सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

सोमवार, 9 जून 2014

हम रिटायर्ड लोग , जीवन कैसे जियें (२)

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लम्बे अंतराल के बाद , ४ जून को, भारत से अमेरिका लौटने पर, 
अपनी अधूरी आलेख श्रंखला की याद आई ! 
अब् स्वस्थ होने पर आगे बढने का प्रयास कर रहा हूँ !

प्रियजन ,

मेरी यह ब्लॉग श्रंखला ,केवल मेरे जैसे रिटायर्ड लोगों के लिए  ही नहीं है ! मेरा सुझाव है कि सभी बच्चे बूढे और जवान ,जीवन जीने का यह नुस्खा आजमायें और इससे लाभान्वित हों ! 

अवस्था में चाहे कोई १०-२० के हों , ४० -५० के हों अथवा ८० -९० वर्ष के हों सब पर यह नुस्खा बराबर कारगर होगा !


यह भी स्पष्ट कर रहा हूँ कि मेरे ये आलेख ,केवल किसी एक व्यक्ति विशेष के अनुभवों पर आधारित नहीं है ! सिद्ध महात्माओं के कथन  में इनका मूल समाहित है  ! 



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पिछले अंक में मैंने कहा था कि : 

एक मात्र "वह" - हमारा प्यारा  सर्वशक्तिमान , परमकृपालु परमात्मा ऐसा औघड उपकारी है जो उचित समय पर बिना मांगे और बिना कीमत वसूल किये हमारी तत्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर देता है और हमारी पात्रता के अनुरूप हमे आवश्यक सभी प्रेरणाएँ तथा सुविधाएँ प्रदान कर देता  है ! "वह" और केवल "वह" ही  इतना उदार है जो "बिनु सेवा हम जैसे दीन जनों पर कृपालु होता है" !

प्रियजन विश्वास करें यह परम सत्य है ! उपरोक्त कथन किसी अन्य के अनुभवों पर नहीं , मेरे अपने इस जीवन के ८६ वर्षों के कटु और मधुर , सुखद और दुखद निजी अनुभवों पर आधारित है !


मेरा तो यह  प्रत्यक्ष अनुभव है कि केवल यदाकदा ही नहीं "वह" हमारा परमउदार  "प्रियतम प्रभु" , हमारे जीवन में प्रत्येक पल ही हम पर कोई न कोई उपकार करता है ! हमे पता भी नहीं चलता  है !

 
अस्तु 

संतों ने सुझाया है कि हम प्रातः, आँख खुलते ही सर्व प्रथम उस परमउदार , करुणासागर ,परमपिता परमात्मा को अतिशय प्रीति सहित याद करें !
मन ही मन हम "उन्हें" उनके अनंत उपकारों के लिए उनके प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त करें  ! "उन्हें" कोटि कोटि धन्यवाद दें ! 

अधिक न हो सके तो कम से कम एक बार ही सजल नयनों और अवरुद्ध कंठ से हम मन ही मन उन्हें धन्यवाद दे दें यही काफी है !प्रियजन , इतने से ही हमारी पूजा , हमारी इबादत सम्पन्न  हो जायेगी ! 


प्रियजन , छ्पन्न भोगों को तो भूल जाइए हमारे सहज आनंद निधान , "प्यारे प्रभु " हमसे यह शाब्दिक आभार - यह धन्यवाद प्रकाशन भी नहीं मांगते ! निज स्वभाव वश वह सतत हम पर अपनी कृपा दृष्टि डाले रहते हैं ! और हमे पता भी नहीं लगता ! 


सजग सचेत हो हम "उनकी" कृपामृत का पान  करते रहें , उसके प्रति "उनका" आभार व्यक्त करते रहें , उन्हें धन्यवाद देते रहें -यही काफी है ! 
हमारी उम्र के रिटायर्ड लोग बिस्तर में पड़े पड़े यह सरलतम साधना कर सकते हैं !  

आवश्यकता है पूरे मन ,सच्ची प्रीति और सच्चे लगन से अपने प्रियतम प्यारे को याद करने की  ! चमत्कार होगा , हमारी एक छोटी सी "याद" से द्रवित हो "वह"  हमारे ऊपर अपनी मधुर "दया" की बरसात करने लगेंगे अनायास ही हम उनका नाम पुकार उठेंगे ! हमारे मूक मन में स्वतः ही अखंड "नाम जाप" होने लगेगा ,और फिर क्या , प्रियजन हमारी झोली में  भर जाएगा केवल मज़ा ही मज़ा ! 

अगले अंकों में उपरोक्त कथन को स्वयम समझने और आपको समझाने का प्रयास करूँगा , अभी आँखें और मष्तिष्क दोनों जवाब दे रहे हैं !


आज इतना ही , शेष जब "हरि इच्छा" 
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निवेदक :   व्ही .  एन.  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव , MA, Ph. D
जून ९ , २०१४ 
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