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मंगलवार, 17 मई 2011

जय जय बजरंगी महावीर - (on Youtube)

मंगलवार - हनुमान जी का दिव्य दर्शन 

मेरे अतिशय प्रिय स्वजन !

भारत में किसी राम कथा में साधारण बानर के वेश में श्री हनुमान जी पधारे उन्होंने श्रद्धा सहित व्यास आसन पर कथा वाचक को टीका लगा कर सम्मानित किया तथा अपने इष्ट  श्री सीता राम जी का अभिनन्दन किया ! एक मुस्लिम फोटो जर्नलिस्ट ने उस राम भक्त बानर के चित्र उतारे जो वहां अख़बारों में छपे !     

ई मेल से U S A के एक परम राम भक्त श्री प्रभु राठी जी ने मेरे पास उस कौतुक के चित्र भेजे जो मुझे इतने भक्ति भरे लगे कि तुरंत ही आपसे 'शेअर' करने का मन बन गया !

श्री राम भक्त हनुमान की जय
 जय जय बजरंगी महावीर

चलिए आप भी हमारे साथ मिलकर आज श्री हनुमतलाल के गुण गा लीजिये ! इस गायन में राघव जी के घर पर मेरे साथ रवि जी (हारमोनियम पर), राघव जी (तबले पर) तथा डाक्टर श्रीमती लक्ष्मी रमेश , डाक्टर श्रीमती शारदा कौल आदि गाने में मेरा साथ दे रहे हैं


जय  जय बजरंगी   महावीर   
तुम  बिन को जन की हरे पीर

अतुलित बलशाली तव काया 
गति पिता पवन का अपनाया 
शंकर से दैवी गुण पाया 
शिव पवन पूत हे धीर वीर
जय जय बजरंगी महावीर , तुम बिन को जन की हरे पीर

दुःख भंजन सब दुःख हरते हो 
आरत की सेवा करते हो
पल भर विलम्ब ना करते हो 
जब भी भक्तों पर पड़े भीर 
जय जय बजरंगी महावीर , तुम बिन को जन की हरे पीर

जब जामवंत ने ज्ञान दिया 
झट सिय खोजन स्वीकार किया 
शत जोजन सागर पर किया 
निज प्रभु को जब देखा अधीर 
जय जय बजरंगी महावीर , तुम बिन को जन की हरे पीर

शठ रावण त्रासदिया सिय को 
भयभीत भई मैया जिय सो 
माँगत कर  जोर अगन तरु सों
दें  मुन्देरी वा को दियो धीर 
जय जय बजरंगी महावीर , तुम बिन को जन की हरे पीर

जब लगा लखन को शक्ति बाण 
चिंतित हो विलखे बन्धु राम
कपि तुम सांचे सेवक समान 
लाये बूटी संग द्रोण गीर    
जय जय बजरंगी महावीर , तुम बिन को जन की हरे पीर 

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"ये अपनी कहानी तो चलती रहेगी 
कि जब तक मिरी जिंदगानी रहेगी"
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निवेदक : वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 16 मई 2011

वो आये हमारा चमन खिल गया # 3 6 5

संकट से हनुमान छुडावें 

(गतांक से आगे )
यहाँ  देखते हैं , वहां देखते हैं 
उन्हें देखते हैं,  जहाँ देखते हैं  

वो आये मिरे घर बड़ी उनकी रहमत  
हम उनकी नजर से 'मकाँ'  देखते हैं

कभी अप्नी 'खोली' कभी उनकी गाड़ी 
ज़मीं   पर   पड़ा       आसमां देखते हैं
  
"भोला"  


सब कहते थे बलिया में "हरबंस भवन" और पुश्तैनी गाँव बाजिदपुर में खानदानी ऊंचे ऊंचे  २४ नक्काशीदार सागौन और देवदार की लकड़ी के भव्य खम्भों पर खड़ी विशाल मर्दानी कचहरी और दो बड़े बड़े आंगनों वाले ज़नान खाने के २० कमरे होते हुए कानपूर में मकान बनाने की क्या ज़रूरत है  ? लेकिन फिर भी सबकी बातें अनसुनी करके ,अम्मा ने वह घर कानपूर में बाबूजी के पीछे पड़कर ज़बरदस्ती बनवा ही लिया था और यह वही घर था जहां  तब ,( १९५० मे ) वह "देवीजी" मेरा interview ले रहीं थी !


हमारा यह घर पूरे मोहल्ले का सबसे सुंदर घर था ! उस एरिया के बाकी सब घर किराये पर उठाने की दृष्टि से बनाये गए थे ! जहां एक एक प्लाट पर ६ से ८ छोट छोटे फ्लेट बने थे वहीं उतनी ही जमीन पर हमारा वह दुमंजिला घर बना था ! हमारे घर का front elevation भी उस नगर में उन दिनों बन रहे अन्य मकानों से बहुत भिन्न और बड़ा ही आकर्षक था ! सुनते हैं आस पास के नगरों से शौक़ीन लोग हमारे घर का नक्शा देखने को आया करते थे फिर भी इस विचार से कि वह बड़ी कार अवश्य ही दिल्ली या लखनऊ की किसी बड़ी कोठी से आई होगी मेरा मन एक भयंकर inferiority  complex से जूझ रहा था !


अब मेरी तत्कालीन दयनीयता का आंकलन कीजिए :  मैं असहाय सा कभी अपने उस घर की और देख रहा था और कभी उन देवी जी की शानदार कार और तिरछी गांधी टोपी लगाये गढ़वाली शोफर को ! हाँ , ड्राइंग रूम में ,थोड़ी थोड़ी देर में ,बाबूजी की पैनी निगाहों से बचता हुआ मैं कनखी से "उनकी' भली भांति सजी संवरी - 'मेड अप' रूप सज्जा को चन्द्र चकोर सा निहार लेता था ! मेरा बीस वर्षीय तरुण मन उन देवी जी की वाणी - बीन की मधुर धुन सुनकर सपोले के समान मदमस्त हो कर झूम रहा था ! मैं इस कदर बेसुध हो गया था कि मुझे उन देवीजी के वे  बेतुके सवाल भी  उस समय  उतने बुरे नहीं लग रहे थे ! प्रियजन, यह मेरी तब की कच्ची उम्र की मजबूरी थी जिसने मुझे विवश कर रखा था!

बचपन से ही मुझे केवल एक शौक था - कार चलाने का ! सारे घर में  घू घू करता हुआ हाथों से हवा में स्टेअरिंग घुमाने का नाटक करते हुए काल्पनिक कार चलाता हुआ  मैं दिन भर हुडदंग मचाता रहता था ! शनी देव की कृपा से जब बाबूजी का कारखाना घर से कुछ दूर अगले नगर में स्थापित हुआ तब आने जाने के लिए अश्व द्वारा संचालित रथों का प्रयोग बाबूजी के लिए अनिवार्य हो गया ! जब किराये की सवारियों से दुखी हुए तो एक सुंदर सा अन्य पशुओं से बिलकुल  फरक - "ग्रे" ( काले और सफेद के मिश्रण के रंग का ) तगड़ा अरबी घोड़ा और उसके साथ एक तांगा भी खरीदा गया ! छोटा था पर मुझे उस घोड़े से कुछ दिनों में ही बहुत प्यार हो गया ! लेकिन कुछ ही दिनों में जब हम सब बलिया गये थे हमारे अफीमची साईस ने वो घोड़ा कहीं अंतर्ध्यान करा दिया और यह ऐलान कर दिया की घोड़ा अचानक इस संसार से कूच कर गया ! हमे उसकी बात पर विश्वास  नहीं  हुआ लेकिन बाबूजी ने उस, तीन पुश्त से गाँव में हमारे वंशजों की सेवा करने वाले साईस को माफ़ कर दिया ! धर्म का एक सूत्र जो बाबूजी अपनी प्रार्थना में नित्य बार बार दुहराते थे , वह था :

दया धर्म का मूल है , नरक मूल अभिमान
तुलसी दया न छाडिये जब लगि घट में प्राण 
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प्रियजन आत्म कथा है ये, जैसे जैसे जो कुछ प्यारे प्रभु की प्रेरणा से याद आ रहा है लिख रहा हूँ ! मुझे कोई कोशिश नहीं करनी पडती है !"वह" जो लिखवाते है लिख देता हूँ ! यदि आपको कुछ अनुप्युक्त लगे तो न पढिये ! ये भी मैं नहीं कह रहा हूँ ,वह ही लिखवा रहे हैं! 

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क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 14 मई 2011

"संकट" से मुलाकात और रक्षा # 3 6 4

संकट से हनुमान छुडावे 
(आत्म कथा)  


(गतांक से आगे) 

फ्रेश होकर, कपड़े बदल कर, मैं भाभी की ड्रेसिंग टेबल के शीशे के आगे खड़ा हुआ और अपने घने घुंघराले बालों को ,उस जमाने के सिने जगत के प्रसिद्ध हीरो भारत भूषण की तरह संवारने लगा !  ( भैया जी , मेरे आज के इस गंजे सर को देख कर हंसिये नहीं ! ६० - ७० वर्ष बाद , खुदा-न-खास्ता, आपकी भी ऎसी गति हो सकती है ! बददुआ नहीं दे रहा हूँ , दुआ कर रहा हूँ की आपके बाल, सालो साल ऐसे ही काले घने घुंघुराले बने रहें ) ! 

इस बीच  भाभी मुझे उस शाम की पूरी कहानी संक्षेप में सुना रहीं थीं ! "मोहल्ले के बच्चों ने आकर बताया की "मेंन रोड पर एक बड़ी गाड़ी का ड्राइवर सब लोगों से 'भोला भैया' के पिताजी का घर पूछ रहा है ! बुद्धू को बाबाजी का नाम भी नहीं मालूम है ! आस पास के सभी 'भोला' नामक लोगों के दरवाजे खटखटा चुका है ! भोला शुक्ला और भोला पासी, के घर भी हो आया है ! हमे लगता है अपने भोला भैया को ही खोज रहा है ! पांच सात  मिनट में यहाँ पहुचने ही वाला है !" आप सोच रहे होंगे कि हम कैसे पिछड़े मोहल्ले के लोग हैं जो एक बड़ी कार देख कर बेज़ार हो गये ! ऐसा कुछ नहीं है भैया ! ये कहानी तब की है जब भारत में बड़ी कारें केवल बड़े बड़े मिल मालिकों के पास और रजवाड़ों में ही होती थीं ! हाँ, आजादी के बाद कुछ शौकीन नेता लोगों के पास भी ऎसी गाड़ियाँ आ गयीं थीं !

आगे भाभी ने बताया,- " फिर थोड़ी देर में वो गाड़ी घर के सामने रुकी , घर की काल बेल 
बजी और वह "बला" घर में दाखिल हो गयी ! ज़ोरदार नाटक हुआ ! मुझे देखते ही मुझसे लिपट गयी जैसे चिर परिचित हो !  दौड़ कर अम्माजी के चरण छुए , बाबूजी को प्रणाम किया ,और तब से बाबूजी का इंटरव्यू ले रही है जैसे किसी अखबार की कोरेसपोंनडेंट हो !
तैयार हो गये हो तो जाओ , बाबूजी की जान बचाओ और खुद झेलो उसे ! तब तक मैं नाश्ता ले कर आती हूँ "  मैं सहमा हुआ ड्राइंग रूम में घुसा ! 

हम सब बच्चे बाबूजी से बहुत फ्री थे ! हमारे बीच खूब हंसी मजाक चलता था !  दोस्ताना कटाक्ष करते हुए बाबूजी बोले  " आइये आपका  ही इंतजार हो रहा था ! देखिये कौन आया है ? दूर दूर क्यों ,यहाँ सामने बैठिये ,शर्माइये नहीं" ! प्रियजन ! सच मानिये मुझे उनका नाम भी नही याद आ रहा था ! जीजी की ससुराल में एक झलक भर देखी थी जब उन्होंने मुझसे अकेले में मौका पा कर ,कहा था कि वह मेरे घर में मुझसे मिलेंगी !

वह कुछ देर चुप रहीं , फिर उन्होंने सीधी गोली दाग दी " बाबूजी कह रहे थे आप चारो भाई बहेन गाने बजाने के बड़े शौक़ीन हैं और आपके बड़े भैया सिनेमा के हीरो बनना चाहते थे ! कहीं आपका इरादा भी आगे चल कर सिनेमा में जाने का तो नहीं है ?" ! 

मैं उनके इस direct hit  के लिए तैयार नहीं था ! मुझे उनके इतने  विचित्र बिहेविअर के कारण बड़ा आश्चर्य हो रहा था ! भारतीय सांस्कृतिक परिपेक्ष में उनका इस प्रकार बिना किसी पूर्व सूचना के अपनी शादी तय करने के लिए स्वयम ही मेरे घर पहुंच जाना और सीधे मेरे पिता और  मुझसे भी इस प्रकार टेढ़े मेढ़े सवाल करना केवल मुझे ही नहीं मेरे पूरे परिवार को बड़ा अटपटा और अस्वाभाविक लगा ! लेकिन-

वह  देखने सुनने में ठीक ठाक थीं , पढ़ी लिखी थीं और सत्ता पक्ष के एक प्रभावशाली नेता की पुत्री तथा स्वतन्त्रता के बाद सहसा धनाढ्य हुए बड़े भाई की छोटी बहेन थीं और इतनी बड़ी चमचमाती लेटेस्ट मॉडल शेवि सुपर डिलुक्स शोफर ड्रिवेन कार पर बैठ कर हमारे घर आयीं थीं ! किसी साधारण मानव के लिए इतने tempting advantages को यूँही  ignore कर पाना असंभव है , और तब मैं बड़े बड़े सपने देखने वाला ,एक नासमझ नवयुवक था ! 

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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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शुक्रवार, 13 मई 2011

हनुमत कृपा से जान बची # 3 6 3

संकट से हनुमान छुडावे 


अम्मा ने शैशव काल  में ही मेरी यह दृढ धारणा  बना दी थी कि सब जीवाधारिओं पर उनके परम पिता  "प्यारे प्रभु" की असीम अनुकम्पा  जन्म से ही रहती है ! माँ के आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त इस अटूट प्रभु कृपा के कवच, और अपने पूर्व जन्म के संस्कार तथा प्रारब्ध के अवशेषों के फलस्वरूप मेरे मन में बालपन से ही यह भाव घर कर गया था कि मेरे जीवन में मेरे साथ जो कुछ भी हुआ है, हो रहा है और भविष्य में,जो कुछ भी होगा ,कडुआ या मीठा, वह सब प्रभु की इच्छा से ही होगा ; उनकी अनन्य कृपा से ही होगा और उसमे ही मेरा कल्याण निहित होगा !

अस्तु जीवन में मैंने किसी भी परिस्थिति का तिरस्कार नहीं किया ! प्रभु ने जो भी अवसर मुझे दिए ,उन्हें मैंने उनका वरदान माना,उनका सदुपयोग किया ! प्रभु की इच्छा से जो भी कार्य करने को मिले , उन्हें पूरी लगन और  ईमानदारी से "राम काज" समझ कर किया  ! मैंने अपने सभी  कर्मों का करने वाला कर्ता या "यंत्री "अपने इष्ट को ही माना और स्वयं को अपने "इष्ट देव" के हाथों द्वारा  संचालित औज़ार ! मुझे अपने इष्टद्व से प्राप्त प्रेरणाओं पर पूरा भरोसा था ,इसलिये में  सदैव आज्ञाकारी सेवक बन कर उनके द्वारा दिए निदेशों को पालन करने का  भरसक प्रयत्न  करता रहा !

प्लीज़ क्षमा करना , आदत से मजबूर मैंने एकबार फिर अपनी आध्यात्मिक ज्ञान पिटारी  की नुमायश शुरू कर दी ! This instinct of SHOWING OFF , as you know, is a natural HUMAN weakness - and I am proving  to be its worst victim -- Any way let us restart the story . इस बीच, मैं भूल गया कि मेरी अपनी कहानी कहाँ तक पहुंची थी ! चलिए टूटे ताने-बानें जोड़ लिए जाएँ और कहानी आगे बढायी जाये ! 

मैं  अपने जमाने - (१९४७-५१) के विद्यार्थी जीवन की चर्चा कर रहा था ! भारत कुछ महीने पूर्व  ही स्वतंत्र हुआ था ! योरप ,दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रिका के विभिन्न  देशों  में रहने वाले समृद्ध प्रवासी भारतीय मूल के निवासियों के बच्चे ,उस वर्ष, ऊंची पढाई के लिए इंग्लेंड जाने के बजाय भारत के विश्वविद्यालयों में आये ! BHU  में भी उस वर्ष प्रवासी भारतीयों की संख्या, और वर्षों से कहीं अधिक थी ! वहां एक अच्छा खासा मिश्रण था विभिन्न देशी और विदेशी विद्यार्थियों का , उनकी भाषाओँ का, रंगारंग संस्कृति-वेशभूषा  का और उनके  मिश्रित  oriental और पाश्चात्य जीवन शैली का ! यू पी के एक ओउद्योगिक  नगर से आये मध्यम वर्ग के मेरे जैसे - तब तक "केवल लडकों के स्कूल" में ही पढ़े बालक के लिए BHU का वो माहौल बड़ा ही आकर्षक था ! पर प्रियजन ,मैं बिगड़ा नहीं ! संस्कारों की इतनी मोटी तह जमी थी मेरे ऊपर कि वह ,वहां के मेरे प्रवास में तनिक भी नहीं धुली ! चदरिया ज्यों की त्यों रह गयी !

बेचलर डिग्री की परीक्षा दे कर गरमी की छुट्टियों का मज़ा लूट रहा था ! सारे पर्चे अच्छे हुए थे !डिग्री मिली ही समझता था ! जीजी की ससुराल में बड़े शान से अपना बेचेलर्हुड कैश कर रहा था ! और हाँ अनेकों सौभाग्यकंक्षिनी स्वजातीय ललनाओं में से एकाध मुझे समझ में भी आ गयीं थीं !  और मुझे ऐसा लग रहा था कि लगभग सभी आज्ञाकारिणी मातृभक्त बालाओं ने अपने काल्पनिक स्वयम्वरों में मुझे अपना बना लिया था ! एक ultra modern - convent educated बाला ने तो मौका पाकर एकांत में मुझसे यहाँ तक कहा कि वो शीघ्र ही मेरे घर में मुझसे मिलेंगी ! 

हर प्रसंग का अंत तो होता ही है ! वही हुआ जो चिर सुनिश्चित है -"मिलन के बाद जुदाई"

दो दिन का था वह मेला आई चलने की बेला,
उठ गयी हाट औ सब ने पकड़ी अपनी अपनी बाट !

और फिर 

तिलक चढा कर , जान बचा कर भोला बाबू आये
और  एक  दिन दरवाजे  पर  "कार"  देख चकराए

भारत में तब  'कार" नहीं देवालय ही बनते थे 
जिन पर चढ़ कर ,यात्रीगण बस ,राम राम जपते थे

शेवी सुपर डिलुक्स कार में वो नेता चलते थे
आजादी के पहिले जो दो पहियों पर चढ़ते थे 

"भोला" 

मैं हारा थका , साईकिल से कहीं दूर से घर पहुंचा था ! घर के बाहर एक बड़ी वाली शेवरले की सुपर डीलक्स  दुरंगी कार खड़ी दिखाई दी ! माथा ठनका ! पीछे की सीढी से चुपके चुपके साइकिल कंधे पर लादे ,पसीने में लतफत किसी तरह ऊपर पहुचा ! सारे घर में अफरा तफरी मची हुई थी ! 

