रसे  धर्म   सब ,  लुप्त   भये    सदग्रंथ !
दंभिंन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किये बहु पंथ !! 
[ उ.का.- ९७ (क) ]

द्विज श्रुति सेवक भूप प्रजासन ! कोऊ नहिं मान निगम अनुसासन !!
मारग सोई जा कहुं जोई भावा  !  पंडित  सोई   जो   गाल    बजावा !!
मिथ्यारंभ   दंभ   रत     जोई   !  ता   कहुं    संत   कहइ   सब कोई !! 
सोई  सयान  जो  पर धन  हारी !  जो कर   दम्भ   सो  बड  आचारी  !!
जो  कह  झूठ   मसखरी   जाना !  कलियुग  सोई  गुनवंत    बखाना !!
निराचार जो  श्रुति पथ   त्यागी !  कलियुग सोई ज्ञानी  सो  विरागी !!
जाके   नख अरु जटा    बिसाला !  सोई तापस   प्रसिद्द  कलि  काला !! 
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  संत तुलसी दास द्वारा कलिकाल के ढोंगी गुरुओं की 
इस सार्थक परिभाषा के आगे अब कुछ कहने को बचा ही नहीं , ! 
और फिर हमसब तो इस कलिकाल में ऐसे दिखावटी गुरुजन को झेल ही रहे हैं !
यहीं यह प्रसंग समाप्त करता हूँ !

'सद्गुरु' के विषय में अगले अंक में प्रेरणानुसार कुछ लिखने का प्रयास करूँगा !  

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प्रियजन ! ऐसा लगता है कि पिछले कुछ दिनों से ,लुप्त हुई कहूँ या सुप्त हुई ?
 मेरी मनोभावनायें , 'मेरे प्यारे सद्गुरु' की आज्ञा-कृपा-दया से आज पुनः जागृत हो गयी हैं ! 
 गुरुजन आशीष दें , प्रियजन शुभकामनायें दें कि यह 'राम काम' संपन्न कर सकूँ !
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निवेदक : व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : डॉक्टर श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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