सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

जो भजे हरि को सदा

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पिछले अंक में मैंने आपको   
परमहंस ठाकुर राम कृष्ण देव जी 
 के वे दो उपदेशात्मक सूत्र बताये थे जिनके अनुकरण ने मुझे  
अत्यंत लाभान्वित किया था ,
उन सूत्रों की शब्दावलि कुछ ऎसी थी -
  
" पर-चर्चा निषेध " - " पर-छिद्रान्वेषण निषेध "

प्रियजन , यदि कोई आज मुझसे पूछें कि मैंने ये दोनों सूत्र ,"आर के मिशन" के किस  प्रकाशन में पढ़े तो मैं नहीं बता पाउँगा लेकिन यह एक परम सत्य है कि लगभग  ६० वर्ष पूर्व ,२० -२२ वर्ष की अवस्था में पढे ये दोनों सूत्र मुझेआज भी ,ज्यों के त्यों याद हैं शायद इसलिए कि मैंने ठाकुर जी के इन दोनों निषेधात्मक उपदेशों का आजीवन पालन किया ! 

हाँ तो ,यौवन की दहलीज पर ,२२ से २५-२६ वर्ष की अवस्था तक ,लगातार ५ - ७ वर्षों के लिए,मुझे    उस 'बंगाली माहौल' में ,अपने से उम्र में काफी बड़े सहयोगियों [कलीग्ज़ ] के 'सत्संग' में  दिन के १० घंटे काटने पड़े ! अपनी आपसी "आमी तुमी" वाली भाषा में वे बंगाली भद्र पुरुष चाहे जो भी बतियाते रहें हों , ये ठाकुर-भक्त सज्जन ,मेरे साथ अधिकतर "काम की बातें" ही करते थे और 'लंच तथा टी ब्रेक' में मेरी - उनकी बातें केवल "सत्संग" तक ही सीमित रहतीं थीं !

आर के मिशन से सम्बन्धित ये प्रवासी बंगाली भद्रपुरुष ,"ठाकुर" के उपरोक्त दोनों आदेशों का पालन स्वयम तो करते ही थे और साथ साथ [ मुझमें अपना छोटा भाई या बडा पुत्र देख कर ] वे मुझे भी सदाचारी बनाने की सदेच्छा से ठाकुर के उन दोनों आदेशों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करते थे  ! आमतौर से नौजवानी में कुसंगत के कारण व्यक्ति बिगड़ जाते हैं, इसके विपरीत  मेरे साथियों ने मुझे सन्मार्ग दिखाया ! 

प्रियजन ,यह है मेरे जैसे एक क्षुद्रतम 'जीव' पर उस 'प्यारे प्रभु की 'अहैतुकी कृपा' का एक जीवंत उदाहरण ,जिसका अनुभवात्मक आनंद मैंने जीवन भर उठाया !  संतकबीर  ने सत्य ही कहा है कि 
" राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेत ! जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको देत !"

प्रियजन मैं नहीं जानता कि मेरी कैसी "चाकरी" है और आज तक मैंने कैसी कमाई की है ,जिसका "बोनस" मुझे  अभी तक प्राप्त हो रहा है ! 

सच पूछिए तो केवल मुझ पर ही नहीं वरन सभी जीव धारियों पर वह ," 'दीन बन्धु ,दया निधान' ,प्यारा भगवान" ,प्रति पल  कुछ न कुछ उपकार करता ही रहता हैं और  "जीव" निर्लज्जता से "प्रभु" के इन उपकारों को सतत भुनाता रहता है ,'सुफल' प्राप्त  करके 'सुखी' होता है , लेकिन वह भूले से भी ,प्रभु को उनके इन उपकारों के लिए  धन्यवाद नहीं देता  फिर भी वह "कारण बिनु कृपालु"दीन दयाल निर्बल का बल प्यारा भगवान" असहाय जीव को  मझधार में डूबते हुए  नहीं छोड़ता  ! वह जीव पर कृपा करता  ही रहता है ! 

मेरे ऊपर भी प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपाओं की सूची वहीं १९५१-५६ तक की कथा तक ही सीमित नहीं है वो तो आज २५ फरवरी २०१३ के दिन भी मेरे ऊपर कृपा कर रहे हैं !


उपकारन को कछु अंत नहीं छिन ही छिन जो बिस्तारे हो 

१९५० के दशक के उत्तरार्ध - नवम्बर १९५६ में मेरा विवाह ग्वालियर के एक ऐसे धार्मिक परिवार में हुआ जिसका बच्चा बच्चा ,श्री राम शरणम के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द जी महाराज  के सानिध्य से प्रभावित था ! परिवार के मुखिया-दिवंगत गृहस्थ संत भूतपूर्व चीफ जस्टिस ,म.प्र .माननीय शिव दयालजी ने घर को श्री राम शरणम के सत्संग भवन सा बना रखा था !  परिवार के सभी सदस्य ,जितना उनसे बन पाता था , अपने दैनिक जीवन में भी 'पंचरात्रि' सत्संग के नियमों का पालन करते थे ! प्रातः ५ बजे नाम जाप ध्यान आदि होता था और दिन भर के अपने कार्य निपटाने के बाद , रात्रिकाल में "अमृतवाणी जी" का  तथा स्वामी जी के अन्य ग्रंथों का पाठ   होता  था ! दैनिक रहनी सहनी ,खांन  पान भी  साधना -सत्संगों के समान   होता था ! प्रातराश में दलिया दूध , भोजन अति सात्विक पर सरस ,भोजन से पूर्व  एवं उसके उपरान्त की  प्रार्थना ,सामूहिक प्रार्थना आदि आदि,!

