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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

मैया मुझे दरशन दो



विक्रम नव संवत्सर 2079 के आगमन की 
कोटिश बधाई और अनन्त मंगलकामनायें ॥

संवत दो हजार उन्यासी
मैरिमैक वैली के वासी ।
भोलाजी को गीत लिखाया
बाबा ने फिर उसे  गवाया ॥

चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस पर सद्गुरुत्रय की प्रेरणा से उपजी यह शब्द रचना:


मैया मुझे दरशन दो,
दरशन दो, दरशन दो ।

एक बार फिर मम अंतरघट
आनंद अमृत से भर दो।

मैया मुझे दरशन दो,
दरशन दो, दरशन दो ।

याद मुझे है कैसे इक दिन मैया तुमने भेज बुलाया
कोटिक भक्तों के आगे माँ तुमने अपने पास बिठाया 
भरी सभा में उस दिन मैया केवल मुझसे ही बतियाया ।
आज पुनः निज बालक को माँ गोदी ले उत्संग भरो ।

मैया मुझे दरशन दो,
दरशन दो, दरशन दो ।

वर्षों बाद पुनः जब मन में तव दर्शन की आस जगी
प्रगट हुईं तुम सहसा मैया अमृत रस की झड़ी लगी ।
फिर भी है अतृप्त यह बालक अब भी खोजे घड़ी घड़ी ।
आज पुनः मम जगी पिपासा को दरशन दे शांत करो ।

मैया मुझे दरशन दो,
दरशन दो, दरशन दो ।

_____________________

श्री श्री माँ आनंदमयी की कृपा एवं दर्शन का सौभाग्य कई बार प्राप्त हुआ। ये प्रसंग मैंने ब्लोग में पहले भी लिखे हैं। निम्न लिंक और इसकी शृखला में आगे के पोस्ट पढ़ें । 

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

सद्गुरु कृपा

 सद्गुरु कृपा 

परमगुरू "प्रभु" * एक है ,सद्गुरु ** भी है एक 
पर  जीवन पथ पर  मिलें ,जन को गुरू अनेक 

परम गुरू जय जय राम 

* हमारे परमगुरू  हैं  सर्वशक्तिमान परमात्मा श्री "राम" !
,औरों के प्रभु, अल्लाह, गौड अथवा किसी और नाम के हो सकते हैं  
इन सभी दिव्य विभूतियों को मेरा श्रद्धायुक्त प्रणाम !

हमारे एकमात्र सद्गुरु हैं श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज 
पर अन्य सभी गुरुजन का भी मैं नमन करता हूँ ! 

सच तो ये है कि 
परमगुरु परमेश्वर की कृपा से ही शिष्य के भाग्य जगते हैं और सद्गुरु, शिष्य के हृदय में  प्रेम भक्ति की अग्नि प्रज्वलित करता है 

प्रभु-सद्गुरु की कृपा से जगते 'सिख के भाग'  
जलती  उनके  हृदय  में  प्रेमभक्ति की आग 
  
हो जाते उस हवन में भस्म शिष्य के पाप 
 कर्तापन  का भाव  औ  अहंकार की छाप

निर्मल मन सिख को गुरू तब अधिकारी मान   
 देते "ज्योति स्वरूप" में "परमसत्य" का ज्ञान 

परमात्मा श्रीराम परमसत्य ,प्रकाशरूप  परमज्ञान आनन्दस्वरूप हैं-
[सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज द्वारा रचित 'अमृतवाणी' से उदधृत ]


"परमगुरू"- सर्वशक्तिमान प्रभु की प्रेरणात्मक इच्छानुसार ही "सद्गुरु "  अपने साधकों पर कृपा कर नाम दीक्षा देते हैं  ,तत्पश्चात
परमेश्वर के परम सत्य के रहस्य का बोध शिष्य को कराते  हैं ! 

दीक्षित होकर सद्गुरु के सम्पर्क में रहने वाले नित्य साधनरत शिष्य को आजीवन अपने "इष्ट" के अतिरिक्त संसार में न तो कुछ और दिखाई देता हैं ,न सुनाई ही !   

सद्गुरु ,से प्राप्त "साधन भक्ति" के अनुरूप "सतत" -"नित्य" साधनारत  शिष्य को वांछित "सिद्ध भक्ति" की प्राप्ति निश्चय ही होती है !  


अंततः गुरू आज्ञा का पालन करने वाले साधक को परिपूर्णता मिलती है ! उसका अन्तःकरण शुद्ध होता है ! वह जीवन भर परिपूर्णता के आनंद रस में सराबोर रहता है !

इस् संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की निम्नांकित  पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं -----

मातु  पिता  गुरु   स्वामी निदेसू ! सकल धरम धरनीधर सेसू !
साधक एक सकल सिधि देनी ! कीरति सुगति भूतिमय बेनी  !
                                                                 अयोध्याकाण्ड दो.३०५ 

चित्रकूट में भाई भरत को सम्बोधित करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने उपरोक्त सूत्र जगमंगल हेतु उजागर किया था ! उन्होंने कहा : " अपने सद्गुरु तथा गुरू सद्र्श्य अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करते हुए ,अपने नित्य कर्म एवं जगत व्यवहार करने वाले साधनारत  साधक को इस जीवन में ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है ! उसे कीर्ति, सद्गति और ऐश्वर्य  की त्रिवेणी स्वयमेव ,बिना प्रयास के ही प्राप्त हो जाती है !

श्री राम शरणं वयम प्रपन्ना 

निज अनुभव 

श्री राम शरणं के हमारे गुरुजन का कथन है कि सोते जगते , खाते पीते , उठते बैठते ,आते जाते ,यहाँ तक कि दफ्तर में काम करते समय भी एक पल को भी अपनी यह सहज एवं सरलतम साधना -"नाम जाप" छोडो नहीं, सतत करते रहो !  प्रियजन ,असम्भव नहीं है उपरोक्त गुरू आज्ञा का पालन ! 

अपने पिछले ८३ वर्षों के जीवन में से , लगभग ५५ वर्षों का मेरा निजी अनुभव है -  इष्ट का नाम न भुलाने वाले व्यक्ति को अनेकानेक चमत्कारिक लाभ होते हैं -सांसारिक सिद्धियों और सफलताओं के साथ साथ ऐसे साधक को ,आध्यात्मिक उपलब्धियों की आनंदमयी अनुभूतियां भी होती है और उसे यदा कदा , आनंदस्वरुप प्यारे प्रभु के साक्षात्कार का भी अनुभव होता है )

सिद्धि भक्ति से प्राप्त रस की मिठास अनिर्वचनीय है ! उसको शब्दों में बयान करना असम्भव है ! वैसे ही जैसे गहरे जल में डूबा व्यक्ति निर्वचन हो जाता है , वैसे ही जैसे गूंगा गुड खाता है लेकिन उसकी मिठास का शब्दों में वर्णन नहीं कर पाता !ऎसी सिद्ध भक्ति की प्राप्ति सतत एवं नित्य भक्ति द्वारा होती है ! 


क्रमशः 

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निवेदक : व्ही, एन,  श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव ===============================

बुधवार, 2 मार्च 2011

हमारे सद्गुरु # 3 0 7





Param Pujya Shree Swami Satyanand Ji Maharaj
हनुमत कृपा -अनुभव                                   

साधक साधन साधिये                              हमारे सद्गुरु 

(गतांक से आगे)                          स्वामी सत्यानन्द जी महाराज                     
                 
        




गुरुजनों की चर्चा चल रही थी कि बीच में कल 'सब गुरुओं के सद्गुरु'- देवाधिदेव "शिवजी महाराज" की 'महाशिवरात्रि' आगयी और अकस्मात मुझे आत्म-कथा के ४०-५० वर्ष पुराने प्रष्ठ पलटने ही पड़े ! आप जानते ही है,  मैं निज बल बुद्धि से कोई  भी कर्म नहीं करता ,मेरे द्वारा जो कुछ  होता है, कोई और ही करता और कराता हैं ! उसने जो लिखाया, मैंने वही  लिखा ! कुछ नागवार लगा हो तो माफ़ कर दीजियेगा !

हाँ तो उस्ताद साहेब द्वारा मुझे "स्वर से ईश्वर प्राप्ति" की राह बताना ,(पहली हनुमत कृपा) ! और  स्वर साधना से जन्मजात 'भजन गायन' की क्षमता में अप्रत्याशित निखार आना (दूसरी हनुमत कृपा) ! "भजन शब्द-स्वर  रचना एवं गायन" में आयी प्रवीणता के कारण मुझे सिद्ध  महात्माओं के दर्शन एवं निकटतम सम्पर्क में आने के सुअवसर प्राप्त होना   ( तीसरी सबसे बड़ी हनुमत कृपा)!

महावीर हनुमान जी की इस महती कृपा के फलस्वरूप मुझे सर्व प्रथम,१९५९ में हमारे सद्गुरु स्वामी जी महराज के दर्शन हुए और उन्होंने मुझे "नाम " प्राप्ति का अधिकारी पाया !(यह मेरे 'इष्ट' की मुझ पर सबसे बड़ी कृपा थी ) ! और उसके बाद सद्गुरु स्वामी जी के स्नेहिल आशीर्वाद से मेंरे जैसे अति साधारण व्यक्ति के जीवन में "आनंदस्वरुप प्रभु" से  मिलन का मार्ग दर्शन करवाने वाले अनेकों संतों के सत्संग का ताँता सा लग गया ! मेरा जीवन सार्थक करवा देने वाले अनेक महात्मा संतों , देवी सद्रश्य  साध्वी माताओं के दर्शन और उनके अति निकट आ पाने तथा  उनकी सेवा में अपने भजनों के नैवेद्य समर्पित  कर पाने के सुअवसर मुझे मिलते रहे ! जय गुरु देव !

