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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

पाठकों के नाम खुला पत्र # 3 4 8

एक सूचना 
इस ब्लॉग के पहले वाले ब्लॉग के प्रेषक अतुल जी ने जिन्हें "बाबू" कहकर संबोधित किया है वह  ग्वालियर के श्री जगन्नाथ प्रसाद जी ,स्वामी जी महराज के एक अतिशय प्रिय शिष्य 
और मेरी धर्म पत्नी कृष्णा जी के बड़े भाई थे ! १९५९  में इन्होने ही पहली बार 
मुझे स्वामी जी से मिलवाया था और मुझे उनसे "नाम" दिलवाया था ! 
"भोला"
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इस ब्लॉग की प्रथम वर्षगांठ पर 
पाठकों के  नाम  एक  खुला  पत्र
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किसी महापुरुष के प्रवचन में सुना कि "आज के मानव को,उसकी व्यस्त जीवनशैली के कारण विधिवत पूर्ण औपचारिकता के साथ ईश्वर की उपासना कर पाने का अवकाश ही नहीं मिलता, अपनी इस असमर्थता के कारण ऐसे लोगों को निराश हो कर बैठ जाने के बजाय साधना का यह सरलतम साधन अपना लेना चाहिए "!

महापुरुष ने आगे बताया कि  "प्रातः निंद्रा से उठते ही बिस्तर पर बैठे बैठे ही सर्व प्रथम अति प्रेम से अपने इष्ट देव का सिमरन चिन्तन करे ! अपने इष्ट देव को अपनी सारी उपलब्धियों, सफलताओं ,खुशियों की प्राप्ति में मददगार बनने के लिए ,उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आंसुओं से भरे नैनों और गदगद कंठ से उन्हें हार्दिक धन्यवाद दे ! करुणानिधान प्रभु इतने से ही प्रसन्न हो जायेंगे "!

इस सन्दर्भ में लीजिये मैं सबसे पहले अपनी ही प्रातःकालीन प्रार्थना आपको सुना दूं !इसके भाव तो नित्य एक ही होते हैं केवल शब्द बदलते रहते हैं !आज की शब्दावली इस प्रकार बन रही है  :


धन्यवाद  तेरा  प्रभु  तू  दाता सुख भोग 
जीवन की सब सफलता आनन्द के संयोग

जो कुछ मेरे पास है ,तेरा ही है दान
मैं इठलाता फिर रहा सब कुछ अपना मान

अर्पण करने को नहीं कुछ भी मेरे पास
खाली हाथ खडा यहाँ  ले दरसन की आस 

हर लो मेरा अहम् औ मेरे सभी विकार
भेंट समझ मेरी इसे, करलो प्रभु स्वीकार

धन्यवाद बस धन्यवाद बस धन्यवाद का गान  
मेरी पूजा मान कर , स्वीकारो भगवान  

"भोला"

प्रिय पाठकगण ,संदेशों का यह क्रम प्रारंभ करते समय मैंने स्पष्ट किया था कि 'स्वान्तः सुखाय" तथा सर्वथा निज स्वार्थ सिद्धि की लालसा से प्रेरित होकर मैं यह कार्य राम काज मान कर प्रारंभ कर रहा हूँ !

प्रियवर राजीव कुलश्रेष्ट जी , श्री भूपेंदर सिंह जी, श्री गोरख नाथ शाव जी श्री  चैतन्य शर्मा जी,"सारासच" जी ,Patali-the Village ji , तथा सुश्री  दिव्या जी  (ZEAL) , सुश्री शालिनी  जी, शिखा जी , संगीता स्वरूप जी --पिछले एक वर्ष में मैंने कितनी बार यह लेखन बंद करने पर विचार किया पर आपने मुझे रोक दिया! आप के प्रोत्साहन ने मुझे अपना यह विशेष "राम काम" करते रहने की प्रेरणा दी ! मेरी साधना चलती रही , मेरी उपासना होती रही !  मैं आपका कितना आभारी हूँ , कह नहीं सकता ! पर मुझे अटपटा लगता है ,आप में से कोई मुझे धन्यवाद देता है या कोई आभार प्रगट करता है मेरे इन आलेखों के लिए !

