सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

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बापू का एक प्रेम यज्ञ जो मैंने देखा 

कुरुक्षेत्र में पार्थ के सारथी कृष्ण के समान, निःशस्त्र निष्काम भाव से "सोनार बांग्ला" के जातीय धार्मिक हिंसा में जूझती जनता को हिंसा त्याग कर प्रेम से मिलजुल कर रहने का  सन्देश देने को 'बापू' दिल्ली से कोलकता जा रहे थे ! मैं १४-१५ वर्ष का रहा हूँगा ! मोहल्ले के एक कोंग्रेसी 'लेबर' नेता का लडका हमारा सहपाठी था ! उसने बताया कि बापू की ट्रेन कानपूर होकर जा रही थी और स्टेशन पर भीड़ को सम्हालने के लिए वह कोंग्रेस सेवादल के स्वयंसेवकों के साथ स्टेशन जा रहा था ! मैं भी उसके साथ चल कर  "बापू" के दर्शन कर सकता था ! पिताश्री से आज्ञा मिल गयी सो मैं उसके साथ निकल पड़ा !

घर से स्टेशन तक का रास्ता आदमी औरतों और बच्चों से ऐसे भरा था जैसे सावन के पहले सोमवार को गंगा स्नान के लिए परमट और सरसैया घाट की ओर जाने वाली सडकों पर स्नानार्थियों की भीड़ होती  है ! मेले जैसा वातावरण था ! ऐसा लग रहां था  जैसे सारा का सारा नगर ही कानपूर स्टेशन में समा जाना चाहता है ! हवा के झोके में जैसे पीपल के पत्ते छन भर में कहीं से कहीं पहुच जाते हैं वैसे ही स्टेशन के निकट पहुच कर हमे पैर भी नहीं चलाने पड़े और हम प्लेटफोर्म पर पहुंच गये ! क्या यह कोई जादू था ?

ट्रेन प्लेटफोर्म में दाखिल हुई ! जैसे जैसे ट्रेन आगे बढी जन समुदाय सैलाब की तरह आगे की ओर बढने लगा ! इतनी जबर्दस्त लहर चली कि उसमे हलके फुल्के शरीर वाले अनेकों दर्शनार्थी या तो कंधों पर लद गए या ----------  प्रियजन न पूछिए उनका क्या हुआ !  मैं सौभाग्यशाली था मुझे "प्यारे बापू" के दर्शन तो हुए पर उसके बाद जो हुआ उसकी याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े होने लगे हैं !

क्या नशा था, क्या दीवानापन था ? लोग पागलों की तरह उस तीसरे दर्जे के डिब्बे की ओर भाग रहे थे जिसपर एक तिरंगा लहरा रहा था और जिसके दरवाजे पर "बापू" खड़े थे ! मुझे दर्शन हो चुके थे, मैं भीड़ से निकल कर किनारे जाना चाहता था ! मैं हल्का फुल्का था ,रेले में अपने आप को सम्हाल न पाया ,मेरे पैर मेरा बोझ ढो न सके ,मैं लडखडा कर गिर गया और मेरे शरीर को लांघ लांघ कर न जाने कितने लोग गुजरे और कितनों के चरण चिन्ह मेरे अंग-प्रत्यंग पर बने नहीं कह सकता ! मेरा वह दोस्त गांवं का हट्टा कट्टा कुश्ती लड़ने वाला पहलवान था ! मेरे अचानक अंतर्ध्यान होने से वह चिंतित हुआ और जब थोड़ी देर बाद उसने मेरी दुर्दशा देखी , उसने झुक कर बमुश्किल तमाम मुझे उठाया और अन्य स्वयंसेवकों की मदद से  फर्स्ट एड करवा कर मुझे घर पहुंचा गया !


प्रियजन , राष्ट्र पिता बापू के प्रति भारत के आम जनता की यह पागलों जैसी प्रीति ही थी जिससे भय खाकर इतनी आसानी से ,अँगरेज़ बोरिया बिस्तर बांध कर अपने "यूनियन जैक" के साथ शांति पूर्वक भारत छोड़ कर चले गये ! यदि भारतवासियों में यह "प्रेम" की ताकत न होती तो अस्त्र शस्त्र के बल से क्या हम कभी उन्हें हरा सकते थे ? 

राष्ट्र पिता "बापू" का "पावर हाउस" था उनका "दृढ़  निश्चयी मन" और उस पावर हाउस का "जेनरेटर" था  उनका  अदम्य  "आत्मबल" ! यह "जेनरेटर" चलता था  "परमपिता परमात्मा - "सर्व शक्तिमान प्रभु की अहेतुकी कृपा'" के 'ईंधन'" से ! बापू को यह ईंधन किसी "कोएलरी" ,"जल प्रपात" (हायड्रो प्लांट) अथवा परमाणु  (न्यूक्लियर ) संयत्र से नहीं प्राप्त होता  था  ! "बापू" को वह ऊर्जा  प्राप्त होती  थी  उनकी अपनी अनोखी "आध्यात्मिक साधना" से जिसमें  शामिल थी सामूहिक ,सब धर्मों की मिलीजुली प्रार्थना  ,सामूहिक  "रामधुन गायन" और  व्यावहारिक एवं  वास्तविक "परपीर हरण" एवं "परदुख निवारण" हेतु  की  हुई "सेवाएं " !

साबरमती से चला संत इक अहिंसा का व्रत धारी !
दुर्बल काठी हाथ में लाठी ,पुरुष पूर्ण अवतारी !!

सांची लगन लगाय "राम" से , वह निकला जिस जिस मुकाम से !
मतवारे  हो चले ,संग उसके, असंख्य नर नारी !!
साबरमती से चला संत इक अहिंसा का व्रत धारी !!

जाति भेद औ  छुआ छूत मिट गये ,और सब "हरि के जन" बन गये !
पारसमणि  बापू ने कंचन किये सभी नर नारी !!
साबरमती से चला संत इक अहिंसा का व्रत धारी !!

पतितजनों  को गले लगाया ,अबलाओं को सबल बनाया !!
"राम" चरण रज से जैसे तर गयी अहिल्या नारी !


https://youtu.be/mgWLRpOBbyg

निवेदक :  व्ही,  एन,  श्रीवास्तव "भोला"
 सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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