सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 26 अगस्त 2013

जागो बंसी वारे ललना - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई

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सभी प्रियजनों को 
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई
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बधइया बाजे आंगने में 
श्याम सलोने कुंवर कन्हैया झूलें कंचन पालने में 
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आज "श्रीकृष्ण" जन्म के सुअवसर पर आनंद मंगल मनाते मनाते अपने अतीत की एकाध बात बताऊँ और जीवन के ८४ - ८५ वर्षों के अनुभव पर आधारित कुछ विचार विनमय हो जाए -  


कन्हैया कन्हैया तुम्हे आना पडेगा
वचन  गीता वाला  निभाना पडेगा
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आओ आओ यशोदा के लाल
आज मुझे दर्शन से कर दो निहाल
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आना कृष्ण कन्हैया , हमारे घर आना
माखन मिसरी दूधमलाई जो चाहे सो खाना 
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पिछले ७-८ दशकों में  ,लगभग सभी सत्संगों में मैंने कृष्ण भक्त देवियों  से उपरोक्त कीर्तन सुने हैं ! घर गृहस्थी के काम काज करते करते मैंने अपनी प्यारी माँ को भी अक्सर ऐसे भजन गुनगुनाते सुना है ! बुआओं , दीदियों ,भाभियों और अपने पड़ोसियों से भी मंगलवार की दोपहरी में आयोजित घरेलू सत्संगों में अक्सर बेताला ढोलक की थाप और मंजीरों की खनक पर इन भजनों को गाते और उनकी धुन पर ,ठुमक ठुमक कर नाचते लुक छुप कर देखा सुना है !
[आज की नहीं, बच्चों ,यह ७०-८० वर्ष पुरानी बात है
 हमारे इस बचपने काअनुकरण नहीं करियेगा]  

आज इन भजनों को  सुनकर मन में यह प्रश्न  उठता है कि देवियाँ  इतने प्रेम से किेस "कृष्ण कन्हैया" को बुला रही हैं ? 

क्या ये देवियाँ , उस "श्रीकृष्ण" को पुकार रही हैं जो हजारों वर्ष पूर्व इस धरती पर अवतरित हुए और मानवता को 'गीतामृत' पिला कर ज़ोरदार शब्दों में यह बता गये कि निराकार ब्रह्म "ईश्वर" के रूप में प्रत्येक 'भूत'- जीवधारी प्राणी के ह्रदय में आजीवन विद्यमान रहते हैं 

श्रीमदभगवद्गीता में उनका यह वचन तो आपको याद ही होगा :

ईश्वर: सर्व भूतानाम हृदयेशेअर्जुन तिष्ठति ! 
भ्राम्यन् सर्व भूतानि यंत्रारूढानि मायया !!

हमारे हृदय में बैठा "वह"- 'सर्व शक्तिमान सर्वज्ञ-परमात्मा- 'ईश्वर' जीवन में प्रति पल हमारा मार्गदर्शन करता है ! वह हमे हमारे जीवन में आने वाले सब संकटों की पूर्व सूचना देता है और हमे उनसे बचने के रास्ते बताता है 

कैसी विडंबना है यह कि हम अपने  हृदय के आसन पर आरूढ़ उस ईश्वर के बहुमूल्य सुझावों की अनसुनी करते जाते हैं और फिर चिल्ला चिल्ला कर उन्हें पुकारते हैं कि "हे नाथ पुनः एक बार आ जाओ और हमारी रक्षा करो" !

और सुनिए -   शैशव में अपनी बूढ़ी दादीमाँ के दंतहीन मुख से लगभग हर प्रातः मैंने सुना था एक भजन - [ कदाचित वह भजन उनकी प्रातःकालीन पूजा का एक अंश था ] दादी, अपने ठेठ भोजपुरी लहजे में मीरा का एक पद गातीं थीं !  

" जागाहे बंसी वारे लाला जागाहे नन्द दूलारे "

उनके गायन की विशेषता यह थी कि शब्दों के फेर बदल के साथ वह इस भजन को किसी एक विशेष राग में गातीं थीं जिसे वह "परभाती" कहतीं थीं ! जो भी हो समय के साथ धीरे धीरे मैं दादी के उन भोजपुरी शब्दों को तो पूरी तरह भूल गया परन्तु आज तक मैं उनकी वह विशेष धुन - उनकी उस "प्रभाती राग" की बंदिश को नहीं भूल पाया ! आगे सुनिए -

इत्तेफाक से , १९५१ - ५२ में छोटी बहन माधुरी के रेडियो प्रोग्राम में गाने के लिए रेडियो स्टेशन से "शेड्यूल" किया मीरा बाई का वही पद आया ! जी हाँ वही भजन जिसका भोजपुरी रूपान्तर मैंने अपनी दादी से बहुत बचपन में सुना था !  तुरंत ही मुझे दादी की वह प्रभाती राग की बंदिश याद आई - और मीराबाई का वह पद उस बंदिश में 'चूल ब चूल' बैठ गया - 

प्रियजन मैंने तब जब उस  भजन को कम्पोज किया ,२० वर्ष का था , आज ८४ - ८५ का हूँ ! गले में खराश है , बार बार खांसी आ रही है - अस्तु कांन बंद कर सुनिए , परन्तु आँखें न बंद करियेगा ! कृष्णा जी ने अत्याधिक परिश्रम करके ,न जाने कहाँ कहाँ से खोज कर "श्रीकृष्णजी"  के बड़े ही सुंदर एवं  चित्ताकर्षक  चित्रों से इस  वीडियो  की संरचना  की है !   मीरा के भाव पूर्ण शब्द और कृष्ण के वे चित्र आपको भाव विभोर कर देंगे ! 

[ प्रियजन गाते समय मेरी आँखें बंद थीं , मैं पूरी तरह रोमांचित था और तभी कृष्णा जी ने , मुझे बिना बताये, घरेलू केसेट रेकोर्डर पर ही वह भजन रेकोर्ड कर लिया और निश्चय किया कि जन्मास्टमी के शुभ दिन् वह चित्रों से सुसज्जित  यह भजन आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगी ] 

पेश है वही भजन ! कृपया सुनिए साथ साथ गाइए ! घर एवं विद्यालयों में बालक बालिकाओं को सिखाइये और इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण से पाए  "गीता ज्ञान" के "दैविक भाव" सभी भक्तों के मन में जगाइए ! 


जागो जागो जागो
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मीरा बाई का पद :

जागो वंशीवारे ललना जागो मोरे प्यारे 

रजनी बीती भोर भयो है , घर घर खुले किवारे ,

गोपी दही मथत सुनियत है कंगना के झनकारे !!
जागो वंशीवारे ललना जागो मोरे प्यारे 


 



उठो लालजी भोर भयो है सुर नर ठाढे द्वारे ,
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल ,जय जय शब्द उचारे !!
जागो वंशीवारे ललना जागो मोरे प्यारे 

माखन रोटी हाथ में लीजे गौवन के रखवारे ,

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ,सरन आया को तारे !!
जागो वंशीवारे ललना जागो मोरे प्यारे 

(भजन - मीराबाई )

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वे प्रियजन जो ई मेल द्वारा मेरे आलेख पढते हैं उनके लिए यह भजन सुनने / देखने का यू. ट्यूब का लिंक :
http://youtu.be/ELSVNh3nPnk
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इस भजन के विषय में अभी अभी मेरे मन में यह भाव उठा है ; प्रभु प्रेरणा से ही होगा , अस्तु लिखे देता हूँ :

योगेश्वर "श्रीकृष्ण" कब सोते हैं ? सोये तो हम सब हैं ! बजाय स्वयम को जगाने के हम उल्टे भगवान श्रीकृष्ण को ही जगा रहे हैं !  

प्रियजन हमम सब को ,श्रीकृष्ण को नहीं , अपने अन्तस्थल में सुसुप्त कृष्ण भाव को दादी की वह "प्रभाती" सुना कर जगाना है ! विश्वास करें , इसमें ही अपना कल्याण निहित है !