चाहे आप जो भी कहें मैं उन महान विभूतियों के नाम आपको अवश्य बताऊंगा इस लिए कि मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि हम सब के"इष्ट" पालनहार, परमपिता, परमात्मदेव" कितने कृपालु हैं ! तभी तो हमारे जैसे साधारण सांसारिक , साधनहीन , गृहस्थ मनुष्य को केवल "स्वर साधना" द्वारा ही "ईश्वर" को याद कर लेने के कारण वरदान के रूप में उन्होंने हमे इतनी  सिद्ध आत्माओं के दर्शन करवा दिये !

इस सूची में मातृदेव,पितृदेव तथा आचार्यदेव को छोड़ कर उन सब विभूतियों के नाम हैं जिनके प्रत्यक्ष दर्शन एवं सत्संग से प्राप्त सुबुद्धि ,ज्ञान और शक्ति के सहारे, मैं आज
आपकी सेवा कर पा रहा हूँ !

श्री स्वामी सत्यानन्द जी      (१९५९) सद्गुरु , श्री राम शरणं ,दिल्ली
श्री प्रेमजी सेठी महाराज       (१९६१)     ,,              ,,        ,,     ,,
श्री स्वामी मुक्तानंद  जी      (१९७०)
श्री स्वामी अखंडानंद  जी       (१९७१)
श्री श्री माँ आनंदमयी जी       (१९७४)
श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी  (१९८३)
श्री डोक्टर विश्वामित्र जी  (वर्तमान सद्गुरु) , श्री राम शरणं ,दिल्ली

मेरी आत्म कथा में ,इन सब विभूतियों द्वारा मुझ पर की हुई उनकी अनन्य कृपाओं की कथाओं के अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है ! अस्तु चाहता तो हूँ की इन सभी गुरुजनों के साथ बिताये एक एक पल का हिसाब सविस्तार आपको दूं ! पर मेरे "वह" अनुमति दें , प्रेरणा के तरंग भेजें तभी यह सम्भव  हो पाएगा ! तब तक मौन रहना ही उचित है !

हाँ , प्रियजन , श्री श्री माँ आनंदमयी के सत्संग में व्यतीत किये कुछ दिव्य दिनों की कथा मैं  अपने ८ जुलाई २०१० के सन्देश से प्रारंभ करके अगस्त २०१० के प्रथम सप्ताह  के  संदेशों में सविस्तार दे चूका हूँ ! रोचक है ,शिक्षाप्रद है समय मिले तो पढ़ लीजियेगा !

शेष वहां से प्रेरणा प्राप्त होने के बाद !

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निवेदक:-  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 1 8 8

हनुमत कृपा
निज अनुभव

साउथ अमेरिका के एक केरेबियन देश में हम पर हुई हनुमत कृपा की कथा चल रही है !कैसे श्री हरि ने उस हवाई यात्रा में मेरी जीवन रक्षा की और फिर किस प्रकार "उन्होंने" उस "नन्हे फरिश्ते" के रूप में प्रगट होकर ,मेरे और साथ साथ हमारे भारत देश के मान-सम्मान को धूमिल होने से बचा लिया ! शत शत नमन मेरे प्यारे प्रभु आपको ह्म पर की हुई इस अहेतुकी कृपा के लिए !आपकी सर्वत्र जय जय कार हो मेरे प्रभु !

इस सन्दर्भ में मैंने अपनी wishful thinking में यह कहा था कि वहाँ slaughter house के inauguration के समय जो घटना हुई वह मात्र एक coincidence अथवा कोई जादू,magic या चमत्कार नहीं था !वह वास्तव में ह्म पर हुई ह्मारे परम पिता की विशेष कृपा का एक जीवंत उदाहरण था !

पौराणिक कथाओं और लिखित इतिहास के माध्यम से ह्म अपने आपको और साथ साथ आप सब प्रियजनों को आश्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं कि विश्व मे असंख्य संतों महात्माओं को ऐसे दिव्य अनुभव हुए हैं जिन्हें सुनकर यही लगता है जैसे प्रभु ने स्वयं अपने हाथों उनके कार्य सँवारे हैं ! अस्तु ऎसी कथाओं पर अविश्वास करना अनुचित है !

आप देखें भारत में पिछले लगभग ६०० -७०० वर्षों में कैसे कैसे महान संत- महात्माओं ने जन्म लिया ! संत कबीर दास जी ,गुरु नानक देवजी, कृष्ण भक्त सूरदास जी ,गिरिधर गोपाल की दीवानी मीराबाई ,रामानुरागी संत तुलसीदास जी , वैष्णव जन के रचयिता गुजरात के संत सम्राट नरसी मेहताजी , महारष्ट्र के संत तुकारामज ,संतज्ञानेश्वरजी,संत रविदासजी संत नामदेव जी --आदि आदि , भाई ! असंख्य हैं ,कहां तक गिनाएं ?इन सभी सिद्ध महापुरुषों के अनुभव उस निराकार परम का नाना रूप धर कर व्यथित मानवता को निर्भय करने की गाथा गाते हैं !

ऐसा नहीं है क़ि "वह" आदि-अनादि काल में ही अवतरित होते थे भारत में तो वर्तमान काल में भी श्री श्री रामकृष्ण परमहंस,श्री औरोबिन्दो श्री स्वामी विवेकानंद ,स्वामी दयानंद आदि अनेकों महान विभूतियों ने ,भिन्न भिन्न स्वरूपों में उस "परम" को समय समय पर जग मंगल हेतु साकार होते हुए देखा है! कैसे झुठला सकते हैं ह्म इस परम सत्य को .

मेरे आध्यात्मिक धर्म गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की कृपा और आशीर्वाद से प्राप्त श्री श्री माँ आनंदमयी के दर्शन एवं दृष्टि दीक्षा से मेरा "अहंकार" शून्य हो गया! मुझे जन जन में "उस परम" के दर्शन का आभास होने लगा और अपनी प्रत्येक सफलता निज करनी से अधिक "उस परम" की कृपा का फल लगने लगी और प्रभु की कृपा पर हमारा विश्वास और दृढ़ हो गया !

प्रियतम प्रभु की सर्वव्यापकता ,सार्वभौमिकता की अनुभूति और कृपा से ह़ी जीवनपथ में आयी हुई उलझनों का सामना करते हुए हमें सत्य की राह पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है ! सच तो यह है क़ि परमपिता प्रभु रूप बदल बदल कर ह्मारे जीवन में आते हैं और हमारी सहज सम्भार करते हैं ! इसलिए मेरे अतिशय प्रिय पाठकों हमे प्यारे प्रभु की सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान सत्ता पर अडिग विश्वास रखना है !

अगले दिन यह कन्फर्म हो गया क़ि उस देश में उस हुलिया,उस वल्दियत का कोई बालक उस समारोह के अतिरिक्त और कहीं देखा ही नहीं गया !अब आप ही कहिये मेरा wishful thought कहां तक सच है ?

निवेदक :-व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"





रविवार, 29 अगस्त 2010

JAI JAI JAI KAPISOOR ( Aug.28/29 .'10)

हनुमत कृपा  - निज अनुभव


गतांक से आगे

प्रियजन! आपको ही क्यों मुझे भी अपना पिछ्ला (२७ अगस्त वाला) संदेश पढ़ कर ऐसा लग रहा है क़ी मैं अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहा हूँ .और यह जानते हुए भी क़ी अपने आप पर ,अपने किसी कृत्य के लिए अहंकार=अभिमान करना उचित नहीं है, मैंने वह सब अनुचित वार्ता लिखी.मैं स्वयम समझ नहीं पा रहा हूँ क़ी मुझसे यह अपराध कैसे हो गया . .

इसमें कतयी कोई दूसरी राय हो ही नहीं सकती क़ी "अभिमान-अहंकार" सर्वथा त्याज्य है.. पर परम रामभक्त संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में सुतीक्ष्ण मुनि से यह कहलवाकर क़ी श्री रघुनाथजी क़ी सेवा का सुअवसर पाने वाला साधक यदि अपनी उस स्थिति-(राम सेवकाई का अवसर पाने) का अभिमान करे तो ऐसा अभिमान भूलने भुलाने लायक नहीं है.

बडभागी श्रेष्ठ मुनि सुतीक्ष्ण जी ने कहा था:-

अस अभिमान जाय जनि भोरे , मैं सेवक रघुपति पति मोरे.
I should always be PROUD of the fact that I am in LORDs service.

प्रियजन! उपरोक्त कथन से यह कदापि न समझ लीजिएगा क़ी मुनिवर सुतीक्ष्ण जी ने मुझे "अभिमान" करने का लाईसेंस दे दिया है अथवा अब मैं उनके समान महान संत बन गया हूँ. ऐसा कुछ भी नही है. विश्वास करिये भइया अभी भी "मैं वही हूँ ,वही हूँ, वही हूँ मैं बिलकुल नहीं बदला हूँ जो पाठ मेरी जननी माँ ने शैशव में ,,सद्गुरु श्री सत्यानंदजी महाराज तथा श्री श्री माँ आनंदमयी ने युवा अवस्था में तथा श्री राम शरणम के वर्तमान आध्यात्मिक गुरु ,डाक्टर विश्वामित्र जी महाराज ने हमे आज तक पढाया है मैं भूला नहीं हूँ.आज भी मैं उनके पढाये प्रेम-प्रीति-भक्ति के पाठ का अक्षरशः पालन करने का प्रयास कर रहा हूँ.. गुरुजन के कहे अनुसार मै "उनकी" कायनात के ज़र्रे ज़र्रे मे अपने प्रियतम प्रभु की मनमोहिनी छबि के दर्शन करने का प्रयास करता रहता हूँ .