मेरे विचार में हम सबके धन्यवाद के पात्र तो हमारे प्यारे प्रभु "श्रीराम" हैं  जिन्होंने २००८ में मुझे जीवन दान देकर आदेश दिया था कि मैं अपनी और "उनकी " घनिष्ठ -परस्पर प्रीति के विषय में मुखर हो कर अपने अनुभवों को शब्द, सन्देश ,कविता, एवं स्वर संगीत (गायन) में परिणित करके "आत्म कथा" के रूप में संसार के समक्ष रखूँ !

प्रियजन, वास्तव में यह ब्लॉग लिख कर और उनमे अपनी भक्तिमय  रचनाएँ स्वयम गाकर  मैं "अपने इष्ट" के आदेश का पालन कर रहा हूँ !  मुझे उनका हुकुम बजाने में बहुत आनंद भी आरहा है !जितनी देर सन्देश लिखता हूँ मेरा  "हरि सुमिरन" और "नाम जाप" चलता ही रहता है ,और समापन के बाद भी  "नाम - खुमारी" टूटती नहीं !  इस शुभ विचार से कि मेरे सभी प्यारे प्यारे पाठक इस का पाठ करके अपने अपने इष्ट देवों को याद कर रहे होंगे ,मेरी खुमारी और बढ़ जाती है और मुझे  देर तक परमानंद का अनुभव होता रहता है ! 

इसलिए अपने सभी स्नेही स्वजन पाठकगण से मेरा करबद्ध निवेदन है कि आप मेरे  इन संदेशों में केवल अपने अपने इष्ट देवों का वैभव ,उनका सौन्दर्य और उनकी प्रतिभा के दर्शन करें ! उनका कृपा प्रसाद मान कर इनमें निहित दैविक आनंद ग्रहण करें ! आपको आपके "इष्ट" से मिला कर मैं पुण्य का भागी बन जाऊ , यह मेरा स्वार्थ है !

हाँ , लेकिन मुझे भुलाएँ नहीं ! हो सकता है कभी अहंकार के वशीभूत हो, मैं कुछ अनाप
शनाप लिख दूं ! प्रियजन निःसंकोच तत्काल मेरी भूल  मुझे बताइएगा !

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

श्री राम जन्मोत्सव # 3 4 5


श्री राम जन्मोत्सव 


प्रियजन ,महापुरुषों का कहना है कि केवल त्रेता युग में ही नही वरन ,प्रत्येक मन्वन्तर में  प्रत्येक युग में , प्रति दिवस ही ,जहाँ जहाँ "ब्रह्म राम" का चिन्तन, ध्यान, भजन कीर्तन सिमरन और विशेषत: उनके मधुर स्वभाव एवं सद्गुणों का "अनुकरण " होता  है वहां पर अनवरत "श्रीराम" का अवतरण होता रहता है !

महापुरुषों के अनुसार त्रेता युग में अवतरित " दशरथ नंदन राम "  मानव स्वरूप में धरती पर पधार कर मानवता को सुखी और सार्थक जीवन जीने के लिए उच्च मर्यादाएं प्रदर्शित करके "स्वधाम" चले गये ! आज कलिकाल में हम सब उन्हें पुनः वापस नहीं बुला सकते ! कलिकाल में हमे अपना "राम" स्वयम अपने आप में और अपने साथ इस धरती पर आये  उन सभी जीवात्माओं में खोजना है जो हमारे पूर्व जन्मों से सम्बंधित संस्कारों तथा कर्मो के फल स्वरूप इस जीवन में भी हमारे माता पिता गुरुजन , मित्र , मालिक , नौकर आदि   सम्बन्धियों  के रूप में हमारा साथ निभा रहे हैं ! प्रियजन हमे इनमे ही अपने " राम"  को पाना है ! तुलसी के शब्दों में वह राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी , सर्व रहित सब उर पुर बासी है ! 

"वह" अनामी "परात्पर ब्रह्म" सर्वव्यापक है , चिन्मय है , अविनाशी है , सर्व रहित भी है और सब के उर पुर में निवास भी करता है ! उसकी कोई सीमा नहीं हैं और वह सब में रमा हुआ है और सर्वत्र व्याप्त भी है ! प्रियजन, "वह" केवल हम सब का ही नहीं है ,वह सम्पूर्ण मानवता को उपलब्ध है और वह सबमें ही व्याप्त भी है ! वह  इस्लाम धर्म के अल्लाह में उनके मोहम्मद साहेब और सभी  पीर-पैगम्बरों में भी है और ईसाइयों  के "GOD' ,HOLY FATHER ? SPIRIT" ,स्वयम ईसामसीह और उनके अन्य सभी मसीहों में भी उतना ही है जितना हमारे इष्ट देव में है ! 

"वह"  विश्व के सभी धर्मों-मतों के "इष्ट" और उन धर्मों के संस्थापक तथा प्रचारक गणों में भी है तथा उनके लिए भी उतना ही  महत्वपूर्ण हैं जितना हमारे "राम" हमारे लिए हैं ! इन सभी दिव्य विभूतियों के जीवन के मूल्य तथा उनके सदगुण , उनके कर्म ,उनके आचार व्यवहार ,उनका शील स्वाभाव उनका चिन्तन उनके विचार सभी "आदर्श" हैं और मानव के समग्र उत्थान हेतु सक्षम व समर्थ हैं अत: सम्पूर्ण मानवता से वन्दनीय हैं और सर्वथा अनुकरणीय है ! 

उपरोक्त मान्यताओं के अनुसार सच पूछो तो इस  धरती पर जन्मे हम सब इन्सान चाहे हिन्दू हों या ईसाई या मुस्लमान एक एक जीवात्मा  उतना  ही सक्षम हैं जितने हमारे "राम" तथा हमारे अन्य देवी देवता  और दूसरे धर्मावलम्बियों के पीर पैगम्बर "अल्लाह"  "खुदा" या "गोड" हैं ! श्री मद भगवत  गीता में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा ही  है कि :

ईश्वर सर्व भूतानाम  हृद्येशे अर्जुन तिस्थ्ती 

ईश्वर सब भूत प्राणियों के हृदय में विराजमान है ! प्रियजन , सो तो है ही , "वह" मुझमे है और आपमें भी है ! "वह" उनमे भी है जिन्हें हम अपने से अलग जानते हैं ! अस्तु  मेरे प्यारे पाठकगण अपने अपने गुरुजनों एवं धार्मिक महात्माओं और  महापुरुषों की बात मानो -- शरमाओ नहीं "प्यार करो" केवल कहने को नहीं बल्कि वास्तव में "प्यार करो" ! दोनों हाथों से अपना निश्छल प्यार जहाँ जहाँ तक हो सके ,दूर दूर तक लुटाओ उसी प्रकार  जैसे राजा दसरथ ने राम जन्म पर अयोध्या में लुटाया था ! राजा दसरथ को "राम रतन धन" मिला था , और उन्होंने रतन लुटाये थे ! हमारे गुरुजन ने हमे "राम नाम" की निधि दी है ,चलिए हम वही लुटाएं और अपनी राम नवमी मनाएं !,   

इस आलेख के पीछे वाले ब्लॉग में मैं अपनी एक रचना "पायो निधि राम नाम " स्वयम गाकर अपने आनंदोदगार व्यक्त कर रहा हूँ ! मैं राम नवमी के दिन ही इसे आपकी सेवा में प्रेषित करने का प्रयास कर रहा था ,असफल रहा ! हमारी बड़ी बेटी श्री देवी ने ( जिसके सहयोग से मैंने यह ब्लॉग लेखन शुरू किया था ) उसने मद्रास (भारत) से इस भजन का  विडिओ क्लिप मेरे ब्लॉग में जोड़ दिया है ! हम अति आभारी हैं उसके ! 