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निवेदक :  व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला" 
वीडीयोकरण :  श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
साउंड ट्रेक संपादन :  राघव रंजन  (पुत्र)
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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

आज़ाद भारत की आवाज़ - "उत्तराखंड हम तुमरे साथ हैं"

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   सभी भारत वासियों को 
"१५ अगस्त"
  स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई   


हम इस समय यू एस ए में टेलीविजन पर भारत के फिल्म और टेलीविजन से संबंधित विभूतियों द्वारा आयोजित रंगारंग कार्यक्रम "उत्तराखंड हम तुम्हारे साथ हैं " देख रहे हैं ! 

अभी अमिताभ बच्चन जी उत्तराखंड की त्रासगी प्रदर्शित करती श्री प्रसून जोशी की कविता " देखो मेरा देश रो रहा है ",'रिसाईट' कर रहे हैं ! इससे पहले अमित जी ने अपना संदेश इन शब्दों से शुरू किया था :

आज के दिन हम आज़ाद हुए हैं  :

प्रियजन ,  अमित जी के उपरोक्त शब्द सुनते ही मेरी बूढ़ी बुद्धि को कुछ याद आया ! १९४७ में कानपुर की नगरपालिका द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस के सांस्क्रतिक कार्यक्रम में गाने के लिए मैंने अपनी छोटी बहिन माधुरी के लिए [जो तब केवल १२  वर्ष की थी] एक गीत लिखा, उसकी धुन बनाई और उसे बहन को सिखाया ! कार्यक्रम से लौट कर माधुरी ने बताया कि उसके गीत में देशभक्त शहीदों के नाम और उनकी कुर्बानी की बातें सुन कर हाल में उपस्थित जनता तथा मंच पर बैठे सभी नेता ,स्कूल के टीचर और अधिकारी रो पड़े और उसके स्कूल की हेड मिस्ट्रेस श्रीमती आर के आगा ने उसे गले से लगा लिया ! 

इत्तफाक से उस गीत की प्रथम पंक्ति के शब्द वही थे जिनसे अमित जी ने आज अपना संदेश शुरू किया ! आज के दिन हम आज़ाद हुए हैं  ! यहाँ विदेश में हमारे पास अपने उस गीत का आलेख नहीं है और ६६ वर्ष पूर्व रचित  ये गीत बहुत कोशिश के बावजूद मुझे सही सही याद नहीं आरहा है ! कोशिश करूँगा यदि मेरे बच्चों अथवा मेरी बहन माधुरी के पास इस गीत के शब्द होंगे और वो मुझे प्रेषित कर देंगे तो भविष्य में प्रियजन मैं आपको भी बता दूँगा !
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 लेकिन आज मैं आपकी सेवा में राम परिवार के एक होनहार सदस्य 
लखनऊ के प्रसिद्ध 'आई सर्जन' - डॉक्टर विश्वास वर्मा 
की स्वतंत्रता दिवस पर रचित यह कविता पेश कर रहा हूँ :
कृपया देखें कितने सामयिक और सत्य हैं उनके उदगार 


नयी रौशिनी आई है,
आज़ादी पाकर भारत ने जग में धूम मचाई है

आज़ादी की ख़ातिर हमने कितने ही बलिदान दिए
आज़ादी पाने को जाने  कितनों ने ही प्राण दिए

आज़ादी ने संविधान का हमको पाठ पढ़ाया है
आज़ादी में हमने पावन लोकतन्त्र को पाया है

आज़ादी के संकल्पों को हमने मन मे ठाना है ॥
क्या क़ीमत है आज़ादी की हमने कब यह जाना है
अधिकारों की ही चिन्ता है फर्ज़ कहाँ पहचाना है

आज़ादी का अर्थ हो गया अब केवल घोटाला है
हमने आज़ादी का मतलब भ्रष्टाचार निकाला है

आज़ादी में खा जाते हम पशुओं तक के चारे अब
‘हर्षद’ और ‘हवाला’ हमको आज़ादी से प्यारे अब

आज़ादी के खेल को खेलो फ़िक्सिंग वाले बल्लों से
हार के बदले धन पाओगे सटटेबाज़ों’ दल्लों से

आज़ादी में वैमनस्य के पहलु ख़ूब उभारो तुम
आज़ादी इसको कहते हैं? अपनों को ही मारो तुम
आज़ादी का मतलब अब तो द्वेष, घृणा फैलाना है ॥

आज़ादी में काश्मीर की घाटी पूरी घायल है
लेकिन भारत का हर नेता शान्ति-सुलह का कायल है
आज़ादी में लाल चौक पर झण्डे फाड़े जाते हैं
आज़ादी में माँ के तन पर चाक़ू गाड़े जाते है

आज़ादी में आज हमारा राष्ट्र गान शर्मिन्दा है
आज़ादी में माँ को गाली देने वाला ज़िन्दा है

आज़ादी मे धवल हिमालय हमने काला कर डाला
आज़ादी मे माँ का आँचल हमने दुख से भर डाला

आज़ादी में कठमुल्लों को शीश झुकाया जाता है
आज़ादी मे देश-द्रोह का पर्व मनाया जाता है

आज़ादी में निज गौरव को कितना और भुलाना है ?

देखो! आज़ादी का मतलब हिन्दुस्तान हमारा है
आज़ादी पर मर मिट जाना एक अरब को प्यारा है

मित्रो! आज़ादी का मतलब निर्भय भारत-माता है
आज़ादी का अर्थ दूसरा  भारत भाग्य-विधाता है

प्यारो! आज़ादी का मतलब अमर तिरंगा झण्डा है
आज़ादी दुश्मन के सर पर लहराता इक डण्डा है

[ डॉक्टर विश्वास वर्मा की स्वीकृति से प्रकाशित ]  
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निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
आभार: डॉक्टर विश्वास वर्मा
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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

गुरु चरणों में चारों धाम - परम गुरू जय जय राम

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 "गुरु ही ईश्वर गुरु ही राम"

परमात्मा श्री राम को परमगुरु स्वीकारते हुए 
हमारे गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने कहा था : 
"भगवान (ईश्वर) ही युग युग में गुरु रूप धारण करते हैं !
 भगवान के उस गुरु रूप में ही साधकों पर भगवत कृपा अवतीर्ण होती है 
जो  उनका (साधकों का) आस्तिकवाद बनाए रखती है !
आस्तिक भाव से आराधन करनेवालों के 
अन्तः करण में गुरु का आशीर्वाद बस जाता है !
गुरुजन के आशीर्वाद से 
समस्त मानव -मंडल सुधरता है तथा 
सम्पूर्ण जगत में मंगल का संचार होता है " 
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पूर्णतः समर्पित ,शरणागत साधक के लिए अविस्मरणीय होता है उसके जीवन का एक एक पल ! क्यूँ ? ! विश्वास करें , जीवन भर निरंतर मिलने वाले, उसके गुरुजनों के आशीर्वाद के फल स्वरूप उस पर सतत होती रहती है आनंददायनी "प्रभु कृपामृत" की वर्षा ;जो उसे पल भर को भी उसके गुरुजन एवं इष्ट के स्मरण से दूर नहीं होने देती !    

गुरु के मंगलदायी चरणों में उसका ध्यान लगा रहता है ,वह अपने सद्गुरु के मनभावन नाम तथा उनके श्री चरणों में चारों धाम के दर्शन करता है !-

बड़ी बेटी श्री देवी की नन्द  श्रीमती   "सौम्या राम" जो "बहरीन" यू ए ई में रहती हैं, उन्होंने अपने इंग्लिश भाषा के आध्यात्मिक ब्लॉग  "Soumya's Gitaaonline" के अंतर्गत  भारतीय संगीत शिक्षण की एक योजना बनाई है ! प्रथम प्रयास में उन्होंने एक सुंदर गुरुभक्ति -रस से रंजित भजन सिखाया है ! हमें इस भजन का एक एक शब्द गुरु महिमा को उजागर करते हुए अत्यंत सार्थक लगा तथा इसकी धुन भी बहुत कर्णप्रिय लगी ! 

