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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

मेरा यह ब्लॉग - क्यों ?

मेरी "आत्म कथा" को समेटे मेरा यह ब्लॉग -  
"महाबीर बिनवौ हनुमाना"  
क्यों ?

# 3 5 0

(गतांक से आगे) 
 
परमात्मा ने जिन संस्कारों से सुसज्जित करके, जिन सांसारिक सुविधाओं से लैस करके, जिन पस्थितियों में जिस परिवार में , जिस जाति, जिस गोत्र में, जिस स्थान पर हमें जन्म दिया हम वहीं जन्मे,और "उन्होंने" जब, जो भी हमसे करवाना चाहा वह करवा लिया! यह "उनका" नियम है और मुझ पर भी यह बाकायदा लागू हुआ है !  

रोज़ी रोटी कमाने और परिवार की परवरिश के लिए ६0 वर्ष की अवस्था तक प्यारे प्रभु ने मुझसे, शायद मेरे पिछले जन्मों के कर्मों का हिसाब चुकता करवा देने के लिए, अति नीच समझा जाने वाला "शूद्रों" का काम करवाया लेकिन इसमें एक बात उल्लेखनीय रही कि वह कर्म करते समय मुझे कभी भी यह नहीं लगा कि मैं कोई सज़ा भुगत रहा हूँ ! सच पूछिए तो मेरी तल्खियाँ दूर करने को, और मुझे सपरिवार आनंदित रखने के लिए "प्यारे प्रभु" ने मुझे वह तथाकथित शूद्रों वाला कार्य करते समय भी, बीच बीच में बड़े बड़े संतों के दर्शन तथा उनके सानिध्य का सौभाग्य दिया ! इन ६० वर्षों में मुझे जिन विशिष्ट दिव्य महात्माओं का  घनिष्ट सानिध्य मिला, उनमें प्रमुख हैं : 

१. श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज (मेरे सद्गुरु) तथा श्री राम शरणम लाजपत नगर नयी दिल्ली के उनके उत्तराधिकारी 
२. श्री श्री माँ आनंदमयी 
३. श्री माँ निर्मला देवी (सहज योग)
४. श्री स्वामी मुक्तानंद जी 
४. श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी 
५. श्री स्वामी अखंडानन्द जी    (आदि) 

मेरे निजी और मेरे सम्पूर्ण परिवार के जीवन को रसमय मधुर और आनंदमय  बनाने में इन दिव्य आत्माओं का योगदान अति महत्वपूर्ण है ! इन महान विभूतियों से प्राप्त दिव्य संदेश मैं अपने लेखों द्वारा आप तक धीरे धीरे पंहुचा ही रहा हूँ ! माँ आनंदमयी की विशेष करुणा और कृपा की कथा आप को पहले सुना चुका हूँ ! 

रिटायर हो जाने पर बच्चों ने हमे और कोई काम करने नहीं दिया ! उनका कहना था "जैसे   शुभ संस्कार आपने हमे दिए हैं, हमारे बच्चों को भी दीजिये , "Why should your grand children be deprived of that ?" मेरे  अधिक समझदार मित्रों ने बिना मांगे राय दी , हमे समझाने की कोशिश की ! "Don't get fooled .They want you to become Baby Sitters for their kids ,while they enjoy parties"!  सब अपने अपने अनुभव से ही राय देते हैं ! 

बुजुर्गों से सीखा था "सुनो सबकी, करो अपने मन की, खूब सोच समझ कर"!  हमने वैसा  ही किया और हमारा अनुभव उनके अनुभव से एकदम विपरीत हुआ ! हम बच्चों के Baby Sitters नहीं बने, उलटे हमारे बच्चों और उनके बच्चों ने हमारी ही देख भाल की ! अब वे ही हमारे Baba Sitters हैं ! हमें हाथ पकड़ कर चलाते फिराते हैं, उठाते बैठाते हैं  !

परिवार की दैनिक प्रातःकालीन प्रार्थना के कारण, जिसमे हम सब एक साथ, मानस तथा गीता जी के चंद चुने हुए शिक्षाप्रद पदों को भावार्थ के साथ पढ़ते थे , हमारे बच्चों के चरित्र पर बहुत सुन्दर प्रभाव पड़ा था !,इसके अतिरिक्त चाहे हम जहाँ भी रहे , भारत में या विदेश  में हमारे बच्चे हमेशा हम दोनों के साथ मन्दिरों और सत्संगों में अवश्य जाते थे, ध्यान से प्रवचन सुनते थे और उनके नोट्स भी बनाते रहते  थे !

मैं जानता हूँ कि आप पारिवारिक प्रार्थना तथा सत्संगों की महिमा कदाचित मुझसे कहीं अच्छी तरह जानते हैं फिर भी मैं आपको बता रहा हूँ ! यह किसी अहंकार वश नहीं ! इसके द्वारा मैं एक तरफ स्वयम अपने आपको  और दूसरी तरफ आप सब को रिमाइंड करवा रहा हूँ, कि हमें अपनी समवेत पारिवारिक साधना में ढील नहीं देनी चाहिए, कम से कम उस समय तक जब तक बच्चे हमारे साथ हैं ! 

सूचना: ग्वालिअर के श्री राम परिवार द्वारा संकलित, दैनिक प्रार्थना के, तुलसी मानस तथा गीता जी के चुनिन्दा अंश धीरे धीरे प्रेषित करूंगा !
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क्रमशः
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निवेदक :- वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

महाराज जी की जयन्ती के अवसर पर उनके एक परम प्रिय शिष्य श्री जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के पुत्र अतुल श्रीवास्तव का पत्र

सभी परिवार जनों को यथा योग्य सादर चरण स्पर्श एवं राम राम

आज (दिनांक 18 अप्रेल 2011) परम पूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की 150 वीं जयन्ती एवं श्री हनुमान जयन्ती है. स्वामी जी महाराज का जन्म सन 1861 की चैत्र शुक्ल पूरणमासी के दिन प्रात: 5 बजे हुआ था. श्री हनुमान जी का जन्म भी प्रात: 5 बजे हुआ था. अतएव मेरी धारणा है कि स्वामी जी महाराज हनुमान जी के अवतार थे, जो कलियुग में हम सब को राम नाम का अति मीठा रस पिलाने के लिये अवतरित हुए थे. उनकी 150वीं जयंती की सबको बधाई. ईश्वर करे स्वामी जी महाराज का वरद हस्त हम सब के सिर पर सदा बना रहे. इस विशेष उत्सव पर हम सब अमृतवाणी का पाठ करेंगे और स्वामी जी महाराज के प्रिय भजन ‘राम अब स्नेह सुधा बरसा दे’, ‘दयामय मंगल मन्दिर खोलो’ आदि गायेंगे एवं जाप करेंगे.