मेरे ससुराल द्वारा अपनायी , श्री स्वामी जी महाराज की "नामोपासना" की नियम बद्ध अनुशासित पद्धति मुझे भी बहुत अच्छी लगी ! मूर्ति पूजन तथा निराकार ब्रह्म की उपासना के बीच का यह सहज सरल साधना पथ मुझे भा गया ! मैंने मन बना लिया स्वामी सत्यानन्द जी महाराज से दीक्षित होने का ! मेरी धर्मपत्नी पहले से ही स्वामी जी महाराज से दीक्षित थीं !

वर्षों भ्रम भूलों में भटकने के बाद मेरा भाग्योदय हुआ और अनंत काल से बिछड़े हमारे मार्गदर्शक हमे मिल गये ! महाराज जी ने मुझ "निर्गुनिया"को श्री राम शरणम में शरण दी !  मुझे नाम दान दिया ! 

  
 

स्वामी सत्यानन्द जी महाराज 

साधना सत्संग में महाराज जी ने भजन गाने का आदेश दिया [कितनी नाटकीयता से यह आदेश मिलता था -उसका विवरण मैंने पिछले आलेखों में किया है ] ! मैं धन्य हो गया था ! पहले सत्संग में कौन सा भजन गाया था ठीक से याद नहीं है ! आदरणीय मूलचंद्र जी ने मुझसे उस भजन के विषय में कितनी बार चर्चा की लेकिन उन्हें भी वह भजन याद नहीं आया ! उन दिनों मैं ज्यादातर ये भजन गाता था :

  • हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम 
  • अब तुम कब सुमिरोगे राम 
  • राम बिनु तन को ताप न जाई 
  • नारायण जिनके ह्रदय में
  • राम करे सो होय रे मनुआ   
लम्बी है लिस्ट उन भजनों की जिन्हें मैं तब गाता था ! 

आइये आप को उस साधना सत्संग के दिनों में ही ग्वालियर के एक साधक से सुना   ब्रह्मानंद जी महाराज का एक सारगर्भिक भजन सुनाऊँ  :


जो भजे हरि को सदा , सो परम पद पायेगा !! 
देह के माला तिलक अरु भस्म नहिं कुछ काम के 
प्रेम भक्ती के बिना नहिं नाथ के मन भायेगा !! 
         जो भजे हरि को सदा , वो परम पद पायेगा !!




जो भजे हरि को सदा वो परम पद पायेगा 

छोड़ दुनिया के मज़े सब बैठ कर एकांत में ,
 ध्यान धर गुरु के चरण का फिर जनम नहिं पायेगा !!
जो भजे हरि को सदा , वो परम पद पायेगा 

दृढ़ भरोसा मन में रख कर जो भजे हरि नाम को ,
कहत ब्रह्मानंद , ब्रह्मानंद  बीच समायेगा !!
 जो भजे हरि को सदा , वो परम पद पायेगा !!
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आप जानना चाहेंगे कि क्यूँ ,  
१.युवा-अवस्था में उन बंगाली सहयोगियों [ कलीग्ज़ ] से मेरे मिलन को  
२.ग्वालियर के राम भक्त परिवार में अपने विवाह को ,
३.सद्गुरु स्वामी जी महाराज  के दर्शन को तथा 
४ .उनसे भजन गाने का आदेश मिलने को -
मैं अपने लिए अति सौभाग्य की बात  तथा परम पिता परमेश्वर की मेरे ऊपर की हुई अति विशिष्ठ कृपा मानता हूँ   

प्रियजन ,अपने ब्लॉग ,"महाबीर बिनवौं हनुमाना"  के अब तक के प्रकाशित ५३० अंकों में हमने अपनी निजी अनुभूतियों के आधार पर अपनी आत्म कथा द्वारा , केवल उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर ही दिए हैं ! पर बार बार अपने उस उत्तर को दुहराना हमें बुरा नहीं लगता !   
हमे लगता है कि आपने हमे एक और अवसर दिया कि हम एक बार फिर प्यारे प्रभु को याद करें , उन्हें अंतरात्मा से धन्यवाद दें उनकी अनंत कृपाओं के लिए !

