सोमवार, 20 मई 2019

(1)दिन दिन प्रीति बढ़ाओ मेरे स्वामी* ॥
चरन-कँवल-छवि, उर उतारि के, अंतर सरस बनाओ  स्वामी
छलकै नयनन सोँ सनेहरस  ऐसी जुगति कराओ   मेरे स्वामी ॥*
*दिन दिन प्रीति बढ़ाओ मेरे स्वामीे*॥


*मम मन को अँधियार मिटै, अस, आतमग्यान कराओ मेरे स्वामीे* ।
*चमकत पग नख केर ज्योत सोँ , अंतर मन चमकाओ मेरे स्वामी* ॥
*दिन दिन प्रीति बढ़ाओ मेरे स्वामी*॥
*आतमग्यान कराय, जनन कै     भेद सबै बिलगाओ स्वामी*॥
*"मैंं-तू" छोड़ि सबै स्वजनन सोँ, "तू ही तू"  कहिरावौ स्वामी*॥
*दिन दिन प्रीति बढ़ाओ स्वामीे* ॥
नोट --
(बाबा/साँई/स्वामी/सतगुरु, प्यारे - कुछ भी कहिये)
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(2)
बसो मेरे मनमंदिर मे राम*
परमपुरुष  परमेश्वर प्रियतम पावन पुण्यसुधाम
बसों मेरे मन मंदिर में राम
*नज़र झुकाऊँ,     दर्शन पाऊँ लगे न कौड़ी दाम*
*परमात्मा तू स्वयं प्रकाशित ज्योतिपुंज सुखधाम
*बसो मेरे.......*
*मानवतन बलबुद्धि सहित प्रभु तुमने किया प्रदान**
माया के   भटकाये भटके   हम मूरख नादान
**बसो मेरे.....*
*काम क्रोध मद लोभ मोह ने जकड़ा निर्बल जान
*टेढ़ी टोपी डाल   अकड़ता फिरा अहं-लपटान *
*बसो मेरे.....*
*बहुतहुआ प्रभु,कृपा करो अब ,दो सुबुद्धिमतिदान*
*अहं त्याग   शरणागत हो मैं करूँ कर्म निष्काम*
*बसो मेरे मनमंदिर मे राम*************


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(3)
मन क्यों कर चिंता करता है
चिंतन कर प्यारे चिंतन कर !
जिनकी करुणा से गुरु पाया
उन करुणाकर का सिमरन कर    !!


पशु कीट पतँग योनि नहीं दी
सुर दुर्लभ मानव तन बख़्शा !
उन परम कृपालु दयालु राम के
उपकारों का सिमरन कर !


प्रारब्ध भोग सहना होगा ,
देवों ने भी उनको भोगा !
जीवन में संकट आएंगे ,
मत उनसे डर ,हरी सिमरन कर !!
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(4 )
*भुलाना चाहता हूँ सब भगर ना भूल पाऊँ मै*
*तुम्ही कोई दवा दे दो कि सब कुछ भूल जाऊं मै*
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*भुला कर सारी दुनिया को कि जब मैँ मूँद लूँ आँखें*
*मुझे बस तुम ही तुम दीखो ,जिधर नज़रँ घुमाऊँ मैं*
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*इबादतगाह गुरुद्वारोँ में केवल तुम ही तुम दीखो*
*हरिक इंसाँ हरिक शय मेँ फ़कत तुमको ही पाऊँ मैँ*
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*मुझे बरबस   सभी राहेँ तुम्हारे पास       ले आयेँ*
*हरिकमंज़िल में बतुम हो ,चाहे जिस ओर जाऊँ मैँ*
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(4 A)


भुला देते हैँ हम +उनको+, मगर +वह+ याद रखते है*!
*हमें    हर रंजोगम से , +वह+   सदा आज़ाद रखते हैँ*!


*प्रलय  से भयंकर संकट  मनुज जीवन मे आते हैँ*
*उजड़ जाती  है दुनिया, +वह+  हमें आबाद रखते हैँ ।*

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(5)
दिले नादाँ भला काहे को तू इतना घबड़ाता है ।*
*हरिक उलझन तिरी जब खुद तिरा सत्गुरु सुलझाता है ॥*


*अकेला हूँ, कोई रहबर,   न कोई हम सफ़र मेरा ।*
*तुझे जीवन में पगले हर समय  ये ग़म सताता है ॥टेक॥*


*नहीं दिखता तुझे, पर "राम" - तेरा मीत  परमेश्वर ।*
*विपत्ति आने से पहले ही मदद को पहुँच जाता है ॥*


*नहीं असहाय-निर्बल तू ,परमगुरु  की शरन मेँ आ ।*
*शरन आये को सतगुरु स्वयं श्रीहरि  से मिलाता है ॥*=
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( ६  )


प्यारे स्वजनों कहो प्रेम से   रघुपति राघव राजा राम*!
*परमसत्य परमात्मा प्यारा प्रीतिपुंज परमानंद धाम
*प्यारे स्वजनो कहो प्रेम से.योगेश्वर श्री श्यामा श्याम
*प्रेमसहित सबजन मिल बोलो  जयसियाराम जयराधेश्याम
*प्यारे स्वजनों कहो प्रेम से .............................*
*कभी सारथी बने पार्थ के दिखलाया निज रूप  महान i
और सुनाया मानवता को   श्रीमद भगवद गीता ज्ञान i  
प्यारे स्वजनों कहो प्रेम से   
*
*प्यारे स्वजनों कहो प्रेम से पतित पावन सीता राम*
*प्रेमसहित बोलो मतभूलो वह है परम शक्ति गुनधाम*
*प्यारे स्वजनों कहो प्रेम से    रघुपति राघव राजा राम*!
*परमसत्य परमात्मा है वह परमानंद शांति सुख धाम*!