2008 अप्रेल में स्वामी जी महाराज की कृपा से, हम लोग (सुनीता, स्तुति, अमित, छोटे से अथर्व करुणानिधान और मैं) डलहौज़ी गये थे. पूज्य स्वामी जी महाराज के जन्म दिन पर हम लोगों को ‘परम धाम’ में अमृतवाणी का पाठ करने का सुअवसर स्वामी जी महाराज की कृपा से मिला था. बहुत आनन्द आया था. कुछ भजन भी, जिनमें ऊपर लिखे हुए भजन भी थे, गाये थे.

11 वर्ष पूर्व आज ही के दिन, स्वामी जी महाराज के परम शिष्य - परम पूज्य बाबू चोला छोड़ कर पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन हो गये थे. इस वर्ष हनुमान जयन्ति की हिन्दी एवं कलेंडर तिथियां वही हैं जो वर्ष 2000 में थीं – जब पूज्य बाबू स्वामी जी में लीन हो गये थे. बाबू ने अपना ऑपरेशन – अपने चित्त को राम नाम में लगाकर करवाया था. ऑपरेशन के लिये जाने से पहले उन्होंने अपने सारे भजन खूब जोर जोर से गाये थे. जो अंतिम भजन उन्होंने गाया था – वह था – “राम नाम लौ लागी” .

परम पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन होने की यात्रा से पहले उन्होंने इस पृथ्वी लोक पर अपने ऊपर किये हुए उपकारों की ‘कृतज्ञता’ – भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को राधा से सुनकर की. ‘कृतज्ञता’ सुनते सुनते ही वे चोला छोड़कर चले गये थे. तो आइये, अपन सब भी आज अमृतवाणी के पाठ के बाद, भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को पढ़ें.

कृतज्ञता

उसका रहूँ कृतज्ञ मैं, मानूँ अति आभार; जिसने अति हित प्रेम से, मुझ पर कर उपकार .1. 
 दिया दीवा सुदीपता, परम दिव्य हरि नाम; पड़ी सूझ निज रूप की, जिससे सुधरे काम .2.
कर्म धर्म का बोध दे, जिसने बताया राम; उस के चरण सरोज पर, नत शिर हो प्रणाम .3.
धन्यवाद उस सुजन का, करूं आदर सम्मान; जिसने आत्मबोध का, दिया मुझे शुभ ज्ञान .4.
उस के गुण उपकार का, पा सकूं नहीं पार; रोम रोम कृतज्ञ हो, करे सुधन्य पुकार .5.
उस के द्वार कुटीर पर, मैं दूं तन सिर वार; नमस्कार बहु मान से करूं मैं बारम्बार .6.
बहते जन को पोत शुभ, दिया नाम का जाप; शब्द शरण को दान कर, नष्ट किये सब पाप .7. 
उस ने जड़ी सुनाम दे, हरे जन्म के रोग; संशय भ्रान्ति दूर कर, हरे मरण के सोग .8.
चिन्तामणि हरि नाम दे, चिन्ता की चकचूर; दिया चित्त को चांदना, चंचलता कर दूर .9.
वारे जाऊँ सन्त के, जो देवे शुभ नाम; बाँह पकड़ सुस्थिर करे, राम बतावे धाम .10. 
सत्संगति के लाभ से, ऐसा बने बनाव; रंग बहुत गूढ़ा चढ़े, बढ़े चौगुणा चाव .11.

कुछ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर गया था, तब अपनी बहन (बिशन मौसी की पुत्री) सुषमा के घर भी गया था. सुषमा के पति श्री शेखर हैं. वे बहुत अच्छे क्लासिकल सिंगर हैं एवं भजनों के कार्यक्रम रेडिओ आदि पर देते हैं. उन्होंने बताया था कि पूज्य बाबू ने उन्हें एक भजन लिखकर उसकी राग बनाने को दी थी. उस विज़िट में हम लोग उनसे वह भजन नहीं सुन पाये थे. परन्तु, जब इस वर्ष होली पर जयपुर गये थे, तब श्री शेखर से वह भजन सुना था. उस भजन के बोल हैं “प्रभु को बिसार किसकी आराधना करूं मैं

यह भजन मैने टेप कर लिया था. आप सब को आनन्द लेने के लिये यह भजन मैं संलग्न कर रहा हूं


प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मोती मिला जो मुझको मानस के मानसर में .  
कंकड़ बटोरने की  क्या चाहना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

सबका परमपिता जब घट घट में बस रहा है;
लघु जान क्यों किसीकी अवहेलना करूँ मैं.

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मुझको प्रकाश प्रतिपल  आनंद आंतरिक है .  
जग के अधिक सुखों की  क्या कामना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..




श्री राम शरणम वयं प्रपन्ना: ; प्रसीद देवेश जगन्निवासत

आप सबका
अतुल

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

हनुमान जयंती - सद्गुरु जन्म दिवस # 3 4 7

अप्रेल १८ ,२०११, तदनुसार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा सम्वत २०६८                                                             

श्री हनुमान जयंती के शुभ पर्व पर 

एवं



सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के जन्म दिवस पर 


बधाई हो बधाई , सभी को बधाई

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जगतगुरु श्री हनुमान जी की जय 

श्रीरामचरितमानस जैसे विश्वविख्यात अनुपम ग्रन्थ के रचयिता ,परम रामभक्त,प्रकांड पांडित्य एवं ज्ञान के धनी ,श्रीमद गोस्वामी तुलसीदासजी ने जिन दिव्य महात्मा की अद्वितीय शक्तियों एवं क्षमताओं का आंकलन कर अपना गुरु माना और जिनका स्मरण करके उनसे बल बुधि विद्या प्राप्ति के लिए प्रार्थना की वह थे श्री हनुमान जी महाराज :

बुद्धि हींन  तन  जनि के  सुमिरों  पवन कुमार 
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश बिकार 

सोच के देखें ऐसे अंजनिसुत,पवनकुमार ,मारुती नन्दन श्री हनुमानजी से श्रेष्ठ इस संसार में और कौन गुरु हो सकता है ! आज के महान संत कथा वाचक श्री मुरारी बापू ने तो यहाँ तक कहा है की यदि किसी व्यक्ति को अब तक सदगुरु नहीं मिला है तो वह श्री हनुमान जी को अपना गुरु बनाले! 
उनके अनुसार श्री हनुमानजी को परमगुरु मान कर उनके सद्गुणों का अनुकरण करके जीवन जीने वालों का अवश्यमेव कल्याण होगा !

शताब्दियों से हमारे परिवार के "कुल देवता - कुल गुरु "यह श्री हनुमानजी ही हैं ! जन्म से लेकर आज तक अपने पुश्तैनी घर के आंगन में लहराते महाबीरी ध्वजा की छाया में नतमस्तक  होकर  शताब्दियों तक हमारे परिजनों और हम लोगों ने सदा "उनसे" प्रार्थना की है और उनकी कृपा वृष्टि का अनंत आनंद लूटा है !