प्रियजन,वह क्लिप देखियेगा अवश्य ! ( ब्लॉग पढ़ कर उसके नीचे "पुरानी पोस्ट"  पर क्लिक करियेगा )

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निवेदन : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती श्रीदेवी कुमार 
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गुरुवार, 31 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 4


अनुभवों का रोजनामचा 

संत शिरोमणि - परम हनुमंत भक्त - बीसवीं शताब्दी में श्री हनुमान जी के अवतार  
                                                    
नीम करौली बाबा 

परम प्रिय पाठकगण , हम सब ही अपने जीवन में पल पल प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा के अनूठे अनुभव करते रहते हैं ! कठिनाई यह है कि हम अपने प्रिय लगने वाले अनुभवों का कारण और कर्ता ,स्वयम अपने आप को मान बैठते हैं और  उस प्रिय उपलब्धि के लिए किसी के प्रति आभार व्यक्त करना तो दूर रहा हम उसके लिए अपने प्यारे प्रभु को भी धन्यवाद  नहीं देते हैं ! दूसरी ओर जीवन में घटने वाली प्रत्येक अप्रिय घटना को प्रभु द्वारा किया अन्याय समझकर हम  अक्सर उस परम कृपालु प्रभु को बुरा भला ही कहते रहते हैं ! 

हमारे बाबा नीम करौली ने बड़े बड़े चमत्कारी कृत्य किये ,जिनके कारण विश्व के जाने माने मनीषियों और हनुमत - भक्तों नें उन्हें बीसवीं सदी के साक्षात् श्री हनुमान जी का अवतार तक घोषित कर दिया ! सत्य तो यह है कि अपनी रहनी करनी में बाबा ने कहीं भी स्वयम को कर्ता  नहीं माना और न जनता -जनार्दन को मानने दिया ! वह जब तलक इस धरती पर बिचरे  एक अति साधारण जीव के समान अपने "परम इष्ट" (  हनुमान जी के भी इष्ट ) "श्री राम" जी को ही सिमरते रहे और जिज्ञासु जनसाधारण से भी केवल "राम नाम" का ही सिमरन , ध्यान और जाप करवाया ! हनुमानजी की भंति ही तन्मय हो कर राम धुन के प्रेमोन्माद में रम कर नाचते गाते रहे !प्रियजन , हनुमान जी के समान ही सिया राम की जोड़ी हृदय सिंहासन  पर बैठाए वह हर घड़ी "राम नाम का जाप" किया करते थे ! 

राम दुवारे  तुम  रखवारे , होत  न  आज्ञा  बिनु  पैसारे
सब सुख लहें तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना 

गोस्वामी तुलसीदास के उपरोक्त कथन को सत्य करते हुए बाबा ने ,हनुमानजी की तरह  सब आर्त जनों के काम बनाये ,पर कभी भी यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह उपकार या कृपा उन्होंने की !उन्होंने कभी भी अपने को कर्तानहीं माना !  उन्होंने पेशकार के समान  सब दुखियों की अर्जियां "श्री राम" दरबार में पेश कीं ! अर्जियों पर निर्णय और कार्यवाही श्री राम जी के इच्छानुसार ही होती थी! उनके ऐसे कृत्यों से इस कथन की पुष्टि हुई कि वह सचमुच इस युग के साक्षात श्री हनुमान जी के अवतार थे ! उपरोक्त विधि से बाबा की कृपा से उन सभी व्यक्तियों का कल्याण हुआ जो कभी भी उनके सम्पर्क में आये !

प्रियजन ,  मैं भारत के उसी क्षेत्र (यू पी) का हूँ जो बाबा की प्रमुख लीला स्थली है जहाँ पर बाबा का जन्म हुआ और जहाँ वह समाधिस्थ हुए ! इस क्षेत्र में बाबाजी की प्रेरणा और आशीर्वाद से हनुमानजी के अनेक अतिभव्य मन्दिर निर्मित हुए ! हमारे कानपूर में भी बाबा द्वारा एक विशाल हनुमान मंदिर का निर्माण हुआ ! सुना है बाबा ने स्वयम उसका  उद्घाटन किया और उसके बाद हजारों कानपुर वासियों के साथ बैठ कर प्रसाद पाया ! उस विशेष दिन जो कुछ भी  हुआ वह एक दिव्य चमत्कार था ! उस चमत्कार की कथा,जो मैंने सुनी आपको सुनाने जा रहा हूँ !

