सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन (English और हिन्दी में)

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Swami Vivekanand 
Valuable Quotes
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स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन 
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1.  Arise, awake and stop not till the goal is reached.

१  उठो, जागो, [आगे बढ़ो] और उस क्षण तक न रुको जब तक तुम लक्ष्य तक पहुच न जाओ ! [जब तक तुम्हारा कार्य सिद्ध न हो जाये] !
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2   Come up, O lions, and shake off the delusion that you are sheep; you are souls immortal, spirits free, blest and eternal; ye are not matter, ye are not bodies; matter is your servant, not you the servant of matter.

२. शेरों आओ ! अपनी यह भ्रान्ति सदा के लिए मिटा दो कि तुम भेड बकरी हो ! केवल यह याद रखो कि तुम एक "अमर आत्मा" हो !  तुम पूर्णतः स्वतंत्र हो !  तुम्हारे ऊपर ,"प्यारे- प्रभु" की असीम कृपा है और उनकी ऎसी कृपा तुम पर सदा सर्वदा बनी रहेगी ! तुम स्थूल आकारधारी कोई 'जड़ पदार्थ' नहीं हो ! तुम 'देह' नहीं हो ! प्रभु ने संसार के सभी पदार्थ  तुम्हारे उपयोग के लिए बनाये हैं ! ये सब पदार्थ तुम्हारी सेवा करने के लिए हैं ! ये सब तुम्हारे सेवक हैं ! मानव तुम इन पदार्थों के गुलाम न बनो !
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3: All the powers in the universe are already ours. It is we who have put our hands before our eyes and cry that it is dark.

३. हमारे पास [मानव के पास] सृष्टि की समग्र शक्तियाँ विद्यमान है ! हम स्वयम अपने हाथों से अपनी आँखें मूंदे , रो रहें हैं कि सर्वत्र अन्धकार ही अन्धकार हैं !
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4.. As different streams having different sources all mingle their waters in the sea, so different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to God.

जैसे जल की विविध धाराएँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकल कर अन्ततोगत्वा एक दूसरे से गले लगती हुईं सागर में समा जातीं है वैसे ही विभिन्न धर्मों  की अलग अलग प्रवृत्तियाँ [जो बाहर से देखने में एक दूसरे से बहुत विलग लगती हैं ] ,वास्तव में अपने अनुयायियों को केवल "एक" परम सत्य -"परमात्मा" की ओर ही ले जाती हैं ! 
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5. All differences in the world are of degree and not of kind because ONENESS is the secret of everything .

बाहर से दिखने वाली संसार और संसारियों के बीच की सभी   विसंगतायें केवल "परिमाण" सम्बन्धी हैं , quantitative है ! वास्तव में इनमे कोई "गुण- भेद" है ही नहीं ! सभी धर्म , अपने अपने ढंग से मानव को अपने धार्मिक "इष्ट" तक  पहुचने के लिए उनके अपने निर्धारित मार्ग बताते हैं ,और उन्हें  वहाँ तक पहुचा भी देते हैं  ]  (चाहे जो भी नाम हो उनके "इष्टदेव" का ,'राम'  हो','शिव' हो अथवा 'श्याम', 'अल्लाह' या 'ईसा' अथवा कुछ भी हो )  


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6.   The more we come out and do good to others, the more our hearts will be purified, and God will be in them.

हम जितना बाहर निकलें और दूसरों का भला करें ,उतना ही हमारा ह्रदय शुद्ध होगा और हमारा प्यारा प्रभु हमारे निर्मल  ह्रदय मे निवास करेगा !
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7.    The world is the great gymnasium where we come to make ourselves strong.

संसार वह व्यायामशाला [जिम्नेशियम] है जहां हम [सब मनुष्य] शक्तिशाली बनने के लिए आते हैं !
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8.  You cannot believe in God until you believe in yourself.

८. बिना अपने आप में विश्वास किये तुम प्रभु में विश्वास नहीं कर पाओगे !
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9.  Truth can be stated in a thousand different ways yet each one can be true.

९. कोई भी सच्ची बात हजारों , अलग अलग ढंगों से बयान की जा सकती है ! लेकिन उस बात की सच्चाई बदलती नहीं  है ! अनेकों ढंग से बयान करने पर भी वह "एक' सत्य' सदा सत्य ही रहता है ! [सत्य सनातन है] 
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10.   Condemn none . If you can stretch out a helping hand , do so.

१०. किसी को निरर्थक न मानो ! यदि तुम अपनी बाहें फैला सकते हो तो दूसरों की सहायता के लिए आगे बढ़ो !
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11.  If you cannot fold your hands , bless your brothers and let them go their own way.

११. यदि तुम अपने हाथ नहीं जोड़ सकते  तो उन्हें ऊपर उठाकर अपने भाइयों के लिए दुआ मांगो और उन्हें उनके अपने रास्ते पर आगे बढने दो !
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12.  In  one word, the ideal is that "You are Divine" 

१२ .एक शब्द में बताऊँ कि आप क्या हैं ? "आप दिव्य हैं"
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13.  If money helps  a man to do good to others, it is of some value; but if not, it is simply a mass of evil, and the sooner it is got rid of, the better.

१३. 'सम्पत्ति' यदि मनुष्य को 'परोपकार' करने की प्रेरणा दे, तो वह सार्थक है ! परन्तु यदि  ऐसा नहीं हो तो वही सम्पत्ति कूडे के ढेर के सदृश्य निरर्थक है और शीघ्रातिशीघ्र उससे छुटकारा पा लेना ही हितकर है !
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क्रमशः 
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सूचना 
उपरोक्त अंग्रेजी भाषा के quotes , स्वामी विवेकानंद जी के जीवन सम्बन्धी 
प्रकाशित साहित्य से लिए गये हैं !
सम्भव है भाषा शास्त्रियों  को हमारा उन अंग्रेजी सूत्रों का हिन्दी अनुवाद 
अक्षरशः सही  न लगे !
 प्रियजन हमने अपने सामर्थ्य अनुसार तथा गुरुजन से प्राप्त प्रेरणा के सहारे उन सूत्रों में व्यक्त स्वामी जी के  विचारों को हिन्दी में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ! 
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद -गतांक से आगे - २४/१/'१३

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स्वामी विवेकानंद जी का
सत्य सनातन - "मानव धर्म"
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मनुष्य द्वारा दृढ़ विश्वास से किये गये वे दृढ़ निश्चय ,उसके वे व्रत ,उसके वैसे सुकर्म जिन्हें कार्यान्वित करने से [ धारण करने से ] उसके आत्मा का ,उसके मन का ,उसके तन का,उसके परिवार का , समाज का और जाति तथा उसके देश तक का रक्षण और पालन हो सके वे सब "धर्म" कहे गये हैं !

मनुष्य द्वारा धारण किया हुआ जो धर्म मनुष्य को पाप से, पतन से बचाए, उसके जीवन को उन्नत करके उसमे ,धीरज , साहस, उत्साह उत्पन्न करे , उसको परिश्रमी , पुरुषार्थी बनाये और उसके पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन को सुंदर, सुदृढ़ और सुमधुर बना सके वही "सत्य सनातन" - "मानव धर्म" है !

परन्तु विगत शताब्दियों से --     

विश्व के लगभग सभी सम्प्रदायों -पंथों के अधिकाँश धर्मानुयायी अज्ञानतावश, उनके धार्मिक सम्प्रदायों में प्रचलित 'कर्मकांडों' को ही "धर्म" की संज्ञा देने लगे हैं जब कि  वास्तव में ये सभी धार्मिक कर्मकांड उनके सांप्रदायिक अनुयायीयों को "इष्ट" तक पहुँचाने के विभिन्न मार्ग हैं ! ये उन्हें उनके इष्ट से मिलाने के साधन मात्र हैं !  