जय जय जय हनुमान गोसाईं  !  कृपा करो गुरुदेव की नाई !

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गुरुदेव स्वामी सत्यानन्द जी महाराज 

मुझे पूरा विश्वास है की श्री हनुमान जी की कृपा के फल स्वरूप ही मुझे इस जीवन में इतने सहृदय परिजन, विज्ञ गुरजन ,स्नेही मित्रगण तथा आध्यात्मिक गुरुदेव श्री स्वामी जी मिले !इतनी सारी शुभ उपलब्धियां किसी को कभी भी अनायास ही नहीं हो सकतीं !प्यारे प्रभु की करुणा के बिनाकुछ भी संभव नहीं है ! हमारे जन्म से बहुत पहले ही से हमपर उनकी कृपा वर्षा शुरू हो जाती है, तभी तो चौरासी लाख योनियों में से सर्वोत्तम "मानव" योनी ही हमे क्यों मिली ? प्रियजन कितनी बड़ी कृपा है उनकी हमपर !
 कबहुक करि करुना नर देही ! देत ईस  बिनु हेतु स्नेही !!
                          बड़े भाग मानुष तन पावा ! सुर दुरलभ सब ग्रन्थही  गावा !





सदगुरु की महत्ता 

ईश्वर ने विशेष अनुग्रह करके मानव को यह अनंत क्षमताओं से भरपूर देवदुर्लभ मानुष चोला दिया है ! अबोध बालक सा मानव अपनी क्षमताओं से तब तक पूरी तरह अनभिग्य रहता है जब तक "जामवंत" जैसे सद्गुरु उस बालक का उपनयन-विद्यारम्भ करवा कर उसका मार्ग दर्शन नहीं करते ,उसकी आत्म शक्ति को जागृत नहीं करते ! 

गुरुजन साधारण मानव को उसकी उसमें ही  निहित क्षमताओं का ज्ञान कराते हैं और उसे अनुशासित  जीवन जीने की कला बता कर उसका उचित मार्ग दर्शन करते हैं !मेरे सद्गुरु ने भी मुझे दीक्षा दे कर मुझ पर महत कृपा की ,मेरा पथ प्रदर्शित कर  मुझे  सत्य ,प्रेम और सेवा के  मार्ग पर चलना सिखाया ,सात्विक  जीवन जीने की कला  सिखाई ,अनुशासन पालन करते हुए जगत में व्यवहार करना सिखाया ! मैं कभी कभी सोचता हूँ कि मेरा क्या हुआ होता यदि मुझे मेरे "सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज " इस जीवन में मुझे नहीं मिलते और इतनी कृपा करके उन्होंने मुझे अपना न बनाया होता या मुझे अपने श्री राम शरणम के "राम नाम उपासक परिवार" में सम्मिलित न  किया होता ? 


सद्गुरु मिलन से मुझे जो उत्कृष्ट उपलब्धि हुई वह अविस्मरणीय है !उससे मैं धन्य हो गया और सच पूछो तो मेरा यह मानव जन्म सार्थक हो गया ! "सद्गुरु दर्शन" के उपरांत मेरी सर्वोच्च उपलब्धि थी सद्गुरु के "कृपा पात्र" बन पाने का सौभाग्य !

१९५६ में मेरा विवाह एक ऐसे परिवार में हुआ जिसके सभी वयस्क सदस्य श्री स्वामी सत्यानंदजी महाराज के कृपापात्र  शिष्य थे ! ये श्रेष्ठ जन पानीपत की माता शकुन्तला जी ,गुहांना के पिताजी  भगत श्री हंस राज जी , बम्बई के ईश्वर दास जी तथा गुरुदेव श्री प्रेमनाथ जी के साथ  स्वामी जी की "नाम भक्ति" साधना में पूरी तरह जुटे हुए थे ! उनसे प्रेरणा पाकर मैं भी स्वामी जी महराज से दीक्षित हुआ और "रामनाम" की उपासना में लग गया ! यह मेरा परम सौभाग्य था !
 

भ्रम  भूल   में   भटकते  उदय  हुए  जब  भाग !                                                             मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग!!




मैंने पहले कहीं कहा  है , एक बार फिर कहने को जी कर रहा है की मनुष्य को मानवजन्म प्रदान कर धरती पर भेजता तो परमेश्वर है लेकिन उसको इन्सान बनाता है ,उसका पालन करता है , उसको राह दिखाता है ,उसकी रक्षा करता है ,उसकी आत्म शक्ति जगता है,उसको मोक्ष का द्वार  दिखाता है उसका "सद्गुरु" ! और यह सद्गुरु भी उसे उसके परम सौभाग्य से एकमात्र उस प्यारे परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है !


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दिवंगत श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज इस युग के महानतम धर्मवेत्ताओं में से एक थे जो  लगभग ६४ वर्षों तक जैन धर्म तथा आर्यसमाज की सेवा करते रहे ! अपने प्रवचनों द्वारा वह जन जन की आध्यात्मिक उन्नति  के साथ साथ सामाजिक उत्थान के लिए भी प्रयत्नशील रहे ! इन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखने पर तथा उनकी विधि के अनुसार साधना करने पर भी जब उन्हें उस आनंद का अनुभव नहीं हुआ जो परमेश्वर मिलन से होना चाहिए तो उन्होंने इन दोनों मतों के प्रमुख प्रचारक बने रहना निरर्थक जाना और १९२५ में हिमालय की सुरम्य एकांत गोद  में जा कर उस निराकार ब्रह्म की (जिसकी महिमा वह आर्य समाज के प्रचार मंचों पर लगभग ३० वर्षों से अथक गाते रहे थे)  इतनी सघन उपासना की कि वह निर्गुण "ब्रह्म" स्वमेव उनके सन्मुख "नाद" स्वरूप में प्रगट हुआ और उसने स्वामीजी को " परम तेजोमय , प्रकाश रूप , ज्योतिर्मय,परमज्ञानानंद स्वरूप , देवाधिदेव श्री "राम नाम" के महिमा गान एवं एक मात्र उस "राम नाम" के प्रचार प्रसार में लग जाने की दिव्य प्रेरणा दी जिसका लाभ आज तक हम सब सत्संगी उठा रहे हैं !

   
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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 
सहयोग : श्रीमती डोक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव  
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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

आत्म कथा - संकल्प # 3 3 7 / 0 2

आत्म कथा 

नव संवत्सर  २०६८ पर संकल्प


यहाँ अमेरिका में इस समय ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा की सुबह हुई है ! हमें जब इस विशेष दिवस की याद आ ही गई तो क्यों न हम इस शुभ दिन कुछ ऐसे संकल्प करें कि जिससे हमारा मानव जन्म धन्य हो और अंततोगत्वा  अपना कल्याण भी सुनिश्चित हो जाये  ! मैं पहले कह चूका हूँ कि संकल्प कर के उसे भुला देने वालों की सूची में मैं बहुत पीछे नहीं हूँ  क्यूँकि किये हुए संकल्प पूरे कर पाने में मैं बहुधा विफल रहा हूँ ! लेकिन इस बार फिर प्रबल  प्रेरणा मिली है तो सोचता हूँ कि आज के दिन कुछ संकल्प कर ही लूं !