अब तो एकमात्र यही प्रार्थना है कि हर घड़ी "उनकी" याद बनी रहे  ,और हमारा रोम रोम पल पल उन्हें धन्यवाद देता रहे !   मन सतत गाता रहें :

बाक़ी हैं जो थोड़े से दिन ,व्यर्थ न हो उनका इक भी छिन 
पल पल करके "उनका" सिमरन , मैं पाऊँ विश्राम 
यही वर मांगूं राम 

सिमरूं निशि दिन हरि नाम , यही वर मांगूं राम 
रहे जनम जनम तेरा ध्यान,  यही वर मांगू राम 

मनमोहन छवि नैन निहारे ,  जिव्हा मधुर नाम उच्चारे 
काबा काशी हो तन मेरा , [औ "तू"] मन में कर  विश्राम
यही वर मांगू राम 
["भोला"]

क्रमशः
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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रविवार, 17 फ़रवरी 2013

बचपन की पहचान - 'स्वामी विवेकानंद जी' - फरवरी १७,'१३

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 श्री गुरुवे नमः 
तीस दिसंबर २०१२ का छूटा हुआ आलेख जो आज प्रकाशित हो रहा है 

स्वामी विवेकानन्द जी
[गतांक से आगे]

 यह प्यारे प्रभु की कृपा है अथवा चमत्कार 
कि इन दिनों अपने जन्म के ८३-८४  वर्ष बाद मुझे एक बार फिर
'विश्वगुरु' स्वामी विवेकानंद जी की याद आई
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आइये इस प्रसंग से सम्बन्धित अपनी 'आत्म कथा' का एक अंश सुनाऊँ 
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बहुत छोटा था, १९३४-३५ की बात है ! मैंने शायद उन्ही दिनों होश सम्हाला होगा ! तभी एक "समर वेकेशन" बिताने के लिए हम " बलिया सिटी " स्थित अपने पूर्वजों के घर  "हरवंश भवन" गये 

शायद आज बहुत लोगों को नहीं याद होगा कि यह ,'बलिया' यू.पी .के सुदूर पूर्व का वह पिछडा जिला है,किसी जमाने में जहां के निवासियों को "बलियाटिक" नाम देकर उनका खूब मजाक उडाया जाता था !  केवल भारत में ही नहीं वरन समस्त विश्व में भारत के ये कुख्यात "बलियाटिक" जन, "महामूर्ख" समझे जाते थे ! [ परन्तु वास्तविकता कतई ऎसी नहीं थी ]

भैयाजी ! सत्य तो यह है कि "बलिया" की धरती पर अनेक ऐसे प्रतिष्ठित महापुरुष अवतरित हुए जिनका लोहा समस्त विश्व ने समय समय पर माना ! '
बलियाटीकों' की   इस नामावली में अनेक देशभक्त और जाने माने वैज्ञानिक ,गणितशास्त्री आदि महापुरुष शामिल हैं!

सर्वप्रथम देशभक्तों का उल्लेख करूँगा ! १८५७ में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मेरठ की फ़ौजी छावनी में बगावत की पहली चिंगारी प्रज्वलित करने वाले वीर सेनानी "मंगल पांडे" इसी बलिया जिले के थे !  

'महात्मा गांधी' के अगस्त १९४२ के "अंग्रेजों भारत छोडो" आंदोलन में ,इन बलियाटीकों ने ही ब्रिटिश शासकों को  लोहे के चने  चबवा दिए थे ! उन दिनों जब सारा भारत  अंग्रेजों के आतंक से थर्रा रहा था इन बलियाटीकों ने वीर चीतू पांडे के नेतृत्व में ,कुछ दिनों के लिए ब्रिटिश दासता की जंजीर तोड़ दी थी और बलिया की कलक्टरी पर से ब्रिटिश "यूनियन जेक" उतरवाकर गांधी का विजयी विश्व प्यारा तिरंगा फहरा दिया था ! उन्होंने कुछ समय के लिए बर्बर अंग्रेजी हुकूमत से अपने जिले को पूर्णतःस्वतंत्र करवा लिया था !  बलिया जेल से सभी राजनेतिक कैदी रिहा कर दिए गये थे ! अब तो ये बातें  शायद ही किसी को याद हो !, 

एक और बात याद आ रही है :  पुनः बलिया पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए ,यू.पी. के तत्कालीन गवर्नर सर मौरिस हेलेट नें भयंकर बारूदी शक्ति प्रयोग करके  सीधेसाधे निहत्थे अहिंसक बलियावासियों पर भयंकर ज़ुल्म तोड़े और बलिया की सत्ता पुनः वापस पाई ! इसका ज़िक्र शायद ही इतिहास की पुस्तकों में हो ! 

बलियावालों की शूरवीरता का अंदाजा आप इससे ही लगा सकते हैं कि इस गवर्नर ने  बलिया पर पुनः सत्ता स्थापित कर लेने के बाद बड़े गर्व से  ब्रिटिश साम्राज्ञी को 'तार' द्वारा सूचित किया था कि "ब्रिटिश फौजों ने बलिया को पुनःजीत लिया "! उस तार की शब्दावली कुछ ऎसी  थी, " Ballia Reconquered"! इस वाक्य से ही आप समझ गये होंगे कि उस बर्बर अंग्रेजी शासक  के मन में इन बलिया वासियों  से कितनी दहशत थी ! ये बात भी कदाचित अब तक हम सब पूरी तरह भूल चुके हैं ! 