प्रियजन ,औरों की छोड़िये,विश्व की सबसे पुरातन मानवीय संस्कृति की संतति "हम" सब भारतीय भी आज सर्वाधिक ग्रसित हैं इस भ्रामक  मानसिकता से ! कितने  दुःख की बात है कि हजारों वर्ष पहले ,मानवता को "तमसो मा ज्योतिर्गमय"का उपदेश देने वाले "हम"आज भी अज्ञानता के इस अंधकूप में पड़े अपनी जगहंसाई करवा रहें हैं ! 


धर्म विषयक अब हमारी आत्म कथा सुन लीजिए !  

बचपन में ,रर्विवार अथवा पूर्णमासी को घर पर ही आयोजित श्री सत्यनारायण भगवान की कथा में बैठना और समाप्ति तक बिना प्रसाद ग्रहण किये न उठना हमारा धर्म था


इच्छा वा अनिच्छा से ,अपना बाँयाँ हाथ सिर पर रख कर, कथावाचक पंडित जी से, माथे पर रोली चन्दन का टीका लगवाना और दाहिने हाथ की कलाई में रक्षा सूत्र बंधवाना हमारा धर्म था

कथा में शतानंद ब्राह्मण और साधू बनिये,उनकी धर्मपत्नी लीलावती तथा चन्द्र कला  के समान आकर्षक रूपवती उनकी पुत्री  कलावती के जीवन के उतार चढाव के दुखद-सुखद प्रसंगों को शांति पूर्वक सुनते रहना और प्रत्येक अध्याय  की समाप्ति पर घंटा शंख बजाना और जोर जोर से "सत्यनारायण भगवान" की जय बोलना हमारा धर्म था   
और कथा की समाप्ति पर ,कुल्हड भर कर सरस पंचामृत पीना और जी भर कर गर्म गर्म देशी घी से बने "हलुए" का प्रसाद पाने के साथ ही हमारे उस बालपन के "धर्म" की सीमा समाप्त हो जाती थी !

ऐसा होता था कि ------ 

सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने के तुरंत बाद ही  परिवार के सदस्य  तथा आगंतुक सभी इष्ट मित्रगण , अपने अपने मनोरंजक कार्यक्रमों में व्यस्त हो जाते थे ! पिताजी के साथ ताश खेलने बैठे उनके मित्र -[चाचा जी] के घर से फोन आने पर उनकी हिदायत के अनुसार चाची जी [उनकी पत्नी]  से हमे यह असत्य बोलना पड़ता था कि "चाचाजी तो यहाँ आये ही नहीं",यह छोटा सा असत्य बोलना , क्या था ?  धर्म  ?


कथा का धार्मिक - उपदेश  कि "सत्य ही वास्तविक मानव धर्म है" किसी को याद नहीं रहता ! पंचामृत तथा हलुए की मिठास में कथा का अमूल्य उद्देश्य न जाने कहाँ खो  जाता  था और 'सत्यम वद' के स्थान पर 'असत्यम वद' ही वहाँ उपस्थित उन सभी कथा श्रोताओं का तत्कालिक धर्म बन जाता जिन्होंने थोड़ी देर पहले जोर जोर से कई बार "बोलिए सत्य नारायण भगवान की जय" का नारा लगाया था !

कर्मकांडी प्रियजनों से मेरा अनुरोध है कि मेरे इस कथन से विचलित न हों , निराश न हों ,,निरुत्साहित न हों ! वास्तव में सब सम्प्रदायो के सभी कर्मकांड सार्थक हैं,कोई भी कर्मकांड त्याज्य नहीं है ! ये सभी कर्मकांड , विभिन्न धर्मों के नैसर्गिक नियमों को जनसाधारण तक सरलता से पहुचाने के सार्थक और उपयोगी साधन हैं !


परमहंस ठाकुर रामकृष्णदेव जी  तथा उनके शिष्य स्वामी विवेकानंदजी ने अपनी अपनी अनुभूतियों द्वारा,धार्मिक कर्मकांडों की सार्थकता  सिद्ध करदी ! ठाकुर ने तो न  केवल हिंदुत्व के ही वरन विश्व के कई अन्य विशिष्ट संप्रदायों में प्रचिलत उनके कर्मकांडों को स्वयम करके ,उनका अनुसंधान किया ,पूरी सच्चाई के साथ ,उनका अनुकरण किया और उनकी सार्थकता के आकलन के द्वारा यह सिद्ध कर दिया  कि मानव  की आत्मोन्नति के लिए किये गये सभी क्रिया कर्म सार्थक हैं ,उपयोगी हैं !आवश्यकता है कि हम उन कर्म काडों में निहित धर्म की वास्तविकता को समझें और उन्हें अपने जीवन में उतारे ! जैसे सत्यनारायण भगवान की कथा से सत्य की महानता को समझें और जीवन में अपना धर्म समझ कर केवल सत्य बोलने का निर्णय लें ! 

धर्म 

स्वामी विवेकानंद ने गहन अध्ययन एवं गुरु कृपाजनित अनुभूतियों से यथार्थ धर्म को जाना और इस ज्ञान को शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में  विभिन्न धर्म गुरुओं के समक्ष प्रस्तुत किया ! 


उन्होंने विश्व को बताया कि समग्र मानवता के लिए वास्तविक "धर्म" एक और केवल "एक" ही है ! किसी एक मत ,किसी एक सम्प्रदाय, किसी एक समुदाय ,जाति देश या काल की संकीर्णता में उसे बांधा नहीं जा सकता ! सारी सृष्टि उस एक धर्म में ही समाहित है !  संमदर्शन , सद्भाव ,सद्व्यवहार , सात्विक कर्म के स्वरूप में धर्म प्रत्यक्ष होता है ,धर्म सधता है !  उन्होंने स्पष्ट किया कि :


वास्तविक मानव धर्म ,समस्त मानवता के लिए विधि द्वारा निर्धारित सत्य,प्रेम और करुणाजनित "सेवा" से युक्त जीवन शैली है ! 


धर्म सत्य है !  धर्म अहिंसा है ! धर्म प्रेम है और प्रेम से उत्पन्न करुणा है ! धर्म परोपकार है ,परसेवा की भावना है ! धर्म  सनातन कानून है, धर्म वह नैसर्गिक नियम है  जिंससे सृष्टि का सम्वर्धन और संरक्षण होता है ,जिससे मानवता का अभ्युदय होता है ! धर्म विश्व का विधान है


धर्म असीम है ! धर्म सार्वजनीन है ! धर्म सर्वकालिक है ! धर्म  सनातन  है ! सृष्टि  की उत्पत्ति से प्रलय तक मानव धर्म एक  है और वह वैसा ही बना रहेगा !  इन नैसर्गिक नियमों को दृढ़ता से धारण करो उनका पालन करो ! यही मानव धर्म है !