जब कानपूर के मन्दिर का उदघाटन होने को था बाबा उन दिनों प्रयाग (इलाहबाद) में थे ! बाबा के साथ के लोगों ने बाबा को याद दिलाया कि उन्हें कानपूर में मन्दिर का उदघाटन करना है और वहां के भक्त उत्सुकता से बाबा की प्रतीक्षा कर रहे होंगे ! अस्तु उन्हें वहां जाना चाहिए ! बाबा उनकी बात अनसुनी कर के भीतर के कमरे में जा कर लेट गये ! लोगों ने उन्हें कुछ देर बाद उसी  कमरे में कम्बल ओढ़े गहरी नींद में सोये हुए देखा ! उस दिन सुबह से देर रात तक वह चौकी से उठे ही नहीं ! सारे दिन रात उन्होंने कुछ खाया पिया नहीं ! थक हार कर लोगों ने यह सोच कर कि शायद बाबा अस्वस्थ हैं उसके बाद बाबा से कुछ कहा भी नहीं !

अगले दिन कानपूर से एक जीप पर बड़े बड़े बर्तनों में भर कर उद्घाटन का प्रसाद ले कर कानपूर के कुछ भक्त आये ! उन्होंने आते ही पूछा " बाबा आ गये न ? कल उदघाटन के बाद बाबा वहां रुके नहीं, जल्दी में लौट आये थे ! हमें आदेश दे आये थे कि इलाहबाद वालों के लिए "प्रसाद" हम आज पहुंचवा दें ! सो हम आप सब के लिए प्रसाद ले आये हैं ! कहाँ हैं बाबा ?" ! इलाहाबाद के भक्त आश्चर्य चकित थे ! बाबा ने इलाहाबाद छोड़ा नहीं था , बाबा अपनी कोठरी से पूरे दिन पूरी रात निकले तक नहीं थे और कानपूर वाले कह रहे थे कि उन्होंने कल मंदिर का उद्घाटन किया था ,हज़ारों भक्तों के साथ पायत में बैठ कर लंगर खाया था ! वास्तव में ये दोनों बातें ही सत्य थीं ,बाबा एक ही समय में दोनों जगह मौजूद थे ! दोनों जगह के प्रत्यक्ष दर्शी बाबा के परम भक्त थे जिन्हें झुठलाना असंभव था !

एक साथ कई कई जगहों पर ,एक ही समय में मौजूद होना ,केवल वैसे असाधारण जीव ही कर सकते हैं जिन्हें आठ में से एक विशेष दिव्य सिद्धि प्राप्त होती है ! हमारे बाबा आठों  सिद्धियों के धनी थे ! जीवन भर उनके चमत्कारों द्वारा यह प्रदर्शित होता रहा ! एक बड़ा उपन्यास तैयार हो जायेगा यदि बाबा के सब चमत्कारों को अंकित किया जाये !

प्रियजन ! यह एक घटना मेरे अपने शहर कानपूर की थी इसलिए मेरे " प्रेरणास्रोत प्यारे प्रभु " ने मुझे पहिले उसकी ही याद दिलाई और मैंने आपको सुना भी दी ! अभी तो इसके अतिरिक्त और बहुत सी कहानियाँ याद आ रही हैं , देखिये "वह" कल क्या लिखवाते हैं !

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क्रमशः
निवेदक :- व्ही . एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 19 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 2

अनुभवों  का  रोजनामचा 

आत्म कथा  

जून १९४५ की लक्खंनवाल (गुजरात - अविभाजित पंजाब ) से कानपूर तक की यात्रा का विवरण चल रहा था ! कलकत्ते के "ब्लैक होल" से भी अधिक भयानक और वास्तविक  कालिमा भरे रेल के डिब्बे में मेरे साथ साथ जीवन की आखिरी सांस लेते सैकड़ों यात्रियों की दुर्दशा का हाल बता रहा था ! 


अपने ग्रुप में मैं उम्र में सबसे छोटा था !पहली बार अपने "भोजपुरी" परिवार  से इतनी दूर एक विशुद्ध पंजाबी-भिन्न भाषा, संस्कृति, रहन सहन और धार्मिक मान्यता वाले परिवार के साथ डेढ़ महीने की लम्बी यात्रा पर गया था !मेरे मित्र का तो पूरा परिवार उसके साथ था ,केवल मैं ही एक ऐसा था जो अपने परिजनों को दूर से ही प्रणाम कर इस असार संसार से विदा होने जा रहा था !