बलिया मे जन्मे महापुरुषों की नामावली बहुत बड़ी है -देशभक्त मंगलपांडे  और चीतू पांडे के अलावा जो नाम अभी मुझे याद आ रहें हैं वे हैं - श्री जय प्रकाश नारायन , श्री राजेन्द्र प्रसाद जी ,चंद्रशेखरजी तथा विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ  गणेशी प्रसाद जी ! आज भी विश्व की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटियों में बलिया से सम्बन्धित अनेक 'साइंटिस्ट' वैज्ञानिक शोध कार्यों में लगे हैं और अति महत्वपूर्ण अनुसंधान कर रहें हैं ! 

अपनी मात्र भूमि का गुण गान यहीं छोड़ मैं स्वामी विवेकानंद सम्बन्धी अपनी आत्म- कथा आगे बढाता हूँ :-

हा तो १९३४ -३५ में बलिया पहुँच कर ,खानदानी कोठी "हरवंश भवन" में अपने ताऊजी के बड़े बेटे की बैठक की दीवारों पर करीने से लटकी तस्वीरों के बीच हमे दो ऎसी तस्वीरें दिखीं जो न तो हिंदू देवी देवताओं की थीं और न हमारे पूर्वजों की ! 





उनमे से एक "ब्लेक एंड  व्हाईट"' तस्वीर थी ! वह एक अति साधारण से मटमैले परिधान में लिपटे अर्धनग्न ग्रामीण ,बढी हुई दाढी और आधी मुंदी आँखों वाले किसी कृशकाय पुरुष की थी ! क्षमा प्रार्थी हूँ , उस समय ६ - ७ वर्ष की अवस्था में जब मुझे दुनिया जहांन का कोई ज्ञान नहीं था मुझे आश्चर्य हुआ था कि कानपूर के  हमारे घर के रसोइये मोतीतिवारी का चित्र वहाँ क्यों लगा था ?  प्रियजन ,चित्रित व्यक्तित्व इतना साधारण था ! वर्षों बाद जाना कि उस साधारण व्यक्तित्व का सूक्ष्माकार कितना दिव्य एवं चुम्बकीय आकर्षण युक्त था ! वह चित्र परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव जी का था !

दूसरा वाला चित्र रंगीन था ! बड़ा ही मनमोहक , किसी देव पुरुष के समान आकर्षक व्यक्तित्व वाले ,बड़ी बड़ी तेजस्वी आँखों से हर देखनेवाले को निहारते गेरुआवस्त्र धारी किसी सन्यासी का ! 
उस नन्ही उम्र में भी वह चित्र देखते ही मेरा मन उस चित्रित व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित हो गया था !  वह चित्र था स्वामी विवेकानंद का !



                                             


बहुत छोटा था , ५ - ६  वर्ष का ,कानपूर पहुँच कर उन दोनों महात्माओं के चित्रों को बिलकुल ही भूल गया !  यहाँ ,  बड़े भैया के कमरे की दीवारों पर 'अछूत कन्या' फिल्म के 'अशोक कुमार - देविका रानी' और देवदास के 'कुंदन लाज सैगल और उनकी पारो तथा चन्द्रवती  [ हीरोइनों के नाम नहीं याद आ रहे हैं ] के चित्र लगे थे ! यहाँ "बालम आय बसों मेरे मन में"  तथा "तडपत बीते दिन रैन" का रियाज़ चलता था ! मैं भी उसी रंग में रंगता गया ! छोडिए  भी इन बीती -बातोंको ---

समय बीतता रहा ! मैं  बढ़ते बढ़ते  २२-२३ वर्ष का होगया ! १९५० में , बनारस हिंदू  यूनिवर्सिटी से बी.एससी. [इंड.केम] की डिग्री प्राप्त करके आजीविका कमाने के चक्कर में पड़ गया ! 

अब आगे की कथा सुनिये कि 'गदह पचीसी' में ,जब नवयुवकों को बर्बाद करने के लिए ,अनेकानेक सांसारिक प्रलोभन  बांह फैलाए खड़े रहते हैं , मैं कैसे बाल बाल बचता रहा !

प्रियजन उस अवस्था में प्यारे प्रभु ने ही मेरी रक्षा की ,एक बार पुनः मुझे  परमहंस ठाकुर रामकृष्ण देव तथा स्वामी विवेकानंद जी की याद  दिलाकर :

ब मुश्किल तमाम उस जमाने में मुझे सरकारी नौकरी मिल ही गयी !  भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की एक 'आयुध निर्माणी' में "नोंन गजेटेड  ऑफिसर - अंडर ट्रेनी " की ! इस केन्द्रीय संस्थान का हेड ऑफिस कलकत्ते में था अस्तु जैसा होता है इस कार्यालय  में मेरे साथ काम करनेवाले  अधिकतर  "कलीग्ज़" और "बौसेज़" -'सोनार बांग्ला' के मूल निवासी थे ! 

