सिया राम के अतिशय प्यारे, अंजनिसूत मारुती दुलारे,
श्री हनुमान जी महाराज
के दासानुदास श्री राम परिवार द्वारा
पिछले अर्ध शतक से अनवरत प्रस्तुत यह

हनुमान चालीसा

बार बार सुनिए , साथ में गाइए ,
हनुमत कृपा पाइए .

[शब्द एवं धुन यहीं उपलब्ध हैं]

प्रार्थी - "भोला" [ श्री राम परिवार का एक नगण्य सदस्य ]




आज का आलेख

रविवार, 17 जून 2018

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परम पिता परमात्मा बिनती एक न आन !
 सब की विपदाएं हरो ,करो विश्व कल्यान !
पिताश्री ,परम शांति दो दान !!
("भोला")
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हे प्यारे पिता  
तेरे चरण कमलों में  शत शत नमन  
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आदिकाल से सभी धर्म ग्रंथों में इस सम्पूर्ण सृष्टि  के सर्जक , उत्पादक,पालक,-संहांरक सर्वशक्तिमान भगवान को  "पिता" क़ह कर पुकारा गया है!  

हिन्दू धर्म ग्रन्थों में उन्हें "परमपिता" की संज्ञा दी गयी है ! ईसाई धर्मावलंबी उन्हें अतीव श्रद्धा सहित "होलीफादर" कह कर संबोधित करते हैं ! 

हमारी "ब्रह्माकुमारी" बहनें उसी परम आनन्द दायक , अतुलित शक्ति प्रदायक , ,ज्योतिर्मय ,शान्तिपुंज  को "शिवबाबा" की  उपाधि से विभूषित करके ,सर्वशक्तिमान निराकार परब्रह्म परमेश्वर से साधको  के साथ  पिता और सन्तान  सा सम्बन्ध दृढ़  करतीं हैं ! 


कविश्रेष्ठ श्री प्रताप नारायणजी के समर्पण -भाव से भरी यह पंक्ति कितनी सार्थक है --


पितु मात सहायक स्वामी सखा तुम्ही इक नाथ हमारे हो 
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उपकारन को कछु अंत नहीं छिन ही छिन जो विस्तारे हो 
[ हे पिता ! तुम्हारे उपकार इतने विस्तृत  हैं कि उनसे उऋण  हो पाना असम्भव है ]
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O Divine Father we have just a single prayer to make
Vanish miseries and bless the entire humanity with peace and prosperity.) 
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परम पिता परमात्मा से हमारी नित्य प्रति की अनुरोधात्मक प्रार्थना-
श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज के शब्दों में  

मेरे   प्यारे  हे  पिता ,परम  पुरुष  भगवान ,
तुझसे बिछड़ा विषम बन मैं भूला निज ज्ञान !! 

जन्म जन्म भूला फिर ,पाया राम न नाम ,
अबकी यदि संयोग हो , सिमरूं आठों याम !! 

बालक बिछड़ा भूल से ,चल कर उलटे पंथ ,
अब तो मार्ग दीजिये , पढूँ नाम मय ग्रन्थ !!


अपने जन की सार ले, अपना बिरद बिचार ,
भूल चूक को कर क्षमा , पूरी करो सम्भार !!


रोये   बिरही  रातदिन  ले  ले लम्बी साँस ,
परम पिता से दूर कर ,लिया काल ने फांस !!

इस अटवी अति घोर में ,भटक भटक दुःख पाय ,
तुम  बिन  मेरा  कौन  है, पथ  जो  मुझे  बताय !!

(रचयिता : ब्रह्मलीन , गुरुदेव श्री स्वामी सत्यानंदजी महराज)

प्रियजन अब पिताश्री के श्रीचरणों की वन्दना में एक पद 


तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता मुझे ऐसा दृढ बिस्वास हो
कि मन में मेरे सदा आसरा तेरी दया व  मैहर की आस हो.

"Beloved Father Bless me with an unfaltering FAITH in your GRACE
so that I always depend upon your kindness."

चढ़ आये जो कभी दुःख की घटा या पाप करम की होये तपन
तेरा नाम रहे मेरे मन बसा ,तेरी दया व मेहर की आस हो.
तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता -----------------------

"If clouds of misery compel me to adopt unholy practices .
O my Beloved Father  
May I be reminded to remember your name inviting your GRACE"

यह काम जो हमने है सर लिया करें मिल के ह्म तेरे बाल सब,
तेरा हाथ जो ह्म पर रहे सदा तेरी दया व मैहर की आस हो.
तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता -------------------

"We-Your loving children be enabled to carry out the jobs assigned to us,
as a team, and your BLESSINGS be always available to us."

