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आज का आलेख

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

बचपन की पहचान - 'स्वामी विवेकानंद जी' - फरवरी १७,'१३

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 श्री गुरुवे नमः 
तीस दिसंबर २०१२ का छूटा हुआ आलेख जो आज प्रकाशित हो रहा है 

स्वामी विवेकानन्द जी
[गतांक से आगे]

 यह प्यारे प्रभु की कृपा है अथवा चमत्कार 
कि इन दिनों अपने जन्म के ८३-८४  वर्ष बाद मुझे एक बार फिर
'विश्वगुरु' स्वामी विवेकानंद जी की याद आई
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आइये इस प्रसंग से सम्बन्धित अपनी 'आत्म कथा' का एक अंश सुनाऊँ 
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बहुत छोटा था, १९३४-३५ की बात है ! मैंने शायद उन्ही दिनों होश सम्हाला होगा ! तभी एक "समर वेकेशन" बिताने के लिए हम " बलिया सिटी " स्थित अपने पूर्वजों के घर  "हरवंश भवन" गये 

शायद आज बहुत लोगों को नहीं याद होगा कि यह ,'बलिया' यू.पी .के सुदूर पूर्व का वह पिछडा जिला है,किसी जमाने में जहां के निवासियों को "बलियाटिक" नाम देकर उनका खूब मजाक उडाया जाता था !  केवल भारत में ही नहीं वरन समस्त विश्व में भारत के ये कुख्यात "बलियाटिक" जन, "महामूर्ख" समझे जाते थे ! [ परन्तु वास्तविकता कतई ऎसी नहीं थी ]

भैयाजी ! सत्य तो यह है कि "बलिया" की धरती पर अनेक ऐसे प्रतिष्ठित महापुरुष अवतरित हुए जिनका लोहा समस्त विश्व ने समय समय पर माना ! '
बलियाटीकों' की   इस नामावली में अनेक देशभक्त और जाने माने वैज्ञानिक ,गणितशास्त्री आदि महापुरुष शामिल हैं!

सर्वप्रथम देशभक्तों का उल्लेख करूँगा ! १८५७ में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मेरठ की फ़ौजी छावनी में बगावत की पहली चिंगारी प्रज्वलित करने वाले वीर सेनानी "मंगल पांडे" इसी बलिया जिले के थे !  

'महात्मा गांधी' के अगस्त १९४२ के "अंग्रेजों भारत छोडो" आंदोलन में ,इन बलियाटीकों ने ही ब्रिटिश शासकों को  लोहे के चने  चबवा दिए थे ! उन दिनों जब सारा भारत  अंग्रेजों के आतंक से थर्रा रहा था इन बलियाटीकों ने वीर चीतू पांडे के नेतृत्व में ,कुछ दिनों के लिए ब्रिटिश दासता की जंजीर तोड़ दी थी और बलिया की कलक्टरी पर से ब्रिटिश "यूनियन जेक" उतरवाकर गांधी का विजयी विश्व प्यारा तिरंगा फहरा दिया था ! उन्होंने कुछ समय के लिए बर्बर अंग्रेजी हुकूमत से अपने जिले को पूर्णतःस्वतंत्र करवा लिया था !  बलिया जेल से सभी राजनेतिक कैदी रिहा कर दिए गये थे ! अब तो ये बातें  शायद ही किसी को याद हो !, 

एक और बात याद आ रही है :  पुनः बलिया पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए ,यू.पी. के तत्कालीन गवर्नर सर मौरिस हेलेट नें भयंकर बारूदी शक्ति प्रयोग करके  सीधेसाधे निहत्थे अहिंसक बलियावासियों पर भयंकर ज़ुल्म तोड़े और बलिया की सत्ता पुनः वापस पाई ! इसका ज़िक्र शायद ही इतिहास की पुस्तकों में हो ! 

बलियावालों की शूरवीरता का अंदाजा आप इससे ही लगा सकते हैं कि इस गवर्नर ने  बलिया पर पुनः सत्ता स्थापित कर लेने के बाद बड़े गर्व से  ब्रिटिश साम्राज्ञी को 'तार' द्वारा सूचित किया था कि "ब्रिटिश फौजों ने बलिया को पुनःजीत लिया "! उस तार की शब्दावली कुछ ऎसी  थी, " Ballia Reconquered"! इस वाक्य से ही आप समझ गये होंगे कि उस बर्बर अंग्रेजी शासक  के मन में इन बलिया वासियों  से कितनी दहशत थी ! ये बात भी कदाचित अब तक हम सब पूरी तरह भूल चुके हैं ! 

बलिया मे जन्मे महापुरुषों की नामावली बहुत बड़ी है -देशभक्त मंगलपांडे  और चीतू पांडे के अलावा जो नाम अभी मुझे याद आ रहें हैं वे हैं - श्री जय प्रकाश नारायन , श्री राजेन्द्र प्रसाद जी ,चंद्रशेखरजी तथा विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ  गणेशी प्रसाद जी ! आज भी विश्व की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटियों में बलिया से सम्बन्धित अनेक 'साइंटिस्ट' वैज्ञानिक शोध कार्यों में लगे हैं और अति महत्वपूर्ण अनुसंधान कर रहें हैं ! 

अपनी मात्र भूमि का गुण गान यहीं छोड़ मैं स्वामी विवेकानंद सम्बन्धी अपनी आत्म- कथा आगे बढाता हूँ :-

हा तो १९३४ -३५ में बलिया पहुँच कर ,खानदानी कोठी "हरवंश भवन" में अपने ताऊजी के बड़े बेटे की बैठक की दीवारों पर करीने से लटकी तस्वीरों के बीच हमे दो ऎसी तस्वीरें दिखीं जो न तो हिंदू देवी देवताओं की थीं और न हमारे पूर्वजों की ! 





उनमे से एक "ब्लेक एंड  व्हाईट"' तस्वीर थी ! वह एक अति साधारण से मटमैले परिधान में लिपटे अर्धनग्न ग्रामीण ,बढी हुई दाढी और आधी मुंदी आँखों वाले किसी कृशकाय पुरुष की थी ! क्षमा प्रार्थी हूँ , उस समय ६ - ७ वर्ष की अवस्था में जब मुझे दुनिया जहांन का कोई ज्ञान नहीं था मुझे आश्चर्य हुआ था कि कानपूर के  हमारे घर के रसोइये मोतीतिवारी का चित्र वहाँ क्यों लगा था ?  प्रियजन ,चित्रित व्यक्तित्व इतना साधारण था ! वर्षों बाद जाना कि उस साधारण व्यक्तित्व का सूक्ष्माकार कितना दिव्य एवं चुम्बकीय आकर्षण युक्त था ! वह चित्र परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव जी का था !

दूसरा वाला चित्र रंगीन था ! बड़ा ही मनमोहक , किसी देव पुरुष के समान आकर्षक व्यक्तित्व वाले ,बड़ी बड़ी तेजस्वी आँखों से हर देखनेवाले को निहारते गेरुआवस्त्र धारी किसी सन्यासी का ! 
उस नन्ही उम्र में भी वह चित्र देखते ही मेरा मन उस चित्रित व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित हो गया था !  वह चित्र था स्वामी विवेकानंद का !



                                             


बहुत छोटा था , ५ - ६  वर्ष का ,कानपूर पहुँच कर उन दोनों महात्माओं के चित्रों को बिलकुल ही भूल गया !  यहाँ ,  बड़े भैया के कमरे की दीवारों पर 'अछूत कन्या' फिल्म के 'अशोक कुमार - देविका रानी' और देवदास के 'कुंदन लाज सैगल और उनकी पारो तथा चन्द्रवती  [ हीरोइनों के नाम नहीं याद आ रहे हैं ] के चित्र लगे थे ! यहाँ "बालम आय बसों मेरे मन में"  तथा "तडपत बीते दिन रैन" का रियाज़ चलता था ! मैं भी उसी रंग में रंगता गया ! छोडिए  भी इन बीती -बातोंको ---

समय बीतता रहा ! मैं  बढ़ते बढ़ते  २२-२३ वर्ष का होगया ! १९५० में , बनारस हिंदू  यूनिवर्सिटी से बी.एससी. [इंड.केम] की डिग्री प्राप्त करके आजीविका कमाने के चक्कर में पड़ गया ! 

अब आगे की कथा सुनिये कि 'गदह पचीसी' में ,जब नवयुवकों को बर्बाद करने के लिए ,अनेकानेक सांसारिक प्रलोभन  बांह फैलाए खड़े रहते हैं , मैं कैसे बाल बाल बचता रहा !

प्रियजन उस अवस्था में प्यारे प्रभु ने ही मेरी रक्षा की ,एक बार पुनः मुझे  परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव तथा स्वामी विवेकानंद जी की याद  दिलाकर :

ब मुश्किल तमाम उस जमाने में मुझे सरकारी नौकरी मिल ही गयी !  भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की एक 'आयुध निर्माणी' में "नोंन गजेटेड  ऑफिसर - अंडर ट्रेनी " की ! इस केन्द्रीय संस्थान का हेड ऑफिस कलकत्ते में था अस्तु जैसा होता है इस कार्यालय  में मेरे साथ काम करनेवाले  अधिकतर  "कलीग्ज़" और "बौसेज़" -'सोनार बांग्ला' के मूल निवासी थे ! 