दफ्तर के उस 'लघु बंगाल' में, दिन के ९  घंटे केवल बांग्ला , हाँ केवल बांग्ला भाषा के 'लिंग भाव से मुक्त'  सम्वाद सुनने को मिलते थे ! "क्या भोला सा --- आज चाय नहीं खिलाएगा ? आज के तोमार चास आचे " !  स्वाभाविक है , तब मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था ! हिन्दी प्रदेश में दिन भर बंगला सुनना - लेकिन कष्ट की बात  छोडिये  मुझे उन  बंगवासी मित्रों की संगत से कुछ बड़े लाभ भी हुए जिन्हें मैं  आज अपने ऊपर 
की हुई अपने प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा ही मानता  हूँ !

लगभग ये सभी सहकर्मी बंधू मुझसे उम्र में काफी बड़े थे और इत्तेफाक से सभी परम 'आस्तिक' भी थे ! इनमे से कोई मा जगदम्बिके भवानी का , कोई माँ दुर्गा का,कोई माँ काली और कोई चैतन्य महाप्रभु तथा मा आनंदमयी का भक्त और उपासक था !  

हमारे इमीडीएट बोस श्री  मित्रा , परमहंस ठाकुर राम कृष्ण देव तथा स्वामी विवेकानंद जी के परम अनुयायी थे ! उन्होंने मुझे आर .के .मिशन द्वारा प्रकाशित अन्य ग्रंथों के साथ साथ 'गोस्पेल्स ऑफ रामकृष्ण" नामक इंग्लिश किताब पढ़ने को दी ! इन पुस्तकों के पढ़ने से ,परमहंस जी के अनेक ऐसे उपदेश मेरे सन्मुख आयेजो तत्क्षण ही मुझे भा गये और मैंने उन उपदेशों को पत्थर की लकीरों के समान अपने जीवन में उतार लिया !  उनमे से कुछ सूत्र जो मुझे अभी भी याद हैं  ,वे हैं  :-

  • अनहोनी प्रभु कर सके ! होनहार मिट जाय !! [सब हो सकता है ! कुछ भी असंभव नहीं , अपने कर्म, पूरी तन्मयता से करते रहो !]
  • जैसे समुद्र में रत्न हैं वैसे ही ईश्वर संसार में व्याप्त है ! [तत्परता से उसे खोजो वह , मिल जायेगा !!]
  • कीजिए ध्यान कोने में , वन में या मन में ! [कहीं भी ध्यान लगाओ  तुम्हे "प्रभु"  अवश्य मिल जायेगा !!]
  • एक ही प्रभु यहाँ "कृष्ण" बन कर अवतरित हुए और वहाँ "ईसा" बन कर !![दोनों ही पूज्यनीय  है , वन्दनीय हैं , आराधनीय हैं , किसी को कम न समझो !!]
  • आध्यात्म का लाभ ह्रदय की शुद्धता से होता है !! [अपना मन साफ़ रखो ! स्वच्छ आईने में सब कुछ साफ़ साफ़ दिखेगा - तुम अपना "सत्य" स्वरूप देख लोगे !!]

प्रियजन ,ठाकुर के दो आदेश जिनके अनुकरण ने मुझे  अत्यंत लाभान्वित किया ,वे थे  
" पर-चर्चा निषेध " - " पर-छिद्रान्वेषण निषेध "!
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शेष अगले अंक में 
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

कण कण में व्याप्त - 'तू ही तू ' - Feb. 10 / 11 - 2013'

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हे सर्वज्ञ,  सर्वत्र ,  सर्वशक्तिमान-"प्रभु" 
 मेरा तो केवल एक "तू" ही है , 
अन्य कोई भी नहीं,अन्य कुछ भी नहीं है मेरा ,
यदि कोई है तो बस एक 
 "तू ही है" 
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भारतीय वेदान्तिक सिद्धांतों पर आधारित ,सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज तथा स्वामी विवेकानंद जी एवं अन्य गुरुजनों की रचनाओं और प्रवचनों से प्रेरित,प्यारे प्रभु की सर्वगुण सम्पन्नता तथा हम जीवधारी मनुष्यों की निर्गुनता तथा परवशता झलकाते मीरा के इस भजन  - 
"मैं निरगुनियाँ गुन नहीं जानी एक धनी के हाथ बिकानी " की सार्थकता दर्शाता मेरा निम्नांकित भजन सुने----

तू ही तू 
रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 
सकल सृष्टि का सिरजन हारा  ,सब का ही रखवैया तू  
तू ही तू 

डाल डाल में,पात पात में , मानवता के हर जमात में 
हर मजहब, हर जात पात  में , एक  तुही है तू ही  तू  
तू ही तू 

 रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 


   -


रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 

सागर का खारा जल तू है, बादल में हिम कण में तू है 
गंगा  का  पावन जल तू   है  ,  रूप अनेक  'एक' है तू 
तू ही तू 
रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 

चपल पवन के स्वर में तू है , पंछी के कलरव में तू है 
भंवरों के गुजन  में तू  है , हर स्वर में,  ईश्वर  है तू  
तू ही तू 
रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 