मनसा वाचा कर्मना सब को सुख पहुचाय
अपने मतलब कारने दुक्ख न दे तू काहु
यदि  सुख तू नहीं दे सके तो दुःख काहू मत दे
ऎसी रहनी जो रहे सो ही आत्म सुख ले

"May we be enabled to serve, with our heart and soul, the needy,
to make them feel happy. Our acts should not cause pain to any one.
If we are not able to provide the unhappy ones with happiness 
we have no right to cause pain to any one.
Those who follow this divine principle will be blessed "


(आभार - राधास्वामी  सत्संग दयालबाग आगरा )
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निवेदक:  व्ही .  एन . श्रीवास्तव "भोला"



बुधवार, 23 सितंबर 2015

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योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की अमर वाणी  ......
श्रीमदभगवत गीता ( श्री गीताजी )
के पाठ से क्या सीखा ?
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मानवता,हर काल में , महाभारत काल के अर्जुन के समान विभिन्न विषम परिस्थितियों से जूझती है !  आज भी सामान्य मानव के मन में धर्म-अधर्म ,सत्य-असत्य तथा ज्ञान-अज्ञान के बीच  महायुद्ध चल रहा है  !,

सत्य तो यह है कि आज भी भारत का "धर्म क्षेत्र" ,"कुरु क्षेत्र" ही बना हुआ है !  नीति न्याय हींन दुर्बुद्धि मानव दुर्योधन के समान प्रत्येक न्यायसंगत कार्य  के मार्ग में रोडे अटकाता  हुआ सर्वत्र  व्याप्त  है और उसका मुकाबिला करने वाला सक्षम  पराक्रमी न्यायशील मानव महाबाहु अर्जुन के समान सांसारिक मोह माया की जाल में फसा हुआ , मानव मूल्यों  को भूल  कर अज्ञानता का शिकार बन  कर   कायरता के वशीभूत हो कर अपना गांडीव धरती पर डालने को मजबूर हो रहा है !

ज्ञानियों,मनीषियों तथा महात्माओं का कथन है कि   अर्जुन की सी कायरता व निष्क्रियता के भाव से  बचने के ध्येय से ,आज की मानवता के लिए भी,योगेश्वर श्रीकृष्ण की गीता के कल्याणकारी मूल्यों को अपनाना अपेक्षित है !

याद रखें कि ,गीता भगवान कृष्ण की वंशी  से निकला वह गीत है जो कायर से कायर मानव के सुप्त  पौरुष को जगा कर, उसमें उत्साह आनंद और कर्म  करने की प्रेरणा जगाता है और उसे  धर्मयुद्ध करने को प्रेरित करता  है  
सद्गुरुजन  का सुझाव है कि हमे भी अपने शौर्य, अपने पौरुष ,अपनी बुद्धिमत्ता ,अपनी व्यवहार -कुशलता  का अहंकार त्याग कर  पूर्णतः समर्पित भाव से योगेश्वर की मुरली के शब्द अपने मानसपटल पर अंकित करें और उसमे उल्लेखित  मार्गदर्शन के आधार पर अपने आचार -विचार व व्यवहार में उन  जीवन -मूल्यों को उतारें !

मूल सन्देश यह है कि सर्वप्रथम हम , यह स्वीकारें कि सांसारिक परिस्थितियों से घबरा कर हम  भी अर्जुन के सामान कायर हो गये हैं ! इस निष्क्रियता  से मुक्त होने के लिए हमे पूर्णतः शरणागत हो कर प्यारे प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारा उचित मार्ग दर्शन करें ! अर्जुन ने अपनी प्रार्थना में कहा था

कायर बना मैं आज करके नष्ट सत्य स्वभाव को ,
भ्रमित  मति ने है भुलाया  धार्मिक शुभभाव को !!

मैं शिष्य शरणागत हुआ अब मार्गदर्शन कीजिए,
हें नाथ  बतलायें मुझे, जो  उचित करने के लिए !!
[ श्रीगीताजी - अध्याय २ ,श्लोक ७ ]
( यहाँ धार्मिक भाव से तात्पर्य लोक कल्याणकारी कर्मों से है )

श्रीमद गीता के प्रारम्भ में निज दुर्गुणों को स्वीकारते हुए अर्जुन ने  श्री कृष्ण के शरणागत  हो कर धर्मसंगत न्यायोचित कर्म पथ पर चलने का मार्ग प्रदर्शित करने की विनती  की  !,वास्तव में आज हमें भी यही करना है! कायरता ,अकर्मण्यता एवं निष्क्रियता को  त्याग कर कर्मठ हो कर सही  राह  पर प्रगतिशील रहने के लिए  योगेश्वर से विनती करनी है कि वह कृपा करें और हमारे सभी अवगुण हर लें !

उपरोक्त भावनाओं को संजोये है निवेदक की स्वरचित प्रार्थना -----
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अपराधी अवगुण भरा पापीऔर सकाम  
क्षमा करो अवगुण हरो प्यारे प्रभु श्री राम  !!

