सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

संगीत शिक्षा - भाग ३

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स्वर से ईश्वर प्राप्ति 
प्रथम संगीत गुरु - जनाब उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां साहेब ( पद्म भूषण )
से प्राप्त मार्ग दर्शन 


संगीत शिक्षा पर अपना प्रथम सन्देश प्रेषित करने के बाद मेरे मन में  उठी हलचल के बीच मुझे मेरे 'प्रेरणा स्रोत' - "प्यारे प्रभु" का जो आदेश मिला उसका पालन करते हुए  अगली सुबह मैंने यहाँ "यू.एस. ए" से भारत - फोन लगाया !

मैं मुम्बई निवासी , अपने उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां साहब से यह जानना चाहता था कि मेरे द्वारा अपने ब्लोगर बंधुओं और अन्य संगीत प्रेमियों के बीच 'उनसे' - ('उस्ताद से) सीखे हुए 'अनमोल पाठ' का प्रचार करने में उन्हें कोई एतराज़ तों नहीं है साथ ही मैं उनसे एक बार 'कन्फर्म'  कर लेना चाहता था कि लगभग ५० वर्ष पहिले उनसे सीखे पाठ का वास्तविक अर्थ मैं ठीक से समझ भी पाया हूँ या नहीं !

बड़ी मुहब्बत के साथ उन्होंने हमसे बात की ! १०-१५  मिनट की इस बातचीत के दौरान भी उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी के अनुभूतियों में वर्णित उस महाकाशीय "शून्य" की चर्चा की जिसमे संगीत के सभी स्वर -श्रुति समेत समाहित हैं ! तत्पश्चात उनके बेटे उस्ताद मुर्तुजा खां से भी कुछ और जानकारी ली !

इस विषय में यह उल्लेखनीय है कि :


 मेरे आध्यात्मिक गुरु परम श्रद्धेय श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने मुझे 'नाम -दीक्षा सन१९५९ में दी थी ! जिस नाम का सतत सिमरन, मनन ,गायन तथा जाप करने की आज्ञां श्री स्वामी जी महाराज ने मुझे तब दी थी , मेरे संगीत के उस्ताद [ गुरु ]  गुलाम मुस्तफा खां  साहेब ने कुछ वर्ष पूर्व - १९५७ में उसी नाम के आधार पर , उसको ही षडज स्वर में उतार कर , उस् ध्वनि को ही अपनी नाभि से उद्भूत करने और उसको ही नींव का पत्थर मान कर अपनी कंठसंगीत की साधना का शुभारंभ करने की सलाह दी !


उनका कहना था कि परमात्मा के जिस स्वरूप पर तम्हे परम श्रद्धा हो, उस स्वरूप के नाम को अपना "षडज" मान कर , "सा" के स्थान पर उसे उच्चारित करो ! जैसे "ओम", "राम" , "अल्लाह" , "मौला" !  जितनी श्रद्धा-भक्ति  से तुम अपने इष्ट को पुकारोगे , उतनी ही सफल होगी तुम्हारी "स्वर साधना" ! रस प्रवाहित होगा ;तुम स्वयं उसमें डूब जाओगे !

आज से ५०-६० वर्ष पूर्व , उस्ताद ने किन शब्दों में मुझे अपना उपरोक्त आदेश दिया होगा वो तों आज मुझे याद नहीं है ! मैंने  अभी उनके आदेश में समाहित वह गूढ़ भावना जो मुझे तब ६० वर्ष पूर्व  तत्काल समझ में आई , उसे ही अपने शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है ! भूल चूक के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ !

मेरी उपरोक्त समझ पर , उसके सत्य होने का , उसकी प्रमाणिकता का ठप्पा १९८० -९० के दशक में लगा जब हमारे कानपुर के घर में एक रविवार के प्रातःकाल , "अमृतवाणी सत्संग" के समापन के उपरांत , हम सब के समक्ष अचानक ही उस्ताद जी अपने लाव लश्कर के साथ प्रगट हो गये ! अंग्रेजी में जिसे surprise देना कहते हैं , उन्होंने वही हम सब को दिया ! साथ में  थे उनके दो बेटे , उनका "हार्मोनियम" , तबले के साथ उनका  खास तबलची , तानपुरा , और उनका "स्वर मंडल" !

हमे विश्वास नहीं हुआ - लेकिन यह हुआ ! प्यारे प्रभु की कृपा से ऐसी घटनाएँ घटती ही रहतीं हैं !  उस प्रातः हमारे  राम नामी अधिष्ठान के सन्मुख उस्ताद ने जो मर्मस्पर्शी कीर्तन गाया वह था :

राम राम राम सीता राम राम राम

जय मीरा के गिरिधर नागर , सूरदास के राधेश्याम 
राम राम राम सीता राम राम राम
जय नरसी के साँवरिया तुम तुलसिदास के सीताराम
राम राम राम सीता राम राम राम  


 आप भी सुनिए,
30 - 40 वर्ष पूर्व घरेलू केसेट रेकोर्डर पर रिकोर्ड किया यह टेप बजते बजते 
अब बिलकुल घिस गया है ;लेकिन यह नामकीर्तन अभी भी अति प्रभावशाली है ! 