तन है  तेरा ,  मन  है तेरा , प्राण हैं  तेरे, जीवन तेरा  
सब हैं  तेरे ,सब  है  तेरा ,  पर मेरा  इक  तू  ही  तू  
तू ही तू 
रोम  रोम  में  रमा   हुआ  है , मेरा   'राम'  रमैया  तू 
सकल सृष्टि का सिरजन हारा, सब का ही रखवैया तू  
 ["भोला"]
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शब्दकार , स्वरकार ,गायक : 
व्ही .एन .श्रीवास्तव  "भोला"
 सहयोग 
श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

Swami Vivekananda - Feb. 7/8 , 2013

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Swami Vivekananda
(Continued from my earlier Blog of Feb. 3 ,2013)
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An advocate of Vedantic Hinduism, Swami Vivekananda believed that all world religions endeavor to evolve one and the same omnipotent, ,omnipresent, omniscient 'GOD' out of each material 'Man'. The idea and inspiration of this evolution process arises from 'within' the 'man'. Thus it is evident that the same God is the source of inspiration for all World religions . How could therefore one religion be inferior to the other.(Barrows 1893b,977-?)

Swami ji believed that contradictions among religions were only apparent and came from the same truth adapting itself to the different circumstances of different natures  of the followers of the particular religion .

Vivekananda's ultimate goal was undoubtedly represented in his proposal of a “UNIVERSAL RELIGION which would:   

1.  hold no location in place or time

2.   which would be INFINITE like GOD whose SUN shines equally upon the followers of RAM. KRISHNA ,CHRIST and Mohammed Saheb as also on all Saints and Sinners, without any discrimination what so ever and which would not be just for the Hindus , Buddhists, Christians or Muslims  . 

3,  This UNIVERSAL RELIGION would preach the entire HUMANITY - all  recipients of GOD's FAVOURS [ sunshine , rain , fresh air etc.] the RELIGION of TRUTH, LOVE and PITY  and would still have infinite space for development .
   
4. This UNIVERSAL RELIGION would endeavor to formulate a place for every human being, from the lowest groveling man to the highest mind towering almost above humanity. 

THE EFFECT - THE RESPONSE    

These statements captivated the attention of the American audience who had been influenced by Swami Vivekanand's proposal of a new  evolutionary way of thinking to create a different model of “human progress” that every religious people could dream of,. This however  was more intriguing than that of the inclusivist model proposed by Barrows. 

What Vivekananda meant by the “UNIVERSAL RELIGION” was not that all religious traditions would be disappeared and replaced by a new and single religion. 

Rather, it would be an authentic togetherness of all religions, in which “each must assimilate the others and yet preserve its individuality and grow according to its law of growth” . The necessity to “assimilate the others” was expressed by Vivekananda as the avoidance of the triumph of any one of the religions over others. He stated:  
Do I wish that the Christian would become Hindu? 
God forbid. 
Do I wish that the Hindu or Buddhist would become Christian? 
God forbid
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(Quoted from various publications -Courtesy 'Google') 

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Dear Readers , 

I am 83 + today. During these years ,I have spent good lengths of time in such countries which lovingly reared communities devoted to different Religious Faiths . 

In some countries I noticed that several communities with differing , rather diametrically apart , religious faiths , lived jointly in perfect peace, harmony and happiness with each other .

In one of these countries we saw a family in which the grand old man being a Muslim by birth followed the ISLAMIC rituals and his wife remained - a staunch Christian through out her life of over 60 years. His eldest daughter-in- law came from a HINDU family and they all lived in perfect peace always , Later we met with several other families also in which members having different religious faiths ,lived very lovingly together .  

In all such families , existed the authentic togetherness of the various  religions and their mutual assimilation without compromising the   individuality of each as envisaged  by Swami Vivekanand JI in 1893 and propagated by Sri Sri Aurobindo , Swami Shivanand (Rishikesh)   Swami Chinmayanand ji etc. later in the 20th century .

Capsuling some of the above feelings I quote,here under per-courtesy Shri Anil Shrivastava of Singapore -

A meaningful  poem written by the first Indian Nobel Laureate  
(for literature) in the year 1913  -  Dr. Rabindranath Tagore 
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 Go not to the temple to put flowers upon the feet of God,
First fill your own house with the Fragrance of love......

Go not to the temple to light candles before the altar of God,
First remove the darkness of sin from your heart.......

Go not to the temple to bow down your head in prayer,
First learn to bow to humility before your fellowmen.....

Go not to the temple to pray on bended knees,
First bend down to lift someone who is down-trodden..