प्रभु हर लो सब अवगुण मेरे , चरण पड़े हम बालक तेरे
प्रभु हर लो ------- 
व्यर्थ गंवाया जीवन सारा पड़ा रहा दुर्मति के फेरे,
चिंता क्रोध लोभ ईर्ष्या वश अनुचि त काम किये बहुतेरे !!  
प्रभु हर लो ------
भीख माँगता दर दर  भटका ,झोली लेकर डेरे डेरे ! 
तेरा द्वार खुला था पर मैं पंहुचा नही द्वार तक तेरे !! 
प्रभु हर लो ------
( ई मेल से ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए यू ट्यूब का लिंक :
 https://youtu.be/d9NaUblXy0I



ठगता रहा जनम भर सबको रचता रहा कुचक्र घनेरे ! 
नेक चाल नही चला, सदा ही रहा कुमति माया के नेरे !!  
प्रभु हर लो -----
मैं अपराधी जनम जनम से झेल रहा हूँ घने अँधेरे !
तमसो मा ज्योतिर्गमय कर अन्धकार हरलो प्रभु मेरे !! 
प्रभु हर लो सब अवगुण मेरे  
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निवेदक :  व्ही,  एन,  श्रीवास्तव "भोला"
 सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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गुरुवार, 10 सितंबर 2015

साई दर्शन -

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शिरडी के साईँ बाबा 
की 
उपसना हेतु एक नया मंगल मंत्र 
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शब्दकार - वरिष्ठ साई भक्त - 
श्री महेंद्र सिन्हा 

स्वरकार व गायक = शिरडी के बाबा के गायक उपासक -
श्री कीर्ति अनुराग  
( अनुराग श्रीवास्तव एवं समवेत गायक वृन्द )
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साईँ बाबा के दिव्य दर्शन के साथ देखें और सुने -
नया साई मंत्र 



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निवेदक - व्ही. एन. श्रीवास्तव  "भोला"
वीडियो शिल्पी - श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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रविवार, 30 अगस्त 2015

ओं नमः शिवाय -

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ओम नमः शिवाय 


 महापुरुषों का कथन है कि जीवों के परमाधार 'परमेश्वर'  के  कृपास्वरुप का नाम "श्री राम "है 
उनके प्रेमस्वरुका  नाम  "श्री कृष्ण"  हैं , 
उनके"वात्सल्य स्वरुप" का नाम  "आदि शक्ति माँ जगदम्बा" हैं 
तथा 'वैराग्य  स्वरुप'का नाम भगवान  शिव है !  

परम पिता परमेश्वर  के गुण , स्वभाव और  क्रिया -कलाप के कारण ही उनके वैराग्य स्वरूप को श्रद्धालु  भक्तजन  शिव ,शंकर ,भोला ,महादेव ,नीलकंठ , ,नटराज,त्रिपुरारी , अर्धनारीश्वर ,विश्वनाथ आदि अनेकानेक  नामों से उनका नमन -वन्दन  करते है !"

शिव" का शब्दार्थ है " कल्याण"! महामहिमामय देवोंके देव महादेव का स्वरूप तेजोमय और कल्याणकारी है ! 
अपने इष्ट श्री राम  के अमृत तुल्य मधुर नाम का  सतत जाप करने वाले भोलेभाले देवता 'शिव-शंकर' ने क्षीरसागर के मंथन से प्राप्त भयंकर विष, का सहर्ष पान किया था ! 
उसे अपने कंठ से नीचे नहीं उतरनेदिया क्योंकि "कालकूट" यदिशंकरके उदर तक पहुंच जाता तों समस्त सृष्टि का ही विनाश हो जाता , न सुर बचते न असुर  !   और यदि शिव   विषपान न करते तों बल मिल जाता  असुरों के  अहंकार को !फिर   देवताओं तथा मानवता का विपत्ति निवारण असंभव हो जाता ! 

 इसी कारण कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले ,करुणा के साक्षात् अवतार,  असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले,भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं हम उन देवाधिदेव की वंदना करते है .,विशेषकर सावन मास में!

कर्पूरगौरम  करुणावतारम  संसारसारं  भुजगेंद्रहारम 
     
सदावसंतम हृदयारविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि 

तुलसीदास की अनुभूति में 'शिव" ऐसे देव हैं जो अमंगल वेशधारी होते   हुए  मंगल की राशि है ;महाकाल के भी काल  होते हुए करुणासागर हैं !,

प्रभु समरथ सर्वग्य  सिव सकल कला गुन धाम 

जोग  ज्ञान  वैराग्य   निधि  प्रनत कल्पतरु नाम !!
( शिव समर्थ,सर्वग्य,और कल्याणस्वरूप ,सर्व कलाओं और सर्व गुणों केआगार हैं ,योग ,ज्ञान तथा वैराग्य के भंडार हैं ,करुणानिधि हैं कल्पतरु की भांति  शरणागतों कों वरदान देने वाले  औघड़दानी हैं )

आइये आज सोमवार को हम सब समवेत स्वरों में पूरी श्रद्धा एवं निष्ठां से ,गुरुजनों के भी सद्गुरु ,सर्व गुण सम्पन्न सर्वशास्त्रों के ज्ञाता ,सर्व कला पारंगत राम भक्त , देवाधिदेव ,  देवताओं समेत समस्त सृष्टि  के पालन हारसब को निःसंकोच वर देने वाले , भोले नाथ शिव शंकर की वन्दना करें !





https://youtu.be/meclUBvlyTc  

(यूट्यूब पर देखने के लिए लिंक )


जय शिवशंकर औगढ़ दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी !

सकल श्रृष्टि के सिरजनहारे , रक्षक पालक अघ संघारी !!

हिमआसन त्रिपुरारी बिराजें , बाम अंग गिरिजा महारानी !!

औरन को निज धाम देत हो हम ते  करते आनाकानी !!

सब दुखियन पर कृपा करत हो , हमरी सुधि काहे बिसरानी !!

"भोला"

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निवेदक :  व्ही .  एन.  श्रीवास्तव  "भोला"

शोध एवं संकलन सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 

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सोमवार, 24 अगस्त 2015

राम सकल नाम्न ते अधिका !! तुलसी !!

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राम रामेंति रामेति रमे रामे मनोरमे !
सहस्त्र नाम ततुल्यं राम नाम वरानने !

महामुनि बुधकौशिक ऋषि द्वारा रचित श्री राम रक्षा स्रोत के देवता हैं युगल श्रीरामभद्रजी  एवं जगद्जननीजानकी मातेश्वरी श्रीसीता जी !

इस महामंत्र के गुणातीत देवता श्रीरामजानकी युगल के दिव्य सद्गुनों की इतनी सार्थक व्याख्या  एवं महिमा  का इतना सरस सुमधुर गायन अन्यत्र किसी भी साहित्य में उपलब्ध नही है !

उपरोक्त श्लोक की दूसरी पंक्ति में समाहित है समग्र स्तोत्र का सारांश 
सहस्त्र नाम ततुल्यं राम नाम वरानने !
अर्थात 
अन्य सहस्त्रों देवताओं के नामो से बढ़ चढ़ कर है श्री राम नाम !

रामभक्त संत तुलसीदास जी ने भी राम नाम को सर्वोच्च कहा  :

ब्रह्म अनामय अज भगवंता ! व्यापक अजित अनादि अनंता !!
हरि व्यापक सर्वत्र समाना ! प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना !!
यद्यपि प्रभु के नाम अनेका ! श्रुति कह अधिक एक ते एका !!
राम सकल नामन्ह ते अधिका ! ............................!!

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संत तुलसीदास की उपरोक्त चौपाइयों का अपना गायन आपको फिर कभी सुनायेंगे आज हम आपको सुना रहे हैं वर्तमान रामनाम साधिका श्रीमती शांतादयाल जी द्वारा रचित स्वरबद्ध किया तथा गाया  यह भजन , जो उन्होंने १९८३ -८४  हमारे कानपुर के अमृतवाणी सत्संग  में गाकर सभी साधकों को भाव विभोर कर दिया था ! लीजिए सुनिये और देखिये 

सुमिर् राम का नाम मन रे , सुमिर राम का नाम !!
रामनाम सब पाप निवारे , रामनाम जप भव भय तारे !!
तर जा भव सागर से प्राणी ,  सुमिर राम का नाम !!

राम जाप जब होगा निरंतर , प्रेम प्रगट होगा घट अंतर !!
ज्योति जगेगी छवि  प्रगटेगी , दर्शन देंगे राम !!
मगन हो जपले राम का नाम ! सुमिर राम का नाम !!





भक्ति करो श्री राम चन्द्र की , सेवा उन्ही के चरणों की !!
मन में उनकी छवि बसा लो ,जपो निरंतर नाम 
मगन हो जप ले राम का नाम !!

सुमिर राम का नाम मन रे सुमिर राम का नाम !!
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youtube LINK :

https://youtu.be/OeHBUNlLrPU

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निवेदक :   व्ही . एन.  श्रीवास्तव "भोला"
तकनीकी सहयोग : श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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रविवार, 9 अगस्त 2015

श्रावण के सोमवार ..भगवान शिव शंकर को समर्पित

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ओम नमः शिवाय 
शिव शंकर   समर्थ,सर्वग्य,,सर्व कलाओं और सर्व गुणों के आगार हैं ,योग ,ज्ञान और ,वैराग्यकेभण्डार हैं !  वे कल्याणस्वरूप हैं,करुणानिधि हैं ,भक्तवत्सल हैं ,कल्पतरु की भांति  शरणागत को वरदान देने वाले   देव हैं !