  



राम राम का कीजिये  आठ प्रहर उच्चार 
बाहर कामना त्याग के राम चरन मन डार
राम राम राम सीता राम राम राम 


चिंतामणि हरि नाम है सफल करे सब काम  
महा मंत्र मानो यही राम राम श्री  राम 
राम राम राम सीता राम राम राम  


दुःख दरिया संसार है, सुख का सागर राम,
सुख सागर चले जाइए दादू तज कर काम 
राम राम राम सीता राम राम राम


जय मीरा के गिरिधर नागर , सूरदास के राधेश्याम 
जय नरसी के साँवरिया तुम तुलसिदास के सीताराम
राम राम राम सीता राम राम राम 
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शायद आपको उस्ताद जी के इस कीर्तन गायन में कोई चमत्कार न महसूस हुआ हो ! पर राम नाम के उपासकों को विशेषतः स्वामी सत्यानन्द जी महाराज से नाम दीक्षा प्राप्त नामोपासकों  को इस कीर्तन में यह दोहा सुनकर अवश्य ही अत्यधिक आनंद आया होगा

चिंतामणि हरि नाम है सफल करे सब काम  
महा मंत्र मानो यही राम राम श्री  राम 





ये दोहा स्वामीजी महाराज के महान ग्रन्थ भक्ति प्रकाश से संकलित है ! उस्ताद  जी ने यह दोहा कहाँ सुना, कब सुना, किससे सुना और किस प्रेरणा से उन्होंने इसे अपने गायन में शामिल किया इस विषय में उनसे कुछ भी पूछना मेरे लिए कठिन है !

आप तों केवल यह देखें कि इस"बगुला भगत भोला" के दो गुरु, एक आध्यात्मिक गुरु तों दुसरे संगीत -कला के गुरु ,ने  एक ही मंत्र दिया -   राम नाम का , जिसके सतत जाप से "भोला" को सदा सदा के लिए चिंता मुक्त हो जाना था ! कितना हो सका ? राम जाने !

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा "भोला" श्रीवास्तव 
( प्रियजन , ध्यान रहे ,सहयोगी सर्वदा सहमत नही होते )
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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

संगीत शिक्षा - भाग २

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स्वर से ईश्वर तक 
"संगीत शिक्षा" 
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आप अचरज में होंगे कि आपके इस बुज़ुर्ग मित्र ने अपने पिछले अंक में अचानक ही पटरी बदल ली और "गुरुडम" के गुरुत्वाकर्षण से खिंच गये ! अब मेरी सुनिए ,मुझे ब्लॉग प्रेषित करने के बाद ,ऐसा लगा जैसे मेंरा मन सहसा किसी अनजानी ,अनचखी और  अनूठी संसारिक उपलब्धि के लालच में फंस गया था ! अपने इस कृत्य से मैं स्वयं आश्चर्यचकित और लज्जित भी हूँ ! मैं अभी समझ नहीं पा रहा हूँ कि कैसे मैं अनायास ही " संगीत गुरु " बनने का ढोंग रचा बैठा और बिना कुछ सोंचे समझे "संगीत शिक्षा "  की इस चर्चा को शुरू भी कर दिया !

शिक्षण-प्रशिक्षण का काम "गुरुओं" का है और यह केवल प्रशिक्षित ज्ञानी महापुरुषों को ही शोभा देता है ! मेरे जैसे 'अज्ञानी - अनाड़ी' व्यक्ति के लिए यह एक सर्वथा अनाधारिक एवं अनुचित चेष्टा है !

आप ही देखें , बिना कोई औपचारिकता निभाए हुए , बिना सम्बंधित व्यक्तियों की अनुमति प्राप्त किये मैंने वह कदम उठा लिया ?  गलती की हैं मैंने !  पर ---

आप जानते ही हैं कि मैं जो कुछ लिखता  हूँ ,उस "ऊपरवाले" के आदेश से और "उनकी" भेजी हुई प्रेरणा के आधार पर ही लिखता हूँ  ! पिछले अंक मैं क्या लिखा ? क्यूँ लिखा ? क्या सोंच कर लिखा ? आपके इन प्रश्नों का उत्तर भी समय आने पर "वह ऊपर वाले ही" मुझसे कभी न कभी लिखवा लेंगे !

