सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

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प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शुक्रवार, 29 मई 2015

एक आध्यात्मिक साधन

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स्वर ईश्वर है 
स्वर साधो ईश्वर सध जायेगा !

प्रियजन , हम जैसे साधारण जिज्ञासु साधकों के आध्यात्मिक मार्ग दर्शन हेतु महात्माओं   ने हमे बताये हैं साधना के तीन आधार -------

१. सिद्ध सद्गुरु का संकल्प
२. सिद्ध मंत्र की शक्ति
३. साधक का विश्वास और उसकी श्रद्धा

साधन का संबंध साधक की रूचि ,योग्यता और उसके सामर्थ्य एवं उसकी इच्छा शक्ति से है  ! सिद्ध सद्गुरु,  साधक के उपरोक्त गुणों का आंकलन कर लेता है  और साधक के इन गुणों के अनुरूप उसके उत्थान हेतु समय समय पर  उचित परामर्श देता रहता है !

निवेदक को उसके गुरुजन ने ( माता पिता और अध्यापको से लेकर आध्यात्मिक सद्गुरु  ने भी ) उसकी आध्यात्मिक साधना के लिए नाम जाप, सिमरन, ध्यानादि के उपरान्त एक अन्य प्रमुख मार्ग सुझाया !

वह मार्ग था शब्द सयोजन से स्वर सयोजन और गायन द्वारा मीरा, सूर, तुलसी,  रैदास एवं कबीरदास की तरह नाम गुण गाकर आस्तिकता का प्रचार प्रसार करना , इस शर्त के साथ कि इस कार्य से मैं किसी प्रकार कोई धन न कमाऊँ ! धनोपार्जन का जो रास्ता पूर्व जन्मो के कार्मिक हिसाब -किताब से एवं , इन गुरुजन के आशीर्वाद से मिला वह था  चर्मकारी !-मैंने अपने चर्मकारी के पेशे से पारिवारिक एवं  घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु समुचित धन  कमाया ! 

और हा एक बात और बताऊँ इस पेशे में मैंने सबसे निम्न स्तर से काम प्रारम्भ किया और अन्ततोगत्वा गुरुजन के आशीर्वाद से उच्चतम स्तर तक पहुंचा ! रामाज्ञा ने मुझसे यह क्रम करवाया ! मुझे इसका कोई खेद नही कि मैंने आजीवन चर्मकारी की ! 

सौभाग्यवश  गुरुजन के  गुरुमंत्र  से ,उनकी करुणा और कृपा से ,उनके आशीर्वाद से इस निम्नस्तरीय पेशे में भी मुझे अनेकानेक उपलब्धिया हुईं ! ज़िक्र करूँगा तो कदाचित अभिमानी अहंकारी कहा जाउंगा ! अस्तु केवल यह बताउंगा कि गुरुजन के आदेशानुसार साधना पथ पर मंत्रजाप, सिमरन, ध्यान एवं स्वर साधना करने से मुझे उनके आशीर्वाद ने इस स्थूल जगत में जहां एक तरफ  धरती से उठाकर आकाश तक पहुंचाया वहीं मेरी अंतरात्मा को जिस परमानंद का रसास्वादन करवाया वह अवर्णनीय है

 मेरी जो  आध्यात्मिक प्रगति हुई है तो उसका आंकलन गुरुजन कर ही रहे होंगे,, मुझे उसका कुछ ज्ञान नहीं !  मैं क्या बोलूँ ! महापुरुषों  से मैंने यही जाना कि साधक  के हृदय की पुकार उसके गीत और गायन  के द्वारा उसके आराध्य तक पहुचती है !
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बहुत सान्सारिक  तू तू "मै" "मै" हो चुकी ! 
अब सुनिये निवेदक और उसके परिवार द्वारा १९८३ में गाया प्रेम दीवानी मीरा बाई का एक भजन -- 
( भजन सुनने के लिए यू ट्यूब का लिंक है :

https://youtu.be/2CpalVZkbnw


दर्शन दीजो आय प्यारे  तुम बिन रह्यो न जाय  
जल बिनु कमल चंद्र बिनु रजनी , वैसे तुम देखे बिनु सजनी !
आकुल ब्याकुल फिरूं रैन दिन , बिरह करेजो खाय !! दर्शन दीजो ====
दिवस न भूख नींद नही रैना मुख सों कहत न आवें बैना !
कहा कहूँ कछु समुझी न आवे , मिल कर तप्त बुझाव !! दर्शन दीजो==== 
क्यूँ तरसावो अंतर्यामी  , आय मिलो किरपा करो स्वामी !
मीरा दासी जन्म जन्म की पड़ी तुम्हारे पाय !! दर्शन दीजो ==
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निवेदक :   व्ही.  एन.  श्रीवास्तव  "भोला"
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   तकनीकी चित्रांकन एवं वीडीयोकरण :  
श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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