इसी भावना से प्रेरित अपनी एक रचना याद आ रही है जो अपने २००८ के होस्पिटल प्रवास से कुछ दिन पहले बनी थी.
.
रोम रोम में रमा हुआ है, मेरा राम रमैया तू,
सकल श्रृष्टि का सिरजन हारा संघारक रखवैया तू !!.

डाल डाल में ,पात पात में , मानवता के हर जमात में,
हर मजहब ,हर जात पात में , एक तुही है तू ही तू.!!

चपल पवन के स्वर में तू है,पंछी के कलरव में तू है,
भंवरे के गुंजन में तू है ,हर"स्वर" में "ईश्वर"है तू !!

क्रमशः

निवेदक:-व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

रविवार, 1 अगस्त 2010

JAI MAA JAI MAA

जय माँ जय माँ
श्री श्री माँ आनंदमयी के वचन 

श्री माँ के जीवन में, जितना ज्ञानामृत ,उनके श्रीमुख से अवतरित हुआ उससे कहीं अधिक आध्यामिक सूत्र, उनकी ज्योतिर्मयी आँखों से और उनके दिव्य मूक विग्रह की गंगोत्री से पवित्र गंगा जल के समान निर्झरित हुआ और जिस जिज्ञासु की गंगाजली में जितना समा पाया उसने उतना भर लिया...

मेरे हिस्से भी जितना आया, मैंने उतना पाया. जहाँ मुम्बई में उन्होंने अपने श्रीमुख से मुझे संबोधित कर अहंकार शून्य रहने का आदेश दिया ,वहीं दूसरे दिन उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से मेरे मन को परमानंद के पवित्र गंगाजल से भर कर मुझे प्रेमाभक्ति के प्रथम सोपान पर चढा दिया. आज, लगभग ४० वर्ष बाद भी माँ की कृपा से प्राप्त ,मेरे अन्तर का भक्ति-प्रेमामृत, छलक छलक कर,मेरे ही नहीं अपितु अनेकों साधकों के मन को प्रेमाद्र कर रहा है.

आगरे के टूर पर निकलने के एक रात पहले मेरे मन में माँ का दर्शन करने की ज़ोरदार हूक उठी थी,,ह्म दोनों ने (मैंने और मेरी धर्म पत्नी ने)उस रात बड़ी देर तक माँ के विषय में बहुत सी बातें की थीं और उनका सुमिरन करते करते ही सोये थे.उस रात ह्मारे वार्तालाप का अंतिम वाक्य था "क्या जाने कब ह्म अब माँ का दर्शन कर पाएंगे" और जैसा आपको विदित ही है, अगले दिन ही माँ ने अति चमत्कारी परिस्थितिमेंमुझे,कानपूर स्टेशन के प्लेटफोर्म पर साक्षात दर्शन दे दिया. जय माँ जय माँ

कानपुर वाले दर्शन से स्पष्ट हुआ क़ि उस ऊपर वाले "परम" के समान ही हमारी श्री श्री माँ आनंदमयी भी अपनी संतान को कभी नहीं भूलतीं,और जब कभी भी मेरे जैसा उनका कोई नादान बालक उनकी याद करता है वह दौड़ कर आ जातीं हैं और अपनी ममतामयी आंचल तले, उसे स्नेह ,सुबुद्धि ,संबल और आत्मशक्ति का पयपान करा कर, जीवन रण में उसे विजयश्री दिला देती है.

आइये ह्म सब मिल कर माँ की जय जयकार करें

निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

जूलाई ३१, और अगस्त १, २०१०

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

SRI SRI MAA AANANDMAYII

श्री श्री माँ आनंदमयी का संदेश  

(माँ का चिन्तन - निवेदक के शब्दों में)

पिताजी ,सबसे पहले आपसे एक प्रार्थना करूंगी,क़ि आप हमे "माँ" कह कर न पुकारें . मैं आपकी बच्ची हूँ.आप सब मेरे माता पिता हैं. कृपया,आप सदा ही  मुझे अपनी अबोध नन्ही बालिका के स्वरूप में  स्वीकारिये .मुझे  "माँ  माँ" क़ह कर,  देवी बना कर ,सोना-चांदी-या संगमरमर में गढ़वाकर, किसी मन्दिर में स्थापित कर ,ताले- कुंजी से बंद करके अपने से दूर न कर दीजिये. इस बच्ची को आपकी देख रेख ,आपका प्यार और आशीर्वाद चाहिए. मैं  प्रार्थना करती हूँ मुझे अपने हृदय मन्दिर में थोड़ा स्थान दीजिये.और मुझे वहीं से सेवा करने का अवसर दीजिये. पिताजी आज आपके प्रश्नों के उत्तर देने से पहले   स्पष्ट कर दूँ क़ि मेरा यह शरीर इस मानव जीवन में,जो थोड़ा बहुत स्वयं समझ पाया है उसके आधार पर वह आप लोगो की शंका का समाधान करेगा

.समस्त भव रोगों से मुक्ति की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम:उस सर्वशक्तिमान परमात्मा पर अखंड विश्वास रक्खे (TRUST HIM) और उस परम  को ही अपना एकमात्र हितकारी और शुभचिंतकजानें     

  •  यह विश्वास दृढ़ बनाये रक्खे क़ि हमारे जीवन में जो कुछ हुआ ,जो हो रहा है और जो कुछ भी भविष्य में होने वाला है वह सब उस परमपिता की इच्छा और कृपा से ही हो रहा है
  • हम जो भी करें वह प्रभु की सेवा समझ कर करें.
  • जितना बन पाए,अधिक से अधिक सत्संग करें.
  •  प्रभु का सुमिरन सदा  करें
  • सदा प्रभु को अपने अंग संग बनाये रखें .
  • अपना समस्त भार प्रभु का सौंप दें .
  •  प्रभु केवल हमारे माता पिता ही नहीं ,वह हमारे सर्वस्व हैं.
  • तुम मानो या न मानो पर वह जानते हैं क़ि तुम केवल उनके ही हो
  • .वह इस सृष्टि  के कण कण से झांक कर तुम्हारे समक्ष अपने आपको ज़ाहिर करते हैं पर तुम उन्हें पहचान नहीं पाते.  ,इसलिए पहले मन में उन्हें पहचान पाने की तीव्र इच्छा जगाओ ,फिर एक दिन उनकी कृपा होगी और तुम न केवल उन्हें जान जाओगे तुम उन्हें पहचान भी लोगे .
  • इस प्रकार तुम जान जाओगे क़ि इस सृष्टि के कण कण में हम सब का एकमात्र हितैषी और शुभ चिंतक सर्वशक्तिमान ,करुनानिधान प्रभु स्वयं व्याप्त है.
  • तुम्हारा अज्ञान मिट जायेगा."THUS THE VEIL OF IGNORANCE WILL VANISH "
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क्रमश;"माँ का चिंतन " अगले संदेशों में
निवेदक : व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"

    गुरुवार, 29 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA


    जय माँ  जय मा   जय  माँ 

    श्री श्री माँ आनंमयी  से अंतिम मिलन 


    आज स्मृति बीथियों में सैर करते हुए मेरी आँखों के सामने , वो सभी मनोहर चित्र ,जो पिछले ८०-८२ वर्षों में,उस चतुर चित्रकार ने बड़े प्यार से मेरे जीवन के केनवस पर खीचे हैं एक एक कर के जीवंत हो रहे हैं. ये चित्र मुझको उन सब मधुर पलों की याद दिला रहे हैं जब मेरे प्यारे प्रभू ने "आउट ऑफ़ द  वे " जाकर , बहुत जुगाड़ ,हेरा फेरी और तिकडम कर के हमे वह सब प्रदान करा दिया ,जिसको मैं पाना तो चाहता था ,मगर  जिसकी मांग मैंने अपने प्यारे प्रभु से कभी भी नही की.

    बिना मांगे देना उनकी (मेरे प्यारे प्रभू की)फितरत है, इस बात पर हमें माँ आनंदमयी के मुंबई वाले १९७४ के सत्संग से सम्बन्धित एक बात याद आयी. मेरी बड़ी बेटी ,श्रीदेवी ने जो उस शाम ह्मारे साथ भजन के कार्यक्रम मे शामिल थी हमे, ह्म़ारा  ब्लॉग देख कर ,बताया क़ि माँ ने उस प्रवचन में उसके भी एक प्रश्न का उत्तर दिया था. श्री देवी के मन में यह जानने की इच्छा थी क़ि "भगवान अथवा किसी देवी-देवता से प्रार्थना करते समय हमे उनसे क्या मांगना चाहिए." श्री देवी को अभी भी याद है क़ि माँ ने अपने प्रवचन में उसके इस मूक प्रश्न का क्या मुखर उत्तर दिया.माँ ने कहा था "ह्म और तुम उनसे क्या मांग सकते हैं ?  जब सच यह है क़ि ह्म जानते ही नहीं क़ि हमे क्या चाहिए,ह्मारे लिए क्या हितकर है और क्या हमे नुक्सान पहुंचा सकता है, इसलिए उचित यह है क़ि ह्म उनसे केवल "बल.बुद्धि,विद्या ,विवेक तथा सुमति मांगे." यदि ये पञ्चरत्न हमे मिल गये,फिर  हमे उनसे और कुछ मागने अथवा पाने की अभिलाषा ही नही रहेगी."


    धर्म पत्नी डोक्टर कृष्णा जी ने भी कुछ अनुभवों की याद दिलायी,एक यह क़ि वह श्री माँ से अपने विवाह से पूर्व ग्वालियर में मिल चुकी थीं. श्री माँ ,राजमाता विजयाराजे सिंदिया के न्योते पर ग्वालियर पेलेस में पधारीं थीं .जहां सबने काफी निकट से उनके दर्शन किये थे .माँ का अति आकर्षक व्यक्तित्व .उनका बहुत कम  बोलना, उनका सुरीला कंठ और सुमधुर भावपूर्ण भजन कीर्तन गायन कृष्णा जी को आज ५०-६० वर्ष के बाद भी अच्छी तरह से याद है, माँ ने तब एक कीर्तन किया था "कृष्ण कन्हइया ,बंसी बजइया, रास रचइया" माँ की दिव्य वाणी ने सबको मन्त्र मुग्ध कर दिया था.
       
    इसके अतिरिक्त एक और बात उन्हें याद आयी जिससे उनको तभी विश्वास हो  गया था क़ि श्री माँ दिव्य शक्तियुक्त हैं,वह बिना देखे सुने ही यह जान जाती हैं क़ि कहाँ क्या हो रहा है और किस के मन में क्या है ? . आदि ...एक विशिष्ट महिला माँ को विदाई देने स्टेशन नहीं आ सकीं, माँ ने ट्रेन छूटते छूटते किसी को बुला कर कहा की उस महिला से कह  देना की "मैं उसकी मजबूरी जान गयी हूँ.वह दुखी न हो, गोपाल जी सब ठीक करेंगे."

    १९५८ में कानपूर के स्वदेशी हाउस में,माँ पधारी थीं.मेरी गैरहाजरी में मेरी बड़ी भाभी जो उन दिनों गर्भवती थीं ,कृष्णा  को लेकर वहां , इस दृढ़ निश्चय  के साथ गयीं कि बिना माँ का प्रसाद और आशीर्वाद लिए वह वहां से नही लोटेंगी. सैकड़ों भक्तों की भीड़ में ये दोनों माँ की चौकी से काफी दूर बैठीं थीं. भक्तगण पुष्पमालाएं चढ़ा रहे थे जिन्हें वह तुरत ही  लौटा देतीं थीं.  एक सज्जन एक टोकरी फूल और एक माला लेकर आये , माँ ने टोकरी तो उन्हें लौटा दी ,पर फूलों की माला अपने हाथ में लेकर ,घुमा कर जनता की और फेंक दी.  हवा में उडती वह माला पंडाल के बीचो बीच बैठी हमारी भाभी जी के गले में आप से आप ही पड़ गयी. भाभी ने जो संकल्प किया था वह पूरा हो गया.. उनको सीधे ,माँ के हाथ से दिया ,प्रसाद मिला. कहने की आवश्कता नही है कि माँ के उस आशीर्वाद से भाभी को कितना आत्मिक आनंद और भौतिक सुख मिला. आज भी वह उस आनंद के नशे में डूबी दिन रात, कृष्ण भक्ति के भजन रचतीं और गुनगुनाती  रहती हैं.  .


    श्री माँ की कृपा एवं आशीर्वाद जनित आत्मिक आनंद के छोटे बड़े अनुभव, माँ भक्तों को अभी भी होते रहते हैं.आज ,जब उनकी स्थूल काया हमारे बीच नहीं हैं.,सूक्ष्म रूप में अब भी वह हर पल हमारे अंगसंग हैं. एक सुरक्षा कवच के समान वह हमे सभी संकटों से बचा
    रही हैं.  


    जय माँ, जय माँ, जय जय माँ 


    निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"                 दिनांक .२९,/ ३० जूलाई , २०१० 

    बुधवार, 28 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ जय माँ


    श्री श्री माँ आनंदमयी से अंतिम भेट (भाग-३ )

    मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण , अभी तक मैंने अपने जो भी निजी अनुभव बयाँ किये उसमे हमारा केवल एक उद्देश्य था क़ि किसी प्रकार , आप सब के समक्ष उस करुना सागर -"परम" की अनंत उदारता और असीमित कृपा के कुछ सत्य उदहारण पेश करके आपको कन्विंस करूं , आपको विश्वास दिला सकूं क़ि हमारा - आपका , इस विश्व में,एक मात्र हितेषी, केवल "वह" ही है, मैंने इस बयानबाज़ी में कहीं भी असत्य का सहारा नही लिया है.

    इस अंतिम एपिसोड को ही लीजिये,कितनी अनहोनी बातें हुईं इसमे. पर विश्वास कीजिए वह सब घटनाएँ सचमुच ही घटीं थीं. और वैसे ही घटीं थीं जैसे मैंने बयाँ की . कृपया यकीन करिये क़ि मुझको कानपूर जाने का विचार आगरे पहुचने के बाद आया.और ...मैं नहीं जानता था क़ि श्री श्री माँ उन दिनों कानपूर में ही थीं,यदि जानता तो मैं कभी भी सीधे कानपूर जाकर उनके दर्शन कर सकता था.यह भी सोचने की बात है क़ि उस खास दिन मैं आगरे से,कानपुर तूफ़ान के उस जर्जर कोच के उस विशेष कूपे में ही बैठ कर क्यों गया था ? आप कुछ भी जवाब दें मेरे पास इन सब सवालों का बस एक उत्तर है -("बा बहू और बेबी" की मीनाक्षी की तरह), "भाई मैंने कुछ भी नह़ी किया", आप पूछोगे तो फिर किया किसने ? भाई आप माने या न माने मेरा तो एक ही उत्तर है जो भी हुआ वह-मेरे इष्ट महावीर विक्रम बजरंगी ने किया "प्रियजन, यह सच है ,सारी क़ि सारी प्लानिंग, ऊपर उन्होंने ही की थी, वह डोर थामे कठपुतलियों को नचाते रहे..

    अब आप दूसरी तरफ की कहानी सुनिए.:

    माँ बिना कोई पूर्व सूचना दिए,अकस्मात ही उस दिन सबेरे कानपूर पहुंची थी.वह कानपूर के अपने होस्ट परिवार के, अति रुग्ण पितामह को स्वस्थ होने का आशीर्वाद देने आयीं और उसी शाम कानपुर छोड़ देने का भी विचार बना लिया और तुरंत ही स्टेशन पहुचाने का आग्रह किया. होस्ट परिवार के युवराज उन्हें स्टेशन ले तो आये. पर अब माँ से पूछे कौन क़ि कहां का टिकट बनवाया जाये .इत्तफाक से उस दिन माँ का मौन व्रत भी था.उनसे बातचीत लिखा पढ़ी में हो रही थी.अटकलें लग रहीं थीं ---

    माँ शायद ,दिल्ली या देहरादून ,पश्चिम दिशा में कहीं जाना चाहे इस लिए एक नम्बर प्लेटफोर्म पर उनकी आराम कुर्सी रक्खी गयी..

    पर जब श्री माँ ने पश्चिम दिशा में अरुचि दिखायी तो यह विचार होने लगा क़ि पूर्व की ओर जानेवाली एकमात्र ट्रेन तूफ़ान को तो नम्बर ६ पर आना है.माँ को वहाँ पहुंचना होग़ा .पर माँ आँख बंद किये बैठी रहीं ,चुपचाप, समझने वाले जान गये क़ि माँ वहा से उठना नहीं चाहतीं थीं. स्टेशन मास्टर से अनुरोध किया गया , बमुश्किल तमाम राजी हो गये क़ि तूफ़ान को ६ के बजाय एक नम्बर पर लगाया जाये, और वही हुआ .

    अब आपही बताएं मेरे प्रियजनों,ये जो कुछ भी हुआ क्या किसी मानव की करनी कही जा सकती है .ऎसे जुगाड़वादी करिश्मे वह सर्वशक्तिमान परम कृपालु ह्म सब का प्यारा प्रभू ही कर सकता है .उनके ऐसे करतब से कौन लाभान्वित होता है,और किसको हानि होती है,,यह व्यक्तियों के अपने पूर्व जन्मो से संचित प्रारब्ध, संस्कार और वर्तमान कर्मो पर निर्भर होता है अस्तु प्रियजनों, माँ के कहे मुताबिक कर्तापन का अभिमान-अहंकार त्याग.कर कर्तव्य करते रहो, काम करते रहो,नाम जपते रहो.कम से कम यह पढ़ते समय तो उनको याद कर लो, और फिर देखो रिद्धिसिद्धि कैसे आपको पुरुस्कृत करती है. अब तो मेरे प्यारे स्वजनों माँ की जयकारबोलो..

    "सारे बोलो , मिल के बोलो , प्रेम से बोलो जय माँ , जय माँ"

    निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला",

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ   जय माँ
    श्रीश्री माँ आनंदमयी से अंतिम मिलन (भाग - २ )

    कानपूर सेंट्रल के आउटर सिग्नल (पश्चमी) पर तूफ़ान जितनी देर खड़ी रही मैं बेचैनी से कूपे में इधर से उधर चहल कदमी करता रहा. बार बार ब्रीफ केस खोलता ,फेस-नेपकिन से चेहरा पोंछता ,शीशे में मुंह देखता हुआ अपने (तब के) काले घने बालों पर कंघी फेरता (अब की न पूंछो ,अब तो वे काले घुंघराले केश ,९९ प्रतिशत काल कलवित हो चुके हैं ,और जो १--२ प्रतिशत बचे हैं , वे भी अब गये, तब गये कर रहे हैं ).निज स्वभावानुसार मैं फिर भटक गया, मुआफ करना पाठकों. अब सम्हल गया हूँ ,चलिए विषय विशेष पर बढ़ें .

