बुधवार, 4 नवंबर 2026

यूट्यूब पर प्रकाशित पिछले वर्षों मे लिखे नए भजन

'अंतरध्वनि' भजन संग्रह के प्रकाशन एवं पुनर्मुद्रण के बाद प्रभु प्रेरणा से कई नए भजन, गीत इत्यादि लिखे गए । 

निम्न सूची में यूट्यूब पर उनके गान के लिंक हैं। 

  1. अति कृपा कर मेरा स्वामी 
  2. अरज करो कर जोर 
  3. ओ मतवारे योगी 
  4. जो शरण आया 
  5. दया करो श्रीराम सब पर दया करो 
  6. नित्य सखा श्री राम हमारे 
  7. प्रभु राम सुखधाम 
  8. प्रेम पुंज करुणा के धाम 
  9. फेरो ना कृपा की नजर 
  10. बसो मेरे मन मंदिर में राम 
  11. बागड़ बम बम  (2)
  12. बाजे बाजे रे बधैया जनकपुरी में 
  13. मिला परम विश्राम 
  14. मेरे प्यारे सद्गुरु तुम बिन रहा नहीं जाता 
  15. मैया मुझे दर्शन दो 
  16. मैं खुश नसीब हूं 
  17. यह सब तुम्हारी कृपा है सद्गुरु 
  18. ये हरियाली ये विविध रंग 
  19. राम तू करण करावन हार 
  20. राम नाम जपने वाले को 
  21. राम लला घर आया रे 
  22. रोम रोम श्री राम विराजे 
  23. वैद्य परम गुरु स्वामी 
  24. सखी धूम मची शंकर अंगना  


शब्दकार, स्वरकार एवं गायक - श्री व्ही एन श्रीवास्तव 'भोला'

सहयोग - डॉ कृष्णा श्रीवास्तव 

बुधवार, 1 जुलाई 2026

मंत्र क्या है?

अनंतश्री स्वामी अखंडानंद जी ने मंत्र की व्याख्या करते हुए बतलाया है: "मननात त्रायते"जो मात्र "मनन" द्वारा हमारी रक्षा करे उसे मंत्र कहते हैं ! 

प्रातःस्मरणीय परमपूज्य स्वामी सत्यानन्दजी महाराज जी ने लिखा है "मन्त्र जाप औषधि, मानस और कायिक दोनों प्रकार के दोषों को दूर कर देती है। 

जप-प्रार्थना से वेदना की अल्पता और मानसिक शान्ति का अनुभव प्रत्येक साधक को अवश्य ही होगा।  

श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने , 
प्रणतक्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः
 (श्रीमद्भागवत दशम स्कंध अध्याय ७३,श्लोक १६) 

प्रणाम करने वालों के कलेश का नाश करने वाले श्रीकृष्ण, वासुदेव , हरि ,परमात्मा एवं गोविन्द के प्रति बार बार नमस्कार है। वसु का अर्थ है प्राण, वासुदेव का अर्थ है प्राणों के रक्षक ; 'गो' का अर्थ है 'इन्द्रियाँ' और गोविन्द का अर्थ है - 'इन्द्रियों के रक्षक', हरि अर्थात "दुःख हर्ता , श्रीकृष्ण" हैं। 

मन को स्वत :आकर्षित कर परमानंद देने वाले और परमात्मा से तात्पर्य है प्रकाश स्वरूप परम सत्यस्वरूप अविनाशी आत्मा; जिनके स्मरण मात्र से कलि और काल प्रेरित दुखों से मुक्ति मिलती है ,विघ्न बाधा का नाश हो जाता है ! 

मंत्र कोई भी हो ; वह आत्मरस प्रदायक ; संकटहारी ,मंगलकारी ; हितकारी और विघ्न विनाशक होता है ! 

यदि मंत्र में सहज रूचि हो . प्रीति हो श्रद्धा हो , विश्वास हो तो रस की अनुभूति होती है ! मंत्र जापक की दृढ़ भावना के आधार पर ही मंत्र फलीभूत होता है ! जैसे वैज्ञानिकों ने परमाणु की शक्ति को समझा वैसे ही संतों और महर्षियों ने निजी अनुभव के बल पर मंत्र की शक्ति को समझा है और उसे जगत के कल्याण के लिए प्रकट किया है ! 

दवा लौकिक चिकित्सा है तो मंत्र जाप आध्यात्मिक चिकित्सा है! 

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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव