सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

बुधवार, 10 जुलाई 2013

गुरु कृपा से - "मन मंदिर में राम बिराजें"- ( भाग २ )

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हे स्वामी !
कुछ ऎसी युक्ति करो कि, 
मेरे मन मंदिर में ,  कृपा निधान , सर्व शक्तिमान, 
एकैवाद्वितीय , परमपिता परमात्मा की 
ह्रदयग्राही ,मनोहारी मूर्ति सदा सदा के लिए 
स्थापित हो जाय  !"
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कृपा करो श्री राम , हम पर कृपा करो !
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी 
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दो जुलाई से ही "श्री राम शरणम" सम्बन्धी "स्मृतियों" का रेला मेरे मन को झकझोर रहा है !

इस बीच अज्ञात सूत्रों से प्रेरणात्मक सन्देश मिला कि " प्यारे , लगता है तुम भटक गये ! उदाहरणों द्वारा जिज्ञासु साधकों को भगवद-प्राप्ति की सरलतम राह ,जिस पर चल कर तुम्हारे जैसा एक अति साधारण व्यक्ति भी "परमानंद स्वरूप एकैवाद्वितीय परमेश्वर" के साक्षात दर्शन कर सके सुझाने की जगह तुम आध्यात्म की जटिल पेचीदगियों में उलझ गये !

प्रियजन आपको याद होगा , गुरुजन के दिव्य आदेश से "महाबीर बिनवौ हनुमाना" की श्रंखला लिखने का मेरा एकमात्र उद्देश्य यही था ! लगता है सचमुच मैं भटक ही गया था ! अस्तु आत्मानुसंधान हेतु अपनी निजी आध्यात्मिक यात्रा  पर एक विहंगम दृष्टि डाल रहा हूँ !

१९५७ -५८ में  पहली बार पूज्यनीय "बाबू" (श्री शिवदयाल जी - एडवोकेट सुप्रीमकोर्ट)  की शुभ प्रेरणा  एवं आशीर्वाद से, मेरे मन में , सदाचार एवं भजन गायन' के "सहज योग" से 'प्रेम भक्ति मार्ग'' पर अग्रसर हो कर परमानंद स्वरूप "राम" मिलन की चाहत का "बीज"आरोपित हुआ !  

पूज्य बाबू के शुभ आशीर्वादीय प्रयास से मुझे १९५९ में , मुरार के डॉक्टर बेरी के निवास स्थान पर, 'मेरे प्रथम एवं अंतिम आध्यात्मिक मार्ग दर्शक' प्रातःस्मरणीय गुरुदेव परम पूज्यनीय श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के प्रथम दर्शन हुए और तभी मुझे उनके साथ बिलकुल एकांत में बैठने तथा उनके चरण कमलों को अपलक निहारने का सुअवसर मिला  ! 

स्वामीजी महाराज के श्री चरणों से निर्झरित गंगा यमुनी अमृत धारा के पवित्र जल ने उस बीज को सींचा और कुछ समय उपरान्त गुरुदेव श्री प्रेमजी महाराज के "प्रेमालिंगन" द्वारा वह नन्हा "प्रेम भक्ति "' का बीज भली भांति अंकुरित हुआ !

कालान्तर में "प्रेम भक्ति" का वह नन्हा बीज विकसित होकर कितना हरिआया ;कितना फूला फला ;उसका अनुमान इस निवेदक दासानुदास का अंतर मन ही लगा सकता है ! रसना अथवा लेखनी के द्वारा उसकी चर्चा कर पाना कठिन ही नहीं,असंभव है  ! 

'असंभव है' , यह सत्य जानते हुए भी मैंने अपनी आत्म कथा में अनेको बार उपरोक्त घटनाक्रम के रोमांचक क्षणों की मधुर स्मृतियों को बयान   करने का प्रयास किया है ; किसी अहंकार से नहीं वरन इस स्वार्थ से कि मुझे आज भी उन मधुर पलों की स्मृति मात्र से रोमांच हो जाता है ; वर्षों पूर्व के वे अविस्मृत .चिरंतन दृश्य मेरे सन्मुख जीवंत हो उठते हैं !गुरुजन के आशीर्वाद से मुझे पुनः उस "नित्य-नूतन- रसोत्पाद्क"दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है ! 

आज ९ जूलाई को इस पल भी मुझे कुछ वैसा ही अनुभव हो रहा है ! मैं रोमांचित हूँ , गद गद हूँ ! "जय गुरु देव जय जय गुरुदेव"! 

चलिए आगे बढ़ें - जालंधर के साधक - मेरे परम स्नेही श्री नरेंद्र साही जी, श्री केवल वर्मा जी एवं श्री प्रदीप तिवारी जी के आग्रह पर शायद 1980 के दशक के मध्य में मुझे AIIMS New Delhi में कार्यरत डॉक्टर विश्वामित्र महाजन के प्रथम दर्शन का सौभाग्य मिला था ! जालंधर के ये तीनों साधक डॉक्टर  महाजन की आध्यात्मिक ऊर्जा से पूर्व परिचित थे ! 

"एम्स" में उनसे हमारी यह भेंट क्षणिक ही थी ! ये समझें कि उस भेंट में मैं केवल उनके आकर्षक सौम्य स्वरूप का मात्र दर्शन ही कर सका था !  उन्होंने भी काम करते करते ही हम सब से थोड़ी सी औपचारिक वार्ता की थी ! डॉक्टर साहेब ने ,यह लोकोक्ति कि "अनुशासित राम भक्त काम के समय केवल काम ही करते हैं" चरितार्थ की थी ! इस प्रकार उस प्रथम भेंट में सच पूछें तो डॉक्टर साहेब से हमारी केवल राम राम ही हो पाई थी ! जो भी हो , मेरे तथा गुरुदेव विश्वामित्र जी के अटूट सम्बन्ध की वह प्रथम कड़ी थी ! अब् आगे की सुनिए :

 ९० के दशक में मेरे  'सेवानिवृत' हो जाने के बाद  हम दोनों बहुधा कानपुर के अपने स्थायी निवास स्थान से बाहर अपने बच्चों के पास  देश -विदेश में रहते थे ! हम कभी माधव के पास दिल्ली ,देवास अथवा अहमदाबाद में रहते , कभी राघव के पास नासिक में, कभी प्रार्थना के पास जहां कहीं वह रहती थी और कभी श्री देवी के पास पिट्सबर्ग में अथवा रामजी के पास यूरोप  , इजिप्ट अथवा, यू .के.  में लम्बे प्रवास करते थे ! 

इस बीच एकदिन जब हम कहीं विदेश भ्रमण के बाद प्रार्थना के पास जम्मू पंहुचे तब उसने बताया कि उसके पास जालंधर से अनेक फोन आ रहे थे ! बड़ी हंसोड़ है हमारी यह छोटी बेटी औरो को छोडिये वह कभी कभी मुझे भी नहीं छोडती ! मुझे चिढाते हुए उसने कहा, 

"क्या बात है पापा आजकल तो आप  'हॉट केक' बन गये हैं ! बड़े 'डिमांड' में हैं ! आपको आपके जालंधर के Fans  बडी बेताबी से याद कर रहे हैं ! हर जगह कोशिश करके जब वो हार गये तो कहीं से मेरा फोन नम्बर पता कर के उन्होंने कई बार मुझसे बात की ! बहुत पूछने  पर उन्होंने बताया कि वे आप को कोई बड़ी Surprise  देना चाहते हैं ! वे आपको जल्द से जल्द जालंधर बुला रहे हैं !"     

कथानक लंबा हो रहा है अस्तु आज यहीं तक , --- शेष कथा बाद में ,जब कभी प्रेरणा होगी !


अभी, गुरुवर विश्वामित्र जी महाराज को अतिशय प्रिय भजन - 
"मेरे मन मंदिर में राम बिराजें " 
की अंतिम पंक्तियाँ सुन लीजिए 
तथा मेरे गुरुजनों के दर्शन कर जीवन धन्य कीजिए !
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मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी 
अधिष्ठान मेरा मन होवे जिसमे राम नाम छवि सोहे ,
आँख मूंदते दर्शन होवे , ऎसी जुगति करो हे स्वामी 
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी


राम राम भज कर श्री राम , करें सभी जन उत्तम काम .
सबके तन हों साधन धाम , ऎसी जुगति करो हे स्वामी 
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी

आँखें मूंद के सुनूँ सितार, राम राम सुमधुर झंकार 
मन में  हो अमृत संचार , ऎसी जुगति करो हे स्वामी ,
मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी

मेरे मन मंदिर में राम बिराजें ऎसी जुगति करो हे स्वामी
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महाराज श्री , 
उस दिन , यू एस ए ,के खुले सत्संग में 
आपकी इच्छा पूर्ति न कर सका था !
आज प्रयास किया है , अवश्य सुनोगे , विश्वास है !
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निवेदक : दासानुदास आपका "श्रीवास्तव जी" (भोला)
हार्दिक सहयोग : आपकी आज्ञाकारिणी - "कृष्णा जी" 
 - एवं  अज्ञेय -
 वे सभी साधक जिनकी कलाकृतियों ने इस भजन को सजाया है 
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