    थोड़ी देर में कंडक्टर महोदय,जो आगरे पर ही अंतर्ध्यान हो गये थे सहसा प्रगट हो गये. "सर, क्या बताएँ ,सब सोते ही रहते हैं,स्टेशन पर कोई लाइन देने वाला नही. घंटे भर से तूफान खड़ी है किसी को फ़िक्र ही नही". वो टले तो कोच अटेंडेंट ,हाथ में झाडन फहराते मेरी सीट की सफाई में जुट गया. मैं उसका मकसद समझ गया और उसकी जवाबी सेवा मैंने भी कर दी.खुश हो कर बोला,"साहेब, इहाँ तो सबे क्न्फुस हैं , लाइन मैनो चक्कर मैं पड़ा है ,उसको स्टेशन से कोई बताता ही नही है क़ी कौन प्लेटफोर्म की लाइन बनावे ,रोज़ तो ६ नम्बर पर जाती है आज ,दहिने घूमी ,एक नम्बर पर जाने वाली है शायद , दहिने दरवज्जे उतरियेगा साहेब". अटेंन्देंट की "जी के" कंडक्टर साहेब से ज़्यादा अच्छी थी

    खरामा खरामा ,जनवासे की चाल से रेंगती तूफ़ान कानपूर सेंट्रल के प्लेटफार्म नम्बर एक में दाखिल हुई.शुरू से आखिर तक सारा प्लेटफॉर्म बिलकुल सुनसान था , न कोई कुली ,न कोई पसिंजर ,न पान बीडी सिगरेट वाले ,न चाय वालों की आवाज़.,ऐसा लगा जैसे किसी करफ्यू लगे शहर में आ गये हैं. मैं हाथ में ब्रीफ केस लिए,पहले खिडकी से फिर दरवाजे पर खड़ा होगया. प्लेटफोर्म खतम होने को आया , जी आर पी , गुड्स बुकिंग शेड के सामने हमारा डिब्बा रुका. मैं खिडकी से दांये बाएं , आगे पीछे देखता रहा, कहीं कुछ न दिखा . बड़ी निराशा हुई , मैं,कानपुर का सपूत , एक अमेरिकन देश के विकास की चेष्टा सम्पन्न करके ३-४ वर्ष के बाद अपने शहर आया हूँ, और बाजा गाजा तो दूर, यहा एक प्राणी  भी पुष्प माला लिए मेरे स्वागत के लिए नहीं आया है. ( यह है  ,मानव के चारित्रिक दुर्बलता का एक ज्वलंत उदाहरण - चार वर्ष पूर्व ही ,श्री श्री माँ आनंदमयी ने जिस व्यक्ति को अहंकार शून्य करने की दीक्षा दी थी, वह व्यक्ति आज पुनः अहंकार के दलदल में धंसा जा रहा था )

    अनमने भाव से मैं धीरे धीरे सम्हल कर कोच के बाहर आया. बाएं दायें वही सूनापन था गेट की ओर जाने को घूमाँ तो नजर आयीं , अँधेरे में,बिलकुल अकेली ,आराम कुर्सी पर आँख बंद किये बैठी , एक ऊंचे बंगाली परिवार की , असाधारण आकर्षक व्यक्तित्व वाली दीदी माँ - ठाकुर माँ (दादी माँ -नानी माँ  )सरीखी महिला. ठिठक कर जहाँ था वही खड़ा रह गया. कौन हो सकतीं हैं यह ? सेन परिवार की अथवा गांगुली परिवार की? क्यों अकेले ही हैं वह यहाँ ? कुछ पलों को मैं इन्ही प्रश्नों में उलझा रहा. क़ि अचानक बिजली सी चमकी--मुह से अनायास ही निकलने लगा "जय माँ, जय माँ , जय माँ"

    प्रियजन, वह कोई अन्य नहीं था , वह माँ ही थी.श्री श्री माँ आनंदमयी ही थीं . मैंने बिलकुल हाथ भर की दूरी से उन्हें देखा .हाथ जोड़ कर उनके आगे खड़ा रहा. उनकी पार्थिव आँखे बंद थीं .पर उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से अवश्य मुझको पहचान लिया था (आगे खुलेगा क़ि कैसे पता चला हमे यह.). इसी स्थिति में मेरे कुछ पल बीते , धीरे धीरे थोड़े ,बहुत थोड़े बस ५-७ लोग वहा आये. सिंघानिया परिवार के युवराज दिखायी दिए अपने स्टाफ के साथ स्वयम दौड़ धूप करके माँ की यात्रा सुखद बनाने की व्यवस्था करते हुए.हा तभी कोई टिकट लाने गया, कोई स्टेशन मास्टर से मिलकर अच्छी बर्थ रिजर्व करवाने. तभी माँ के परम भक्त सेवक , स्वामी निर्मलानंद जी (वही जिन्होंने १९७४ के मुंबई समारोह में हमे माँ की सेवा में भजन कीर्तन गाने का सौभाग्य दिलाया था) माँ का असबाब लिए आते दिखे. किसी ने उनका नाम पुकारा , इस प्रकार मैंने तो उन्हें पहचान लिया  ,उन्होंने हमे पहचाना , या नहीं कहना मुश्किल है.

    अब सबसे चमत्कार की बात सुने ,स्वामी जी ने माँ का बिस्तर उसी कोच में उसी बर्थ पर बिछाया जिस पर मेरा यह अधम शरीर दिन में ६-७ घंटे बैठा था. जिस पर बैठे बैठे मैंने भजन गा गा कर सफर का समय काटा था मैंने निश्चय किया क़ि गाड़ी छूटने तक वहीं रहूं. सो रुका रहा. आश्चर्य हुआ जब स्वामी जी ने मुझसे कान में कहा "माँ डाक्चेन आपोनाय " (माँ आपको बुला रहीं हैं )

    मुझको और क्या चाहिए था,जिनके दर्शन के लिए वर्षों से ह्म तरस रहे थे वही माँ बुला रहीं थीं . .मैं दौड़ कर कोच पर माँ के पास उनके कूपे में पहुँच गया. स्वामी जी पीछे पीछे आये.. माँ ने एक पर्चा उन्हें दिया जिसे पढ़ कर वह हमसे बोले "माँ पूछ रही हैं आपका विदेश का प्रवास कैसा रहा? परिवार कैसा है?"  मेरे मुह पर जैसे ताला लग गया हो , आँखे झर झर बरस पडीं कंठ अवरुद्ध हो गया. क्या बोलता ? माँ की दोनों चमकदार आँखें और उनके हाथों की वह आशीर्वादी मुद्रा अभी भी रोमांचित कर रही है हमे

    प्रियजन मेरे साथ आप भी मन ही मन माँ का आवाहन कर उन्हें नमन करें और जय माँ ,जय माँ, कर के सम्पूर्ण जगत को आनंद से भर दें .

    कल कुछ और बातें बताउँगा आज से ही सम्बंधित..

    निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

    सोमवार, 26 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ जय माँ


    श्री श्री माँ आनंदमयी से अंतिम भेंट. (भाग एक )

    मुंबई की रासलीला में हुए श्री श्री माँ के दर्शन के साथ मेरे दफ्तर,घरबार और परिवार की सभी समस्याएं एक एक कर,आप ही आप सुलझ गयीं यह समझ में आया क़ी जिस व्यक्ति के माथे पर उसके माता -पिता एवं गुरुजन के आशीर्वाद की शीतल अमृत वर्षा सतत हो रही हो उस व्यक्ति को किसी प्रकार का सांसारिक ताप कैसे सता सकता.है. जो व्यक्ति ईश कृपा का सुरक्षा कवच धारण किये हो उसे बलवान से बलवान शत्रु घायल नहीं कर सकता,उसे परास्त होने का तो सवाल ही नहीं है.

    "जाको राखे साइयां मार सके ना कोय
    बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय "

    मेरे विभाग वाले,मुंम्बई से मेरा तबादला किसी कष्टप्रद स्थान में करवाना चाहते थे,पर हरि इच्छा देखिये;भारत सरकार ने मुझे ,साऊथ अमेरिका के एक पिछड़े देश के ओउद्योगिक विकास हेतु,उस देश की सरकार का सलाहकार नियुक्त करवा दिया. यह एक सम्मानजनक पोस्ट थी. मुझे शीघ्रातशीघ्र वहाँ जाना पड़ा .अस्तु ह्म १९७५ में ,२-३ वर्ष के डेपुटेशन पर मुंबई से, परिवार सहित वेस्ट इंडीज़ के लिए रवाना हो गये..

    लगभग ३ वर्ष बाद वेस्ट इंडीज़ से भारत लौटने पर,१९७८ में मेरी पोस्टिंग दिल्ली में हो गयी .यहाँ मैं अपने विभाग में उत्तर भारत क्षेत्र का अध्यक्ष नियुक्त हुआ. इसमें हमे निरीक्षण के लिए काफी टूर करने पड़ते थे.

    भारत आ कर ह्मारे मन में श्री माँ के दर्शन की लालसा दिनों दिन प्रबल होने लगी.एक बार ह्म कालकाजी में श्री माँ के आश्रम गये भी पर इस बार माँ का जन्म दिवस बेंगलूर में मनाया जा रहा था, माँ वहाँ गयीं थी. अस्तु माँ के दर्शन नहीं हुए. ह्म अशोक विहार से कालका जी गये थे , दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर पर. बड़ी निराशा हुई

    अगली सुबह मुझ को टूर पर आगरा जाना था .शाम की निराशा से मन दुख़ी था जाने को मन नहीं कर रहा था.पर जाना तो था ही.विचार किया, व्यक्ति एक निराशा के कारण अपने कर्म तो नही छोड़ सकता. अस्तु सबेरे ७ बजे , ताज से रवाना हुआ, १० बजे पहुंचा, १२ बजे तक निरीक्षण पूरा करके आगे कानपूर ऑफिस का आकस्मिक निरीक्षण करने का . कार्यक्रम बना लिया. आगरे से कानपूर तक की रेल यात्रा की व्यवस्था हो .गयी और मैं तूफान मेल पर सवार हो गया

    पहले दर्जे की कोच एकदम जर्जर दशा में थी. दरवाजे बंद नही होते थे खिडकियों में शीशे नहीं थे. कंडक्टर हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया "सर,माफ़ करे, विदयारथियों का राज है सर आप दरवाज़ा लोक कर के बैठें. खोलिएगा नहीं,चाहे लाख खटखताएं, कानपूर में ही दरवाज़ा खोलियेगा". कुछ जुगाड़ कर के उसने कूपे बंद करवा दिया .