क्रमशः 


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विदेशों में रहने वाले  भारतीयों के लिए मैं उपरोक्त हिन्दी आलेख का अंग्रेजी भाषा में एक "ब्रीफ" नीचे दे रहा हूँ ! आशा है उसे पढ़ कर हिंदू धर्म के विषय में उनके मन में उठे सभी प्रश्नों का उत्तर उसमे मिल जाएंगें ,उनका भ्रम दूर हो जाएगा ,उनकी  जिज्ञासा  मिट जायेगी !, 

ONE RELIGION 
for the entire humanity:


UNIVERSAL RELIGION - "DHARAM" ( धर्म )

as specified in the INDIAN SCRIPTURES ( वेदान्त )
[ dating back to the Vedantic Age - 6 to 7,000 years ago ]
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Brahma, Vishnu , Mahesh, Ram , Krishna, Buddha, Mahavir 

Allah, Khuda , Ahur Mazda, Lord Jesus , Lord Zoroaster ,
Lord Confucius  and  Jehovah etc etc.
All these are essentially ONE and the same :

एकम सत्  विप्र बहुधा  वदन्ति 

"Truth is ONE , sages call it by different names"

 RELIGION:

Religion is the bond between God and the humans
Religion is the Pathway to Peace and Brotherhood 
Religion shows us the way to GOD REALISATION  
Religion transforms Human Character
Without Religion there will be no Morality 
  Without Religion Human Life is a dreary waste 
Religion imparts Spirituality
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ONE  RELIGION 

There is only one religion : The religion of LOVE
There is only one religion   :The religion of HEART
There is only one religion  : The religion of SCRIPTURES 
[ the oldest of them are the Bhartiya Vedaant I 
There is only one religion : The  religion of UNITY
[ THE RELIGION OF ONE NESS ]


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निवेदक: व्ही.  एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती  कृष्णा  भोला  श्रीवास्तव 
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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद -गतांक से आगे [ १९ / १ / ' १३ ]

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स्वामी विवेकानंद जी       
के प्रेरणादायक सूत्रात्मक 
संदेश 
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उनके जीवन  का हर इक पल  "ईश्वर का संदेश"  बन गया ,
वह जब बोले जो भी बोले ,"आध्यात्मिक उपदेश" बन गया !

"सूत्र" सरिस उनका वचनामृत भाव पूर्ण उनका  वह  गायन,  
तमस मिटा जिज्ञासु हृदय में भरता गया ज्योति मनभावन ! 

उनसे  मानव-धर्म समझ, जग अवगत हुआ हिंदु  दर्शन  से ,
  उनको "विश्वगुरू" स्वीकारा  सकल जगत  ने  हर्षित मन से ! 

[भोला]
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 आत्मोत्थान प्रेरक स्वामी जी के फुटकर वचन 


१.    उठो जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंजिल मिल न जाये !

२.   आत्मगौरव बढाओ  !
      सच्चे और सहनशील बनो ! ईर्ष्या  तथा अहंकार  को  दूर  कर  दो !
      संगठित हो कर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो ! सबके सेवक बनो !

   आत्म विश्वास रखो !
      तुम अपनी आत्मशक्ति से सारे संसार को हिला सकते हो  !
    
      किसी बात से तुम निराश और निरुत्साहित न हो ! 
      ईश्वर की कृपा तुम्हारे ऊपर बनी हुई है ! इस पृथ्वी पर कौन है ,जो  तुम्हारे मंगलकारी                 
      कर्मों की उपेक्षा कर सकता है ! 

४.   आत्म निर्भर बनो ! 
      शक्ति और विश्वास के साथ लगे रहो ! 
      बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खड़ा हो  कर कार्य करना चाहिए ! 

      तुममें सब शक्तियाँ विद्यमान है ! अपनी शक्तियों और क्षमताओं को पहचानों ; 
      उनका आंकलन करो ! तुम्हारी क्षमता असीम है ! इन्हें किसी दायरे में न बांधो  !

५.    सत्यनिष्ठ ,पवित्र और निर्मल रहो तथा आपस में न लड़ो !
      अपना  एश्वर्यमय स्वरूप  विकसित करो !

६     
दिव्य जीवन जियो, जो सत्य  है ,उसे निर्भयता से सबको बताओ !

७     मानव सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाओ !
       
       हम जितनी अधिक दूसरों की सेवा करेंगे ,प्राणिमात्र का भला करेंगे 
      हमारा  हृदय  उतना ही शुद्ध होगा और परमात्मा उसमें बसेंगे !

८.      मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष में सदा अटल रहो! 

९.     आप जैसा सोचेंगे वैसा ही बनेंगे! 

१०.   भाग्य केवल बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का साथ देता है ! 

११.   मौन क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा है 



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"शिक्षा" विषयक वक्तव्य : 


१.     जब तक जियो ,तब तक सीखो !

२.     अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है !

३.     जीवन  पाठशाला है और जीना ही शिक्षा है !


४.     शिक्षा ऎसी हो जो मनुष्य को चरित्रवान बनाए !  


५        शिक्षा मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाकर उसका सर्वतोमुखी विकास करती है ! 

.     शिक्षा ऎसी हो जो मनुष्य को दांनव नहीं मानव बनाये !


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"धर्म" सम्बन्धी सूत्र : 


१.    धर्म-पालन  ही  मनुष्य के  आत्मोन्नति  का यथार्थ उपाय है !

२     धर्म के पालन से मन का विकास करो , मन को  संयमित रखो !


३.    धर्म का रहस्य आचरण से जाना जाता है !


४.    सच्चे बनो तथा सच्चा बर्ताव करो ! इसमें ही समग्र धर्म निहित है !


५.    मानव सामर्थ्यशाली बने , निरंतर कर्मशील बने ,निरंतर संघर्ष करे और निःस्वार्थ

       बनने का प्रयत्न करे  !   सब धर्मों का सार  यही है  !

६.    नीति परायणता तथा साहस को छोड़ कर और कोई दूसरा धर्म नहीं है !


७.    सबको आत्मरूप  मानकर प्राणीमात्र से प्रेम करो ! अंत में प्रेम की ही विजय होगी  

८.    मानव सेवा ही सर्वोच्च धर्म है !

      सभी जीवंत ईश्वर हैं इस भाव से सबको देखो , यदि नहीं देख पाओ तो उन्हें 
      आत्मरूप अनुभव करो ! उनकी सेवा करो !   

९.     अपने इष्ट [ईश्वर] की समर्थता पर अटूट विश्वास रखो !

१०.   अपनी हर सफलता में अपने 'इष्ट' के सहयोग को स्वीकारो !


११.   जीवन की हर अप्रिय व दुखद घटना, ईश्वर में 
हमारे विश्वास की परीक्षा लेती है! 


स्वामी विवेकानंद जी के जीवन से संबंधित साहित्य  से संकलित =========================================

निवेदक : व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद - गतांक से आगे -१५/१/1

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स्वामी विवेकानंद ने गाया 
"तुझसे हमने दिल है लगाया"

[गतांक के आगे]

अपनी प्रथम भेंट में ही परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव से 'दिव्य दृष्टि' पाकर 'नरेंद्रनाथ' ने विश्व के सभी प्रमुख  धर्मों के अनुयाइयों द्वारा पूजित ,उनके 'इष्ट देवों" के भिन्न भिन्न स्वरूपों को ,निराकार "पारबृह्म परमेश्वर" की दिव्यता में प्रतिबिम्बित होते देखा ! ज्योति स्वरूप - "प्रभु" के उस मनमोहक सौंदर्य ने नरेंद्र को मंत्रमुग्ध कर दिया ! वह अपनी सुध बुध खोकर कुछ समय को समाधिस्थ सा हो गया !   

इस अनुभव से उन्हें विश्वास हो गया कि समस्त मानवता का केवल "एक" ही ईश्वर है और यदि मानव अतिशय प्रीति ,श्रद्धा एवं विश्वास से अपने अपने इष्ट की आराधना करे तो वह निःसंदेह "उसका" साक्षातकार कर सक्ता है ! हिंदु अपने राम-श्याम-शिव के साथ परमेश्वरी माताओं के ,ईसाई अपने ईसामसीह के ,मुसलमान अपने अल्लाहताला के और  सब जीवधारी अपने मन मंदिर में विद्यमान सत्यस्वरूप परमेश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं !

ईश्वर के वैसे ही आनंददायी ,हृदयग्राही दिव्य स्वरूप का दर्शन करके नरेंद्र अनेक  बार आत्मलीन हुआ था ! प्रियतम प्रभु के ऐसे सामीप्य से  रोमांचित होकर उसके रोम रोम से प्रार्थना के निम्नांकित शब्द स्वतः ही प्रस्फुटित होने लगते थे ! 

 प्यारे प्रभु !

"कण कण में तू ही है समाया, जो कुछ है बस तू ही है"

 इस समग्र सृष्टि के अणु अणु में मुझे केवल "तू ही तू" दीखता है
तेरे इस दिव्य सौंदर्य को देख कर मेंरी आंखें उसपर से हट नहीं रही हैं
मेरा तन मन जीवन सर्वस्व  उस सौंदर्य पर न्योछावर हैं

मेरा दिल तुझसे लग ग़या है
तू  मेरा सर्वस्व  बन गया  है

तेरे बिन  इस जग में प्यारे मेरा और न कोई  है
मेरा कहने को दुनिया में जो है बस इक 'तू' ही है 

 मेरे प्यारे प्रभु 

"तुझसे मैंने दिल है लगाया जो कुछ है बस तू ही है" 

अपने मन में ऎसी ही भावनाओं को संजोये नरेन्द्रनाथ कभी कभी गुरुदेव परमहंस ठाकुर के अनुरोध पर उन्हें भजनों द्वारा अपने हृदयोद्गार सुनाता जिन्हें सुनते ही गुरुदेव भी निज सुध बुध खो कर पूर्णतः ध्यानस्थ हो जाते थे ! 

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प्रियजन , मेरा अब तक का लेखन ,"पठन-पाठन-श्रवण" तथा टेलीविजन पर देखे सुने प्रवचनों से प्राप्त जानकारी के आधार पर  हुआ है ! अब प्रेरणा हो रही है कि इसी संदर्भ के अपने कुछ निजी अनुभव आपके समक्ष पेश करूं : 

लगभग  ६५ वर्ष की आयु तक , रोज़ी रोटी कमाकर सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में मैं इतना व्यस्त रहा कि मुझे , कुछ भी पढ़ने लिखने का सौभाग्य ही नहीं मिला ! ऐसे में मेरे लिए 'आध्यात्मिक ज्ञान' अर्जित करने का कोई सवाल ही नहीं था !   

रिटायर होने के बाद लगभग ७४ वर्ष की आयु में .संन  २००३ में यहाँ बोस्टन आने पर ,प्यारेप्रभु की कृपा और विधि के विधान से मुझे स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर आधारित ' नरेंद्र  कोहली ' का उपन्यास "तोड़ो कारा तोड़ो" पढ़ने का सौभाग्य मिला !  कैसे ?

संभवतः यहाँ की बर्फीली बोरियत से हम दोनों को मुक्त कराने की सद्भावना से हमारी बड़ी बहू मणिका बेटी ने ,कदाचित अपने आराध्य "बाबाजी - गुरु नानकदेव" के प्रेरणात्मक निर्देश से , हम  वह पुस्तक पढ़ने के लिए दी ! उस पुस्तक के पठन से मेरा कितना उपकार हुआ, मुझे बहुत बाद में  समझ में आया ! 

वास्तव में इस ११ वर्षीय अंतराल में अनेकानेक चमत्कार हुए  

एक मध्यरात्रि पढते पढते , उस उपन्यास में यह प्रसंग आया कि एक दिन [शायद २२ अप्रैल १८६६ को ] ,"नरेंद्र नाथ दत्त" ने परमहंस ठाकुर रामकृष्ण को [जनाब 'जफरअली' रचित] एक गीत सुनाया ,जिसका शीर्षक था ,"तुझसे मैंने दिल को लगाया जो कुछ है बस तू ही है" ! 

अब सुनिए कि इससे मेरे साथ क्या चमत्कार" हुआ    

आपके इस भोले निवेदक के मन में उस उपन्यास में छपे , नरेंद्रनाथ दत्त  द्वारा गाये उस गीत का शीर्षक पढते ही , "शब्द एवं स्वर" का एक अद्भुत गंगा-यमुनी ज्वार अनायास ही उमड पड़ा ! और उस प्रथम  पंक्ति के आधार पर , बोस्टन की उस बर्फीली रात्रि में ,[अवश्य ही ईश्वरीय प्रेरणा से ] ,मेरे द्वारा 'धुन समेत' एक सम्पूर्ण भजन की रचना हो गयी ! 

इस भय से कि कहीं सुबह तक वे शब्द और वह धुन गुम न हो जायें ,कृष्णा जी ने ,उनकी तकिया के नीचे रक्खे पोर्टेबल केसेट रेकोर्डर पर ( जिससे वह रात में सोने से पहले, भजन कीर्तन और संतों के प्रवचन सुनती और मुझे सुनाती भी हैं ) ,वह भजन ,धुन के साथ ,तत्काल रेकोर्ड भी कर लिया !

आज मुझे विश्वास हो गया है कि परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव जी और उनके शिष्य श्री  विवेकानंद जी की इच्छा से तथा सद्गुरु , डॉक्टर विश्वामित्र महाजन जी के आशीर्वाद जनित प्रेरणा से ,ऊपरवाले "परम कुशल यंत्री"-"प्रभु" के  द्वारा संचालित  होकर "भोला" नामक इस यंत्र ने उस गीत की शब्द तथा स्वर रचना की ! उसके बाद भी  गुरुदेव कृपा वृष्टि करते रहे,एक के बाद एक चमत्कार होते रहें और एक एक कर के अनेको भजन बने और उनकी स्टूडियो रेकोर्डिंग हुई ! श्री राम शरणम लाजपत नगर ने मेरे उन भजनों के अनेक केसेट और सी.डी बनवाए ,  मेरी रचनाओं की एक पुस्तिका भी छपवाई तथा मुझे गुरुदेव डॉक्टर महाजनजी का अति स्नेहिल आशीर्वाद भी प्राप्त होते ता रहे ! 

आज स्वामी   विवेकानंद जी की १५०वी जयंती के शुभ अवसर पर कदाचित स्वामीजी ही मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि मैं आपको वह भजन सुनाऊँ - जिसका उल्लेख मैंने अभी किया है ,यह वही भजन है जिसकी प्रथम पंक्ति मैंने स्वामी जी की जीवनी में पढ़ी थी !



तुझसे हमने दिल है लगाया , जो  कुछ है बस तू ही है 
हर दिल में तू ही है समाया ,जो कुछ है बस     तू ही है
तुझसे हमने दिल है लगाया , जो  कुछ है बस तू ही है 

तू    धरती  है  तू ही अम्बर , तू  परबत  है  तू  ही    सागर 
कठपुतले हम तू नटनागर ,जड़ चेतन सब को हि नचाया 
तुझसे हमने दिल है लगाया , जो  कुछ है बस तू ही है 



सांस सांस मे आता जाता ,हर धड़कन में याद दिलाता 
तू ही सबका जीवन  दाता,    रोम रोम मे तू हि समाया  
तुझसे हमने दिल है लगाया , जो  कुछ है बस तू ही है 


बजा रहा है मधुर मुरलिया ,  मन-वृंदाबन में सांवरिया 
सबको बना दिया बावरिया ,स्वर में ईश्वर दरस कराया 
तुझसे हमने दिल है लगाया , जो  कुछ है बस तू ही है 

[शब्द-स्वर : "भोला"]


प्रियजन सच पूछिए तो , मेरे द्वारा जब उपरोक्त रचना हुई ,उस समय स्वामी विवेकानंद जी के आध्यात्मिक- दर्शन के विषय में मेरा ज्ञान नहीं के बराबर था ! इस वजह से तब से आज तक मेरे जहन में बार बार यह प्रश्न उठता रहा  कि  स्वामी जी के विचारों से पूर्णतः अनिभिग्य होते हुए भी मैंने  इस रचना में उनके आध्यात्मिक दर्शन का इतना सच्चा उल्लेख कैसे कर दिया ?   