Go not to the temple to ask for forgiveness for your sins,
First forgive from your heart for those who have sinned against you.
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Why can't we -Indians,who ,in the past practicing the aforesaid tenets of our Vedantic Religion , happily assimilated in our society followers of several widely differing Religious Faiths ,continue to practice the same  UNIVERSAL RELIGION of TRUTH, LOVE and PITY for the good of the entire universe ,in the name of one UNIVERSAL LORD.
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 A wishful thought of a genuine HINDU from INDIA-
"V. N. SHRIVASTAV"-"BHOLA" 
Cooperation - Smt.Krishna Bhola, 
Contribution : Smt.Shree Devi , Sri Anil Shrivastava 
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I presume the Foot Note at the bottom has been
anonymously tagged by one of my children
   without my knowledge. In response I have just to say -.
" I don't deserve the compliment Beta. I could n't have done it
without the family's cooperation"+  
LOVE U  DEAR .GOD BLESS U ALL
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We are fortunate you have 'lead us by example' in following this universal religion!
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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

विवेकानंदजी की वाणी & a report on World Parliament of Religions (1893)

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स्वामी  विवेकानंदजी  की  वाणी 


अथाह है स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित आध्यात्मिक साहित्य और असीम है उनकी रचनाओं मे संग्रहीत ज्ञान ! किसी ने ठीक ही कहा है कि उनकी समस्त रचनाओं के गूढ़ रहस्यों को साधारण मनुष्यों को समझाने के लिए कदाचित उन्हें ही एक बार फिर इस धरती पर अवतरित होना पड़ेगा !

प्रियजन , हमने तो सागर तट  पर  बैठे बैठे कुछ कंकर पत्थर बीन लिए और आपकी सेवा में प्रस्तुत कर दिए ! सागर की गहराई में पैठ कर ज्ञान के अमूल्य मोती ले आना इस उम्र में , हमारे सामर्थ्य के बाहर है ! गुरुजन की प्रेरणा से हमने अब तक लिखा है और जितना बन पायेगा आगे भी लिखते रहेंगे !

चलिए अब हम गतांक से आगे बढ़ें :-

आज हम आपके समक्ष स्वामी जी के विविध सम्वादों से संकलित उनके अनमोल वचनों को  अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहे हैं ! हमारे कथन में भाषा भेद अवश्यम्भावी  है ! हमारी  कम अकली के कारण भाव भेद भी होंगे , जिनके लिए क्षमा प्रार्थी हैं हम !

मानव तुम सर्व प्रथम अपने आप को पहचानो ! तुम्हारी यह देह [यह नश्वर काया] "तुम" नहीं हो !  यह मानव शरीर, मात्र तुम्हारा वस्त्र है, परिधान है ! वास्तव में "तुम", वह सनातन चैतन्य "आत्मा" हो जो इस देह रूपी परिधान को धारण किये हुए है ! अविनाशी सूक्ष्म आत्मा का यह काया रूपी  वस्त्र जड़ है , नाशवान है !

श्रीमदभगवदगीता के सांख्य योग के श्लोक - " वासांसि जीर्णानि -----नवानी देही " तथा  "नैनं छिन्दन्ति ----मारुतः"  का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने समझाया :-

जैसे पुराने वस्त्र तज कर मनुज नूतन वस्त्र धारे ,
[ मृत्योपरांत ]   
जीर्ण तन को त्याग वैसे जीव भी  नव् देह  धारे !! 
[श्रीमद भ.गीता, अध्याय -२  ,श्लोक २२ ]
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[ अनश्वर आत्मा के गुण ]
आत्मा कटे ना शस्त्र  से ,ना ये जले है आग से   
      ना सूखता यह वायु से, ना 'जल' गला पाए इसे  !! 
[श्रीमद भ.गीता ,अध्याय- २ ,श्लोक २३ ]
(भोला )
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"आत्मा" न तो "पुरुष" है न "स्त्री"!   न "हिंदू"' है , न "मुसलमान"'!  न "यहूदी" है , न "पारसी" और  न "ईसाई" ! वास्तव में आत्मा-"कर्म-प्रवर्तक" ,याज्ञिक और परम पवित्र, दैवी शक्ति से युक्त ऊर्जा है ! 

हमारा धार्मिक लक्ष्य है कि हम अपनी आंतरिक और बाहरी प्रकृति को नियंत्रित करके , सहज आत्मज्ञान द्वारा अति स्पष्टता से  प्रत्येक आत्मा की असंदिग्ध दिव्यता को ,  पहचाने और स्वीकारें !

याद रखिये कि सभी धर्मगुरु आत्म ज्ञान की ईश्वरीय प्रेरणा तथा तत्कालिक मनोविज्ञान एवं दर्शन शास्त्र के अध्ययन से अपने अनुयायियों के लिए उचित कर्म काण्ड ,उपासना , आराधना तथा साधना की क्रियायें निर्धारित करते हैं !  देवी प्रेरणा से अनुसंधानित सब धर्मों के सभी मौलिक कर्म  सार्थक हैं ! आत्मिक ज्ञान से उपजी कोई भी धार्मिक क्रिया निंदनीय नहीं है , निरर्थक नहीं है !

ये दूसरी बात है कि कालांतर में सभी धर्मों के बाह्य स्वरूपों में कुछ परिवर्तन हुए , वे प्रदूषित हुए  परन्तु उनका मूल स्वरूप नहीं बदला है ! अस्तु आस्थावान सभी विश्वासी जनों को अपने अपने धर्म का पालन करते रहना चाहिए !  अन्य धर्मों के दोष देखने के बजाय अपने धर्म के पालन से ही मानव का कल्याण होगा !