पहुंचते ही भाभी ने घेर लिया ! "मैं जानती हूँ , अब इस उम्र में तुम्हारे भैया के लिए कौन आएगा ? ये तुम्हारी ही कोई चीज़ है"! मैंने पूछा "कौन भाभी ?' "जाओ खुद ही देख लो , चार बजे शाम से ही नाटक चालू है !अभी ड्राइंग रूम में बेचारे बाबूजी का interview चल रहा है, इसके बाद शायद तुम्हारा ही नम्बर होगा ! जल्दी से मुंह हाथ धो कर सज धज कर उनसे मिललो , बेचारे बाबूजी की जान बचाओ ! " 

मैं भाँप  गया , आगंतुका बालिका अवश्य ही मेरी जीजी के ससुराल वाली किसी बुआ , चाची या मौसी की होनहार बिटिया होंगी !       


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क्रमशः 
आप जानते ही हैं ,ब्लोगर महाशय कुछ गडबड कर रहे हैं ! 

निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 10 मई 2011

एक आसरा तेरा हनुमत # 3 6 2

उपकारन  को कछु अंत नहीं छिन ही छिन जो विस्तारे हो 
तुम सों प्रभु पाय प्रताप हरी कहि के अब और सहारे हो ?

हमारे प्यारे प्रभु ने अब तक़ हम पर जो जो उपकार किये हैं और जो वह अभी भी करते ही जा रहे हैं उसका हिसाब रख पाना या ,उसकी गणना कर पाना किसी के वश में नहीं है ! पाठकगण मेरे लिए भी ये बता पाना की मेरे इष्ट ने मुझ पर  कब , कैसे , क्या क्या और कितने उपकार किये , असंभव है !  बात ऎसी है कि ,मुझे नवम्बर २००८ में जीवन दान मिलने के बाद से मुझे यह लगने लगा है की मेरी प्रत्येक सांस, मेरे ह्रदय की एक एक धडकन मुझे मेरे प्यारे प्रभु की कृपा के फलस्वरूप मिली जान पडती है ! यदि "उनकी" कृपा न होती तो आज मैं यह सन्देश आप तक कैसे भेजता ?  अब आप ही कहें कि मैं कैसे और कहाँ तक़  "उनके" उपकारों क़ी गिनती करूं ? अस्तु निश्चित कर लिया है कि नहीं करूंगा उनके सुफलदायी कृपाओं की चर्चा करने की निरर्थक चेष्टा ! हाँ ---

ऐसे में प्रेरणा मिल रही है कि अभी मैं अपने विद्यार्थी जीवन क़ी कुछ वैसी घटनाएँ   आपको बताऊँ ,जिनमे संसार को ऐसा लगा जैसे हनुमान जी ने मेरे प्रति बड़ा अन्याय किया पर वास्तव में अन्त में मुझे उन घटनाओं के कारण अप्रत्याशित लाभ हुए !  

I I T , I I M , Medical College आदि में भर्ती हो जाने के बाद विद्यार्थियों क़ी , मन्दिरों में अपने इष्ट देवों से सबसे बड़ी मांग क्या होती है ? -अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने क़ी और प्रेसिडेंट या निदेशक का गोल्ड मेडल पाने  क़ी, पास हो जाने पर मल्टी नेशनल कम्पनी में जॉब पाने क़ी और उसके बाद एक सुंदर सुशील कमाऊ टिकाऊ जीवन साथी प्राप्त करने क़ी ! मेरे जमाने -(१९४७-५०), में भी आम  विद्यार्थियों क़ी कुछ ऎसी ही मांगें होतीं थीं और  मेरे अंतर्मन में भी पढायी के दिनों में  इन्ही उपलब्धियों क़ी प्राप्ति क़ी चाह रहती होगी पर शायद अपने संस्कारवश मैं अपनी प्रार्थना में  इष्टदेव से उनकी मांग करने के बजाय बस इतना ही कह पाता था कि "मेरे प्रभु ! मुझे केवल वह दो जो मेरे लिए हितकर हो ! मेरे साथ वही हो जो "तुम्हे" अच्छा लगे " ! न जाने कैसे बचपन से ही यह प्रार्थना मुझे भली लगती थी और अक्सर देव मंदिरों में मेरे मुंह से यही प्रार्थना निकलती थी !

बेचेलर डिग्री की परीक्षा के दिनों में ,सबके साथ ,मैं भी प्रति सप्ताह मंगलवार को हनुमान   जी के संकटमोचन मन्दिर जाने लगा ! वहां मैं पूरे जोर शोर से हनुमान चालीसा का पाठ  करता था और उसके बाद मन ही मन कभी कभी बिलकुल अकेले ही मानस के अंतिम तीन छंद अवश्य गुनगुना लेता था जिसकी प्रथम पंक्ति है :

पाई न केही गति पतित पावन राम भज सुनु शठ मना

ज्यों ज्यों परीक्षा निकट आयी हनुमत भक्ति का वेग दिनों दिन बढ़ता गया ! विद्यार्थी भाइयों नें अब सप्ताह में दो दो बार (शनिवार को भी) मन्दिर जाना शरू कर दिया ! वहां हनुमान मन्दिर में चालीसा का पाठ अधिक जोर से होने लगा ! "हम आज कहीं दिल खो बैठे" जैसे फिल्मी गीत गाने वाले मेरे जैसे बालको ने अब बाथरूम में भी फिल्मी गीत गाने बंद कर दिए ! वे अब शोवर में ,ठंढे पानी से नहाते समय , पूरा जोर लगाकर , तार सप्तक पर श्री हनुमान अष्टक का सस्वर पाठ करते थे -

को नही जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो 

इस बीच परीक्षा हो गयी ! यूनिवर्सिटी गर्मी की छुट्टियों के लिए बंद हो गयी और हम सब परिवार के साथ ,मौज मस्ती में ड़ूब गये ! एक जीजी की शादी तय हुई ! उनका तिलक लेकर उनकी ससुराल गया ! वहां तो जैसे डुगडुगी पीट कर ऐलान कर दिया गया कि भैया  का साला, दुल्हिन का बी.एच .यू  वाला हेंडसम भाई आया है ! फिर क्या पूछना था  खूब ज़ोरदार खातिर हुई !क्यों न होती ? कायस्थों के परिवार में सुंदर सुशील कुंवारी लडकियाँ की कमी नहीं होती ! वहां मौजूद सभी समझदार माताएं अपनी अपनी बेटियों से मेरा सम्बन्ध जोड़ने के प्रयास में लग गयीं !

पाठकगण आप को साफ़ साफ़ बता दूँ कि अभी जो मेरी धर्मपत्नी हैं श्रीमती डाक्टर कृष्णा जी M.A.,Ph.D.  इत्तेफाक से वह उस जमघट में नहीं थीं और न उनकी माता जी ही वहां थीं ! कृष्णा जी तो मेरे जीवन में , तब से ६-७ वर्ष बाद मेरी प्यारी अम्मा की सघन खोज के बाद १९५६ में मिलीं ! "शनिदेव" के प्रभाव से ,मेरे विवाह में , मेरे भले के लिए ही शायद एक प्रकार की  साढ़े साती लगी हुई थी  !

आप तो जानते ही हैं कि मेरे संदेशों की इस श्रंखला के चीफ एडिटर महोदय,मेरे प्यारे प्रभु ने , मेरी श्रीमती जी को धरती पर अपना सहायक सम्पादक नियुक्त कर के मेरे ऊपर अंकुश लटका रखा है ,अब तो देखना यह है कि मेडम इसपर कितना कैंची चलाती हैं ! मेरा सर तो सिजदे में झुका हुआ खैरिअत की दुआ मांग रहा है ! आप भी दुआ मांगिये प्लीज़ --

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क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन.श्रीवास्तव "भोला"   
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सोमवार, 9 मई 2011

एक आसरा तेरा हनुमत # 3 6 1

एक आसरा तेरा  हनुमत एक आसरा तेरा 
कोई और न मेरा तुझ बिन कोई और न मेरा 
एक आसरा तेरा 

महापुरुषों का कथन है कि, " जिसका भी आश्रय लिया हो ,उस पर अडिग भरोसा होना चाहिए ! "उनकी" क्षत्र छाया में, मेरा (आश्रित का) कभी कोई अकल्याण हो ही नहीं सकता ,ऐसा दृढ़ विश्वास होना चाहिए !" लेकिन आम तौर पर ऐसा नहीं हो पाता ! जब मन मांगी मुराद पूरी नहीं होती तो भरोसा डगमगा जाता है !

आपने देखा होगा कि कैसे सिनेमा घरों और टेलेविजन के अधिकांश फेमिली सोप नाटकों में , बेचारे परमपिता परमेश्वर को अथवा त्रिशूल धारिणी सिंहवाहिनी जगजननी माँ दुर्गा को, सरेआम ,मन्दिरों के खचाखच भरे प्रांगणों में कभी कभी कैसी कैसी खरी खोटी बातें सुननी पडती है ! उन्हें कहीं निराश प्रेमियों की , कहीं मोडर्न बहुओं के द्वारा सताई विधवा सासों की , अथवा कर्कशा सासों द्वारा उत्पीडित बहुओं के करुण रुदन के साथ साथ पूरी ताकत से मन्दिर के जहाँगीरी घंटे को जोर जोर से बजाते परीक्षा में फेल हुए विद्यार्थियों  के विषादाग्नि  में तपे वाग वाण सहन करने पड़ते  है ! ज़रा सोच कर देखिये क्या क्या कहते हैं लोग उनसे ? कैसे कैसे उलाहने देते हैं उनको ? वह बेचारे चुपचाप सुनते रहते हैं ! पत्थर के जो हैं , कर ही क्या सकते हैं ?