    मैं नीचे बर्थ पर बैठता,लेटता कभी कुछ पढ़ कर कभी कोई भजन गुनगुना कर समय काटता रहा.स्वामी जी के भजनों की पुस्तिका पॉकेट में थी, उसमे का यह भजन कल से ही पूरे जोर शोर से कंठ से फूट रहा था .बंद रेल के डिब्बे को मैं इसी धुन से गुंजाता रहा .

    जगन मात जगदम्बे तेरे जयकारे
    तू शक्ती भगवती भवानी ,महिमा मय महामाया बखानी,
    विश्व रचे पाले संघारे
    जगन मात जगदम्बे तेरे जय कारे

    कानपूर के आउटर सिग्नल पर गाड़ी रुक गयी. और उसके बाद जो कुछ भी हुआ कल सुनाऊंगा. तब तक आप भी जयकारे में शमिल हो जाइये

    जय माँ, जय माँ, जय जय जय जय माँ..

    निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

    रविवार, 25 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA




    जय माँ   जय माँ

    श्री श्री माँ आनंदमयी क़ी कृपा दृष्टि 
    =====================================
    आज २५ जुलाई २०१० है, गुरु पूर्णिमा का मंगल दिवस.
    सभी गुरुजनों को हमारा कोटिश प्रणाम .गुरुजन कृपा करें, हमें सुबुद्धि एवं सुप्रेरणा प्रदान करे. 
    हम जहाँ भी रहें हमें सत्संग का लाभ मिलता रहे.
    ===============================                
    मैया मोहे मंगल दर्शन दीजे 
    विमल मधुर तेजोमयी  मूरति, मनोगमा मैं निहांरू,
    निज ममता-मंदिर में ,मैया ,   मुझको अपना लीजे 
    मंगल दर्शन दीजे मैया 

    श्री स्वामी जी महाराज का मातृवंदन का यह पद मैं , १९५९ के अपने प्रथम पंच- रात्रि -सत्संग में शामिल होने के बाद अक्सर श्री राम शरणम के सत्संगी साधकों के सन्मुख गाता रहता हूँ. कितनी बार इसे गाते गाते बहुत भावुक हो गया, एक विचित्र स्थिति में पहुच गया , किसी ने उसे आवेश कहा किसी ने कहा "हाल में इनकी माँ नहीं रहीं , इससे भावुक हो रहे हैं"आदि आदि..सच पूछो तो मुझे स्वयम नहीं पता क़ी कभी कभी भजन गाते गाते. मुझे की हो जाता है. मैं तो केवल इतना जानता हूँ:

    जब भी उन को भजन सुनाता , जाने क्या मुझको हो जाता,
    रुन्धता कंठ ,नयन भर आते , बरबस मैं गुमसुम हो जाता .

    एक बात बताऊं,सीक्रेट है,किसी से कहियेगा नहीं. शुरू शुरू में मुझे ऐसा लगता था कि यह आसुओं का बहना , गले का रुंध जाना,सब ,नकली है, मैं नाटक करता हूँ. तब सोचता था , मैंने कौन सी ऎसी साधना की है जो मुझे आनंद की यह ऊंची स्थिति मिलती? छोडिये इसका निश्चय उस परम के हाथ, वह जाने क्या सच है क्या झूठ. मैं आनंद लूटता हूँ . आप भी बहती गंगा में हाथ धो ले. अपने गुरुजन का, अपने अपने इष्ट का स्मरण ,नाम जाप करते रहिये आनंदित रहिये.

    रासलीला मंचन के समापन पर हमे श्री माँ का मंगलमय दर्शन, अति निकट से हुआ . श्री माँ की ज्योतिर्मयी आँखों से निकली वात्सल्य-करुणा व  ममतामयी शुभ कामनाओं की संजीवनी फुहार ने मेरी दर्शन प्यासी आँखों
    को तृप्त कर दिया .पूर्णमासी का चाँद देख कर जैसे सागर का ज्वार तट की तरफ दौड़ पड़ता है , वैसे ही परमानंद क़ी धारा मेरे अन्तस्थल में प्रवेश कर गई . प्रियजन,मेरा अंतर्घट पूरा भर कर छलकने लगा , मेरी आँखे भर आयीं

    वह मई १९७४ की एक शाम थी और आज जुलाई २०१० का यह सवेरा है, ३६ वर्ष से ऊपर हो गये , अभी भी, ह्मारे मन में ,माँ से दृष्टि दीक्षा में मिली, आनंद की वह लहराती भेट वैसे ही हिचकोले ले रही है,विश्वास करिये अभी इस पल भी, मैं रोमांचित हो रहा हूँ श्री श्री माँ के स्मरण मात्र से. (और फिर आज तो गुरु पूर्णिमा है ) मन करता है जय माँ, जय माँ जय माँ जय माँ करके सारा भू-मंडल गुंजायमान कर दूँ.

    हाँ १९७४ के बाद भी मैंने अनेक प्रयास किये माँ के दर्शन प्राप्ति के लिए. पर सफल केवल एक बार हुआ. वह घट्ना भी अति मार्मिक और चमत्कारिक है.प्रियजन, मेरा सौभाग्य सराहिये , इस बार हमे एकदम एकांत में केवल दो हाथ की दूरी से माँ का दर्शन हुआ. कल सविस्तार पूरी कथा सुनाऊंगा.

    निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

    शनिवार, 24 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ जय माँ 
    माँ आनंदमयी की कृपा दृष्टि

    अगली शाम ह्म माँ के पंडाल में समय से काफी पहले पहुँच गये. उस दिन "रास लीला" का कार्यक्रम था. लालचन ,ह्म कल की तरह आज भी सबसे आगे बैठना चाहते थे.हमे माँ के सामने बैठने का आनंद जो कल मिला था उसका सुखद एहसास ह्म आज एक बार फिर करना चाहते थे.पर आज वहाँ हमे कोई पूछने वाला नह़ी था कल के "वी . आई .पी" आज फुट-पाथी (जन साधारण )बन गये थे. कल की दूध सी सफेद चादर के नीचे पड़े मोटे कालीन की जगह आज ,(जल्दी आने के बावजूद) हमे चौथी कतार में लाल काली स्ट्राइप वाली धूल धूसरित दरी पर ,श्री श्री माँ के चरण कमलों से लगभग २० मीटर की दूरी पर बैठने की जगह मिली. 

    थोड़ी देर में ,शंखनाद के साथ श्री श्री माँ आयीं .उनकी साक्षात देवी लक्ष्मी सी मनोहारिणी छवि देखते ही हमारा मन पवित्रता एवं दिव्यता के प्रकाश से भर गया. कल के सत्कार के कारण उभरा मन का अहंकार और आज अपनी असली हैसियत पहचान कर ,अपनी साधारणता का ज्ञान होने पर ह्मारे मन में उठा क्षोभ का सैलाब ,माँ के दर्शन मात्र से ,पल भर में छूमंतर हो गया .

    रासलीला कब शुरू हुई कब खतम हुई ,उसमे क्या क्या हुआ,हमसे न पूछिये; हमारी निगाहें तो माँ के मुखारविंद पर,उनके अति आकर्षक दिव्य विग्रह पर टिकी हुई थीं .वहाँ
    से हटना ही नहीं चाहती थीं. बताऊं क्यों? एक तो उनका दिव्य आकर्षण और दूसरी थी : हमारी क्षुद्रता या मानवीय कमजोरी;.बता ही दूँ जब सच बोलना है तो क्या छुपाना? मेरे मन के किसी कोने में एक चोर बैठा था. मुझसे कहता था ,कल तुमने भजन सुना कर माँ को इतना प्रसन्न किया , माँ आज भी तुम्हे पंडाल के भीड़ भाड़ में जरूर खोज रहीं होंगी उस समय पुनः हमे अहंकार नामक चोर ने अपने वश में कर लिया था. मेरे प्यारे स्वजन देखा आपने मानव कितना असहाय, कितना बेबस, कितना मूर्ख बन जाता है. अभी कल ही माँ ने ,अहंकार शून्य करने की सीख दी .और आज ह्म, वापस जाने के बजाय झूठे अहंकार की डगर पर चार कदम आगे ही बढ़ गये .

    मैं उचक उचक कर अपने आप को प्रदर्शित करने का निष्फल प्रयास करता रहा.माँ ने मेरी और देखा तक नहीं. वह कृष्ण लीला का आनंद लूट रहीं थीं. उन्हें उस लीला में,उनके इष्ट राधा-कृष्णा के साक्षात् दर्शन हो रहे थे. मेरी निराशा की सीमा नहीं थीलीला समाप्त भी हो गयी.सब जाने लगे .माँ भी उठीं. मचान से उतरीं. मैं अपनी जगह पर ही खड़ा हो गया श्री .माँ हमारी तरफ न आकर दूसरी और मुड गयीं. मुझे निराशा का एक और धक्का लगा. दुख़ी हो मैंने अपनी आँखे बंद करलीं. रोने को मन कर रहा था .माँ कल बाबा मुक्तानंद के गणेशपुरी आश्रम जा रहीं थी.अब मुझे माँ के दर्शन कब और कहा हो पाएंगे ?

