सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

शनिवार, 22 मई 2010

Nothing happens without "HIS" Grace.

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"बिनु हरि कृपा न होइहे कछुहू, गावत बेद पुराण "

अपनी सीमित बौद्धिक क्षमता से समझी, गुरुजनों से प्राप्त गूढ़ जानकारी के आधार पर हमने "जीव -जगत -जगदीश" जैसे विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास पिछले कुछ लेखों में किया. पर सच तो मात्र यह है क़ि
मैंने नही लिखा है कुछ भी, और नही कुछ गाया है
मेरी कलम पकड़ कर यह सब गुरु जन ने लिखवाया है

प्रियजन, हम मानव निरे अपने बलबूते पर कुछ भी नहीं कर सकते ,क्योंकि हम तो न कुछ देख सुन सकते हैं और न कुछ समझ ही सकते हैं वास्तव में अपने जीवन में पगपग पर हमे उस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमात्मा की सहायता की आवश्यकता पडती है . उसके बिना हमारी कोई भी चेष्टा हमे सफलता नही दिला सकती.

मैं ८१ वर्षो के निजी अनुभव के आधार पर आप को पूरे विश्वास के साथ बता रहा हूँ क़ि जीवन में सफल होने के लिए आपको सर्वाधिक आवश्यकता है अपने इष्ट की कृपा को प्राप्त करने की. यह भी ध्रुव सत्य है क़ि यदि हम कर्तापन का अहंकार त्याग कर , स्वयं को पूर्णत: अपने इष्ट के श्रीचरणों में समर्पित कर दें तब इष्टदेव हमारे कार्य की बागडोर अपने हाथ में ले लेंगे. एक बात और है क़ि हमारे पूर्ण समर्पण करने पर वह हमारी मदद करने में तनिक भी विलम्ब नही करेंगे .और उनके सहयोग से सफलता हमारी झोली में आप ही आप आ गिरेगी.

लोग कहते हैं क़ि बिना मांगे कुछ भी नहीं मिलता. हम कहते हैं क़ि इस कथन का एक अपवाद है हमारा प्रभु /इष्ट बिना मांगे ही, सच्चाई और ईमानदारी की राह चलने वाले पुरुषार्थी व्यक्ति पर अपनी कृपा लुटा देता है, हाँ एक बात और है , कृपा की भीख कौन किससे मांगे ? ."करुणा सागर कृपानिधान ,घट घट बासी श्री/भगवान ", आपका इष्ट / परमात्मा जब आपके अंदर ही बैठा है, तब आपको न किसी मंदिर में जाना है, न कोई अनुष्ठान करवाना है. हमे तो बस पूरी तत्परता लगन और सत्यता के साथ अपना कर्म करते रहना है. हम  सब को याद है जनकदुलारी सीता की वह प्रार्थना जो पुष्पवाटिका में श्री राम से नयन मिलन के उपरांत उन्होंने गिरिजा मंदिर में की थी:
मोर मनोरथ जानहु नीके , बसहु सदा उरपुर सबहीके .

भाई , हमारा इष्ट भी हमारे उरपुर में बसा है और हमारे सब मनोरथ जानता है. ह्म क्यों चिंता करें? ह्म .उनका स्मरण करते हुए पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ अपने करम करते जायें. वह निश्चय ही कृपा करेंगे और हमारा काम बना देंगे एक पारंपरिक शब्द है:
"प्रभु से लाग रहो रे भाई , तेरो बनत बनत बन जायी ". . .


क्रमश----
: -- निवेदन :श्रीमती डॉ कृष्णा एवं :व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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