अब मेरी सुनिए ,१७-१८ वर्ष की अवस्था तक घर में रहा ! अपने संचित प्रारब्ध एवं माता पिता के संस्कारों तथा उनके पूजा पाठ और पुन्यायी के सहारे ,मेरी गाड़ी सब के साथ साथ भली भांति चलती रही ! और जब मेरा घर छूटा , मैं बनारस आया तो अपनी specific ज़रूरतों के लिए अब मुझे स्वयम ही अपनी अर्जी लगाने की जरूरत पड़ी ! इस उद्देश्य से विश्वविद्यालय के कुछ अन्य आस्तिक सहपाठियों के साथ मैंने किसी किसी मंगलवार को ,निकट के नगवा गाँव में स्थित श्री हनुमान जी के संकटमोचन मन्दिर में जाना प्रारम्भ कर दिया !

मेरी प्रार्थनाओं के उत्तर में श्री हनुमानजी ने ,मुझे बी.एच .यू के प्रवास के दौरान ,मेरी तब की १७-१८ वर्ष की अपरिपक्व बुद्धि के अनुसार कडवे ( ? ) और मीठे दोनों प्रकार के प्रसाद दिए ! आज ८२ वर्ष कि अवस्था में इसका उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ कि आपको उदाहरण देकर बता सकूं कि हनुमान जी का जो प्रसाद मुझे तब कडुवा लगा था वही कुछ समय के बाद मेरे लिए अत्यधिक मीठा बन गया और मैं आजीवन उसकी मधुरता चखता रहा ! जो तत्काल कडुआ लगा था वह वास्तव में अस्थायी रूप से कडुआ था और शीघ्र ही स्थाई रूप से  मीठा हो गया !

तात्पर्य यह है कि थोड़ी सी निराशा के कारण हतोत्साहित होकर हम अक्सर अपने आगे के प्रयास ढीले कर देते हैं और भविष्य में उसके कारण अधिकाधिक कष्ट झेलते हैं ! और हाँ, अन्त तक जब कोई दूसरा नहीं मिलता तो हम उस बेचारे "ऊपर वाले" को अपनी हार  का ज़िम्मेदार ठहरा कर मन्दिरों में घंटे बजा कर वैसा ही नाटक खेलते हैं जिसका चित्रण मैंने ऊपर किया है ! 

प्रियजन मैं अपने ८ दशकों के अनुभव के आधार पर आपको विश्वास दिलाता हूँ कि  इष्ट देव द्वारा, आपको दिया हुआ , आपकी कड़ी मेहनत का प्रसाद कभी कडुआ हो ही नहीं सकता ! जरा धीरज रख कर थोड़ी प्रतीक्षा करने पर वह फल जो आज खट्टा लग रहा है , कल तक ,पक कर मीठा हो जायेगा ! 

जो मिले फल ,प्यार से तू ,कर उसे स्वीकार
आज जो कच्चा है , वो कल हो जायेगा तैयार 
("भोला")


कल से सुनाऊंगा उस जमाने के ही ऐसे अनुभव जिनमे पहले तो खट्टे फल मिले पर
कुछ  समय बाद वो फल ही अति मधुर हो गये !
क्रमशः  

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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
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शुक्रवार, 6 मई 2011

श्री राम दूतं शरणं प्रपद्दे # 3 6 0

आश्रय
श्री राम दूतं शरणं प्रपद्ये      

    
शैशव में ही अम्मा ने मुझे श्री हनुमान जी के सुपुर्द कर दिया और तब से आज तक वह ही मेरे "परम आश्रय" हैं ! मेरे जीवन के इन ८२ वर्षों में "मारुती नंदन" ने मेरी ,कब किस क्षेत्र में कितनी और कैसी कैसी मदद की उसका लेखा जोखा देना मेरी साधारण मानव बुद्धि के लिए तो असंभव है ही और मुझे तो ऐसा लगता है जैसे ,मेरे "वह",जी हाँ उन "ऊपरवाले" का सुपर कम्प्यूटर भी शायद  क्रैश कर गया है !आप पूछोगे , कैसे जाना ? 

बताऊं आपको , पिछले तीन दिनों से जहाँ , इधर धरती पर , मेरी खर बुद्धि से कुछ निकल नहीं रहा है , वहीं ऐसा लगता है जैसे ऊपर ब्रह्मलोक के क्षीर सागर में विश्रामरत मेरे प्रेरणा स्रोत , पथप्रदर्शक के 'जी पी एस' का सम्बन्ध भी उनके सेटेलाइट से टूट गया है ! उन्होंने भी पिछले ७२ घंटे से मेरे पास कोई प्रेरणा प्रेषित करने की पेशकश नहीं की !

क्यों चिंता कर रहा हूँ मैं ? जब पतवार हनुमान जी को सौंपी हुई है और उन्हें अपना परम आश्रय मान ही लिया है तब क्यों न सबसे पहले उनका ही सुमिरन करके , उन्हें मनालूं ! 
मुझे विश्वास है कि श्री हनुमान जी का स्मरण करते ही साधक को बल बुद्धि,यश कीर्ति  , निर्भयता, सुदृढ़ता , आरोग्य और वाक्पटुता की प्राप्ति होती है ! मेरे मस्तिष्क में भी श्री हनुमान जी की कृपा से अपने लेख के लिए भाव आ जायेंगे और मैं अपने प्यारेप्रभु का २६ नवम्बर '०८ का आदेश अक्षरशः पालन कर पाउँगा !

जाके गति है हनुमान की 
सुमिरत संकट-सोच-विमोचन मूरति मोद- निधान की
अघटित-घटन,सुघट-विघटन,ऎसी विरुदावली नहि आन की  

तुलसीदास जी  का कथन है कि जिसको एकमात्र हनुमानजी का ही भरोसा है उसकी सारी आशाएं ,आकांक्षाएं और प्रतिज्ञाएँ अविलम्ब पूरी हो जाती हैं ! हनुमानजी की आनंदमयी मूर्ती का स्मरण करते ही सारे संकट कट जाते हैं और सब चिंताएं दूर हो जाती हैं !  हनुमान जी की कृपा दृष्टि सब कल्याणों की खान है और वह जिस पर होती है उसपर सब  देवी देवताओं की कृपा निरंतर होती रहती है ! यह सिद्धांत वज्र के समान अटूट है !

बाल्मीकि रामायण के श्री राम ने हनुमान जी के विषय में कहा था कि  रावण और बाली के सम्मलित बल का मुकाबला हनुमान जी अकेले ही कर सकते हैं !  पराक्रम,उत्साह, बुद्धि, प्रताप,सुशीलता, मधुरता, गंभीरता, चातुर्य, धैर्य तथा नीति -अनीति का विवेक श्री हनुमान जी से बढ़ कर किसी और में नहीं है !

क्यों न हो ऐसा जब उनके रोम रोम पर साक्षात् श्री राम बिराजे हैं ,उनके अंग प्रत्यंग में , उनके साज सिंगार ,वस्त्राभूषण में सर्वत्र राम ही राम , बस राम ही राम हैं --एक हनुमान जी के दर्शन के साथ साथ कोटि कोटि श्री राम का दर्शन होता है ! चलिए एक पारंपरिक रचना में हम सब श्री हनुमान जी के श्री विग्रह का दर्शन करें -

राम माथ ,मुकुट राम ,राम हिय, नयन राम
राम कान, नासा राम, ठोड़ी राम नाम है  
राम कंठ ,कंध राम, राम भुजा बाजूबंद  
राम हृदय अलंकार , हार राम नाम है
राम उदर नाभि राम, राम कटी कटी सूत
राम बसन जन्घ राम पैर राम नाम है  
राम मन बचन राम राम गदा कटक राम 
मारुती के रोम रोम व्यापक राम नाम है             

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माननीय चीफ जस्टिस श्री शिवदयाल जी के एक प्रवचन से प्रेरित  
निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 4 मई 2011

हनुमान तेरा आसरा # 3 5 9

हनुमान तेरा आसरा 

(गतांक से आगे) 

महापुरुष कहते हैं  कि ,सच्चे साधक का एक ध्येय, एक इष्ट और एक गुरु होना चाहिए !आसरा - आश्रय, भी मात्र एक का ही लेना उचित है ! सागर पार करने को केवल एक सुदृढ़ नौका चाहिए ,अनेकों नौकाये हो कर भी काम नही आयेंगी ! मानते हैं , लेकिन क्या करें/ जब तक हमारी  अपनी सद्वृत्तियों के अनुरूप हमे हमारी मंजिल तक ले जाने वाला या हमारा पथ प्रशस्त करने वाला सद्गुरु नहीं मिलता ,तब तक  हम डगमगाते रहते हैं ! जब हमारा भाग्योदय होता है ,तब हमे सदगुरु मिलते हैं जो हमारी स्थिति के अनुरूप , हमे हमारे इष्ट का परिचय देते हैं, अथवा अपने किसी सुयोग्य सहयोगी  के पास उनकी कृपा मागने के लिए भेज देते हैं  ! मेरे  साथ ऐसा  ही हुआ !

