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बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

सर्वेश्वरू माँ - (सेवा निवृत्तिके बाद कैसे जियें के अंतर्गत )

परमप्रिय स्वजनों 
 नवरात्रि के पावन पर्व पर 
हमारा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकार करें !

प्रियजन ! अनंत काल से , सृष्टि के हर खंड ,  हर संस्कृति . सम्प्रदाय  एवं मत में
आदि शक्ति "माता श्री" की उपासना होती है ! 
देशकाल और तत्कालिक प्रचलित मान्यताओं  के अनुसार  मानवता के विभिन्न वर्गों में सिद्ध साधकों  के अनुभवों तथा  पौराणिक आख्यानों के अनुरूप आद्यशक्ति माँ के अनेकों रूप हैं,अनेकों नाम हैं  ! 
जननी माँ की प्रतिरूपनी ये दिव्य माताएं सभी साधकों की सफलता ,स्वास्थ्य ,सुख और समृद्धि की दात्री हैं !

भारतीय संस्कृति में  नवरात्रि के मंगलमय उत्सवों के नौ दिनों में  माँ की आराधना के प्रसाद स्वरूप साधकों को माँ से मिलता है   सांसारिक कष्टों से बचने का "रक्षा कवच ". सफलता हेतु मार्गदर्शन एवं  दिव्य चिन्मय जीवन जीने की कला तथा प्रेरणामय यह सन्देश "जागो ,उठो ,आगे बढ़ो उत्कर्ष करो "

सेवा निवृत्ति के  बाद लगभग पिछले २५ वर्ष कैसे जिया , ये बात चल रही थी ,कि श्राद्धों का पखवारा आया और साथ साथ लाया नवरात्री का यह "मात्र भक्ति भाव रस सिंचित" ,दिव्य दिवसों का अद्भुत समारोह !

खाली नहीं बैठा , माँ सरस्वती शारदा की विशेष अनुकम्पा से  इन २५ -३० दिनों में ,प्रेरणात्मक तरंगों में बहते हुए ,"प्रेम-भक्ति रस सेओतप्रोत अनेक रचनाएँ हुईं , और उनकी धुनें बनी ,बच्चों द्वारा उपलब्ध करवाई इलेक्ट्रोनिक सुविधाओं के सहारे उनकी रेकोर्डिंग  हुई , कृष्णा जी ने उनको  यू ट्युब पर भोला कृष्णा  चेनल पर प्रेषित भी किया !सों इस प्रकार मेरा जीवन क्रम अग्रसर  रहा , सुमिरन भजन द्वारा सेवा कार्य चलता रहा  

सरकारी सेवाओं से निवृत्ति के बाद .इससे उत्तम और कौनसी सेवा कर पाता ? इस सेवा से जो परमानंद मिलता है उस दिव्य अनुभव के लिए आदिशक्ति माँ  के अतिरिक्त और किसे धन्यवाद दूँ  !

प्रियजन   इन नौ दिनों  में जो रचनाएँ हुईं उनमें से  एक इस आलेख के अंतर्गत आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ  ! मेरी यह रचना - "सर्वेश्वरी जय जय जगदीश्वरी माँ", मेरे परम प्रिय मित्र एवं गुरुभाई श्री हरि ओम् शरण जी" के एक पुरातन भजन की धुन पर आधारित है 






सर्वेश्वरी जय जय जगदीश्वरी माँ 
तेरा ही एक सहारा है तेरी आंचल की छाहँ छोड़ अब नहीं कहीं निस्तारा है  

सर्वेश्वरी जय जय ------------

मैं अधमाधम ,तू अघ हारिणी ! मैं पतित अशुभ तू शुभ कारिणी 
हें ज्योतिपुंज तूने मेरे, मन का मेटा अंधियारा   है !!
सर्वेश्वरी जय जय --------------

तेरी ममता पाकर किसने ना अपना  भाग्य सराहा है 
कोई भी खाली नहीं गया जो तेरे दर पर आया है !!
सर्वेश्वरी जय जय --------------


अति दुर्लभ मानव तन पाकर आये हैं हम इस धरती पर, 
तेरी चौखट  ना छोड़ेंगे ,अपना ये अंतिम द्वारा है !!
सर्वेश्वरी जय जय ---------

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रचनाकार एवं गायक "भोला "
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शुभाकांक्षी 
(श्रीमती) कृष्णा एवं व्ही.  एन.  श्रीवास्तव "भोला" 
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