     माँ के आगे पीछे लोग इधर उधर भाग रहे थे. मैं यथा स्थान खड़ा रहा ,आंसू भरी बंद आँखें लिए और दोनों हाथ जुड़े हुए,नमस्कार की मुद्रा में. कुछ पलों में ऐसा लगा जैसे माँ ह्मारे आगे से निकल कर दूर चलीं गयीं . मैंने धीरे से आँखें खोलीं.प्रियजन क्या देखता हूँ क़ी उसी पल ,हमसे काफी आगे निकली हुई माँ,अनायास ही घूम गयीं और मेरी तरफ देख कर उन्होंने आशीर्वाद के मुद्रा में अपना हाथ उठाया .संयोग देखिये उस पल भी मेरे और माँ के बीच कोई व्यक्ति या अन्य कोई व्यवधान नहीं था .वह मेरे इतने निकट थीं क़ी मैं  सुनहरे फ्रेम के नीचे से चमकती हुईं उनकी दोनों आँखों को साफ़ साफ देख पाया.

    मेरे अतिशय प्रिय स्वजन ,मैं बयान नहीं कर पाउँगा क़ी श्री माँ की उन दोनो आँखों में कितना आशीर्वाद और कितनी स्नेहिल शुभ कामनाएं भरीं थीं. मेरी अपनी जननी माँ की आँखों में जो वात्सल्य,करुणा और प्यार दुलार की घटाएं मैं ४० -५० वर्ष पूर्व देखा करता था ,वही आज श्री श्री माँ की आँखों से उमड़ घुमड़ कर मेरे सम्पूर्ण मानस पर अमृतवर्षा कर रही थी, मेरा जीवन .मेरा तन मन सर्वस्व धन्य हो गया था .मैं नख से शिख तक रोमांचित था.  अभी इस समय भी मेरी कुछ वैसी ही दशा हो रही है. आगे लिख न पाउँगा .
    अब जो कहूँगा कल ही कहूँगा

    निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला" .

    शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ जय माँ 
    श्री श्री माँ आनंदमयी की कृपा 
    ==========================
    जब जागेगी हृदय में, राम मिलन की चाह
    स्वयम प्रगट हो संत जन ,दिखलायेंगे राह 


    अनायास आकर गुरू ,पकड़ तुम्हारा हाथ, 
    परम धाम ले जायेंगे ,तुमको  अपने साथ  


    ह्मारे गुरुदेव, प्रातःस्मरणीय ब्रह्मलीन  श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने अपने उपदेशों एवं रचनाओं में समवेत भजन-कीर्तन गायन तथा सिद्ध- संत-परिवेश में धरती पर प्रगटे दिव्य-आत्माओं के दर्शन एवं सत्संग की महिमा पर प्रचुर प्रकाश डाला है.स्वामी जी के बाद ,श्री प्रेम जी महाराज एवं वर्तमान सद्गुरु डोक्टर विश्वमित्र जी  महाराज ने भी साधकों के चारित्रिक और आध्यात्मिक विकास के लिए जीवन में अधिकाधिक सिद्ध संतो का संग - सत्संग ,करने  पर जोर दिया है  स्वामी जी महाराज ने कहा है क़ी सत्संग में बैठने तथा अपने इष्ट का नाम जाप करने से ,साधक को मन वांछित फल मिलता है. :


    सच्चे संत की सरन में  बैठ  मिले   विश्राम ,
    मन माँगा फल तब मिले जपे राम का नाम.


    गुरुदेव श्री डाक्टर विश्वमित्र जी महराज अपने प्रवचन में वर्तमान समय के सच्चे- सिद्ध संत जनों का उल्लेख करते हुए कभी कभी ब्रह्मलीन  स्वामी अखंडानंद जी महराज ,स्वामी शरनानंद जी महाराज एवं श्री श्री माँ आनंदमयी का नाम बड़े प्रेम और अतीव श्रद्धा से  लेते हैं .
                            ====================.
    श्री श्री माँ आनंदमयी की कृपा दृष्टि का निज अनुभव :-


    उस शाम श्री माँ ने जो बात केवल मुझसे कही थी,वो सविस्तार अपने सात जुलाई से ९ जुलाई के संदेशों में लिख चुका हूँ.फिर भी याद दिलादूँ,क़ी श्री माँ ने वह वार्ता किस वाक्य से शुरू की थी.माँ ने कहा था , "पिता जी सारा दीन सोई (signature)करता है ?"आपको याद आगया होग़ा. यदि नही तो   
    प्लीज़ पुराने ७ से ९ जुलाई २०१० ,तक के मेरे संदेश फिर पढ़ लीजियेगा.


    माँ के उस शाम के प्रवचन ने मुझे विश्वास दिला दिया क़ी  माँ अपूर्व /दिव्य शक्तियों से भरपूर हैं , माँ त्रिकाल दर्शिनी हैं साधकों उपासकों सेवकों और वास्तविक भक्तों के प्रॉब्लम ,उनके प्रश्न / उनकी चिंता के विषय और उनके  कारण,तथा समाधान की विधी ,माँ सब कुछ बिना पूछे ही जान लेती हैं. आपने देखा ही कैसे जब ह्म पंडाल में घुस तक नहीं पा रहे थे श्री माँ ने हमे अपने पास बुला कर इतने निकट बैठा लिया और कितनी लगन से और  मन लगाकर उन्होंने ह्मारे भजन कीर्तन सुने (केवल सुने ही नहीं वरन ह्मारे स्वर में स्वर मिला कर ह्मारे साथ साथ गाये भी -जैसा अनेक  प्रत्यक्ष दर्शियों ने हमे बाद में बताया ) जितनी देर ह्म वहाँ बैठे रहे माँ के स्नेहिल आशीर्वाद की अमृत वर्षा ह्म पर होती रही.


    कार्यक्रम के समापन पर एलान हुआ क़ी अगले दिन वृन्दाबन के गोस्वामी जी की पार्टी रास लीला प्रस्तुत करेगी. ह्म ने मन बना लिया क़ी ह्म सब अगले दिन भी वहाँ जायेंगे.रास लीला के बहाने एक बार फिर माँ का दर्शन होग़ा सबसे बड़ी लालच यह थी..प्रियजन, अभी इतना ही ,कल का हाल कल बताउंगा . फ़िलहाल राम राम..


    निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

    गुरुवार, 22 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ  जय माँ
    श्री श्री माँ  आनंदमयी की कृपा 

    श्री माँ के लिए सभी पुरुष "पिताजी" ,सब स्त्रियाँ "देवी माँ"सदृश्य और बाल वृन्द "कन्हैया  के गोप - गोपी मंडल " के सदस्य थे. स्वयम उनका निजी अहम् उनके शैशव से ही शून्य हो गया था. उन्होंने अपनी काया को आजीवन "मैं" की संज्ञा नहीं दी. उन्होंने "मैं और मेरा" जाना ही नहीं. बंगला भाषा में जिन्हें  "आमी आर आमार" कहते हैं , उसके लिए वह कहतीं थीं, "आमार" में से "आ" निकाल लें  और फिर जो बचा - क्या ? "मार",बस  वह ही हमारा तुम्हारा है. बंगला में "मार"  शब्द का अर्थ है "माँ का" .इस कथन से माँ समझातीं थीं क़ी संसार में जो कुछ भी है वह सब उस " परमेश्वरी, जग जननी माँ " का है ,तुम्हारा कुछ भी नही है फिर क्यों मेरा तेरा के चक्कर में पड़े हो.?"

    याद आया ,उस शाम माँ के आगे हमने ,संत कबीरदासजी की ,पारम्परिक शैली क़ी एक रचना प्रस्तुत की थी.

    हरि बिनु तेरो ,मेरे मनुआ, अपना कोई नही 
    महल बनायो ,किला बनायो,तू कहे घर मेरा ,
    पर ये तन भी तेरा नाही , चार दिनों का डेरा रे .  अपना कोई नहीं ..

    श्री श्री माँ कहतीं थीं .

    संसारिकता में लिप्त साधारण मानव जो कर्म करता है ,अधिकतर वह निज स्वार्थ सिद्धि जैसे -नाम,धन,धाम कमाने के लिए होता है .ऐसे कर्म मनुष्यों की निजी इच्छा से होते हैं.और उनकी चेष्टाओं के अनुरूप उनको सफलता अथवा असफलता मिलती रहती है 

    शरणागत मनुष्यों को कर्म की प्रेरणा प्रभु स्वयम देता है. परमपिता परमात्मा स्वयम एक अदृश्य प्रेरणा-शक्ति स्रोत बन कर  उस कार्य के शुभारम्भ से समापन तक ,उस व्यक्ति का हाथ थामे उसका कार्य करवाता रहता है और अंततः उसे सफल बना देता है. पर प्रभु से 
    सहयोग पाने के इच्छुक व्यक्ति को एक पल के लिए भी उस अदृश्य प्रेरणा,बुद्धि, शक्ति प्रदायक श्रोत (सर्व शक्ति सम्पन्न परमात्मा )की सुधि नहीं बिसरानी चाहिए.अपना कार्य करते समय उसे मन ही मन अपने इष्ट का सिमरन करते रहना चाहिए .हाथ काम करे 
    पर मन में प्रार्थना चलती रहे.