शैशव में जननी माँ बनी हमारी पहली इष्ट ,पहली गुरु, पहली मार्ग दर्शक ! बाल्यावस्था में  ही, मुझे अपने पैरों  पर खड़ा कर के उन्होंने आंगन के महाबीरी ध्वजा वाले हनुमान जी को सौंप दिया ! गुरु मन्त्र दिया कि " कभी भी , कहीं भी ,अँधेरे में डर लगे , रास्ते में कुत्ता पीछा करे, भूत प्रेत का भय सताए तो  हनूमानजी को याद कर लेना , उनसे केवल इतना ही कहना की हे  " हनुमान जी -

को नही जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो ?: 
काज कियो बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देहि बिचारो 
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहीं जात है टारो 
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु  संकट होइ हमारो 

फिर तुम्हारा डर पल भर में फुर्र से उड़ जायेगा ! "

अम्मा से मिला यह गुरु मन्त्र बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ ! जब कभी भय ने सताया ,हमने "उनको" याद  किया और बात बन गयी ! इसके बाद अम्मा की बात गाँठ बांधे मैं एक के बाद एक मंजिल पार करता गया ! आत्म कथा के पिछले अंकों में बता चुका हूँ की कैसे "पनकी" वाले हनुमान जी की कृपा से मुझे खानदानी मुंशीगीरी का पेशा छोड़ कर कोई टेक्नीकल काम सीखने की प्रेरणा मिली ! यही नहीं मेरी अभिलाषा पूरी करने के लिए श्री  हनुमानजी की ने  मुझे भारत की उस जमाने की सर्वश्रेष्ठ युनिवर्सिटी B H U  के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी में out of turn - most unexpectedly बिना किसी सोर्स या शिफारिश के एडमिशन भी दिला दिया ! अपना तो एक ही सोर्स था , और अपने को भरोसा भी एक हनुमंत का ही था अन्य किसी का नहीं !  

वाराणसी में पढाई के दौरान पूरे समय अम्मा द्वारा नियुक्त हमारे इष्ट श्री हनुमान जी  हमारे अंग संग रहे ! उन्होंने एक से एक भयंकर दावानल में ,मुझ पर कोई आंच न आने दी ! इन घटनाओं में मेरे साथ मेरे अनेकानेक अतिप्रिय घनिष्ठ  मित्रगण ,सगे सम्बन्धी मेरे ही जैसे १७-१८ वर्ष के अन्य प्रदेशों और सुदूर साउथ अफ्रिका आदि विदेशों से आये अनेकों सहपाठी , युवक-युवतियां तथा गुरुजन सभी शामिल हैं ! जिनका अभी यहाँ उल्लेख करना मुझे उचित नहीं लग रहा है ! विद्याध्ययन  के दिनों में वाराणसी में मेरे साथ अनेकों ऎसी अनूठी घटनाएँ घटीं जिन पर विश्वास करना स्वयम मेरे लिए कठिन होता यदि मैं खुद ही उसका गवाह न होता !

प्रत्येक अवसर पर श्री हनुमान जी ने अपना वरद हस्त मेरे मस्तक पर रख कर मुझे  विजय श्री दिलवायी ! हमारा हनुमंत- भरोसा दिन प्रति दिन दृढ़ ही होता गया !

(ये सारी घटनाएँ अति रोचक हैं !  १९४०-५० के भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे युवक युवतियों के रहन सहन चाल ढाल पर प्रकाश डालतीं हैं लेकिन इन कथानकों में मेरे भागीदार अधिकांश साथी अब तक यह संसार छोड़ चुके हैं, और फिर किसी की सम्मति के बिना उसके विषय में कुछ भी कहना मेरे प्यारे पाठकों , मुझे प्रभु से मिल रहे अभी के संकेतों के मद्देनजर अनुचित लग रहा है ! इसलिये अभी उनके विषय में  कुछ नहीं बोलूँगा लेकिन जैसे जैसे "ऊपर वाले" से आदेश मिलेगा, आत्म कथा में उनका समावेश करूंगा)

क्रमशः
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 2 मई 2011

हनुमान तेरा आसरा # 3 5 8

श्री  राम  तेरा  आसरा 
भगवान तेरा  आसरा 

!! हनुमान तेरा  आसरा !!

बचपन से सुनते सुनते अब तो यह हमारी दृढ़ धारणा बन गयी है कि सर्वशक्तिमान सर्वग्य ,सर्वत्रव्याप्त "राम" ही हमारे  सर्वस्व है ! (सबके इष्ट  भिन्न  भिन्न हैं अतएव प्रार्थना है - कि आप सब अपने अपने इष्ट को  याद करते हुए निम्नांकित पद दुहरायें)


सियराम   स्वरूप   अगाध   अनूप   बिलोकनि   मीनन   को  जलु  है 
श्रुति  राम  कथा  , मुख  राम  को नाम , हिये पुनि  रामही  को थलु  है 

Stunning is the charm of the couple "Sree Sita Ram ji". 
Their appearance before us is , like WATER  for the FISH of our eyes . 
Oue Ears are for listening to HIS tales (katha), 
Mouth is for uttering his name and our 
Heart is the abode of SREE RAM . 

मति  राम  हि  सों  गति  राम  हि  सों  रति  राम  सों  रामही  को  बलु  है  
सबकी  न  कहें , तुलसी के मते,   इतनो   जग    जीवन   को    फलु   है 

All my strength , my wisdom , my  मति  गति  रति  are derived from HIM 
and are bestowed  by RAAM only. 
Can't say about others but according to TULSIDAS 
 This ONLY is the BOON of  human existence .

तुलसी , नानक, कबीर ,सूर , दादू ,मलूक, रैदास और मीरा , किन किन का नाम लूं, इन सभी भक्त साधकों ने एक ही स्वर में अपने अपने इष्ट का गुण गान किया है और उनको ही अपना "परम आश्रय " बताया है ! इन सब के इष्ट देवों के नाम में "श्री राम" का नाम ही समाहित है ! सबने एकमात्र "उनका" ही आसरा लिया है  ! इन महान विभूतियों को आसरा देने वाले "वह" राम क्या कभी हमारे आश्रय भी बनेंगे ? क्या हम साधारण नरनारी कभी "उन" तक पहुंच पाएंगे  ?  उत्तर में महापुरुषों ने कहा , कि बिना किसी की मदद के  "उन" तक पहुंच पाना असंभव नहीं ,तो कठिन अवश्य ही है !
भाग्यशाली हैं वे ,जिनके गुरुजनों ने उन्हें वहां तक पहुंचने का मार्ग बताया है ! सिद्ध गुरुजन ,जी पी एस की तरह शिष्यों को कोई मोड़ आने से पहले ही आगाह कर देते हैं की 
इतने मीटर गज फीट या मील के बाद उन्हें दाहिने घूमना है या बाएं !


आप सोच रहे होंगे कि "हनुमान तेरा आसरा" कहते कहते मैं क्यों राम जी के आसरे की  बात करने लगा ! वास्तव में बात यह है कि , सभी राम भक्तों का आसरा केवल मारुती नंदन श्री हनुमान जी ही  है ! कल बताउंगा कैसे !


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क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

"सत्य साईँ बाबा" - श्रद्धांजली # 3 5 4

मेरी श्रद्धांजली
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कोट्टयम केरल के मन्दिर में "अनंत शयनंम" की मुद्रा में लेटे योगेन्द्र 
तथा 
प्रयागराज में त्रिवेणी तट पर लेट कर विश्राम करते अंजनी सुत हनुमान जी 
के समान प्रशांत निलयम में अनंत विश्रामरत 
श्री श्री सत्य साईँ बाबा को समर्पित 
भोला की यह श्रद्धांजली     

मन का सुमन चढाने लाया श्रद्धांजलि में "साईँ" तुम पर
मेरा  अंतिम यही समर्पण  स्वीकारो  मुझ  पर करुणाकर 

    बाबा  मैंने कभी न मांगी तुमसे घड़ी अंगूठी माया   
बंद आँख कर खड़ा रहा मैं ,कुछ ना माँगा ,सब कुछ पाया
जय हो सत्य साईँ बाबा की 
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यहाँ U S A में Times Now और अन्य समाचार चेनेल्स पर वहां भारत में प्रशांत निलयम के कुलवंत हाल में पारदर्शी आवरण में ढँकी "सत्य साईँ बाबा" की छवि देख कर मैंने कल आपसे कहा था की मुझे तो बाबा अभी भी वैसे ही लग रहे हैं जैसा मैंने उन्हें ४० -४२ वर्ष पूर्व बंबई में देखा था ! चलिए वो कहानी ही पहले सुना दूँ :

तब हम बंबई के अँधेरी (पूर्व) के जे बी नगर में रहते थे ! बड़ी सडक के उस पार, मरोल में , literally,  stone throw distance पर "सत्य साईँबाबा" का एक सेंटर था ! बाबा  उन दिनों वहां आये थे और पास के एक बड़े पंडाल में रोज़ सुबह शाम आम जनता को दर्शन देते थे और स्वयम गा कर कीर्तन करवाते तथा प्रवचन भी देते  थे ! रोज़ी रोटी के चक्कर में तब हमारी दशा यह थी की , समझो घर के दरवाजे पर बाबा खड़े थे और हम अनजान थे ! हमे तो तब पता चला जब दूसरे या तीसरे दिन ,दफ्तर के एक मलयाली सहयोगी ने ,जो घर में भी हमारे पड़ोसी थे हमे बाबा के आगमन के विषय में बताया ! वे स्वयम बाबा के मुरीद भक्त थे ! उन्होंने  हमारे मन में भी बाबा के दर्शन की अभिलाषा जगा दी ! निश्चित हुआ की अगले दिन हम अपने कुछ दक्षिण भारतीय सहयोगियों के साथ बाबा के दर्शन करके ,बस और लोकल से नहीं ,बल्कि अपनी सरकारी कोटे से मिली प्रीमियर फिएट कार द्वारा फटाफट समय से दफ्तर पहुच जायेंगे !