हमारे  ऋषि मुनियों ने साक्षात्कार के अनुभूत तथ्यों के  आधार पर"ओंकार" के मूल विभु व्यापक तुरीय  शिव के  निराकार ब्रह्म स्वरूप को  साकार स्वरूप दे कर उसे अलौकिक वेशभूषा  से सुसज्जित किया है ! उनके  शरीर  को भस्म से विभूषित  किया है ,  गले में सर्प और  रुंड मुंड की माला डाली है ,  जटाजूट में पतित पावनी "गंगधारा" को विश्राम दिया है  ,  भाल  को दूज के चाँद से अलंकृत किया है ,  एक हाथ में  डम डम   डमरू  तो दूसरे हाथ  त्रिशूल दिया है 1

श्रावण के दूसरे सोमवार के शुभ प्रातः आप की सेवा में प्रस्तुत है 
 भक्तवत्सल महादेव "शिव शंकर" के विभिन्न विग्रहों के सुदर्शन !
पार्श्व में सुनें निवेदक "भोला" के वयोंवृद्ध कंठ से प्रस्फुटित   
 शंकर वंदना 
जय शिवशंकर त्रिपुरारी ,

जय शिवशंकर त्रिपुरारी !
जय जय   भोले   भंडारी   ! जय आशुतोश   कामारी !!
जय शिवशंकर त्रिपुरारी ! 

गौर वदन माथे पर चंदा , 
जटा संवारें सुरसरि गंगा !!
चिताभसम तन धारी !  जय शिवशंकर त्रिपुरारी !!

उमा सहित कैलाश बिराजे ,
गणपति कार्तिक नंदी साजे !
छवि सुंदर मन हारी ! जय शिवशंकर त्रिपुरारी !! 

भक्त जनन पर कृपा करत हो, 
दुख दारिद भव ताप हरत हो ,!
हमका काहे बिसारी ?  जय शिवशंकर त्रिपुरारी !!
जय जय   भोले   भंडारी   ! जय आशुतोश   कामारी !!
जय शिवशंकर त्रिपुरारी ! 
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 सर्व- कष्ट -निवारक - "महामृत्युंजय मंत्र" 
ओम त्रियम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम 
उर्वारुकमिव  बंधनान  मृत्युर मुक्षीय माम्रतात !!
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( शब्द एवं स्वरकार-गायक "भोला")
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निवेदक ;  व्ही   एन श्रीवास्तव  "भोला"
सहयोग ;  श्रीमती डॉ. कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
_ +++++++++++++++++++++
LINK 
+https://youtu.be/ZavOzVsM1XM

   


मंगलवार, 7 जुलाई 2015

हमारी आज की साधना

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हमारी साधना का लक्ष्य 
"वृद्धि आस्तिक भाव की ,शुभ मंगल संचार"
(सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी )
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हम अवकाशप्राप्त - वयोवृद्ध जन अपने  इस जर्जर पिंजर से 
अब कैसी साधना करें ?
( हास्य व्यंग युक्त एक आध्यात्मिक सन्देश )


हम सभी अक्खा जीवन अपनी अपनी क्षमता,निष्ठा ,श्रद्धा,विश्वासानुसार साधनारत रहे ! निजी वास्तविकता बताऊँ -  भाई किसी न किसी कारण वश मैं स्वयम  कभी भी विधिवत, पारंपरिक कर्मकांड सम्मत कोई आराधना नही कर पाया ! जीवन निर्वाह हेतु  पूर्वजन्म के संस्कारों एवं कार्मिक लेखा जोखा - "बेलेंस शीट" के अनुसार निर्धारित   सभी कर्तव्य कर्मों  को  ही  मैं अपनी दैनिक साधना समझ कर ईमानदारी से उनका निर्वहन करता रहा  ! ये हुई सीनियर सिटीजन की उपाधि से विभूषित होने  के पहिले की स्थिति !

अब आज की स्थिति बताता हूँ :

१९२९ मॉडल की "बेबी ऑस्टिन" का अंजरपंजर,पुर्जा पुर्जा खडखड़ा रहा है! भोपू-'होर्न' मूक है , लेकिन सौभाग्य सराहिये कि इसके फूटे साइलेंसर की  फटफटियों जैसी  फटफटाहट  दूर से ही एलान कर देती है कि मा बदौलत  की सवारी नुक्कड़ तक आ गयी है !

जनाब  भारी भारी साँसों के बीच अपने इष्टदेव के सर्व शक्तिमान सर्व दुखभंजन नाम का जिव्हा द्वारा , पीडामय कराह के साथ जोर जोर से उच्चारण करते हुए ,तथा बीच बीच मे  थकेहारे  हाथों से ,एक निश्चित लय से धरती से उठती गिरती छडी (जो मेरी प्यारी पौत्री शिवानी अपनी पिछली भारत यात्रा में देहरादून मसूरी या नैनीताल से मेरे लिए लाई थी) , जी हाँ उसी छडी की तालबद्ध खटखटाहट द्वारा परिवार वालों को दूर से सचेत करता हुआ  जब मैं डायनिंग टेबल तक पहुचता हूँ ,सब सतर्क हो जाते हैं ! मेरी स्पेशल हत्थेदार कुर्सी पर सूखने को डाले गये छोटे बच्चों के अंदरूनी कपड़े तुरंत हटा लिए जाते हैं ! बच्चे टी वी के अपने गेम के चेनल बुझा कर "संस्कार" चेनेल लगा देते हैं (चाहे उसमे उस समय मनोज कुमार जी "हनुमान यंत्र"  का प्रचार करते हों अथवा युवतियों के सुन्दरीकरण के प्रसाधनों को  आधे दाम में बेचने का कोई रंगींन  विज्ञापन चल रहा हो )!  