पिछले ५०-६० वर्षों में महापुरुषों के सत्संग में मैंने अपने मानसिक,शारीरिक ,भौतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए जो अनेकों संकल्प किये हैं ! सोचता हूँ ,पहले एक बार उन्हें याद कर लूं ! एक वाक्य में मैं उनका निचोड़ है :

सबसे प्रेम करो, सदनीति अपनाओ ,सदाचारी बनो, अपने कर्तव्यों तथा अपने स्वधर्म का दृढ़ता से पालन करो !

आज का संकल्प 

तुलसी के रामचरित मानस में उन सभी गुणों का निरूपण हुआ है जिन्हें अपनाकर जीव  अपना मानव जीवन सार्थक कर सकता है ! बचपन से मानस के दोहे चौपाइयां माँ और दादी से सुनता रहा था ,गुरुजन के सम्पर्क में आने पर उनके अर्थ और उनकी महत्ता समझ में आयी और उनमे वर्णित सद्गुणों को निज जीवन में उतारने की प्रबल इच्छा हुई और उसके लिए समय समय पर अनेक संकल्प किये ! ५०-६० वर्षों से लगातार उन्हें याद रखने का रियाज़ कर रहा हूँ ,उनमे से जितने आज तक मेरे स्मृति पटल पर अंकित हैं उन्हें एक बार दुहरा रहा हूँ !

सब प्राणियों में "इष्ट दर्शन" तथा उनसे "प्रीति": 
सर्व प्रथम स्वयम अपने आप में , तत्पश्चात अन्य सभी जीवधारी प्राणियों में अपने "इष्ट देव" का दर्शन करें और सबको उतना ही प्यार ,स्नेह सम्मान और आदर दें जितना आप स्वयम अपने आपको अथवा अपने इष्ट देव को देते हैं !


जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मय जानि !   
बन्दउ  सब के  पद  कमल सदा जोरि जुग पानि ! 
                                                       ( बाल. ६) 

रहनी सरल , तन मन निर्मल 

तदोपरांत  अपने मन को ,अपने स्वभाव को ,अपने रहन सहन को सादा बनाए और उसे   कुटिलता से मुक्त रखें  क्योंकि हमारे इष्ट देव श्रीराम जी को निर्मल मन वाले जीव ही प्रिय हैं, उन्हें कपट छल छिद्र तनिक भी नहीं सुहाता !

सरल सुभाव न मन कुटिलाई ,जथा लाभ संतोष सदाई  ! (उत्तर . ४५/२ )
निर्मल मन जन सो मोहि पावा ,मोहिं कपट छल छिद्र न भावा ! (सु. ४३/५ )

धर्म - सत्य भाषी , पर सेवा : 
अपने मन को निर्मल कर के निष्कपट भाव से ,सत्य धर्म का पालन करते हुए, हम  परोपकार और परसेवा के कार्यों में लग जाएँ! तुलसी कहते हैं कि इसके समान और कोई धार्मिक अनुष्ठान है ही नहीं !

धरम न दूसर सत्य समाँना , आगम निगम पुरान वखाना !   ( अयो.  ९४/५ )
पर हित सरिस धरम नहीं भाई , परपीड़ा सम नहीं अधमाई !   ( उत्तर . ४०/१)

हरि कृपा से संत समागम - सत्संग से मुक्ति
स्वधर्म निभाने की प्रेरणा आपको मिलेगी सत्संग से , सो  जितना बन पाए उतना संत समागम करो !

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन !
बिनु हरि कृपा न होई सो गावहिं  वेद पुरान  ! 
                                        ( उत्तर . १२५ )

मौक्ष तक पहुचने की काफी ऊंची ऊंचीं बातें हो गयीं ! भाई ५० -६० वर्ष तक लगातार मश्क करने से ये रामायण की उपरोक्त बातें तो थोड़ी बहुत याद भी रह गयीं हैं और उनमे बताये सद्गुणों को बरत कर हम लाभान्वित भी हुए हैं ! पर जानते हैं , अक्सर हम  उन साधारण संकल्पों की उपेक्षा कर देते हैं जो हमारे रोज के जीवन में अधिक महत्व के होते हैं ! चलिए  इस प्रकार का अपना केस ही सबसे पहले आपको बताऊ :

२००५ में यहाँ यु एस के डॉक्टरों द्वारा मुझे दिए विविध हिदायतों के कारण मैंने तब अपनी जीवन रक्षा के लिए चंद अति आवश्यक संकल्प किये थे लेकिन धीरे धीरे मैंने उन्हें भुला दिया और वो मेरी स्मृति के किसी कोने में पड़े  सिसकते रह गये थे ,आज मैं उन सभी संकल्पों को मन ही मन दुहरा रहा हूँ ! आप से अनुरोघ है कि आप मेरे लिए शुभ कामनाएं करें कि मैं आज से उन संकल्पों को भलीभांति निभा सकूं ! फ़िलहाल वे संकल्प गोपनीय हैं !

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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 9 मार्च 2011

आत्म कथा ( # 3 1 3)

अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 

पिछले दो तीन दिवसों में ही "उनकी" कृपा के  दो अनुभव हुए ! पहला था उनके द्वारा  मुझे मेरी अपनी न्यूनताओं का ज्ञान कराना , प्रियजन जो बिना हरि कृपा के हो ही नहीं सकता ! आपने देखा ,"उन्होंने" मेरे जैसे अज्ञानी प्राणी को जो अपने आप को "ज्ञान का भण्डार" मान  कर इठलाता फिरता है  उसे उसकी वास्तविकता से परिचित करवा  दिया ! मेरी आँखें खोल दीँ !


मेरे कृपानिधान इष्ट देव ने जो मुझपर दूसरी कृपा की वह बड़ी चमत्कारिक थी ! ज़रा देखिये "उन्होंने" मुझे सावधान तो किया पर हताश होकर मुझे "राम काज" छोड़ने नहीं दिया ! यह उनकी दूसरी कृपा थी ! मुझ साधारण मरकट को मेरी क्षमताओं का ज्ञान कराते हुए उन्होंने पहले कहा कि "राम काज लगि तव अवतारा"और इस प्रकार मुझे प्रोत्साहित करने  के बाद , मुझ पर पूरा भरोसा जता कर "उन्होंने" मुझे आशीर्वाद दिया और कहा " राम काज सब करिहो तुम बल बुद्धि निधान"!

कहां मिलेगा किसी को ऐसा उदार स्वामी जो "बिनु सेवा ही द्रवे दीँन पर", जो मुझ जैसे  साधन हींन व्यक्ति  पर इतनी कृपा , इतना अनुग्रह , इतने उपकार करेगा ? 



ऐसो को उदार जग माही
बिनु सेवा जो द्रवे दीँन पर , राम सरिस  कोऊ नाहीं !!
ऐसो को उदार जग माही


प्रियजन, स्वर से उन्हें रिझाने का प्रयास करने वाला  साधक हूँ ,
संत शिरोमणि रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास जी की  
रचनाएँ बरबस ही कंठ से प्रस्फुटित होने लगीं हैं 

हरि तुम बहुत अनुग्रह कीनी
 साधन हींन विविध दुर्लभ तन मोहिं कृपा कर दीन्हीं !!
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कोटिन मुख कहि जात न प्रभु के एक एक उपकार  
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हरि तुम बहुत अनुग्रह कीनी 

मेरे प्यारे पाठकों आपको बता दूँ ,गुरुजनों से जो सुना है 
और जो मुझे अक्षरश: सत्य लगा

बिनु हरि कृपा  विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई

और 

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन,
बिनु हरि कृपा न  ह़ोई  सो  गावहीं  वेद  पुराण 


मेरा परम सौभाग्य है कि मुझे सिद्ध सद्गुरु मिले, और आजीवन आप जैसे स्वजनों का ऐसा सत्संग मिला जो साधारणत: दुर्लभ है !

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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 2 मार्च 2011

हमारे सद्गुरु # 3 0 7





Param Pujya Shree Swami Satyanand Ji Maharaj
हनुमत कृपा -अनुभव                                   

साधक साधन साधिये                              हमारे सद्गुरु 

(गतांक से आगे)                          स्वामी सत्यानन्द जी महाराज                     
                 
        




गुरुजनों की चर्चा चल रही थी कि बीच में कल 'सब गुरुओं के सद्गुरु'- देवाधिदेव "शिवजी महाराज" की 'महाशिवरात्रि' आगयी और अकस्मात मुझे आत्म-कथा के ४०-५० वर्ष पुराने प्रष्ठ पलटने ही पड़े ! आप जानते ही है,  मैं निज बल बुद्धि से कोई  भी कर्म नहीं करता ,मेरे द्वारा जो कुछ  होता है, कोई और ही करता और कराता हैं ! उसने जो लिखाया, मैंने वही  लिखा ! कुछ नागवार लगा हो तो माफ़ कर दीजियेगा !

हाँ तो उस्ताद साहेब द्वारा मुझे "स्वर से ईश्वर प्राप्ति" की राह बताना ,(पहली हनुमत कृपा) ! और  स्वर साधना से जन्मजात 'भजन गायन' की क्षमता में अप्रत्याशित निखार आना (दूसरी हनुमत कृपा) ! "भजन शब्द-स्वर  रचना एवं गायन" में आयी प्रवीणता के कारण मुझे सिद्ध  महात्माओं के दर्शन एवं निकटतम सम्पर्क में आने के सुअवसर प्राप्त होना   ( तीसरी सबसे बड़ी हनुमत कृपा)!

महावीर हनुमान जी की इस महती कृपा के फलस्वरूप मुझे सर्व प्रथम,१९५९ में हमारे सद्गुरु स्वामी जी महराज के दर्शन हुए और उन्होंने मुझे "नाम " प्राप्ति का अधिकारी पाया !(यह मेरे 'इष्ट' की मुझ पर सबसे बड़ी कृपा थी ) ! और उसके बाद सद्गुरु स्वामी जी के स्नेहिल आशीर्वाद से मेंरे जैसे अति साधारण व्यक्ति के जीवन में "आनंदस्वरुप प्रभु" से  मिलन का मार्ग दर्शन करवाने वाले अनेकों संतों के सत्संग का ताँता सा लग गया ! मेरा जीवन सार्थक करवा देने वाले अनेक महात्मा संतों , देवी सद्रश्य  साध्वी माताओं के दर्शन और उनके अति निकट आ पाने तथा  उनकी सेवा में अपने भजनों के नैवेद्य समर्पित  कर पाने के सुअवसर मुझे मिलते रहे ! जय गुरु देव !

चाहे आप जो भी कहें मैं उन महान विभूतियों के नाम आपको अवश्य बताऊंगा इस लिए कि मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि हम सब के"इष्ट" पालनहार, परमपिता, परमात्मदेव" कितने कृपालु हैं ! तभी तो हमारे जैसे साधारण सांसारिक , साधनहीन , गृहस्थ मनुष्य को केवल "स्वर साधना" द्वारा ही "ईश्वर" को याद कर लेने के कारण वरदान के रूप में उन्होंने हमे इतनी  सिद्ध आत्माओं के दर्शन करवा दिये !

इस सूची में मातृदेव,पितृदेव तथा आचार्यदेव को छोड़ कर उन सब विभूतियों के नाम हैं जिनके प्रत्यक्ष दर्शन एवं सत्संग से प्राप्त सुबुद्धि ,ज्ञान और शक्ति के सहारे, मैं आज
आपकी सेवा कर पा रहा हूँ !

श्री स्वामी सत्यानन्द जी      (१९५९) सद्गुरु , श्री राम शरणं ,दिल्ली
श्री प्रेमजी सेठी महाराज       (१९६१)     ,,              ,,        ,,     ,,
श्री स्वामी मुक्तानंद  जी      (१९७०)
श्री स्वामी अखंडानंद  जी       (१९७१)
श्री श्री माँ आनंदमयी जी       (१९७४)
श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी  (१९८३)
श्री डोक्टर विश्वामित्र जी  (वर्तमान सद्गुरु) , श्री राम शरणं ,दिल्ली

मेरी आत्म कथा में ,इन सब विभूतियों द्वारा मुझ पर की हुई उनकी अनन्य कृपाओं की कथाओं के अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है ! अस्तु चाहता तो हूँ की इन सभी गुरुजनों के साथ बिताये एक एक पल का हिसाब सविस्तार आपको दूं ! पर मेरे "वह" अनुमति दें , प्रेरणा के तरंग भेजें तभी यह सम्भव  हो पाएगा ! तब तक मौन रहना ही उचित है !

हाँ , प्रियजन , श्री श्री माँ आनंदमयी के सत्संग में व्यतीत किये कुछ दिव्य दिनों की कथा मैं  अपने ८ जुलाई २०१० के सन्देश से प्रारंभ करके अगस्त २०१० के प्रथम सप्ताह  के  संदेशों में सविस्तार दे चूका हूँ ! रोचक है ,शिक्षाप्रद है समय मिले तो पढ़ लीजियेगा !

शेष वहां से प्रेरणा प्राप्त होने के बाद !

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निवेदक:-  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

हमारी साधना - भजन # 3 0 1

हनुमत कृपा - अनुभव                                                           साधक साधन साधिये 

हमारी साधना - भजन                                                            ( ३ ० १ )


तारीख़ महीना साल अब कुछ भी याद  नहीं ! ५०-६० साल पुरानी डायरियां भी हमारे ७५ वर्ष पुराने मकान की अलमारियों से धीरे धीरे गायब होगयीं शायद दीमकों ने उन्हें स्वाहा कर दिया ! हाँ, तो १९५० के दशक में कभी ,हमारे बहत अनुरोध पर ग्वालटोली बाज़ार के किसी मकान की एक छोटी सी कोठरी में गुलाम मुस्तफा साहेब ने कानपूर में अपना एक छोटा सा अस्थायी विद्यालय बनाना स्वीकार किया ! 

मुझे गर्व है कि उन्होंने कानपूर में अपने प्रथम शागिर्द के रूप में मुझे और मेरे छोटे भाई जैसे स्थानीय सुगम संगीत प्रेमी पड़ोसी संतू श्रीवास्तव को स्वीकार किया ! मुस्लिम काल के संगीत घरानों की परंपरा के अनुसार हम दोनों शागिर्दों को दीक्षा देने  की सारी व्यवस्था उस्ताद की मन्त्रणा अनुसार संतू भाई  ने की !

पारम्परिक हिन्दू गुरुजन जिस प्रकार रोली टीका कर के कलाई में 'कलावा' बांधते हैं वैसे ही हमारी कलायी में मुस्तफा साहेब ने "गण्डा" बाँधा ! हम दोनों उनके शागिर्द हो गये ! इसके अतिरिक्त और क्या क्या हुआ वह कुछ भी याद नहीं ! संतू ,लाल कुँए के पास के हलावाई की जलेबिओं का एक बड़ा दोना , हनुमान जी के मंदिर में प्रसाद चढ़ा कर ले आया ! हम सब ने बड़े प्रेम से प्रसाद पाया ,तब तक पास का चायवाला मिट्टी के सकोरों में चाय भी दे गया !  

संगीत विद्यालय था , कुछ संगीत तो होना ही था ! इधर उधर से मांगमूंग कर तानपूरा  तबला और बाजा लाया गया था ! आप सोच ही सकते हैं कि साधारण हिन्दू गृहस्थों के घर के साज़ किस स्टेंडर्ड के होंगे ! तानपुरा स्त्रियों की गायकी में काम आने भर का था! पुरुषों के ऊँचे स्वर तक उसे मिला पाना कठिन था !

उस्तादजी ने कुछ आपत्ति नहीं की ! उसी तानपुरे को किसी प्रकार मर्दाने स्वरों तक चढा कर मिला लिया ,और आँखें मूँद कर गर्दन नीचे झुकाए हुए ,अपने कंठ से जो स्वर उन्होंने भरा तो , मेरी आँखें भर आयीं ! कैसे बताऊं ,कितनी मिठास थी, कितनी तडप थी, कितना दर्द था, कितनी पीड़ा थी, उस एक स्वर में ? स्वर साधन करने के बाद उन्होंने मेरी रूचि का आदर करते हुए कबीरदास जी  का यह भजन गाया ! हमे आज वह भजन इसलिए याद आ गया क्योंकि इसके लगभग ४० वर्ष बाद ,१९८० =९० के दशक में वह एक बार कानपूर आये थे और  हमारे घर के सत्संग भवन में हमारे आध्यात्मिक गुरुदेव के चित्र के समक्ष उन्होंने वही भजन गाया था जो हम सब को बहुत अच्छा लगा ! हमारे माधव जी तो उस दिन से यह भजन अक्सर गाते रहते हैं !हमने उस दिन यह भजन रिकार्ड भी कर लिया था और वह रेकार्डिंग अभी भी हमारे पास है ! व्यवस्था हो जायेगी तो प्रियजन किसी दिन आपको सुनाऊंगा भी ! वह भजन था :-

 सतगुरु हो महाराज मोपे सांई रंग डारा !
शब्द की चोट लगी मेरे मन में बेंध गया तन सारा !
औषधि  मूल  कछू नहीं लागे  का करे  बैद बिचारा ! 
सुर नर  मुनि जन  पीर औलिया कोई न पावे पारा !
कहत  कबीर  सरव रंग  रंगिया  सभी रंग ते न्यारा!  
                                    सतगुरु हो महाराज मोपे सांई रंग डारा !

इसके अतिरिक्त उस्ताद ने एक और भजन सुनाया था , वह भी फिर कभी बताऊंगा ! आज इतना ही !

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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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रविवार, 6 फ़रवरी 2011

साधन- भजन कीर्तन # 2 8 7

हनुमत कृपा - अनुभव                                                      साधक साधन साधिये

साधन- भजन कीर्तन                                                                              (२८७)

क्षमा प्रार्थी हूं , प्रियजन , मैंने अपने पिछले संदेश # २८६ में कुछ  वो बातें दुहरा दीं जो  मैं अपने २८५ वें संदेश में लिख चुका था ! पर उससे यह सिद्ध हो गया कि मेरे २८६ वें संदेश में लिखी एक यह बात कि "मेरी स्मृति मुझे धोखा दे रही है" ,परम सत्य है !

ऐसा लगता है कि , यहाँ चौबीसों घंटे , अपने चारोँ ओर बर्फ के ऊँचे ऊँचे सफ़ेद  टीले और घर के  कम्पाउंड के  घास के मैदानों , पेड़ पौधों और छत  पर जमी  २ से ४ फीट मोटी बर्फ की परतों को  ४० - ५० दिनों से लगातार देखते देखते , मेरे मस्तिष्क का "ग्रे मसाला " भी अब बर्फ जैसा धवल हो गया है ! ऐसे में किस से शिकायत करुं === 
  
                            कोई     शिकवा     न   गिला     है   "उनसे"            
                           वही लिक्खा है जो "श्री राम" ने लिखाया है !!
                                    टोक देते तो क्या बिगड़ जाता   ---
                                    मेरा  संदेश  ही    सुधर  जाता !!
                                    दे गये पर "वही"मुझको धोखा         
                                    हाय  कैसा समय  ये  आया है!! 
                           वही लिक्खा है जो "श्री राम" ने लिखाया है  !! 
                                                  (भोला)  
पाठकगण,  प्रमुख सम्पादक हैं "वह" , सर्व अधिकार सुरक्षित है उनके हाथों में ! उन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग क्यों नहीं किया ? संदेश के अनावश्यक ,असत्य और अनुचित अंशों को उन्होंने क्यों नहीं मिटा दिया ? ह्म तो उनसे ही पूछ रहे हैं कि उन्होंने मुझसे वह सब लिखवाया ही क्यों ? भैया ये सब वही जाने ! आप और ह्म क्यों व्यर्थ में माथा पच्ची करें ! चलिए यदि आपने मुझे क्षमा  कर दिया हो ,तो आगे बढ़ा जाये !