कार्यक्रम के अनुसार अगले दिन बहुत सबेरे से ही हमारी कोलोनी में चहल पहल चालू हो गयी ! मेरे सहयोगी - रंगाराव, उन्नीकृष्णन और कल्याण रमण ७ बजे से ही तैयार होकर नीचे गाड़ी के पास खड़े हो गये !  पांचो बच्चों के टिफिन बॉक्स में उस दिन जल्दी जल्दी  सेंड विच भर कर कृष्णा जी ने उन्हें सेंट्रल स्कूल के लिए विदा किया और फिर मेरे दफ्तर वाले उन  तीनो सहयोगियों के साथ वह भी हमारे साथ चलीं !

हम बाबा के आगमन के समय से आधे घंटे पहले ही पहुंच गये ! पर तब तक सैकड़ों कारे  और हजारों स्कूटर मय अपनी सवारियों के वहां पहुंच चुके थे ! पंडाल से एक मील दूर भी कार पार्किंग की जगह नहीं मिली ! किसी तरह एक खाली प्लाट के चौकीदार से हमारे सहयोगियों ने फाटक खुलवा ही लिया और श्रीवास्तव सर की नयी गाड़ी की सुरक्षा की गारंटी हो गयी ! अब हमारी पंडाल तक की पैदल यात्रा चालू हुई ! मरोल तब आधा अधूरा ही बना था, रास्ते सकरे और कच्चे थे और हजारों की संख्या में जन समुदाय धूल उड़ाता हुआ दौड़ता हुआ पंडाल की ओर जा रहा था ! वहाँ पहुचते पहुचते हमे आधा घंटा और लग गया ! दंग रह गये यह देख कर की बैठने की कौन कहे वहा तो खड़े होने की भी जगह नहीं थी ! किसी तरह बाबा के आसन से काफी दूर , गेट के पास खड़े खड़े पैर टिकाने भर की जगह मिली !

वहाँ के साईसेवक जनसमुदाय से कीर्तन करवा रहे थे ! हम भी साईँ भक्तो की आवाज़ मे आवाज़ मिला कर कीर्तन करते रहे  ! तभी सहसा कीर्तन रुक गया ! सब समझे की बाबा आ गये ! हम भी चौकन्ने होकर इधर उधर देखने लगे ! पर तभी स्पीकर पर किसी ने ऐलान किया कि " बाबा के आने में अभी एक घंटा और लगेगा !" लगभग साढ़े नौ बज चुके थे दफ्तर के हम चार सीनियर अफसर एक साथ गैरहाजिर हो रहे थे , वहाँ तो हुडदंग मच रही होगी ! हमे जल्दी ही ऑफिस पहुच जाना चाहिए ! यह सोच कर हम सब पंडाल से निकल कर अपनी गाड़ी की ओर चल पड़े !

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प्रियजन आप निराश न होना! हमे थोड़ी देर में दर्शन हों जायेंगे! कल तक प्रतीक्षा कर लें !
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

हनुमत कृपा # 3 5 1

बचपन के कृपा दर्शन 
(सन्देश # ३२९ के आगे की कथा) 


बचपन में अपने ऊपर हुई हनुमत कृपा की कहानियाँ सुना रहा था कि सहसा ही मेरे ब्लॉग # ३३० से ३३५ तक साक्षात् श्री हनुमान जी के अवतार नीमकरौली बाबा की बात चल गई और वह भी उनके "चमत्कारिक कम्बल" तक पहुंच  कर थम गयी ! आज अभी मन में विचार आया "बचपन बीते तो अब ७० - ७५ वर्ष हो गये हैं ,कब तक बचपने में अटके रहोगे अपनी गाड़ी भी आगे बढ़ाओ"! याद आई बाबा की रेलगाड़ी वाली कहानी और साथ में अपनी उस   यादगार रेलयात्रा की कहानी :

कथा की भूमिका दुहरा लूं ! १९४२-४३ की बात है ! नीम करौलीबाबा रेल रोक कर ब्रिटिश रेल कम्पनी - "E I R" से अपनी मांग पूरी करवा चुके थे ! बापू का ,"अंग्रेजों भारत छोडो" आन्दोलन जोर पर था ! मैं ८ वीं या ९ वीं कक्षा में पढ़ता था ! हमारे बड़े भैया के हम उम्र  भतीजे "कोनी भैया" के साथ मैं भी , बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के " बी.मेट" के स्टडी टूर पर निकले विद्यार्थियों के साथ कानपुर के कारखाने देख कर पनकी स्थित श्री हनुमान जी के दर्शन करके ,आगरा की Foundry Industry (लोहे ढ्लायी  के कारखाने) देखने जाने को तैयार हो गया था ! हनुमान जी की प्रेरणा से इन B H U के विद्यार्थियों के साथ रह कर मैंने तब १०-११ वर्ष की आयु में ही  यह निश्चय ले लिया था की मैं अपनी बिरादरी  के पुश्तैनी पेशे -मुंशीगीरी जजी,वकालत या ICS , PCS बनने का स्वप्न भूल कर कोनी भैया की तरह जीविकोपार्जन के लिए कोई टेक्निकल काम करूं !

उस समय तो ऐसा कुछ नहीं लगा की हनुमान जी ने मेरी अर्जी सुनी होगी ,लेकिन १० वर्ष बाद यह साबित हो गया कि उस पल ,कुमति निवारक "श्री हनुमानजी" ने सुमति दे कर मुझसे एक उचित प्रार्थना करवाली थी ! प्रियजन, आप जानते ही हैं कि मेरे उस समय के विचार "उनकी" कृपा से मेरे भावी जीवन के निर्णायक निश्चय सिद्ध हुए ! तभी तो मैंने १९५०-५१ में B H U के ही कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी से डिग्री हासिल की !

हनुमान जी की उपरोक्त प्रेरणा से मिली B H U के कोलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी की इस डिग्री के आधार पर ही अन्तोगत्वा मेरी विदेशों में भी औद्योगिक सलाहकार Expert / Advisor के पद पर नियुक्ति हुई ! हनुमत कृपा के फलस्वरूप !
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क्रमशः  
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पाठकगण : यहा अमेरिका में अभी अभी समाचार मिला कि 
"सत्य साईँबाबा" नही रहे ! कलम रुक गयी है ! 
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निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

अंजनि सुत हे पवन दुलारे - VIDEO- # 3 5 2

हनुमत वन्दन 

सदियों से हमारे हरवंश भवन बलिया में महाबीरी ध्वजा के तले अपने "रामहित दास - वंश" के कुल देवता श्री हनुमान जी की उपासना हो रही है ! इसी  परम्परा के अंतर्गत  कानपूर शाखा में भी , अपने निवास के आँगन में श्री महाबीर जी की ध्वजा प्रस्थापित हुई ! मेरा "भोला परिवार"  १९६३ से १९८९ तक अधिकतर कानपूर से बाहर रहा  ( मेरी सरकारी पोस्टिंग्स के कारण ) अस्तु हमारे बड़े भैया तथा उनके बच्चे वहां के महाबीर जी की रोज़ की पूजा वन्दना बहुत ही श्रद्धा से करते रहे !
  
१९८४ में रिटायर होकर २०-२२ वर्षों के बाद मैं पुनः कानपुर आया और मुझे  इष्टदेव श्री  महाबीर जी की ध्वजा तले बैठ कर  हनुमान चालीसा पाठ करने का मौका मिला ! भैया भाभी और उनके श्रद्धालु बच्चों की नित्य पूजा अर्चना से वह स्थान इतना  चार्ज हो गया था की चालिसा के तुरंत बाद ही "अंजनी सुत हे पवन दुलारे" की रचना हुई ! कुछ दिनों  बाद बच्चों के अनुरोध पर इसका स्टूडियो में ऑडियो केसेट एल्बम बना और फिर DVD  एल्बम भी बन गया ! मैं हनुमान जयंती के अवसर पर आपको वह सुनाना चाहता था , असफल रहा , यहाँ अमेरिका में आज अभी गाकर सुना रहा हूँ !( केमरा और मजीरा कृष्णा जी संचालित कर रहीं हैं , राघव जी "यू ट्यूब" में डालने का प्रयास कर रहे हैं -)

नीचे चित्र के "एरो" पर क्लिक करके पूरा भजन सुनिए साथ में गाइए 

हनुमान जी को मनाइए , प्रार्थना करिये 
"हे संकट मोचन सबके कष्ट हरो" 


अंजनि सुत हे पवन दुलारे , हनुमत लाल राम के प्यारे
अंजनि सुत हे पवन दुलारे 

अतुलित बल पूरित तव गाता , असरन सरन जगत विख्याता
हम बालक हैं सरन तुम्हारे , दया करो हे पवन दुलारे
अंजनि सुत हे पवन दुलारे

सकंट मोचन हे दुख भजंन , धीर वीर गम्भीर निरन्जन
 हरहु कृपा करि कष्ट हमारे , दया करो हे पवन दुलारे 
अंजनि सुत हे पवन दुलारे

राम दूत सेवक अनुगामी , विद्या बुद्धि शक्ति के दानी
 शुद्ध करो सब कर्म हमारे , दया करा हे पवन दुलारे


अंजनि सुत हे पवन दुलारे , हनुमत लाल राम के प्यारे 
अंजनि सुत हे पवन दुलारे


"भोला"




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गीतकार-स्वरकार-गायक-
निवेदक :व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"; सहयोग : पूरा "भोला परिवार"

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

मेरा यह ब्लॉग - क्यों ?

मेरी "आत्म कथा" को समेटे मेरा यह ब्लॉग -  
"महाबीर बिनवौ हनुमाना"  
क्यों ?

# 3 5 0

(गतांक से आगे) 
 
परमात्मा ने जिन संस्कारों से सुसज्जित करके, जिन सांसारिक सुविधाओं से लैस करके, जिन पस्थितियों में जिस परिवार में , जिस जाति, जिस गोत्र में, जिस स्थान पर हमें जन्म दिया हम वहीं जन्मे,और "उन्होंने" जब, जो भी हमसे करवाना चाहा वह करवा लिया! यह "उनका" नियम है और मुझ पर भी यह बाकायदा लागू हुआ है !  

रोज़ी रोटी कमाने और परिवार की परवरिश के लिए ६0 वर्ष की अवस्था तक प्यारे प्रभु ने मुझसे, शायद मेरे पिछले जन्मों के कर्मों का हिसाब चुकता करवा देने के लिए, अति नीच समझा जाने वाला "शूद्रों" का काम करवाया लेकिन इसमें एक बात उल्लेखनीय रही कि वह कर्म करते समय मुझे कभी भी यह नहीं लगा कि मैं कोई सज़ा भुगत रहा हूँ ! सच पूछिए तो मेरी तल्खियाँ दूर करने को, और मुझे सपरिवार आनंदित रखने के लिए "प्यारे प्रभु" ने मुझे वह तथाकथित शूद्रों वाला कार्य करते समय भी, बीच बीच में बड़े बड़े संतों के दर्शन तथा उनके सानिध्य का सौभाग्य दिया ! इन ६० वर्षों में मुझे जिन विशिष्ट दिव्य महात्माओं का  घनिष्ट सानिध्य मिला, उनमें प्रमुख हैं : 

१. श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज (मेरे सद्गुरु) तथा श्री राम शरणम लाजपत नगर नयी दिल्ली के उनके उत्तराधिकारी 
२. श्री श्री माँ आनंदमयी 
३. श्री माँ निर्मला देवी (सहज योग)
४. श्री स्वामी मुक्तानंद जी 
४. श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी 
५. श्री स्वामी अखंडानन्द जी    (आदि) 

मेरे निजी और मेरे सम्पूर्ण परिवार के जीवन को रसमय मधुर और आनंदमय  बनाने में इन दिव्य आत्माओं का योगदान अति महत्वपूर्ण है ! इन महान विभूतियों से प्राप्त दिव्य संदेश मैं अपने लेखों द्वारा आप तक धीरे धीरे पंहुचा ही रहा हूँ ! माँ आनंदमयी की विशेष करुणा और कृपा की कथा आप को पहले सुना चुका हूँ ! 

रिटायर हो जाने पर बच्चों ने हमे और कोई काम करने नहीं दिया ! उनका कहना था "जैसे   शुभ संस्कार आपने हमे दिए हैं, हमारे बच्चों को भी दीजिये , "Why should your grand children be deprived of that ?" मेरे  अधिक समझदार मित्रों ने बिना मांगे राय दी , हमे समझाने की कोशिश की ! "Don't get fooled .They want you to become Baby Sitters for their kids ,while they enjoy parties"!  सब अपने अपने अनुभव से ही राय देते हैं ! 

बुजुर्गों से सीखा था "सुनो सबकी, करो अपने मन की, खूब सोच समझ कर"!  हमने वैसा  ही किया और हमारा अनुभव उनके अनुभव से एकदम विपरीत हुआ ! हम बच्चों के Baby Sitters नहीं बने, उलटे हमारे बच्चों और उनके बच्चों ने हमारी ही देख भाल की ! अब वे ही हमारे Baba Sitters हैं ! हमें हाथ पकड़ कर चलाते फिराते हैं, उठाते बैठाते हैं  !

परिवार की दैनिक प्रातःकालीन प्रार्थना के कारण, जिसमे हम सब एक साथ, मानस तथा गीता जी के चंद चुने हुए शिक्षाप्रद पदों को भावार्थ के साथ पढ़ते थे , हमारे बच्चों के चरित्र पर बहुत सुन्दर प्रभाव पड़ा था !,इसके अतिरिक्त चाहे हम जहाँ भी रहे , भारत में या विदेश  में हमारे बच्चे हमेशा हम दोनों के साथ मन्दिरों और सत्संगों में अवश्य जाते थे, ध्यान से प्रवचन सुनते थे और उनके नोट्स भी बनाते रहते  थे !

मैं जानता हूँ कि आप पारिवारिक प्रार्थना तथा सत्संगों की महिमा कदाचित मुझसे कहीं अच्छी तरह जानते हैं फिर भी मैं आपको बता रहा हूँ ! यह किसी अहंकार वश नहीं ! इसके द्वारा मैं एक तरफ स्वयम अपने आपको  और दूसरी तरफ आप सब को रिमाइंड करवा रहा हूँ, कि हमें अपनी समवेत पारिवारिक साधना में ढील नहीं देनी चाहिए, कम से कम उस समय तक जब तक बच्चे हमारे साथ हैं ! 

सूचना: ग्वालिअर के श्री राम परिवार द्वारा संकलित, दैनिक प्रार्थना के, तुलसी मानस तथा गीता जी के चुनिन्दा अंश धीरे धीरे प्रेषित करूंगा !
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क्रमशः
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निवेदक :- वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

महाराज जी की जयन्ती के अवसर पर उनके एक परम प्रिय शिष्य श्री जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के पुत्र अतुल श्रीवास्तव का पत्र

सभी परिवार जनों को यथा योग्य सादर चरण स्पर्श एवं राम राम

आज (दिनांक 18 अप्रेल 2011) परम पूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की 150 वीं जयन्ती एवं श्री हनुमान जयन्ती है. स्वामी जी महाराज का जन्म सन 1861 की चैत्र शुक्ल पूरणमासी के दिन प्रात: 5 बजे हुआ था. श्री हनुमान जी का जन्म भी प्रात: 5 बजे हुआ था. अतएव मेरी धारणा है कि स्वामी जी महाराज हनुमान जी के अवतार थे, जो कलियुग में हम सब को राम नाम का अति मीठा रस पिलाने के लिये अवतरित हुए थे. उनकी 150वीं जयंती की सबको बधाई. ईश्वर करे स्वामी जी महाराज का वरद हस्त हम सब के सिर पर सदा बना रहे. इस विशेष उत्सव पर हम सब अमृतवाणी का पाठ करेंगे और स्वामी जी महाराज के प्रिय भजन ‘राम अब स्नेह सुधा बरसा दे’, ‘दयामय मंगल मन्दिर खोलो’ आदि गायेंगे एवं जाप करेंगे.

2008 अप्रेल में स्वामी जी महाराज की कृपा से, हम लोग (सुनीता, स्तुति, अमित, छोटे से अथर्व करुणानिधान और मैं) डलहौज़ी गये थे. पूज्य स्वामी जी महाराज के जन्म दिन पर हम लोगों को ‘परम धाम’ में अमृतवाणी का पाठ करने का सुअवसर स्वामी जी महाराज की कृपा से मिला था. बहुत आनन्द आया था. कुछ भजन भी, जिनमें ऊपर लिखे हुए भजन भी थे, गाये थे.

11 वर्ष पूर्व आज ही के दिन, स्वामी जी महाराज के परम शिष्य - परम पूज्य बाबू चोला छोड़ कर पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन हो गये थे. इस वर्ष हनुमान जयन्ति की हिन्दी एवं कलेंडर तिथियां वही हैं जो वर्ष 2000 में थीं – जब पूज्य बाबू स्वामी जी में लीन हो गये थे. बाबू ने अपना ऑपरेशन – अपने चित्त को राम नाम में लगाकर करवाया था. ऑपरेशन के लिये जाने से पहले उन्होंने अपने सारे भजन खूब जोर जोर से गाये थे. जो अंतिम भजन उन्होंने गाया था – वह था – “राम नाम लौ लागी” .

परम पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन होने की यात्रा से पहले उन्होंने इस पृथ्वी लोक पर अपने ऊपर किये हुए उपकारों की ‘कृतज्ञता’ – भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को राधा से सुनकर की. ‘कृतज्ञता’ सुनते सुनते ही वे चोला छोड़कर चले गये थे. तो आइये, अपन सब भी आज अमृतवाणी के पाठ के बाद, भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को पढ़ें.

कृतज्ञता

उसका रहूँ कृतज्ञ मैं, मानूँ अति आभार; जिसने अति हित प्रेम से, मुझ पर कर उपकार .1. 
 दिया दीवा सुदीपता, परम दिव्य हरि नाम; पड़ी सूझ निज रूप की, जिससे सुधरे काम .2.
कर्म धर्म का बोध दे, जिसने बताया राम; उस के चरण सरोज पर, नत शिर हो प्रणाम .3.
धन्यवाद उस सुजन का, करूं आदर सम्मान; जिसने आत्मबोध का, दिया मुझे शुभ ज्ञान .4.
उस के गुण उपकार का, पा सकूं नहीं पार; रोम रोम कृतज्ञ हो, करे सुधन्य पुकार .5.
उस के द्वार कुटीर पर, मैं दूं तन सिर वार; नमस्कार बहु मान से करूं मैं बारम्बार .6.
बहते जन को पोत शुभ, दिया नाम का जाप; शब्द शरण को दान कर, नष्ट किये सब पाप .7. 
उस ने जड़ी सुनाम दे, हरे जन्म के रोग; संशय भ्रान्ति दूर कर, हरे मरण के सोग .8.
चिन्तामणि हरि नाम दे, चिन्ता की चकचूर; दिया चित्त को चांदना, चंचलता कर दूर .9.
वारे जाऊँ सन्त के, जो देवे शुभ नाम; बाँह पकड़ सुस्थिर करे, राम बतावे धाम .10. 
सत्संगति के लाभ से, ऐसा बने बनाव; रंग बहुत गूढ़ा चढ़े, बढ़े चौगुणा चाव .11.