अच्छा लगता है यह  ! बच्चों की अच्छी अनुशासित परवरिश करने के लिए अपनी ही पीठ थपथपाने को जी करता है ! 

कहा फंस गया आत्म गुण गान में ?  कलियुगी मानव जो हूँ काम क्रोध लोभ मोह मत्सर आदि दुर्गुणों का आगार , एक पुरातन पतित ! क्षमा करें !
सद्गुरु कृपा से अपनी पहचान हुई , सचेत हुआ  निज दुर्गुणों - दोषों से अवगत हुआ !

आगे सुने ! संत दर्शन हुए , हर स्थान पर सत्संगों का सैलाब सा आ गया ! स्वदेश में, परदेस  में, उत्तरी गोलार्ध में दक्षिणी गोलार्ध में , पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध में सर्वत्र पौराणिक सरस्वती सुरसरि गुप्त रूप में इन सब  देशों के सरोवरों में सहसा प्रगट हो कर हमारा मार्ग दर्शन करती रही ! 

सद्गुरु जंन  के आशीर्वाद का कितना आनंदपूर्ण सुफल ? 

विदेश में ही एक संत ने प्रवचन में महात्मा सूरदास जी के एक पद का उल्लेख किया जिसमें उन्होने अंतर्मन में "हरि नाम सुमिरन"  की मूक साधना को ही परमानंद स्वरूप  भगवद प्राप्ति का सरलतम एवं सर्वोच्च साधन बताया !

जो घट अंतर हरि सुमिरे,
ताको काल रूठी का करिहे , जे चित चरण धरे !!

सहस बरस गज युद्ध करत भये ,छिन इक ध्यान धरे ,
चक्र धरे बैकुंठ से धाए , वाकी पेंज सरे !!
जहँ जहँ दुसह कष्ट भगतन पर , तहं तहं सार करे 
सूरजदास श्याम सेवे जे , दुस्तर पार करें !! 
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आपको अपने साधक्  परिवार द्वारा प्रस्तुत सूरदास का वही भजन सुना देता हूँ ! १९८३ में भारत में हम सब ने मिलकर यह गाया था किसी रविवासरीय अमृतवाणी सत्संग में !
; लीजिए सुनिये 



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निवेदक - व्ही  एन  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग -  श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

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प्रिय स्वजन पाठकों
एक प्रार्थना

भारतीय उपमहाद्वीप से हजारों मील दूर यहाँ अमेरिका में नेपाल की त्रासदी के हृदय विदारक समाचार सुन कर मन भर आया !

याद आया ओक्तोबर १९९३ का वह दिन जब इजिप्ट में ऐसा ही भयानक भूकम्प आया था ! हम इजिप्ट की एलेक्जेंद्रिया की एक बहुमंजिली इमारत के सबसे ऊपर वाले भाग में थे ! झूले के समान झूल रही थी वह बहुमंजिली इमारत ! हमारे पैर लडखडा रहे थे ! सीलिंग पंखे दायें बाएं पेंडुलम से डॉल रहे थे ! आसपास के छोटे छोटे मकान ताश के पत्तों के समान बिखर रहे थे ! अगले दिन विनाश का पूरा चित्र सामने आया ! दूर दूर तक भयंकर तबाही हुई थी !

परम कृपालु प्यारे प्रभु ने अपने उत्संग में लेकर हमारी जीवन रक्षा की ! और तभी वर्ष भर पहले आये गुजरात के भूकंप की याद ताज़ा हुई ! अहमदाबाद में हमारा एक बंगाली बालक और उसका पूरा परिवार , जिसने हमे अत्याधिक आदर  दिया था उस भूकम्प में वहाँ की एक नयी बहु मंजिली इमारत में दफन हो गया ! एक दो मास पूर्व ही उन्होंने नये घर में गृहप्रवेश किया था - हम उस उत्सव में थे , कुछ समय पहले ही विवाह के ८ वर्ष बाद उन्हें एक संतान प्राप्त हुई थी ! ,

मेरा मन रो पड़ा ! मन की पीड़ा शब्दों से स्वर में उतरी  एक प्रार्थना के रूप में ! कृष्णा जी ने १९९३ में इजिप्ट में घर पर उपलब्ध सुविधाओं से उसे उस समय ही एक साधारण से टेप रेकोर्डर से रेकोर्ड कर लिया और पुराने केसेटों से खोज कर कृष्णा जी ने वह प्रार्थना मुझे दी , आपकी सेवा में नीचे प्रस्तुत है ! कृपया आपभी मेरे साथ इस प्रार्थना में शामिल हों !