 मानव धर्म- के  सनातन मूल सूत्र  यें है ----

१. सिद्ध गुरु की कृपा से "परम सत्य" को जानना !

२. सत्य जानकर  निजी आध्यात्मिक अनुभूतियों के आधार से  सब प्राणियों को अपना         मानना और सबसे "प्रेम" करना !

३. "प्रेम" के कारण  मन में जागी "करुणा'  से "परहित" करना और "सेवारत" होना !

४  अहिंसा का प्रतिपालन करना !

सभी "धर्मों" के  सद्गुरुओं के सिद्धान्तात्मक उपदेश तथा उनके परम्परागत निर्धारित कर्मकांड ,उनके सदग्रन्थ और  उनके मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर और गुरुद्वारे ,"सत्य ,प्रेम और करुणाजनित अहिंसा ,दया , क्षमा, सेवा ,परहित आदि मानवीय आचरणों को  ही  "मानव धर्म" की संज्ञा देते हैं !"

विश्व के लगभग सभी धर्मगुरुओं का कहना है  कि " मनुष्यों द्वारा करणीय [करने योग्य] सब सत्कर्म ही मानव धर्म हैं "

अस्तु हे मानव कुशल कर्मों की सम्पदा अर्जित कर और उनके द्वारा अपना चित्त [मन] निर्मल कर ! निर्मल चित्त से किया हुआ प्रत्येक कार्य ही धर्म है ! इस धर्म के पालन से अन्ततोगत्वा मनुज अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेगा ! तुलसी के ईश "राम" ने स्वयम ही कहा है ,  "निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा' !

अब संत शिरोमणी तुलसीदास जी की याद आगयी तो आइये सुन लीजिए तुलसीकृत रामचरित मानस में "मानव धर्म" के विषय में रामायण के दिव्य पात्रों द्वारा बोले कुछ अनमोल वचन , अपने इस दासानुदास "भोला" के स्वर में :-
 
मानव धर्म 

धरम न  दूसर  सत्य  समाना , आगम  निगम पुरान  बखाना !
   परम धरम श्रुति विदित अहिंसा ,पर निंदा सम अघ न गरीसा !

   पर हित सरिस धर्म नहि भाई , पर पीड़ा सम नहि अधमाई !
   पर हित बस जिनके मन माही ,तिनकहु जग दुर्लभ कछु नाही !





 साधू चरित शुभ चरित कपासू , निरस विसद गुनमय फल जासू 
जो सहि दुःख पर छिद्र दुरावा , बंदनीय तेहि जग जस पावा 

अघ कि पिसुनता सम् कछु आना , धरम कि दया सरिस हरि जाना 
'निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा'



मनुज तुम अपनी नैसर्गिक  दिव्यता को जानो, ! साधुता अपनाओ ! संत महात्माओं जैसे कर्म करो ! उनके "कपास" सदृश्य  चरित्र से शिक्षा ग्रहण करो ! परछिद्रानुवेष्ण  न करो  ! इसके विपरीत , तुम  साधुओं के समान , दूसरों के अवगुणों को अपने अस्तित्व की बाजी लगाकर भी , ढकने का प्रयास करो !

अस्तु प्यारे भाई बहनों तुम सर्वप्रथम अपने इस "आत्मिक स्वरूप " को पहचानो , अपनी दिव्यता पर विश्वास करो , अपनी सात्विक ऊर्जा को जानों और मानो ! प्रियजन  विश्वास करो इस प्रक्रिया से  तुम परमात्मा  के  अस्तित्व  को  जान लोगे और अपने इस  मानव  जीवन का "प्रेय" और "श्रेय" दोनों ही प्राप्त कर  लोगे  !

क्रमशः 
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निवेदक:- व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग :- श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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हिन्दी भली भांति न पढ़ पाने वाले बंधुओं के लिए हम अंग्रेजी भाषा में 
स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में दिए प्रथम भाषण 
के कुछ अंश यहाँ उध्रत कर रहें हैं -

Swami Vivekanand 's Address to the

World Parliament of Religions (1893)

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Sisters and Brothers of America

[At this moment came the three minute standing ovation from the audience of 7,000]

  • It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions; and I thank you in the name of millions and millions of Hindu people of all classes and sects.
  • My thanks  also to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration.
  • I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration but we accept all religions as true. I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites who came to Southern India and took refuge with us in very year in which their holy temple was shattered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation.
  • I will quote to you brethren a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest childhood, which is every day repeated by millions of human beings: 'As the different streams having their sources in different places all mingle their water in the sea, so, O Lord, the different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to Thee...
  • The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world of the wonderful doctrine preached in the Gita: 'Whosoever comes to me, though whatsoever form, I reach him; all men are struggling through paths which in the end lead to me.'
  • Sectarianism, bigotry, and it's horrible descendant, fanaticism, have long possessed this beautiful Earth. They have filled the earth with violence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization, and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now.
  • But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honour of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the sword or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.

[edit] Courtesy -  गूगल - विकेपेडीया 



महावीर बिनवउँ हनुमाना ब्लॉग खोजें

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