सद्गुरु स्वामीजी महराज के दर्शन मुझे  उस पंच रात्रि सत्संग के बाद दुबारा नहीं हुए ! एक वर्ष में ही महाराज अपने इष्ट परमप्रभु श्री राम के "परम धाम"चले गये ! ग्वालियर से बाबू  दादा दिल्ली पहुँच गये , इनका  तार मेरे पास आया , पर एक तो देर हो गयी थी दूसरे  मेरे पास उन दिनों ऎसी सुविधा और साधन भी नहीं थे कि जा पाता ! मैं हरिद्वार भी नहीं पहुँच  पाया ! मन मसोस कर रह गया ! वह मन जिसमे श्री स्वामी महाराज ने   " राम नाम " के सदाबहार वृक्ष का बीज बो दिया था ! हर ऋतू में पुष्पित -फलित  रहने वाले राम नामी पौधे ने मेरे मन में जड़ पकड़ ली थी ! मैंने कैसे जाना , सुनिए ---

उनदिनों मैं अपने करिअर के सबसे  निचले स्तर पर था ! मेरे एक दूर के रिश्तेदार जिन्हें उनके सौहार्द , सौजन्य और सहयोग के कारण मैं अपना बड़ा भाई  मानता था उन दिनों कानपुर में ही भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी थे ! उनमें एक विशेषता थी - वह यह क़ि वो एक वास्तविक "राम भक्त" थे ! अपने इस गुण के कारण वह मुझे अतिशय  प्रिय व आदरणीय लगते थे !

मैं नया नया दीक्षित हुआ था और मेरी धर्म पत्नी कृष्णा जी मुझसे ९- १० वर्ष पूर्व स्वामी जी महाराज द्वारा ही दीक्षित हुईं थीं ! मेरे दीक्षित होने के बाद ह्म दोनों ने नियमित रूप से आराधना करने का विचार क़िया !-अपने दैनिक कार्यक्रम में समय निकाल कर ह्म अपनी नवजात गुडिया श्रीदेवी को गोद में लेकर , जब भी ,जहाँ भी मौका मिल जाता था अपना भजन कीर्तन जाप और अमृतवाणी  का पाठ कर लेते थे ! 

ऐसे में एक दिन जब हमदोनों  अमृतवाणी का पाठ कर रहे थे  मेरे वही वाले बड़े भैया आ गये ! कृष्णाजी ने उन्हें अमृतवाणी की एक प्रति दे दी !उन्होंने भी  ह्मारे साथ पूरी अमृतवाणी गायी ! समापन पर उन्होंने गदगद कंठ से कहा " भोला !इस पुस्तिका में तो समस्त आध्यात्म का निचोड़ भरा पड़ा है ,कहाँ मिलती है यह ? मुझे दोगे ? मैं इस का नित्य प्रति पाठ करूँगा ! इसमें  तुलसी रामायण में प्रतिपादित "रामनाम " की  महिमा की पुष्टि होती है जिसका पाठ मैं नित्य प्रति करता हूँ ! सुनो " और उन्होंने मानस के राम-बाल्मीक़ि प्रसंग से हमें   सुनाया 

मन्त्रराज   नित जपहि तुम्हारा , पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा !!
तुम तें अधिक गुरुहि जिय जानी ,सकल भाय सेवहि सनमानी !

जाहि न चाहिअ  कबहु  कछु   तुम संन सहज सनेहू !
बसहु  निरंतर  तासु  मन सो राउर निज गेहू !!
                                                   -------------------
क्रमशः 
निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"


शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

साधन-भजन कीर्तन # 2 8 6

 हनुमत कृपा - अनुभव                                            साधक साधन साधिये 

साधन-भजन कीर्तन                                                                      ( २ ८ ६ )

आज अभी अभी अपने सद्गुरु स्वामी सत्यानंद जी महाराज के आज के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी ,श्री राम शरणं ,रिंग रोड दिल्ली के वर्तमान गुरुदेव डाक्टर  विश्वामित्र महाजन जी महाराज को अपने इन संदेशो के विषय में सूचना दी और आज ही मेरा कल का लिखा पूरा संदेश पोस्ट होने से पहिले मेरे कम्प्यूटर जी की कृपा से पूरा का पूरा ऐसा गायब हुआ क़ि फिर उसे ह्म़ारे कम्प्यूटर एक्सपर्ट बच्चे भी खोज न पाए !

ऐसा पहिली बार तो हुआ नहीं , आप जानते ही हैं ,मेरे चीफ एडिटर महोदय , मेरे प्रेरणा स्रोत , मेरे इष्टदेव को मेरे लेख में ,जो कुछ अशोभनीय ,असत्य या  असंगत नजर आता है उसे वह निःसंकोच कैचिया देते हैं ! प्रियजन ह्म  पारिश्रमिक भोगी सेवक उनके खिलाफ इन्किलाब करने का साहस कैसे कर सकते हैं ! हरि इच्छा मान कर मुंह सिये पड़े रहते हैं! लगता है आज  उन्हें मेरे उस संदेश में कुछ भी अच्छा नहीं लगा और उन्होंने पूरा संदेश ही सेंसर कर दिया ! ऊपर से यह क्माल देखिये क़ि मेरी स्मृत भी मुझे धोखा दे रही है ! मुझे कुछ भी नहीं याद क़ि उस संदेश में मैंने क्या लिखा था ! बस याद है केवल यह क़ि उसमे मै अपने प्रथम सत्संग के अनुभव की बात कर रहा था ! चलिए उसी विषय में दोबारा कोशिश करले : 

१९५९ में मैंने पहिली बार श्री रामशरणं के पंच रात्रि सत्संग में भाग लिया ! यह सत्संग ग्वालियर में श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष हुआ था ! सत्संग के मोटे मोटे नियम मुझे मेरी ससुराल वालों ने बता दिये थे ! उनदिनों रेडिओ स्टेशन के संगीत विभाग से सम्बंधित था इससे ससुराल में मुझे एक ऊंचा गायक समझा जाता था ! स्वामी जी को भजन बहुत प्रिय हैं अस्तु मुझसे यह भी कहा गया क़ि सत्संग में गाने के लिए मैं बहुत से भजन तैयार करलूं ! स्वाभाविक है ऐसे में किसी के भी मन में अहंकार का होना ! मैं कैसे बचता ?

हाँ  तो मैं पूरी तैयारी के साथ , अपने सुंदर से सुंदर कुरते की जेब में भजनों की पर्चियां रखे  हर बैठक में महराज जी के निकटतम बैठने की आशा लिए , इस प्रकार सत्संग भवन में प्रवेश करता था कि स्वामी जी मुझे देखते ही दूर से इशारा कर के मुझे अपने पास बुलाएं    और अपने निकट बैठालें ! पर पहले दो दिनों में ऐसा कुछनहीं हुआ !