कुछ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर गया था, तब अपनी बहन (बिशन मौसी की पुत्री) सुषमा के घर भी गया था. सुषमा के पति श्री शेखर हैं. वे बहुत अच्छे क्लासिकल सिंगर हैं एवं भजनों के कार्यक्रम रेडिओ आदि पर देते हैं. उन्होंने बताया था कि पूज्य बाबू ने उन्हें एक भजन लिखकर उसकी राग बनाने को दी थी. उस विज़िट में हम लोग उनसे वह भजन नहीं सुन पाये थे. परन्तु, जब इस वर्ष होली पर जयपुर गये थे, तब श्री शेखर से वह भजन सुना था. उस भजन के बोल हैं “प्रभु को बिसार किसकी आराधना करूं मैं

यह भजन मैने टेप कर लिया था. आप सब को आनन्द लेने के लिये यह भजन मैं संलग्न कर रहा हूं


प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मोती मिला जो मुझको मानस के मानसर में .  
कंकड़ बटोरने की  क्या चाहना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

सबका परमपिता जब घट घट में बस रहा है;
लघु जान क्यों किसीकी अवहेलना करूँ मैं.

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मुझको प्रकाश प्रतिपल  आनंद आंतरिक है .  
जग के अधिक सुखों की  क्या कामना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..




श्री राम शरणम वयं प्रपन्ना: ; प्रसीद देवेश जगन्निवासत

आप सबका
अतुल

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

हनुमान जयंती - सद्गुरु जन्म दिवस # 3 4 7

अप्रेल १८ ,२०११, तदनुसार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा सम्वत २०६८                                                             

श्री हनुमान जयंती के शुभ पर्व पर 

एवं



सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के जन्म दिवस पर 


बधाई हो बधाई , सभी को बधाई

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जगतगुरु श्री हनुमान जी की जय 

श्रीरामचरितमानस जैसे विश्वविख्यात अनुपम ग्रन्थ के रचयिता ,परम रामभक्त,प्रकांड पांडित्य एवं ज्ञान के धनी ,श्रीमद गोस्वामी तुलसीदासजी ने जिन दिव्य महात्मा की अद्वितीय शक्तियों एवं क्षमताओं का आंकलन कर अपना गुरु माना और जिनका स्मरण करके उनसे बल बुधि विद्या प्राप्ति के लिए प्रार्थना की वह थे श्री हनुमान जी महाराज :

बुद्धि हींन  तन  जनि के  सुमिरों  पवन कुमार 
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश बिकार 

सोच के देखें ऐसे अंजनिसुत,पवनकुमार ,मारुती नन्दन श्री हनुमानजी से श्रेष्ठ इस संसार में और कौन गुरु हो सकता है ! आज के महान संत कथा वाचक श्री मुरारी बापू ने तो यहाँ तक कहा है की यदि किसी व्यक्ति को अब तक सदगुरु नहीं मिला है तो वह श्री हनुमान जी को अपना गुरु बनाले! 
उनके अनुसार श्री हनुमानजी को परमगुरु मान कर उनके सद्गुणों का अनुकरण करके जीवन जीने वालों का अवश्यमेव कल्याण होगा !

शताब्दियों से हमारे परिवार के "कुल देवता - कुल गुरु "यह श्री हनुमानजी ही हैं ! जन्म से लेकर आज तक अपने पुश्तैनी घर के आंगन में लहराते महाबीरी ध्वजा की छाया में नतमस्तक  होकर  शताब्दियों तक हमारे परिजनों और हम लोगों ने सदा "उनसे" प्रार्थना की है और उनकी कृपा वृष्टि का अनंत आनंद लूटा है !

जय जय जय हनुमान गोसाईं  !  कृपा करो गुरुदेव की नाई !

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गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी महाराज 

मुझे पूरा विश्वास है की श्री हनुमान जी की कृपा के फल स्वरूप ही मुझे इस जीवन में इतने सहृदय परिजन, विज्ञ गुरजन ,स्नेही मित्रगण तथा आध्यात्मिक गुरुदेव श्री स्वामी जी मिले !इतनी सारी शुभ उपलब्धियां किसी को कभी भी अनायास ही नहीं हो सकतीं !प्यारे प्रभु की करुणा के बिनाकुछ भी संभव नहीं है ! हमारे जन्म से बहुत पहले ही से हमपर उनकी कृपा वर्षा शुरू हो जाती है, तभी तो चौरासी लाख योनियों में से सर्वोत्तम "मानव" योनी ही हमे क्यों मिली ? प्रियजन कितनी बड़ी कृपा है उनकी हमपर !
 कबहुक करि करुना नर देही ! देत ईस  बिनु हेतु स्नेही !!
                          बड़े भाग मानुष तन पावा ! सुर दुरलभ सब ग्रन्थही  गावा !





सदगुरु की महत्ता 

ईश्वर ने विशेष अनुग्रह करके मानव को यह अनंत क्षमताओं से भरपूर देवदुर्लभ मानुष चोला दिया है ! अबोध बालक सा मानव अपनी क्षमताओं से तब तक पूरी तरह अनभिग्य रहता है जब तक "जामवंत" जैसे सद्गुरु उस बालक का उपनयन-विद्यारम्भ करवा कर उसका मार्ग दर्शन नहीं करते ,उसकी आत्म शक्ति को जागृत नहीं करते ! 

गुरुजन साधारण मानव को उसकी उसमें ही  निहित क्षमताओं का ज्ञान कराते हैं और उसे अनुशासित  जीवन जीने की कला बता कर उसका उचित मार्ग दर्शन करते हैं !मेरे सद्गुरु ने भी मुझे दीक्षा दे कर मुझ पर महत कृपा की ,मेरा पथ प्रदर्शित कर  मुझे  सत्य ,प्रेम और सेवा के  मार्ग पर चलना सिखाया ,सात्विक  जीवन जीने की कला  सिखाई ,अनुशासन पालन करते हुए जगत में व्यवहार करना सिखाया ! मैं कभी कभी सोचता हूँ कि मेरा क्या हुआ होता यदि मुझे मेरे "सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज " इस जीवन में मुझे नहीं मिलते और इतनी कृपा करके उन्होंने मुझे अपना न बनाया होता या मुझे अपने श्री राम शरणम के "राम नाम उपासक परिवार" में सम्मिलित न  किया होता ? 


सद्गुरु मिलन से मुझे जो उत्कृष्ट उपलब्धि हुई वह अविस्मरणीय है !उससे मैं धन्य हो गया और सच पूछो तो मेरा यह मानव जन्म सार्थक हो गया ! "सद्गुरु दर्शन" के उपरांत मेरी सर्वोच्च उपलब्धि थी सद्गुरु के "कृपा पात्र" बन पाने का सौभाग्य !

१९५६ में मेरा विवाह एक ऐसे परिवार में हुआ जिसके सभी वयस्क सदस्य श्री स्वामी सत्यानंदजी महाराज के कृपापात्र  शिष्य थे ! ये श्रेष्ठ जन पानीपत की माता शकुन्तला जी ,गुहांना के पिताजी  भगत श्री हंस राज जी , बम्बई के ईश्वर दास जी तथा गुरुदेव श्री प्रेमनाथ जी के साथ  स्वामी जी की "नाम भक्ति" साधना में पूरी तरह जुटे हुए थे ! उनसे प्रेरणा पाकर मैं भी स्वामी जी महराज से दीक्षित हुआ और "रामनाम" की उपासना में लग गया ! यह मेरा परम सौभाग्य था !
 

भ्रम  भूल   में   भटकते  उदय  हुए  जब  भाग !                                                             मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग!!




मैंने पहले कहीं कहा  है , एक बार फिर कहने को जी कर रहा है की मनुष्य को मानवजन्म प्रदान कर धरती पर भेजता तो परमेश्वर है लेकिन उसको इन्सान बनाता है ,उसका पालन करता है , उसको राह दिखाता है ,उसकी रक्षा करता है ,उसकी आत्म शक्ति जगता है,उसको मोक्ष का द्वार  दिखाता है उसका "सद्गुरु" ! और यह सद्गुरु भी उसे उसके परम सौभाग्य से एकमात्र उस प्यारे परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है !


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दिवंगत श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज इस युग के महानतम धर्मवेत्ताओं में से एक थे जो  लगभग ६४ वर्षों तक जैन धर्म तथा आर्यसमाज की सेवा करते रहे ! अपने प्रवचनों द्वारा वह जन जन की आध्यात्मिक उन्नति  के साथ साथ सामाजिक उत्थान के लिए भी प्रयत्नशील रहे ! इन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखने पर तथा उनकी विधि के अनुसार साधना करने पर भी जब उन्हें उस आनंद का अनुभव नहीं हुआ जो परमेश्वर मिलन से होना चाहिए तो उन्होंने इन दोनों मतों के प्रमुख प्रचारक बने रहना निरर्थक जाना और १९२५ में हिमालय की सुरम्य एकांत गोद  में जा कर उस निराकार ब्रह्म की (जिसकी महिमा वह आर्य समाज के प्रचार मंचों पर लगभग ३० वर्षों से अथक गाते रहे थे)  इतनी सघन उपासना की कि वह निर्गुण "ब्रह्म" स्वमेव उनके सन्मुख "नाद" स्वरूप में प्रगट हुआ और उसने स्वामीजी को " परम तेजोमय , प्रकाश रूप , ज्योतिर्मय,परमज्ञानानंद स्वरूप , देवाधिदेव श्री "राम नाम" के महिमा गान एवं एक मात्र उस "राम नाम" के प्रचार प्रसार में लग जाने की दिव्य प्रेरणा दी जिसका लाभ आज तक हम सब सत्संगी उठा रहे हैं !

   
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग : श्रीमती डोक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव  
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