!! दया करो , दया करो !! 
!! हें प्रभु दया करो !!  सब पर दया करो !! 
हें प्रभु दया करो !!
!! मेरे राम , दया करो !!
दीन दुखी हैं सब संसारी , एक पर एक विपद सहें भारी !
विपदा आन हरो ! हें प्रभु दया करो ! सब पर दया करो !! 
!! मेरे राम , दया करो !!
अपनी बात कहूँ क्या तुमसे  सब पतितों में हूँ मैं नीचे !
फिर भी तुम हो आँखे मीचे ! बेडा पार करो !
!! हें प्रभु दया करो ! सब पर दया करो !!
!! हें प्रभु दया करो !!
!! मेरे राम , दया करो !!
प्रार्थी विनीत "भोला"
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एम् पी थ्री का लिंक नीचे दिया है 

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

भरोसे के सहारे ही जिये जा रहे हैं

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( गतांक के आगे )

"भरोसे" के सहारे आज तक जिये हैं और आगे भी जियेंगे ! 

भरोसा 


केवल यह प्रार्थना किये जायेंगे कि :
भरोसा हो तो ऐसा हो मेरे मालिक मुझे तुम पर ,

  कि मेरा जी न घबराये ,'सुनामी' भी अगर आये !!

गतांक मैं मैंने कहा था :

राम भरोसे काट दिए हैं, जीवन के "पच्चासी"
  बाक़ी भी कट जायेंगे,मन काहे भया उदासी  
 थामे रह 'उसकी' ही उंगली दृढता से मनमेरे  
 पहुंचायेगा "वही" तुझे 'गंगासागर औ कासी'
('भोला') 
इस तुकबंदी के बाद मैंने यह भी स्वीकारा था कि 
कम्प्युटर पर उपरोक्त पंक्तियाँ लिखकर जब दुबारा पढीं तो अपने  कथन की असत्यता का आभास हुआ ! अहंकारी "भोला जी " समझते हैं कि अपने जीवन के पिछ्ले ८५ वर्ष  वह एकमात्र अपने पराक्रम  से जिये हैं !

प्रियजन मुझे तो उनके इस कथन मैं अहमता की दुर्गंध आ रही है ! आप भी लिहाज़ और तकल्लुफ छोडिये ,और निवेदक के उपरोक्त कथन की दुर्गन्ध स्वीकार लीजिए  !

महात्माओं का  कथन है कि मानव एकमात्र निजी अथवा अपने किसी निकटतम मानवी सहयोगी के बल बूते से कोई भी आध्यात्मिक अथवा सांसारिक कार्य सफलता से सम्पन्न नहीं कर सकता ! 

भगवत् कृपा से उपलब्ध दिव्य प्रेरणाओं तथा निज प्रारब्धानुसार प्राप्त मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के बिना मानव किसी भी क्षेत्र में कभी कोई सफलता नहीं पा सकता !


प्रियजन हम सब  साधारण मानव हैं ! अपने अपने इष्ट देवों के "भरोसे" हम आज तक जिये हैं और शेषजीवन भी "उनके भरोसे" ही जीलेंगे, हमे इस सत्य का ज्ञान और उस की सार्थकता पर दृढ़तम् भरोसा होना चाहिए !


गुरुजन की कृपा से बहुत पहले ३० - ४० वर्ष की अवस्था मैं ही मेंरी यह धारणा प्रबल हो गयी !  कैसे बनी यह हमारी दृढ़ भावना ?  

वर्षों पुरानी डायरीज़ के प्रष्ठों के बीच दबी यादों की मंजूषा की कई सूखी पंखुडियाँ हाथ आगई हैं ! आप भी  आनंद लें उसकी भीनीभीनी सुगंध का 

इस विषय मैं इसके आगे कुछ लिखने से लेखनी - ( हमारे कम्प्यूटर ने ही ) इनकार कर दिया !  ऊपर से यह विचार भी आया कि मेरी सहयोगिनी अर्धांगिनी श्रीमती जी ,सदा की भांति इस बार भी मेरे किसी अहंकार सूचक स्वगुणगान  युक्त बकवास में मेरा सहयोग नहीं देंगी  ! अस्तु अपने निजी अनुभव तक सीमित रहूंगा और परिवार वालों के "भरोसे" से प्राप्त दिव्य अनुभूतियों  के बीच जीवन दान तक का वर्णन फिलहाल नहीं करूँगा !

"उनकी" कृपा करुणा और "उनके" प्रेम के "भरोसे" हमारा 'वर्तमान' कैसा प्रफुल्लित है उसका नमूना अवश्य पेश करूंगा ! !