दफ्तर के उस 'लघु बंगाल' में, दिन के ९  घंटे केवल बांग्ला , हाँ केवल बांग्ला भाषा के 'लिंग भाव से मुक्त'  सम्वाद सुनने को मिलते थे ! "क्या भोला सा --- आज चाय नहीं खिलाएगा ? आज के तोमार चास आचे " !  स्वाभाविक है , तब मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था ! हिन्दी प्रदेश में दिन भर बंगला सुनना - लेकिन कष्ट की बात  छोडिये  मुझे उन  बंगवासी मित्रों की संगत से कुछ बड़े लाभ भी हुए जिन्हें मैं  आज अपने ऊपर 
की हुई अपने प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा ही मानता  हूँ !

लगभग ये सभी सहकर्मी बंधू मुझसे उम्र में काफी बड़े थे और इत्तेफाक से सभी परम 'आस्तिक' भी थे ! इनमे से कोई मा जगदम्बिके भवानी का , कोई माँ दुर्गा का,कोई माँ काली और कोई चैतन्य महाप्रभु तथा मा आनंदमयी का भक्त और उपासक था !  

हमारे इमीडीएट बोस श्री  मित्रा , परमहंस ठाकुर राम कृष्ण देव तथा स्वामी विवेकानंद जी के परम अनुयायी थे ! उन्होंने मुझे आर .के .मिशन द्वारा प्रकाशित अन्य ग्रंथों के साथ साथ 'गोस्पेल्स ऑफ रामकृष्ण" नामक इंग्लिश किताब पढ़ने को दी ! इन पुस्तकों के पढ़ने से ,परमहंस जी के अनेक ऐसे उपदेश मेरे सन्मुख आयेजो तत्क्षण ही मुझे भा गये और मैंने उन उपदेशों को पत्थर की लकीरों के समान अपने जीवन में उतार लिया !  उनमे से कुछ सूत्र जो मुझे अभी भी याद हैं  ,वे हैं  :-

  • अनहोनी प्रभु कर सके ! होनहार मिट जाय !! [सब हो सकता है ! कुछ भी असंभव नहीं , अपने कर्म, पूरी तन्मयता से करते रहो !]
  • जैसे समुद्र में रत्न हैं वैसे ही ईश्वर संसार में व्याप्त है ! [तत्परता से उसे खोजो वह , मिल जायेगा !!]
  • कीजिए ध्यान कोने में , वन में या मन में ! [कहीं भी ध्यान लगाओ  तुम्हे "प्रभु"  अवश्य मिल जायेगा !!]
  • एक ही प्रभु यहाँ "कृष्ण" बन कर अवतरित हुए और वहाँ "ईसा" बन कर !![दोनों ही पूज्यनीय  है , वन्दनीय हैं , आराधनीय हैं , किसी को कम न समझो !!]
  • आध्यात्म का लाभ ह्रदय की शुद्धता से होता है !! [अपना मन साफ़ रखो ! स्वच्छ आईने में सब कुछ साफ़ साफ़ दिखेगा - तुम अपना "सत्य" स्वरूप देख लोगे !!]

प्रियजन ,ठाकुर के दो आदेश जिनके अनुकरण ने मुझे  अत्यंत लाभान्वित किया ,वे थे  
" पर-चर्चा निषेध " - " पर-छिद्रान्वेषण निषेध "!
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शेष अगले अंक में 
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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4 टिप्‍पणियां:

  1. शालिनी जी ,
    जो 'वह' हमसे लिखवाते हैं वह हम लिख देते हैं और तभी तक लिख पायेंगे , जब तक "वह" हमे "डिक्टेट" करते रहेंगे ! बेटा , आप समझदार है जानती ही हैं कि :
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    हम 'मरकट' हैं,नचा रहा वह "चतुर मदारी" हमको ,
    नाचें जायेंगे, जब तक "वह" नचवायेगा हमको !!
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    बोलें सच', 'प्रिय वचन', 'काम' के, रहें सदा ही शरण "राम" के !!
    निर्भयता से कर्म करें हम, फल की चिंता नहीं करें हम !!
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    हमारा स्नेहिल आशीर्वाद स्वीकारें

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