*जय जय राम ...*कीर्तन.....*
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( ७ )


*अपने सत्गुरु प्राण पियारे*॥
कहीं न दिखते, पर हैं   हर पल संग हमारे*!
*शीतल-वरद-हस्त सिर रखकर जगजीवन के ताप निवारेँ*॥
*अपने सत्गुरु प्राण पियारे*॥


*एक उन्हीं का  अवलम्बन है, उनपर निर्भर मम तनमन है* ।
*नहीँ कहीं है   कोई निराशा, हर दिश केवल आशा आशा* ।
*ज्योँ गुलाब की शुष्क डाल में सुरभि-गंध की भरी फुहारेँ*॥


*अपने सत्गुरु प्रान पियारे*॥


*आने दिया न ऐसा अवसर, उनके आगे फैलाता कर*  ।
*दुर्घटना घटने से पहले आ जाते गुरु रक्षक बनकर* ।
*उनकी ममता मयी गोद मेँ साधक सब दुखदर्द बिसारे*॥


*अपने सत्गुरु प्राणपियारे*॥


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( ८   )
*प्रथम दरश सतगुरु के चरना*
*अघ-नाशक मंगल शुभकरना*॥टेक॥
*दरसन सों अप्रतिम सुखपावा*
*परम सत्य  गुरु देव  बतावा*॥टेक॥
*आंसुन सोँ गुरु चरन पखारा,*
*बंदन  कर आरती    उतारा*॥टेक॥
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*बन्दौं चरन कमल गुरुवर के*॥
*दूध आलता सरिस गुलाबी  ,कोमल जस पग शिशु रघुवर के*॥टेक॥
*बन्दौं चरन कमल सतगुरु के*॥
*अंधियारे मंह मणिदीपक सम, बरत करत उजियार गहन तम*!
*दरसावत मग गुरवर दर के*॥टेक॥
*काजर सम कारो अंतर-मन   - पाप ताप संंतप्त छीन तन ।*
*भैंट लिये आया गुरु दर पे*  ॥टेक॥

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(9)
सद्गुरु  


म्हारा सतगुरु आंगन आया रे
सतगुरु मिलन भाव सिंचित मम रोम रोम हरसाया रे
नयनन सों जल धार बही तन कुम्भ प्रयाग नहाया रे l                     
तन मन निर्मल कर सद्गुरु को प्रेम सहित गुहराया रे !
पलक झार आँसुनफुहार  सों मन मंदिर चमकाया रे l
म्हारा सतगुरु ++++++++++
भाँतिभांति के सुमन गंधमय बगियन सों चुनलाया रे l   
शिवरंजनि बेला गुलाब लड़ियन  सों द्वार सजाया रे l
आंगन गलियारन चौबारन कहँ  गम गम गमकाया रे l
मनमंदिर के  आसन पर गुरु चरण कमल पधराया रे  l


म्हारा सतगुरु  आंगन आया रे ll

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( 10
परम धाम से परम धाम की यात्रा


भ्रम  भूलोँ के  तूफानो मेँ ,  फँसी जीव की    नय्या।
शरणागत जब हुआ ,मिल गया *सद्गुरु* प्रबल खिवैया ॥


कहाँ  से तू आया है मुसाफिर ,कौन गाँव  जायेग़ा !
गहरी नदिया नाव पुरानी ,निर्बल तू लहरें तूफानी !
कौन पार पहुंचाएगा ,कौन गाँव  तू जायेग़ा !!


बिन हरिकृपा मनुज निरबुद्धी कुछ भी न करपायेगा  !
परम कृपालु राम ही उसकी नय्या पार लगायेगा !!
कहाँ  से तू आया है मुसाफिर----
शून्याकाश से उतर जीव इस शून्य धरणि पर बिखरा ,  
शून्य हुई  मन बुद्धि जगत में ,माया ने धर पकड़ा !
अहंकार मद काम क्रोध मोहादि विषय ने जकड़ा !
मैं मैं करता रहा मूढ़ तू ,प्यारे प्रभु को बिसरा !!
कहाँ  से तू आया है मुसाफिर----------
पूर्ण समर्पण कर प्राणी जब हरिशरणागत होवेगा !
परमकृपालु राम माँझी बन ,नय्या पार लगाएगा !
बाँह पक़ड़ कर तेरी तुझको  परमधाम पहुंचाएगा !
परमधाम से आया है तू परम धाम  को जाएगा !!