उस छोटी अवस्था में ( १५ वर्ष का था मैं तब ) मेरी कोई निजी पुण्य की कमाई होने का प्रश्न ही नहीं था ! उस समय तक अपनी एकमात्र सम्पत्ति थी माता पिता एवं पितामहों से विरासत में मिली उनकी पुन्यायी और उनके संस्कारों की धरोहर ! बचपन में 'भागवत' के एक प्रसंग में अम्मा से सुना था कि पान्डु पत्नी महारानी कुंती ने अपने भतीजे श्री कृष्ण से एक विचित्र "वर" माँगा था :" मुझे प्रति पल इतने कष्ट दो कि मैं 'तुम्हे' एक पल को भी भुला नहीं पाऊँ "! यहाँ रेल के डिब्बे में इतने कष्ट झेलते हुए हम 'उन्हें' कैसे भुला पाते ? परिवार की याद आते ही मेरे को अपने परिवार के 'इष्टदेव' श्री हनुमान जी महाराज की याद  का आ जाना स्वाभाविक ही था !


विक्रम बजरंगी महाबीर जी महराज जिनकी लाल ध्वजा पताका हमारे पैत्रक घर 'हरवंश भवन', बलिया के आँगन में आज भी लहराती है ,भला "उन्हें" कैसे भुलाता मैं ? हमारे पितामहों तथा पिता और हमारी पीढी के बड़े 'कजिन' इलाहबाद शाखा के बड़े भैया पर "उनके" द्वारा समय समय पर की हुई कृपा की कथाएं एक एक कर के याद आयीं ! 


कैसे साक्षात प्रगट होकर उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे एक परदादा जी का मार्ग दर्शन कर के उन्हें अन्याय से मृत्यु दंड पाने से बचा लिया ! एक दूसरे पितामह को "उन्होंने" उनके परलोक गमन की पूर्व सूचना देकर सावधान किया और "उनके" ही कथनानुसार हमारे उन दादा जी  ने श्री जगन्नाथ पुरी में त्रिमूर्ति के समक्ष ही प्राण त्यागा ! ( विस्तार से पितामहों की कथाएं पहले दे चुका हूँ इसलिए दुहराउंगा नहीं ! कृपया पिछले सन्देश पढ़लें )


रेल के डिब्बे में प्राण रक्षा की कोई सम्भावना ही नहीं थी ! हमारा दम घुट रहा था  किसी पल कुछ भी हो सकता था ! सभी यात्रिओं को अब एक मात्र ईश्वर का सहारा था !अपने अपने ढंग से अपने अपने इष्टदेव को सब ही याद कर रहे थे !मैंने भी अपने इष्ट देव को मनाने की प्रक्रिया चालू की ! मैंने मन ही मन कहा :


श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार 
वरनऊ रघुबर बिमल यश जो दायक फल चार 
बुद्ध हीन तन जान के सुमिरों पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार  

और फिर हनुमान चालीसा का पाठ चालू हो गया ! तब १५ वर्ष की अवस्था में मैंने  कैसा गाया था ,कह नहीं सकता ! लेकिन आज "उनकी" आज्ञा से  ८ २  वर्ष की अवस्था में मैं आपको सुनाने का प्रयास कर रहा हूँ ! आपके मन मन्दिर के इष्टदेव मेरी यह अर्जी सुनें और हम सब पर अपनी ऎसी ही कृपा दृष्टि सर्वदा बनाये रखें कि हम सब मिल जुल कर उनका सिमरन इसी प्रकार करते रहें !

  

प्यारे प्रभु प्रेमियों , अब थक गया हूँ !आज यहीं समाप्त करता हूँ ! कल फिर मिलूंगा यदि "उनकी"आज्ञा हुई !

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निवेदक: 
व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

हमारे गुरुजन # 3 0 5

हनुमत कृपा - अनुभव                                                                                (३०५)
                                                   Param Pujya Shree Swami Satyanand Ji Maharaj                       
साधक साधन साधिये   

                                                     साधना के पथ प्रदर्शक -                    
         "हमारे सदगुरु"
                         
                पिछले अंकों में मैंने आत्मकथा द्वारा अपने ऊपर हुई एक महत्वपूर्ण "गुरु कृपा"
               (उस्ताद जी की नजरे इनायत) का वर्णन किया !
              औपचारिक रीति से उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहेब मेरे पहले 'विद्या गुरु' थे !
               इसके बाद १९५९ में मेरे परम सौभाग्य से मुझे मेरे आध्यात्मिक -धर्मगुरु 
       श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के दर्शन हुए!

जीवन का एक एक पल  मानव को प्रभु की अहेतुकी कृपा का अनुभव कराता हैं ! इन्सान को आनंद ,विषाद, पीड़ा , व्यथा , सुख-दुःख के सभी अनुभव "हरि-इच्छा" से होते हैं ! पर साधारण मानव (जिन पर उनके दुर्भाग्यवश गुरुजन की कृपा दृष्टी  नहीं होती ) वे नाना प्रकार की भ्रांतियों में भटकते रहते हैं ! ऐसे प्राणी आनंद और सुख के अनुभव का श्रेय  तो  अपने आप को देते हैं पर अपनी पीड़ा दुःख और विषाद के लिए ईश्वर को दोषी ठहराते हैं !

मैंने पहले कहीं कहा  है , एक बार फिर कहने को जी कर रहा है की मनुष्य को मानवजन्म प्रदान कर धरती पर भेजता तो परमेश्वर है लेकिन उसको इन्सान बनाता है ,उसको मुक्ति मोक्ष का मार्ग दिखाता है उसका "सद्गुरु" ! और यह सद्गुरु भी उसे उसके परम सौभाग्य 
से एकमात्र उस परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है !

युवावस्था में लगभग २५ वर्ष की आयु में "स्वर द्वारा" 'ईश्वर सिमरन' करने की शिक्षा पा कर , प्रातः सायं के कंठ संगीत का रियाज़ करते समय  प्रत्येक "षड्ज" के उच्चारण में उस परम प्रभु परमेश्वर को पुकारते रहने का जो अभ्यास मुझे उन ५-७ वर्षों में हुआ , उसके  फल स्वरूप मैं रेडिओ आर्टिस्ट या फिल्मो में प्ले बेक सिंगर तो नहीं बन सका पर मुझे जो अन्य उत्कृष्ट उपलब्धि हुई वह अविस्मरणीय है ,उससे मेरा जीवन धन्य हो गया सच पूछो तो मेरा यह जन्म सार्थक हो गया !

वह उत्कृष्ट उपलब्धि थी "सद्गुरु दर्शन" एवं उनके "कृपा पात्र" बन पाने का सौभाग्य !

१९५६ में मेरा विवाह एक ऐसे नगर मे हुआ जिसके लगभग सभी  प्रतिष्ठित निवासी परम संत श्री स्वामी सत्यानंदजी महाराज के शिष्य थे तथा उनके परिवार के सभी व्यस्क जन महाराज जी से दीक्षित थे तथा "राम नाम" के उपासक थे !मेरा परम सौभाग्य था यह !

                      भ्रम  भूल   में   भटकते  उदय  हुए  जब  भाग ! 
                      मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग!!

स्वामी सत्यानन्द जी उस युग के महानतम धर्मवेत्ताओं में से एक थे ! लगभग ६५ वर्षों तक जैन धर्म तथा आर्य समाज से सघन सम्बन्ध रखने पर भी जब उन्हें उस आनंद का अनुभव नहीं हुआ जो परमेश्वर मिलन से होना चाहिए तो उन्होंने इन दोनों मतों के प्रमुख प्रचारक बने रहना निरर्थक जाना और १९२५ में हिमालय की सुरम्य एकांत गोद में उस निराकार ब्रह्म की (जिसकी महिमा वह आर्य समाज के प्रचार मंचों पर लगभग ३० वर्षों से अथक गाते रहे थे)  इतनी सघन उपासना की कि वह निर्गुण "ब्रह्म" स्वमेव उनके सन्मुख "नाद" स्वरूप में प्रगट हुआ और उसने स्वामीजी को " परम तेजोमय , प्रकाश रूप , ज्योतिर्मय,परमज्ञानानंद स्वरूप , देवाधिदेव श्री "राम नाम" के महिमा गान एवं एक मात्र उस "राम नाम" के प्रचार प्रसार में लग जाने  की दिव्य प्रेरणा दी "