    राम अपनी कृपा से हमे शक्ति दो,
    राम अपनी कृपा से हमे भक्ति दो ,
    नाम जपता रहूं ,काम करता रहूँ 
    तन से सेवा करूं मन से सय्य्म करूं 
    नाम जपता रहूँ काम करता रहूँ 
    श्री राम  जय राम जय जय राम

    निवेदक:
    व्ही , एन, श्रीवास्तव "भोला" 

      

    मंगलवार, 20 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ  जय माँ 

    माँ आनंदमयी की कृपा  

    लगभग आधे घंटे की (होई-चोई)-,धूम -धडाके दार (होरी)-हरिकीर्तन रुकने पर  एक अनोखी निश्त्ब्धता पूरे पंडाल में छा गयी.करीबन मिनिट भर के लिए जैसे सब कुछ थम गया .ऎसी नीरवता कि यदि सुई गिरती तो उसकी आवाज़ भी  सुनाई पड़ जाती.


    सब स्तब्ध थे.ह्म माँ के सबसे करीब,ठीक उनके सामने बैठे थे.ह्मारे और उनके बीच पुष्पों ,अगर बत्तियों और धूप की पवित्र सुगन्धि से भरे सूक्ष्म  वायुमंडल के अतिरिक्त और कुछ भी नही था. माँ की  पतितपावनी  विग्रह से प्रसारित हो रहीं उनकी परमानन्द दायिनी ऊर्जा ,अछूती ,सीधे  मुझे  सिर से  पाँव तक रोमांचित कर रही थी.  सर्वत्र शांति ही शांति थी.आनंद ही आनंद था.


    थोड़ी देर में एक हल्की सी आवाज़ स्पीकर पर सुनाई पड़ी "हे राम" .ह्मारे कान खड़े हो गये..मेरी आँखे बंद थीं समझ न सका किसने लगाई यह प्रेम भरी गुहार ह्मारे इष्ट देव को.. चंद पल बाद सुनाई दिया एक अन्य अनूठा संबोधन "पिताजी..."(ह्मने  पहिले कभी माँ का प्रवचन नहीं सुना था इसलिए नहीं जानता था कि माँ अक्सर यह सम्बोधन पंडाल के सभी पुरुषों का ध्यान एकाग्र करने के लिए करतीं थीं). मैंने भी सुना "पिताजी" पर तब तक न मेरी आँखे खुलीं  थीं ,न मेरा द्रवीभूत हृदय ही स्थिर हो पाया था अस्तु समझ न पाया कि कौन बोल रहा है ..पर एकाग्रता से सुनता रहा .कुछ पलों में जान गया कि जो मैंने सुनी वह श्री श्री माँ आनंदमयी की ही अमृतवाणी थी.आगे माँ बोलीं:


    "पिताजी ,आप सब बहुत बहुत दूर से यहाँ आये हैं.कितना कितना बस और  लोकल में धक्का खाकर यहाँ पहुंचे हैं. क्यों आये और कैसे आ पाए आप ?बोलून, पिताजी " कौन बोलता,माँ ने स्वयम ही अपने प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया.\
    "पिताजी, कोई भी कार्य भलीभांति सम्पन्न करने के लिए कर्ता को ये तीन बातों का ध्यान रखना है ,जैसा आपने भी किया होग़ा . "प्रथम-आपने यहाँ आने का दृढ़ निश्चय किया होग़ा . दूसरा आप  निकल पड़े होंगे और तीसरी सबसे  विशेष क्रिया जो आपने की होगी  यह कि अपने आपको पूर्णतः अपने भगवान को समर्पित कर दिया होग़ा .इस प्रकार  (1.Determination ,2.Action ,3.Surrender ) आपकी इन  तीनों क्रियाओं ने आपको यहाँ पहुंचा दिया.यदि आप इन तीनो मे से एक क्रिया  भी ठीक से नहीं करते तो आप यहाँ तक नहीं पहुँच पाते."
    क्रमशः 
    निवेदक : व्ही. एन,  श्रीवास्तव "भोला"
    .
               

    सोमवार, 19 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ  जय माँ 

    माँ आनंदमयी की कृपा 

    हमारे ग्रुप में ४ वर्ष की सरगम से लेकर ४५ वर्ष का मैं था.आज ३५ वर्ष बाद कोई आश्चर्य नहीं क़ी ह्म में से किसी को भी याद नहीं है क़ी उन ४०-४५ मिनिटों में ,जब ह्म भजन गा रहे थे तब ह्मारे आमने सामने या आगे पीछे क्या हो रहा था .अतीत के धूमिल पृष्ठ पलट कर देखता हूँ.

    अपनी भजनान्जिली अर्पित करने  से पूर्व हमने केवल इतना ही देखा था : 


    अति सुगंधमय उज्ज्वल पुष्पों से सुसज्जित उच्च सिंघासन पर बिराजीं ,दूध से भी धवल परिधान धारण किये श्री श्री माँ का दिव्य विग्रह.माँ की मुस्कुराती हुई मनमोहिनी छवि.और सोने के फ्रेम में से ,ज्योति शिखा सी दमकतीं कृपा लुटाती उनकी दो बड़ी बड़ी आँखें तथा श्री माँ की वह नजर जो जिधर घूमतीं उधर प्रेमामृत की बौछार हो जाती. हमारे जीवन का यह पहला अवसर था जब ह्म किसी ऎसी सिद्ध विभूति को इतने निकट से देख पा रहे थे. ह्म रोमांचित थे, हमे एक अति विशेष आत्मिक आनंद का रसास्वादन हो रहा था.


    ह्म एक के बाद एक ,मात्रु वन्दन के पद गा रहे थे. अगला  पद हमारी छोटी बहन मधू चंद्रा ने शुरू किया. .धीरे धीरे ह्म सब और ह्मारे साथ साथ पूरा पंडाल ही गा उठा

    जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय!
    भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी ..

    तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
    सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी ..

    आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
    अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी ..

    अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
    कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी ..

    तू विधि वधू, रमा तू , उमा महामाया।
    मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी ..

    जग जननी जय जय ,माँ जग जननी जय जय



    प्रियजन. ह्म सब गा रहे थे .सारा पंडाल माँ की जयकार से गूँज रहा था .जैसा बता  चुका हूँ,मेरी आँखें बंद थीं,बंद ही रहीं जब तक माँ बोलीं नहीं.


    अभी अनेक भजन हैं जो हमने उस शाम गाये थे लेकिन मैं आपको सब नहीं सुना रहा हूँ .आपकी तरह मैं भी बेताब हूँ माँ का अमोलक प्रवचन सुनने सुनाने को, कल कहूंगा.



    निवेदक:: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"

    रविवार, 18 जुलाई 2010

    JAI MAA JAI MAA

    जय माँ , जय माँ 
    माँ आनंदमयी की कृपा 


    प्रियजन, मैं जो भी बयान कर रहा हूँ वह केवल इस मकसद से क़ी मैं आपको उस महान जादूगर के अप्रत्याशित करतब का एक छोटा सा नमूना दिखा सकूँ .


    कहाँ हमे पंडाल में प्रवेश नहीं मिल रहा था और कहाँ माँ के अति निकट उनसे केवल दो गज की दूरी पर,बिलकुल उनके सामने बैठने का अवसर मिल जाना.क्या यह किसी अजूबे से कम है?आप ही देखें,कैसे ह्मारे प्यारे प्रभु ने ह्म जैसे नगण्य व्यक्तियों को श्री श्री माँ आनंदमयी के दिव्य विग्रह का ऐसा भव्य दर्शन इतने पास से संभव करा दिया. प्रियजन  तुलसी ने कितना सच कहा है:


    "कोमल चित अति दीन दयाला , कारण बिनु रघुनाथ कृपाला."


    कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ हुआ,हमे माँ के सन्मुख भजन सुनाने का आदेश हुआ.समय दिया गया पन्द्रह  मिनिट का .हमने प्रारंभ किया देवी माता की अति प्रसिद्द प्राचीन वन्दना से.


    सर्व मंगल मान्गालाये शिवे सर्वार्थ साधिके 
    शरण्ये त्रेम्बिकेगौरी नारायणी नमोस्तुते


    और उसके बाद ह्म सबने गाया हरि ॐ शरण जी का अति लोकप्रिय भजन :
    जगदम्बिके जय जय जग जननी माँ  क्या मनहर नाम सुहाया है 
    वारूँ सब कुछ माँ चरणों पर , मेरे मन को यह भाया  है.....
    जगदम्बिके ..जय माँ.....
    श्री राम तुही श्री कृष्ण तुही दुर्गा काली श्री राधा तू ,
    ब्रम्हा बिष्णू शिव शंकर में तेरा ही तेज समाया है.......
    जगदम्बिके....जय माँ .....


    जय माँ ,जय माँ ,जय माँ ,जय माँ ................................................
    और फिर न जाने कितनी देर तक जय माँ जय माँ की धुन माँ के पंडाल में गूंजती रही.जब ह्म रुक जाते इधर उधर से फिर वही जय माँ जय माँ की धुन उठ आती और उसके रुकने से पहले फिर कोई धीरे से कहता " प्लीज़ रुकिए नहीं,गाते रहिये  "हमारी मंडली से कोई एक हमारा नया भजन शुरू कर देता. यही क्रम चलता रहा,.


    केवल इतना ही नही आगे बहुत कुछ हुआ जिसकी कथा फिर कभी जब भी  प्रभु की आज्ञा होगी सुनाऊंगा. भाई अब वादा नही करूँगा. वादा तोड़ना बुरी बात है ,लेकिन कभी कभी वादे टूट ही जाते हैं .कल की ही लें ,बहुत चाह कर भी सन्देश नही भेज पाया.ऊपर वाले की मर्ज़ी नही थी.मैं क्या करता..


    निवेदक : व्ही  एन  श्रीवास्तव "भोला"