प्रिय पाठकगण मेरा यह सोचना क़ि पंडित राम अवतार शर्मा जी , बन्सलजी ,पवैया जी , शिवदयाल जी तथा जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव जी जैसे ग्वालियर के  पुराने साधकों के होते हुए महाराज जी मुझ जैसे नये साधक को सबसे आगे अपने निकट आमंत्रित कर के बैठाएंगे एक दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ न था ! 
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 प्रियजन , इस प्रसंग में ही हमे अभी बहुत कुछ कहना है ! लेकिन  इसके पहिले क़ि यह संदेश भी कहीं गुम  हो जाये आज इसे भेज देता हूं ! क्रमशः कहानी पूरी कर दूंगा !
हाँ आपने सुना ही होग़ा क़ि यहाँ ह्मारे नगर में आजकल इतनी जबर्दस्त बर्फबारी हो रही है जितनी पिछले पचास वर्षों में नहीं हुई !  घर के आगे पीछे बर्फ के पहाड़ खड़े हैं. !
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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन # 2 8 5

हनुमत कृपा - अनुभव                  साधक  साधन साधिये 
                                  
साधन- भजन कीर्तन                                                                                (२८५) 

श्री स्वामी जी महाराज के सानिध्य में होने वाले उस पंचरात्रि सत्संग के सभी बैठकों में   मैं अपनी गायकी की प्रवीणता प्रदर्शित करने को उतावला था ! मैं अपने नये नये रेशमी कुरतों  की जेब में भजनों की छोटी छोटी पर्चियां छुपाये , इस भाव भंगिमा से सत्संग भवन में प्रवेश करता था कि स्वामी जी महराज की दृष्टि मुझ पर पड़े और अपने आसन पर बैठे बैठे वह मुझे पुकार कर अपने निकट बैठालें !

काफी दिनों बाद  समझ पाया कि तब मैं कितना बड़ा मूर्ख था ! उस सभा में , पंडित राम अवतार शर्मा जी, श्री मुरारीलाल पवैया जी, श्री गुप्ता जी , श्री बंसल जी ,श्री बेरी जी ,श्री शिवदयाल जी तथा श्री जगन्नाथ प्रसाद जी जैसे  महान साधकों के  होते हुए ,मेरा यह सोचना कि श्री स्वामी जी  महाराज  मेरे जैसे नये साधक को आगे बुलाकर अपने निकट बैठाएंगे,  कितनी  बड़ी मूर्खता थी ? प्रियजन  ! मुझे  अब लगता है  कि  वास्तव में मेरी मूर्खता आँक कर ही मुझ पर अति करुणा करके श्री स्वामी जी ने मुझे सुधारने के लिए अपने संरक्षण  में ले लिया था ! कितना बड़ा सौभग्य था वह मेरे लिए ?  स्वामी जी के निम्नांकित शब्दों में मेरी मनोभावना प्रतिबिम्बित है  : 

भ्रम  भूल  में   भटकते  उदय   हुए  जब  भाग !
मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग !!

अब सुनिए कि आपके इस "तीसमार खान" साहेब की क्या गति हुई वहाँ ! नित्य  प्रति  हर   सभा में वह उतनी ही तैयारी के साथ जाते , उचक उचक कर अपना चेहरा स्वामी जी को दिखाते लेकिन  उनको अवसर  नहीं मिलता ! आखिर एक दिन महराजजी की कृपा दृष्टि उन पर पड़ ही गयी , महराजजी की उंगली उनकी ओर उठी ! वह गदगद हो गये ,अपनी  जेब से डायरी निकालने को झुके  पर तब तक महराज जी की उंगली उनके बगल में बैठे किसी और साधक की ओर घूम कर रुक गयी और उन्होंने उन साधक को  भजन सुनाने का आदेश भी दे दिया और तीसमार खान अपनी पर्चियां  सम्हाले हाथ मलते ही रह गये ! प्रियजन !अपने आप को सर्व श्रेष्ठ समझने वाले अहंकारी व्यक्तियों की अंततः ऎसी ही गति होती है !

पर ऐसा नहीं है क़ि मैं पाँचों दिन उपेक्षित  ही पड़ा रहा ! अंततः महराज जी ने हमे मौका दिया पर  काफी लम्बी प्रतीक्षा के बाद ! यूं कहिये कि मन ही मन बहुत रोने धोने के बाद मुझ पर  विशेष कृपा कर के ह्मारे इष्ट देव श्री राम ने ही मुझे वह अवसर प्रदान किया क़ि मैं नैवेद्य  सरीखा अपना वह भजन उनके श्री चरणों पर अर्पित कर सकूं ! मैं तैयार तो था ही , बड़े भाव से पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ , मैंने हारमुनियम से तानपूरे का काम  लेते हुए ( तब मैं  इतनी निपुणता से बाजा नहीं बजा पाता था ) मुकेश जी का एक नया भजन गाया 

राम झरोखे बैठ कर  सब का मुजरा लेत 
जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको देत !!
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राम करे सो होय रे मनुआ राम करे सो होय !!

कोमल मन काहे को दुखाये, काहे भरे तोरे नैना ,
जैसी जाकी करनी होगी वैसा पड़ेगा भरना 
बदल सके ना कोय रे मनुआ ,बदल सके ना कोय !!
राम करे सो होय रे मनुआ !!

पतित पावन नाम है वाको रख मन में विश्वास ,
कर्म किये जा अपना रे बंदे ,छोड़ दे फल की आस ,
राह दिखाऊँ तोहे रे मनवा राह दिखावों तोहे !!  
राम करे सो होय रे मनुआ !!

जो भी जाके वाके द्वारे साची अलख जगाये ,
मेरो दाता ऐसो दाता ,खाली नहीं फिरावे,
काहे धीरज खोय रे मनुआ ,काहे धीरज खोय !!
राम करे सो होय रे मनुआ !!
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महराज जी के आशीर्वाद से तथा सभा भवन के आकाश में पहले से ही गूंजती भक्ति रस में सराबोर धुनों की तरंगों के कारण मेरा भजन भी खूब जमा और मुझे ऐसा लगा क़ि वहाँ उपस्थित सभी साधकों एवं महराज जी को भी वह बहुत पसंद आया ! महराज जी तो मेरी ओर देख कर थोड़ा सा मुस्कुराए ही पर मेरे लिए उतना ही काफी था !मुझे उस से ही रोमांच हो गया  मैं गद गद हो गया मेरी आँखें डबडबा गयीं ! मुझे लगा क़ि श्री गुरुदेव को मेरा वह प्रथम प्रयास पसंद आया है  और यह विश्वास भी हो गया क़ि , नैवेद्य स्वरुप अर्पित मेरी वह "भजन भेंट" मेरे "इष्टदेव" ने  स्वीकार कर ली है !


हाल से बाहर आते समय  एक अनजान सत्संगी साधक ने मुझसे कहा "आपने तो रुला ही दिया भैया, देखिये मेरे रोंगटे अभी तक खड़े हैं "!
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निवेदक:- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"