आज तक मेरे पास इस प्रश्न का एक साधारण उत्तर था , "शायद इत्तेफाक से" ,जो अब मुझे गलत लग रहा है ! आज अचानक मुझे यह विश्वास हो गया है कि ,मेरे प्यारे प्रभु  ने ही मुझसे स्वामी जी के समग्र "आध्यात्मिक दर्शन; चिंतन-मनन" का सार समाहित किये  वे शब्द  लिखवाये थे !

अब हम भली भांति समझ गये हैं कि स्वामी जी को "मानवता" से कितना "प्यार" था ! मनुष्यों की छोडिये वह तो सृष्टि  के कण कण से ही बेतहाशा प्यार करते थे ! वह प्रत्येक जीव में 'परमप्रिय प्रभु'  के दर्शन करते थे , उनसे श्रद्धायुक्त प्रीति करते थे और  उनकी सेवा भी करते थे ! 

परमेश्वर के प्रति उनकी "प्रीति" इतनी गहन थी कि अपने सद्गुरु ठाकुर के समान उन्हें भी मातेश्वरी के विग्रह में तथा वृन्दावन के सांवरिया, मुरली बजैया , कृष्ण कन्हैया की मूर्ति में और उनकी वंशी के स्वर में "परमेश्वर" का प्रत्यक्ष दर्शन होता था ! वह अपनी स्वास स्वास में तथा अपने हृदय की प्रत्येक धड़कन में दिव्य "ब्रह्मनाद" को प्रतिध्वनित पाते थे ! सप्तक के प्रत्येक 'स्वर' में वह ईश्वर का दर्शन करते थे !" 

तभी तो उनके जीवन का एकमात्र आदर्श बन गया था "दरिद्र नारायण की सेवा" जिसे उन्होंने "धर्म" की संज्ञा दी ! 

उनका दृढ़ मत था कि,  ईश्वर की प्रत्येक कृति में,  सर्वग्य सर्वव्यापी  परमेश्वर का दर्शन करते हुए उनसे गहरी प्रीति करना और उनकी सेवा करना ही मानव का "परम धर्म" है !वास्तव में "मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है" !
क्रमशः 
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निवेदक: व्ही, एन . श्रीवास्तव "भोला"
सह्योग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद (गतांक से आगे)

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जनवरी १२, २०१३  
विश्वगुरु स्वामी विवेकानन्द जी की 
एक सौ पचासवीं जयन्ती पर 
समस्त मानवता को हार्दिक बधाई
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स्वामी विवेकानंद जी ने समग्र मानवता के आध्यात्मिकु उत्थान ,भौतिकी प्रगति एवं सर्वांगीण  मंगलमय कल्याण के लिए आज से १५० वर्ष पूर्व भारत की पवित्र धरती पर जीवन धारण किया था !


प्रियजन, भारत की इस महान विभूति की विलक्षणता तो देखें कि केवल ३९ वर्ष की अल्पायु तक इस धरती पर विचरने वाले  इस तत्ववेत्ता महापुरुष ने इतने थोड़े समय में ही कैसे  भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक संपदा को खोजा, खंगाला , निज अनुभूतियों के आधार से उन्हें समझा, उनका मूल्य आंका और खरा पाकर उन्हें 'स्वीकारा ;  तत्पश्चात उस अमूल्य निधि को  अति उदारता से समस्त विश्व में वितरित किया ! 

उन्होंने स्वदेश और पाश्चात्य जगत में हिंदुत्व के प्रति फैली भ्रामक मान्यताओं को दूर करके  विश्व मानवता  को भारतीय आध्यात्म और धर्म  के शाश्वत स्वरूप से परिचित करवाने और उसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का सफल प्रयास किया !

स्वामीजी ने सद्गुरु परमहंस रामकृष्णदेव जी के मार्गदर्शन से तथा  अपने जीवन के असंख्य दिव्य अनुभवों से यह जाना कि "मानव सेवा ही वास्तविक "ईश्वर-पूजा" है ! उन्होंने  स्वयम को दलित और निर्धन वर्ग का अनन्य भक्त और सेवक माना था  ;वे  कहा करते थे ," मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ ! न  संत  हूँ और न  दार्शनिक ही हूँ  ! मैं तो गरीब हूँ और ग़रीबों का सेवक हूँ  ! मैं सच्चा महात्मा उसे ही कहूँगा ,जिसका हृदय ग़रीबों के लिए तड़पता हो !

उनका दृढ़ मत था कि मानवता का एकमात्र धर्म "सेवा" ही है ! यथार्थतः  किसी भी 'धर्म' का निर्वहन केवल 'उपवास" या "रोजा" रखकर, प्रदर्शनात्मक ढंग से ,हठयोग की कष्टप्रद साधनायें करने अथवा काबा-काशी या चारोंधाम भ्रमण करके मंदिरों ,मस्जिदों और गिरिजाघरों में अपने अपने ढंग से श्रद्धा सुमन अर्पित करने ,चादरें चढाने अथवा मोम बत्तियाँ जलाने से नहीं होता है ! अस्तु विविध धर्मावलंबियों के भिन्न भिन्न पारम्पारिक अनु
ष्ठानों को "धर्म" नहीं समझना चाहिए !

स्वामी जी कहते थे कि ,मानव धर्म केवल कर्मकांडी अनुष्ठानो में ही संकुचित नहीं है, वह अत्यंत व्यापक है ! वास्तव में ,पूरी मानवता द्वारा "धारण" करने हेतु प्रतिष्ठित केवल एक "सत्य धर्म" है  जिसका निर्वहन  "प्रत्येक जीवधारी प्राणी को "आत्मरूप" जानने , उससे हार्दिक "प्रीति" करने, और उसकी "निस्वार्थ सेवा" करने से होता  है ! 


प्रियजन  ,स्वामी विवेकानंद केवल जानते , मानते और सोचते ही नहीं थे !  उन्होंने जो जाना , जिसे माना  ,जो संकल्प किया ;उसे कार्यान्वित किया ! उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था ! हिंदू धर्म को कैसे गतिशील और व्यावहारिक बनाया जाए; यही उनका मौलिक चिंतन रहा !

इसके अतिरिक्त ,देश-विदेश-भ्रमण के अपने निजी अनुभवों से वे इस निष्कर्ष पर पहुँच  गये थे कि: 

१. कोरा आध्यात्मवाद और कोरा भौतिकवाद ,दोनों आधे अधूरे हैं ! 


२. भारतीय "वेदान्त-ज्ञान" तथा पाश्चात्य जगत के "तकनीकी विज्ञान" के मिलन द्वारा   ही विश्व-कल्याण सम्भव है !    

३. भारतीय 'आध्यात्मिक चिंतन' की सम्पदा और पाश्चात्य जगत के 'तकनीकी विज्ञान ' का खजाना एक दूसरे से मिल कर समस्त  मानवता  का  मंगलमय सर्वान्गीण  विकास कर  सकता  है ! 

४. मानवता के  अभ्युदय के  लिए भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृतियों का संगम होना  आवश्यक है ! 