इस समय भी "वह" मुझे "कुछ" करने की प्रेरणा दे रहे हैं , जो मैं शीघ्रातिशीघ्र कार्यान्वित करने जा रहा हूँ ! उस कार्यवाही का फल  क्या हुआ, सविस्तार अगली खेप में पेश करूँगा !
हो सकता है कि आपके सभी प्रश्नों का उत्तर उसमे मिल जाये !

आज मेरी उपरोक्त भावनाओं को मेरे प्रति सहानुभूति के साथ स्वीकारें , कृपा होगी !

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निवदक:-  व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग :- श्रीमती कृष्णा "भोला" श्रीवास्तव 
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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

संगीत शिक्षा

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स्वर साधना 

हमारे एक नाती [ Grand Child ] ने हमारे " जय शिव संकर औघड दानी" वाले ब्लॉग को देखने के बाद ,निमानंकित टिप्पडी की  :- 
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जयसीताराम नाना जी और नानी जी,,

सादर प्रणाम एवं चरणस्पर्श, 
राम राम 
आपका  शिवशंकर जी वाला भजन सुना..बोहोत ही सुंदर प्रेरणादायक प्रस्तुति है आपकी! धन्यवाद ! हम ठीक हैं..और रियाज़ भी चल रहा है थोडा थोडा.., एक समस्या है..जब हम ऊँचे सुर में होते हैं ..तो आवाज़ पे उतना control नहीं आता और vibration भी स्वयं आ जाती है..क्या करूं..?  नीचे सुर में अगर उसको गायें..तो मज़ा नहीं आता. .guide करिए. 
 
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यह सोंच कर कि उसकी टिप्पडी केवल मेरे भजन के शब्दों के विषय में है , मैंने उसे निम्नांकित  उत्तर दिया :-
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राम राम बेटा , यदि ब्लॉग में "स्माइली"  दिखा सकता तों वास्तविकता समझ में आती ! ये तों बताओ उत्तर कि  भजन सुन पाये या नहीं ? कृपया इस मेल के नीचे हमारे ब्लॉग का जो लिंक  दिया है , वहाँ क्लिक करो तों असली ब्लॉग खुल जायेगा और हमारे उस भजन का वीडियो भी तुम देख सकोगे ! एमेच्योर रेकोर्डिंग है , त्रुटियाँ हैं , --उन्हें इग्नोर करना ! तुम्हारा रिराज़ कैसा चल रहा है ? खाली समय का रियाज़ से अच्छा उपयोग और कोई नहीं है ! तुम सब खुश रहो ! रियाज़ के द्वारा भक्ति करो , और स्वर से ईश्वर को पा लो ! --- भोला नाना 

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उपरोक्त पत्र के साथ ही मैंने निम्नांकित पत्र भी प्रेषित किया :
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राजा बेटा ,राम राम  , "NO BIG PROBLEM "

जब १९५० के दशक में २०-२२  वर्ष की अवस्था में मैं ,अपनी छोटी बहन माधुरी को  जो तब १६ वर्ष की ही थीं ,आकाशवाणी लखनऊ में सुगम संगीत का प्रोग्राम कराने ले जाता था मेरी भेंट अपनी ही उम्र के एक उभरते शाष्त्रीय गायक  गुलाम मुस्तफा खां से हुई !  वह यू.पी के एक मशहूर संगीत घराने के हैं और आज वह पद्म भूषण से विभूषित हैं ! उन् दिनों १९५०-६० में हम अक्सर रेडियो स्टेशन पर मिलते थे ! 

मैंने एकबार गुलाम मुस्तफा साहेब से यही प्रश्न किया जो तुमने मुझसे आज पूछा है ! बात यह थी कि उस जमाने में सभी लडकियां "लता" ,और पुरुष "रफी" बनना चाहते थे ! माधुरी और मैं, हम दोनों भी इस रोग के  शिकार थे ! 

मुस्तफा साहेब ने जो नुस्खा दिया अगले पत्र में भेजूंगा ,  after knowing from you that you are seriously interested .गुरु मंत्र है ऐसे नहीं दिया जाता जब तक मन्त्र लेने वाला पूरी तरह तैयार न हो ! वैसे आज के लिए थक भी गया हूँ . More on hearing from U 
God Bless all of U  , 
LOVE
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मेरे उपरोक्त पत्र के उत्तर में उसने कहा :-
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"जी नानाजी , हम तैयार हैं..सुनने के लिए..आप  बताइए.". 
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शेष आगे के अंकों में 

निवेदक : व्ही . एन   .श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

शंकर शिव शम्भू साधु संतन सुखकारी

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"औघड दानी शिव" 

अपने इष्ट श्री राम के अमृत तुल्य मधुर नाम का  सतत जाप करने वाले भोलेभाले देवता 'शिव-शंकर' ने क्षीरसागर के मंथन से प्राप्त भयंकर विष, 'कालकूट' का सहर्ष पान किया पर उसे अपने कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया !  "कालकूट" यदि शंकर के उदर तक पहुंच जाता तों समस्त सृष्टि का ही विनाश हो जाता , न सुर बचते न असुर  !  यदि शिव   विषपान न करते तों दृढ हो जाता असुरों का अहंकार और  देवताओं तथा मानवता का कल्याण  और विपत्ति निवारण असंभव हो जाता !

इस " कालकूट-पान " से शंकरजी को न कोई पीड़ा हुई ,न कोई  कष्ट ,लेकिन उस विष के 'तेजाबी प्रभाव' और उससे उत्पन्न असह्य 'ताप' के कारण शंकरजी का कंठ नीला पड़ गया और उनका नाम पड़ा - "नील कंठ" !

शंकरजी के सतत नाम जाप ने उनके कंठ में ,'मरहम' का काम किया ! शीतल रामनामी  'गिफ्ट रेप' में लिपटा वह कालकूट विष भी शंकर को शीतलता प्रदान करता रहा !

शंकरजी की कंठ कोठरी में 'विष' तथा 'रामनाम' के उस मधुर मिलन ने उन्हें एक विशेष (विष + राम)  =  विश्राम , परमानंद युक्त विश्राम प्रदान किया ! यह वही "परम विश्राम" है जिसे रामभक्त तुलसीदास ने अपने इष्ट श्रीराम  की लवलेश कृपा से अनुभव किया  जिसके परमानंद में सराबोर-आत्मविभोर तुलसी आजीवन कहता रहा   - 

जाकी कृपा लवलेश सों मतिमंद तुलसीदास हूँ
   पायो परम विश्राम 'राम' समान प्रभु नाही कहूँ  !
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शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी     
सतत जपत राम नाम अतिशय शुभकारी  
Lord Shiva bestows His Grace & ; happiness upon all saintly devotees ..
HE constantly chants RAM NAM and  showers BLISS upon all
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आइये उस रामभक्त ,भोले शिवशंकर की वन्दना करें जिनके स्मरण मात्र से सभी साधू संत सुखी हो जाते हैं और जो  हजारों दिव्य नामों में सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरि 'राम नाम' का जाप  प्रतिपल - सतत करते  रहते  है !
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ओम नमः शिवाय + ओम नमः शिवाय + ओम नमः शिवाय  


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे 
सहस्त्र नाम त तुल्यम राम नाम वरानने
(A shloka from "RAM RAKSHAA SROTAM"  
बुद्ध कौशिक' रचित 'राम रक्षा' स्रोतम से एक श्लोक)

  रामनाम मधुबन का भ्रमर बना मन शिव का ,
निश  दिन  सिमरन  करता नाम  पुण्यकारी !!
In the divine 'Garden of Ram Nam', Lord Shiva freely moves about like a honey Bee humming  restlessly the holy name of HIS master - "SRI RAMA" 



शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी     
सतत जपत राम नाम अतिशय शुभकारी  

Lord Shiva bestows immense pleasure and happiness to saintly beings
HE chants the holy name of  SRI RAMA constantly.

लोचन त्रय अति विशाल , सोहे नव चन्द्र भाल 
रुंड मुंड ब्याल माल , जटा गंग धारी 
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी 

Lord Shiva has three large beautiful eyes , HE is crowned with a 
bright celestial crescent moon on his forehead and dons Garlands of human skulls 
and a shiny hooded serpent around His body. The heavenly river 
Ganges rests in the thick matted locks of hair piled over His head.

पारबती पति सुजान,प्रमथराज वृषभ यान
सुर नर मुनि सैव्यमान त्रिविध ताप हारी 
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी

Lord Shiva is the learned husband of Parbatii and sole master & mentor of 
His devotees and followers . He is worshipped & served by All beings 
including those blessed with divinity . In return HE relieves his devotees 
of their all worldly miseries ,pains and problems .

औघड़दानी महान ,कालकूट कियो पान  
आरतहर तुम समान को है त्रिपुरारी 
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी

Whimsically Generous Lord Shiva is a temperamental Giver of Alms .
To save Devas from peril  HE drank the 'Kaalkuutt' poision .

O. Lord Shiva , NO ONE in this universe is as kind and merciful as You are 
 शब्द एवं स्वरकार - गायक -  भोला 
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A NOTE : -  This SHIVA BHAJAN written composed and sung by BHOLA and family in early 19 sixties was recorded by Hindustan Star Co. in India .
  Incidentally this song became the SIGNATURE TUNE 
for the HINDI programmes of RADIO SURINAM of West Indies . 
This  Bhajan was  very popular with overseas Indians in early 1960s and 70s. 
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निवेदक : व्ही . एन . श्रीवास्तव 
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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