प्रियजन , इस दासानुदास को उसके ऊपर होने वाली "राम कृपा" का मधुर अनुभव प्रति पल हो रहा है ! शरीर जीर्णशीर्ण हो गया है लेकिन "मन" पूर्णतः स्वस्थ और आनंदित है !  उसका "रिसीवर" सूक्ष्म से सूक्ष्म दिव्य -"इथीरिय्ल" तरंगों को ज्यूँ का त्यूं पकड़ रहा है ! "प्यारे प्रभु" के प्रेरणात्मक संदेशों की अमृत वृष्टि में सराबोर है मेरा तन मन ! शब्द और स्वरों की बौछार हो रही है ! स्वरों के साथ शब्द मूक मुख से स्वतः प्रस्फुटित हो रहे हैं ! "भरोसे"का कितना सरस सुंफल है यह - 

सद्गुरु की कृपा से मन में "राम भरोसा" अवतीर्ण हुआ ! मैंने उनकी दिव्य प्रेरणाओं के सहारे बिस्तर पर लेटे लेटे अपने सूखे कंठ से महाराज जी के भजन "अब मुझे राम भरोसा तेरा" की धुन बनाई , गाया और रेकोर्ड भी किया !  प्रियजन "कर्ता" नहीं हूँ , केवल यंत्र हूँ ! सुनिये देखिये ---





क्रमशः 
निवेदक - व्ही एन श्रीवास्तव "भोला:
सहयोग - श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव 
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शनिवार, 28 मार्च 2015

भरोसा रखिये- "राम जन्म" होगा आपमें ही - सद्गुणों सद्विचारों के रूप मैं

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(गतांक से आगे)

पिछले आलेख मे हम ,सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी के निम्नांकित शब्द गाकर अपने देवाधिदेव "राम" से मांग रहे थे "उनका "अनमोल भरोसा"

 मुझे भरोसा राम तू दे अपना अनमोल -- 
रहूं मस्त निश्चिन्त मैं कभी न जाऊं डोल 

फलस्वरूप करुनानिधान श्री राम ने निज स्वभावानुसार सदा की भांति इस बार  भी अति कृपा कर  मुझे अपना 'अनमोल भरोसा' अविलम्ब प्रदान भी कर दिया !  आप जानते हैं इसी अनमोल भरोसे के मार्ग दर्शन में मैंने सन १९५९ से (लगभग ३० वर्ष की अवस्था से) आज तक का अपना जीवन कितनी सफलता से जिया है ! मेरी आत्मकथा उसके  उदाहरणों से भरी पड़ी है और आज की स्थिति ये है कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि :-

राम भरोसे काट दिए हैं, जीवन के पच्चासी
  बाक़ीभी कटजायेंगे, मन काहे भया उदासी  
 थामे रह 'उसकी' ही उंगली दृढता से मनमेरे  
 पहुंचायेगा "वही" तुझे 'गंगासागर औ कासी'
('भोला') 

कम्प्युटर पर उपरोक्त पंक्तियाँ लिखकर जब दुबारा पढीं तो इस कथन की असत्यता का आभास हुआ ! दुर्गंध है इसमें अहमता की ! "मैं" और "मुझे" ही सारा श्रेय कयू  ?

मैं आज स्वयम से पूछ रह हूँ कि मेरा यह अहंकारी "मैं" कहाँ होता   यदि (सद्गुरु श्रीस्वामी सत्यानन्दजी महाराज से दीक्षित होने के एक वर्ष बाद ही ) संन १९६० में ही अकस्मात  मेरा जीवन दीप बुझ गया होता ?

 पर भयंकर झंझा मैं भी मेरा जीवन दीप बुझा नहीं 

आपको सुनाने के लिए अटूट भरोसे से प्राप्त "जीवन दान"का एक जीवंत भूला बिसरा उदाहरण सहसा ही याद आ गया :

लेकिन आज नहीं कहूँगा यह कहानी , आज राम नवमी है , 
बधाई हो बधाई , सबको राम जन्म की बधाई 
आज तो नाचने गाने खुशी मनाने का दिवस है ! आज पहले  इस बूढे तोते (पोपट) - की भेंट - "सूरदासजी" की यह रचना स्वीकार करिये 
 जिसे वह अपने परिवार के तीन पुश्तों के सहयोग से  
अतिशय हर्षोल्लास के साथ प्रस्तुत कर रहा है  

रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर 
देस देस से टीको आयो ,कनक रतन  मणि हीर !!रघुकुल ----
घर घर मंगल होत बधाई , भई पुरबासिन भीर ,
आनंद मग्न होय सब डोलत ,कछु न शोध सरीर !!रघुकुल ---- 
मागध बंदी सबे लुटावें, गो गयंद हय चीर ,
देत असीस सूर चिर जीवो रामचन्द्र रणधीर !! रघ्कुल ---- 

("सूरदास जी")

वीडियो लिंक https://youtu.be/XWfs-bQ8dSI

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निवेदक : व्ही. एन  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा "भोला" 
एवं समग्र भोला परिवार  
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