इस विचार को क्रियात्मक स्वरूप प्रदान करने के उद्धेश्य से,  विवेकानंद जी ने ,भारतीय वेदान्त के सारतत्व पर आधारित - "विश्वबंधुत्व'" की भावना और जीवों की एक दूसरे के प्रति "स्नेहिल-सौहार्दपूर्ण व्यवहार" की सस्कृति को  पाश्चात्य जगत की " तकनीकी , वैज्ञानिक  भौतिकवादी संस्कृति" से जोड़ कर एक "बहु जन हिताय , बहु जन सुखाय",  विश्व के निर्माण की कल्पना की ;और उसके लिए ही अपना जीवन समर्पित किया !


स्वामी जी की वाणी में उनके समग्र जीवन का अनुभव मुखर होता है ! उनके वचन और , रहनी -सहनी में उनका धर्म-दर्शन जीवंत है ! उनकी निस्वार्थ जनसेवा और त्याग में  उनके गुरु और इष्ट की पूजा मूर्तिमंत हुई  !

स्वामी विवेकानंद  की 'कथनी'   

[क] मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य यह है कि मैं गुरुदेव  ठाकुर रामकृष्णदेवजी के स्वप्नों को साकार करूं और उनके आदेशानुसार मनुष्य जाति  को मानवता के दिव्य स्वरूप से परिचित करवाऊँ तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उस सात्विक  दिव्यता को  अभिव्यक्त करने का उपदेश दूँ और उसके लिए उपाय बताऊँ !  


[ख] निर्धनता, अस्पृश्यता ,निरक्षरता  तथा रूढिवादिता  के अभिशाप से मानवता को  मुक्त कराए बिना विश्व का सम्वर्धन ,संरक्षण और अभ्युदय होना सम्भव नहीं है !


[ग]  
"पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान । ध्यान के द्वारा ही हम इंद्रियों पर संयम रख सकते हैं। शम, दम , तितिक्षा ,चित्त की शुद्धि तथा एकाग्रता को बनाए रखने में ध्यान बहुत सहायक होता है।"

उनकी 'करनी'

प्रत्येक "कर्ता" को , अपने "कर्म" के दौरान , तीन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है - --    १. उपहास,  २. विरोध  और  ३. स्वीकृति ! 

स्वधर्मानुसार सात्विक कर्म करने वाले कर्ता को ,उपहास और विरोध का दृढता से  सामना करते हुए कर्म करते रहना चाहिए ! स्वीकृति - सफलता निश्चित ही मिलेगी ! 

वातावरण कैसा भी हो,  परिस्थितियाँ अनुकूल हों अथवा  प्रतिकूल , यदि  आस्तिक भाव, आत्मविश्वास तथा  पूरी ईमानदारी के साथ उपलब्ध उपकरणों का सदुपयोग करते हुए कर्म किया जाए तो अंत में सफलता अवश्य ही 'कर्ता' के चरण चूमेगी ! 

उपरोक्त दोनों बहुमूल्य सिद्धांतों / तथ्यों को भली भांति समझ कर स्वामी जी अपने सभी कर्म क्रियान्वित करते थे ! 
 
स्वामी जी के जीवन का लक्ष्य था , विश्व में एक मानवतावादी , चरित्रवान , सम्वेदनशील समाज की स्थापना करना, समाज की निस्वार्थ भाव से सेवा करना , शिक्षा के प्रति जागरूक रहना , इन्द्रिय संयम से मन और योग से तन को स्वस्थ रखना  ; जिसके लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहें !

सद्गुरु के स्वप्न और अपने लक्ष्य को  साकार रूप देते हुए विवेकानंदजी ने सर्व प्रथम नवम्बर १८९४  में उत्तरी अमेरिका के न्युयोर्क महानगर में " वेदान्त समिति " का गठन किया  ; तत्पश्चात  १ मई  १८९७  को   कोलकत्ता में रामकृष्ण मिशन की और  १८९८ में बैलूर  में रामकृष्ण मठ की स्थापना की  ! इसके बाद उनके शिष्यों ने  विश्व भर में स्थान स्थान पर उनके "कर्म"  और योग के आदर्षों से अनुप्राणित अनेक "रामकृष्ण मठ" और "विवेकानंद केन्द्र" स्थापित किये ! 

देश -विदेश में स्थापित ये केन्द्र और मिशन आज तक परमहंस रामकृष्ण ठाकुरजी  एवं उनके शिष्य विवेकानंद के संदेशों के प्रबल प्रचारक एवं  प्रसारक बने हुए है ! इन संस्थाओं तथा इनके द्वारा संचालित विद्यालयों एवं स्वास्थ्य केन्द्रों में आधुनिक उपकरणों के प्रयोग से श्रेष्ठतम शिक्षा एवं उच्चस्तरीय चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है ! विद्यालयों में विविध कलाओं के साथ साथ वैज्ञानिक व तकनीकी शिक्षा तथा  योग और वेदांन्त की शिक्षा भी दी जाती है ! इनमें शिक्षार्थियों को आस्तिक जीवन जीने की कला सिखाई जाती है तथा आर्त-जनों की सेवा तथा आवश्यकतानुसार विविध प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित जनसमुदाय की सेवा की प्रेरणा दी जाती है ! 

इन मिशनों द्वारा देश विदेश में की जा रहीं मानवता की ये उत्कृष्ट सेवाएं महान तत्ववेत्ता युगपुरुष - स्वामी विवेकानंद जी और उनके सद्गुरु परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव जी के वेदान्तिक चिंतन एवं  व्यावहारिक धर्म दर्शन को  चिरजीवंत रख कर अनंत काल तक ,इस आद्वितीय गुरु-शिष्य जोड़ी के अभिनंदनीय श्री चरणों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करती रहेंगीं ! 

एक आवश्यक सूचना 
मेरे पिछले - ५ जनवरी वाले आलेख के प्रकाशित होने के बाद उसमे 
स्वामी जी के शिकागो वाले ५ मिनिट के भाषण का 'वीडियो क्लिप' 
संलग्न हो गया है ! कृपया आप उसे अवश्य देखें और स्वामी जी की 
ओजपूर्ण वाणी सुनें   

[क्रमशः] 

स्वामी जी के शिक्षाप्रद सूत्रात्मक वचनों का संकलन 
और बहुत कुछ अगले अंकों  में प्रस्तुत करेंगे  

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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
 सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव
श्रीमती श्री देवी कुमार  . 
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शनिवार, 5 जनवरी 2013

स्वामी विवेकानंद -

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स्वामी विवेकानंद
शिकागो- विश्व धर्म सम्मेलन में 


परमहंस ठाकुर राम कृष्ण देव की यह इच्छा थी कि उनके सर्वाधिक प्रिय ,दिव्य ,ज्ञानी शिष्य विवेकानंद विश्व की समग्र मानवता को "धर्म" का वास्तविक स्वरूप दिखाए तथा  विभिन्न मत मतान्तरों , सम्प्रदायों , धर्मानुयायियों द्वारा फैलाई धर्म विषयक भ्रामक मान्यताओं को मिटा कर मानवता को  शाश्वत "धर्म" के सत्य स्वरूप से परिचित कराए !

अपने गुरुदेव के  स्वप्न को साकार करने के लिए  स्वामी विवेकानंद' भगवती स्वरूपा   ,गुरु माँ शारादामणि की आज्ञा ले कर तथा उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर नोर्थ अमेरिका के  शिकागो नगर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए  भारत से सिंगापुर ,जापान ,कनाडा होते हुए  जुलाई १८९३ में  शिकागो पहुंचे !अमेरिका पहुँचने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि सम्मेलन स्थगित हो गया है , दो महीने बाद होने की सम्भावना है ! 