प्रियजन , कुछ दिनों पहले मैंने वायदा किया था कि भविष्य में मैं अपने ब्लॉग के द्वारा कलियुग में मोक्ष प्राप्ति के सरलतम साधन "भजन-कीर्तन "के  गायन के प्रशिक्षण का प्रयास करूँगा ! खेद है कि अपनी अस्वस्थता के कारण आज तक यह कार्य प्रारम्भ न कर सका! परन्तु प्रसन्नता इस बात की है कि मेरी अतिशय प्रिय एक दक्षिण भारतीय बिटिया"सौम्या" ने अपनी ब्लॉग श्रंखला में,हिन्दी भाषा  में भजन प्रशिक्षण का श्रीगणेश कर दिया है ! मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं हैं उसके इस अभियान के लिए और यह लिखते समय मैं उसे मन ही मन बहुत बहुत आशीर्वाद दे रहा हूँ !

महाबीर बिनवौ हनुमाना के वे पाठक जो नये भजन सीखना चाहते हैं अति सुगमता से यह भजन सीख सकते हैं ! सौम्या बेटी ने उस भजन का वीडियोकृत रूप  भेजा है जिसे मैं नीचे दे रहा हूँ ! इस  वीडियो मे सीखने वालों की सुविधा के लिए, इस भजन के शब्द हिन्दी भाषा की 'देवनागरी' लिपि के साथ साथ अंग्रेजी की 'रोमन' लिपि ( इंग्लिश के अक्षरों ) में भी अंकित हैं !


भजन  

मन भावन मेरो सत्गुरु नाम् ,गुरु चरणो में चारों धाम् 
गुरु नॆ मिटाई विषय वासना ,गुरु ने जगाई भक्ति भावना
गुरु निर्मल्   मेरो गुरु निष्काम् , गुरु चरणो में चारों धाम्
मन भावन मेरो सत्गुरु नाम् ,गुरु चरणो में चारों धाम्

गुरु चरणो में चारों धाम्

मन भावन मेरो सत्गुरु नाम् ,गुरु चरणो में चारों धाम्

गुरु ने सिखाई सच् कि साधना ,जप्-तप् निष्ठा नित्योपासना
गुरु  ही  ईश्वर्  गुरु  ही  राम् ,गुरु चरणो में चारों धाम्
मन भावन मेरो सत्गुरु नाम्,  गुरु चरणो में चारों धाम्

अविचल प्रीत् कि रीत् सिखा दो, गुरुवर नैय्या पार् लगादो
लीजो  मेरो  कोटि  प्रणाम् , गुरु  चरणो  में चारों धाम्
मन भावन मेरो सत्गुरु नाम् ,गुरु चरणो में चारों धाम्
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 (इस भजन के शब्दकार, स्वरकार  के नाम नहीं ज्ञात हैं,
  गायिका श्रीमती "श्रीविद्या रंगराजन" हैं )
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मुझे  पूर्ण विश्वास है कि सौम्याबेटी का यह प्रयास विदेशों में बसे भारतीयों को जहां एक ओर ,योगेश्वर श्री कृष्ण की श्रीमदभगवत गीता के गूढतम रहस्यों से अवगत करायेगा वहीं भजनों द्वारा केवल नाम सुमिरन करके भवसागर पार करने की सुविधाजनक विधि भी बताएगा !

कुछ निज अनुभूति से बताऊँ :

गुरु की दृष्टि से ,शब्द से और स्पर्श से साधक की आत्मिक शक्ति जगती है ! साधक जहां भी जाए ,जो भी करे ,जो भी सोचे ,गुरु सदैव उसके साथ रहते हैं ! नाम के कारण गुरु और शिष्य का संबंध बड़े उत्तरदायित्व का बन जाता है  ! यह सम्बन्ध इस लोक से परलोक तक दोनों (गुरु शिष्य ) के बीच दृढता से बना रहता है और सब प्रकार से शरणागत साधक का आत्म जागरण एवं कल्याण करता है ! 

प्रियजन ; नाम चाहे सद्गुरु का हो अथवा परमगुरु परमेश्वर के अनंत नामों में से कोई एक हो,  सच्चा नामाराधक, भवसागर तो पार कर ही लेगा ! तुलसी की अनुभूति पर आधारित है उनके ये उदगार -----

कलियुग  केवल  नाम  अधारा !
सुमिर सुमिर जन उतरहि पारा !!

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निवेदक:  व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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