एक अपरचित देश जहां न कोई मित्र था न कोई सम्बन्धी ,न कहीं ठहरने का ठिकाना था ,न कोई खाने पीने की सुविधा ! उनके पास  इतनी धन राशि  भी नही थी कि वह अपनी कोई निजी निश्चित व्यवस्था कर सकें ! उन्हें  ऐसा लगने लगा कि जैसे अमेरिका का वह पूरा प्रवास अब उन्हें वहाँ की सड़कों पर भटक भटक कर बिताना पडेगा ! किसी साधारण व्यक्ति के लिए यह एक अति चिन्तादायक स्थिति होती !

परन्तु प्रियजन ,एक प्राकृतिक नियम है -"दिव्यात्मा युक्त व्यक्ति हर परिस्थिति में चिंता मुक्त रहता हैं ! वह विश्वासी जानता है कि उसकी चिंता स्वयम "प्रभु"करते हैं " ! 

विधि को विवेकानन्द से बड़े महत्वपूर्ण काम करवाने थे अस्तु   अमेरिका की सड़कों पर निश्चिन्त घूमते हुए  नैसर्गिक मुस्कुराहट युक्त तेजस्वी मुखमंडल वाले  उस परिव्राजक  की भेंट एक अमेरिकन महिला  Miss Kate Sanborn  से हुई !  स्वामीजी के दिव्य आभामय स्वरूप तथा उनके विद्व्तापूर्ण  मधुर सम्भाषण से उनके प्रति गहन श्रद्धा से आकर्षित हुई वह महिला उन्हें अपने साथ बोस्टन ले आयीं ! मिस केट ने अपने घर मे ही उनके ठहरने की उचित व्यवस्था कर दी !  इनके घर पर ही स्वामी जी की भेंट  हावर्ड  यूनिवर्सिटी  के प्रोफेसर जोन हेनरी राईट से हुई  ! 

विवेकानंद जी में एक अद्भुत चुम्बकीय आकर्षण था ! वह जिससे मिलते, उसे अपनी ओर खीच लेते , उसे अपना बना लेते , उसका मन मोह लेते और उसका दिल जीत लेते थे !  ऐसा  मनमोहक व्यक्ततित्व था उनका !

हॉवर्ड  विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राईट भी स्वामीजी के इस  प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के अपूर्व आकर्षण से अछूते न रह सके ! इस नवयुवक भारतीय संन्यासी के आध्यात्मिक दर्शन की सार्थकता से परिचित होकर ,प्रोफेसर राईट ने ,अनजान होते हुए भी स्वामीजी की हर प्रकार से सहायता की ! उन्हें अमेरकी जीवन शैली से परिचित कराया और प्रोफेसर राईट ने जो सबसे बड़ा काम  किया वह यह था कि उन्होंने शिकागो के धर्म सम्मेलन में भारत का  प्रतिनिधित्व कर पाने के लिए स्वामी जी का आवश्यक "मार्ग-दर्शन" किया !
प्रोफेसर राईट के प्रयास से  ही स्वामीजी को विश्वधर्म परिषद में प्रवेश पाने के लिए परिचय- पत्र मिला !  

शिकागो में विश्व के अन्य धर्मों के प्रतिनिधियों को बड़े शान से फूलों से सजी घोड़ा गाड़ियों पर सवार हो कर सभास्थल तक पहुचते देख एक वयो वृद्धा अमेरिकन भद्र महिला  Mrs Hale ने स्वामी जी को अपनी निजी बग्गी (घोड़ा गाड़ी ) द्वारा परिषद के सभागृह तक  पहुंचाया !  

स्वामीजी को विश्व धर्म परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व करवाने का सम्पूर्ण श्रेय , हिंदुत्व से सर्वथा अनभिज्ञ रहें  अन्य धर्म के अनुयायी ,इन दो अमेरिकी नागरिक -   हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राईट और शिकागो की श्रीमती हेल को ही जाता है !

अनेकों विघ्न बाधाओं और  प्रतिकूल परिस्थितियों से टक्कर लेते हुए  स्वामी जी परिषद भवन में दाखिल तो हो गये लेकिन उन्हें सम्मलेन में भारतीय आध्यात्म,धर्म एवं जीवन दर्शन पर प्रकाश डालने का अवसर कैसे मिले ,यह समस्या अभी भी बरकरार थी !

उस सम्मेलन में , विश्व के अन्य सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को  अपने अपने धर्मों की विशेषताएं बताने के लिए व्यवस्थापकों द्वारा आमंत्रित किया गया था लेकिन इस परिव्राजक  को ऐसा कोई निमंत्रण नहीं दिया गया था  ! फिर भी  चंद भारतीय एवं उपरोक्त दोनों अमरीकी स्वजनों के सह्योग एवं अनवरत प्रयास , तथा ईश्वरीय प्रेरणा से अन्त्तोगत्वा स्वामी जी को संसद में बोलने का समय मिल गया !  

अवसर मिला तो ,लेकिन विडम्बना  देखिये भारतीय आध्यात्म और धर्म के पक्ष  को उजागर करने के लिए सम्मेलन के आयोजकों ने स्वामी जी को केवल पांच मिनट जी हाँ केवल पांच मिनट का ही समय दिया था ! 




शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में मंच पर आसीन स्वामी विवेकानंद 

प्यारे प्रभु की इच्छा तथा सदगुरु की कृपा तो  देखिये कि जिस वक्ता को बमुश्किल तमाम ,जोड़ तोड़ के बाद , बोलने के लिए केवल पांच मिनट का ही समय दिया गया था ,उसने अपने ज्ञानवर्धक ओजस्वी ,विवेचनात्मक व्याखानों से सभागृह पर ऐसा जादू डाला कि ११ से २७ सितम्बर तक पूरे सत्र भर वह वहाँ पर छाये रहें ,व्याख्यान देते रहें !! 

यह चमत्कार कैसे हुआ ? सुनिए  

११ सितम्बर १८९३ को विश्व धर्म सम्मेलन के प्रथम दिन ही स्वामी जी ने सभागृह में उपस्थित लगभग ७००० श्रोताओं को ,जिनमे ९० प्रतिशत से अधिक श्वेत अमरीकी थे,   "ब्रदर्स एंड सिस्टर्स " कह कर सम्बोधित किया ! 


Full text: Swami Vivekananda's 1893 Chicago speech

"मेरे प्यारे अमरीकी भाई बहनों" - यह सम्बोधन सुन कर ,पहिले कुछ पलों के लिए तो सभी श्रोतागण स्तब्ध रह गये तत्पश्चात रोमांचित हो कर सभी खड़े हो गये और जोर जोर से तालियाँ बजाने लगे ! तालियों की गडगड़ाहट से सभागृह तब तक गूँजता रहा जब तक आयोजकों ने उनसे अति विनय पूर्वक बैठ जाने का आग्रह नहीं किया !   

इस आत्मीय सम्बोधन में समाहित था ,भारतीय आध्यात्मिक दर्शन पर आधारित हमारी संस्कृति का एक पुरातन अनमोल सन्देश- "वसुधैव कुटुम्बकम" जिसका भावार्थ यह है कि " विश्व  एक परिवार है ! चाहे हम किसी भी देश के हों, किसी भी "रेस" के हों ,हम काले हो ,सांवले हों ,बादामी हों अथवा गोरे हों , हम सब एक ही पिता की सन्तान हैं ,हम सब एक दूसरे के "भाई बहिन"हैं "! 

सम्मेलन में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन्हें  हिन्दू  होने  का गर्व है ,उन्हें गर्व है  कि वह एक ऐसे धर्म के अनुयायी हैं जिसमें  "सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति", की क्षमता है ! उन्होंने कहा कि भारतीय धर्म अति उदार है ,वह हमे विश्व के अन्य सभी धर्मों के प्रति केवल "सहिष्णुता" ही नहीं वरन उनपर विश्वास कर के उन्हें सच्चा मान कर स्वीकार करने तक की अनुमति भी देता है ! 

फिर अपने वक्तव्य में उन्होंने भारतीय दर्शन को संजोये दो शास्त्रीय संस्कृत श्लोकों को उदधृत किया;प्रथम श्लोक "शिव महिमा स्तोत्र" से था : दूसरा "श्रीमद भगवदगीता" से ; जिसमे भारतीय धर्म तथा आध्यात्म की सार्वभौमिक स्वीकृति तथा उसकी सहिष्णुता एवं उसके सार्वजानिक स्वरूप को उजागर किया गया है ! 

प्रथम श्लोक ,"शिव महिमा स्तोत्र" से 

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।
" जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार अपनी अपनी रुचि के अनुसार  भिन्न भिन्न साधना  रूपी टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग भी अन्त में  "एक परमतत्व "में ही आकर मिल जाते हैं।विभिन्न मार्ग से लोग आते हैं पर सारे रास्ते एक  ही लक्ष्य की ओर जाते हैं "
द्वितीय श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से था :
ये यथा माम्  प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ।।4-11।।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के उपरोक्त कथन का हिन्दी भावार्थ  
जिस भांति जो भजते मुझे उस भांति दूँ फल योग भी !
सब  ओर  से  ही   बर्तते  मम  मार्ग  में  मानव सभी !!
                                      [दिनेश जी रचित श्री हरि गीता से]                  

जो कोई ,अपनी रूचि के अनुसार ,जिस किसी मार्ग या विधि -विधान से मेरी ओर आता है ,उसे मैं निश्चय ही प्राप्त हो जाता हूँ [ वह मुझे पा लेता है ] ! 

भारतीय जन मानस इन पुरातन धार्मिक स्त्रोतों को जीवन में उतार कर अन्य सभी धर्मों के प्रति आदर सहित उदार बना रहा ! भारत ने विश्व के अन्य देशों से निष्कासित अन्य धर्मों के अनुयायी शरणार्थियों को न केवल अपनी भूमि पर फलने फूलने दिया, उन्हें अपने अपने धर्मों का पालन करने की पूरी छूट दी ! भारत उन विस्थापितों के साथ आज तक "एकता" बनाये हुए है ! 

इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने धर्म संसद को बताया कि जब रोमन जाति के अत्याचार से पीड़ित "यहूदी" शरणार्थी भारत के दक्षिणी तट पर आये तब भारतीयों ने उन्हें सहर्ष अपनी धरती पर शरण दी ! इसी प्रकार जब जोरास्थियंन [जरथुष्ट्र] धर्म के विस्थापित अनुयायी बेघर हो कर भारत आये तब भारत ने उन्हें अपनाया !  आज हम उन्हें "पारसी" कह कर पुकारते हैं ! अपने धर्म का यथा विधि पालन करते हुए "पारसी" समाज आज भी भारत में सख -समृद्धि भरा प्रगतिशील जीवन जी रहा है !


भारत का वास्तविक हिंदू धर्म ,विश्व के अन्य सभी धर्मों की मान्यताओं ,विचारों तथा उनकी पूजा पाठ और आराधना के विधि विधान को स्वीकारता है और उनका समुचित आदर करते हुए उनमे समन्वय बनाये रखने का प्रयास करता है ! 


विवेकानंद ने  इस परिषद में विश्व के किसी भी धर्म की कोई आलोचना नहीं की .किसी भी धर्म का विरोध नहीं किया , किसी भी धर्म को ऊंचा या नीचा नहीं बताया ,ना धर्म परिवर्तन की बात की ! उन्होंने स्पष्ट किया कि  विश्व के विभिन्न धर्मों,सम्प्रदायों ,  मत मतान्तरों  का सारतत्व एक  ही  है लेकिन उनके अभिव्यक्तिकरण की प्रणाली ,शब्दों में निरूपण करने की पद्धति ,साधना के क्रियात्मक स्वरुप की रूप रेखा भिन्न भिन्न है  !
 इस प्रकार स्वामी जी ने भारतीय वेदान्त के  मानवतावादी ,व्यवहारिक ,प्रगतिशील ,और प्रायोगिक सन्देश के मर्म को   विश्व के समक्ष अत्यंत मधुर वाक्पटुता से प्रस्तुत कर हिंदू धर्म और आध्यात्म  को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया ,उसके गौरव को अक्षुण्ण बनाया !

विश्व भर के प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में स्वामी जी के शिकागो के व्याख्यानों की चर्चा हुई , उनके विचारों का मोटे मोटे अक्षरों में उल्लेख हुआ तथा उन्हें साधुवाद दिया गया ! अमेरिकी अखबारों ने तो उनकी तारीफ़ के पुल ही बाँध दिए ! TRIBUNE ने उन्हें ,The  Cyclonic HIindu Monk कहा ,THE NEW YORK HERALD  ने उन्हें संज्ञा दी The greatest figure in the Parliament of religions की !Boston Evening Transcript ने उन्हें " A great favorite at the Parliament of Religions" कह कर सम्मानित किया !
सच ही तो है "जाकी सहाय करी करूणानिधि ताके जगत में मान घनेरो "


भारत की महानतम विभूति ,इस युवा संन्यासी विवेकानंद  ने  धर्म और अध्यात्म के नये परिप्रेक्ष्य में अद्वैत वेदान्त के आधार पर श्रोताओं  को यह समझाया कि, "सारा विश्व आत्म रूप है" !" सारे जगत को आत्म रूप देखने का प्रयास करो, न देख सको तो  इसका अनुभव करो ! स्वानुभूति के आधार पर नर को नारायण जानकार उनकी सेवा करो ! अनेकता में एकता के दर्शन करो ! ईश्वर का यह ही सर्वमान्य स्वरूप  है !

शिकागो के कोलम्बस हौल में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि वक्ताओं की हठधर्मिता भरी वाणी सुनने वाले श्रोताओं ने स्वामी विवेकानंद के, अन्तःस्थल से उभरे  वक्तव्यों की माधुर्यमयी शैली में ,विश्व बन्धुत्व का संदेश सुना ! वे मंत्रमुग्ध हो गये ! 

स्वामी जी के निजी अनुभवों पर आधारित उनकी सत्य-निर्मल विचारधारा , उनकी त्यागमयी सेवा वृत्ति एवं उनकी वाणी की मधुरता से ढंकी उनकी गम्भीर द्रढता  ने सम्मलेन में सबका मन जीत लिया और इस प्रकार भारत को सपेरों, भिखारियों और जटाजूटधारी ढोंगियों तथा पत्थर के देवी देवता पूजने वाले धर्म गुरुओं का एक निकृष्ट देश समझने वाले पाश्चात्य श्रोताओं ने पहली बार वास्तविक भारतीय आध्यात्म का आस्वादन किया ! उनकी आँखें खुली की खुली रह गयीं ! 


'सभी धर्म सत्य हैं ! वे सब ,ईश्वर प्राप्ति के विभिन्न उपाय मात्र हैं "!
सदगुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव जी के निजी स्वनुभूतियों पर आधारित 
उनकी प्रमुख सिखावन के मुखर स्वरुप थे  
विश्वगुरु स्वामी विवेकानंदजी द्वारा 
शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिये सारगर्भित संदेश !! 
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क्रमशः 
अभी बहुत कुछ कहना है !  

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 निवेदक : व्ही.  एन .  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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