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शेष अगले अंक में
निवेदक:   व्ही . एन . श्रीवास्तव  "भोला"
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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

साधन-भजन कीर्तन # 2 9 8

हनुमत कृपा -अनुभव                                                          साधक साधन साधिये

साधन-भजन कीर्तन                                                                              ( २ ९ ८ )

भक्ति संगीत (भजन) का प्रभाव

संगीत मार्तण्ड पन्डित ओमकारनाथ जी हमारे बी.एच .यू. के संगीत महाविद्यालय के संस्थापक और प्रथम प्राचार्य थे ! उन्होंने महामना मालवीय जी की मन्त्रणा से भारतीय शाश्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार हेतु इस विद्यालय की स्थापना करवायी थी !

यह उनके दिव्य ( जी हाँ दिव्य ) संगीत का आकर्षण था जिसने सैकड़ों संगीत प्रेमियों को ,विश्वविद्यालय के रुरिया  हॉस्टल के सामने वाले  घास के मैदान में, बिना किसी तम्बू-कनात के , डायरेक्ट "नीले गगन के तले ,तारों की छैयां में " शीतकाल की शीतल ओस में भींगते हुए,बिना किसी शिकवा शिकायत के सारी रात बिठाये रखा !

मेरे जीवन का यह पहिला अवसर था जब मुझे ऐसे दिव्य गायक के इतने निकट बैठकर   उनका संगीत सुनने का सुअवसर मिला ! पंडित जी के गायन में जो एक प्रमुख विशेषता मुझे उस समय लगी , वह यह थी की वह कोई भी गायन (ख्याल - भजन कुछ भी ) शुरू  करने के पूर्व कुछ समय को आँखें बंद कर के "ध्यान" लगाते थे और जो पहिली ध्वनी उनके कंठ से निकलती थी वह प्रनवाक्ष्रर "ॐ" जैसी थी ! गुरु से प्राप्त "मन्त्र" के समान मेरे जहन में उसी   समय यह बात बस गयी कि अपना कार्यक्रम प्रारम्भ करने से पहले हर गायक को अपने "इष्ट"का सिमरन अवश्य कर लेना चाहिए !

प्रियजन ! मेरा ये "ओब्ज़रवेशन" १९४७-४८ का है ! मैंने उस समय तक इतने निकट से  किसी अन्य विख्यात संगीतग्य को गाते हुए नहीं देखा था ! हो सकता है की उस जमाने में  अन्य गायक भी ऐसा करते रहे होंगे !

सुगम संगीत तथा काव्य में मेरी रूचि के कारण आकाशवाणी से सम्बन्धित हो जाने पर मुझे ,१९४७ से आज २०११ के बीच , ६४-६५ वर्षों में भारत के अन्य बड़े बड़े संगीतज्ञों से मिलने का मौका मिला !और मैंने देखा कि एक तरह से सभी स्वर-संयोजक , गायक , वादक अपना प्रोग्राम शुरू करने से पहिले "स्टेज" को सर नवाते हैं और  श्रद्धा से अपनीं आँखें मूँदकर अपने ईश्वर-खुदा को याद करते हैं !

अत्यंत निकट से, परिवार के माहौल में घर पर ही मुझे नौशाद साहेब , पंडित जसराज जी, गुलाम मुस्तफा साहेब, मुकेशजी,कविता कृष्णमूर्ति जी,हरिओम शरणजी, वाणी जयराम जी तथा पंकज उदास जीआदि अनेक जाने माने संगीतज्ञों से मिलने का अवसर मिला !मैंने इन सभी प्रतिष्ठित संगीतज्ञों को कार्यक्रम के पहिले अपने इष्ट को उसी भाव से याद करते हुए पाया ! संगीत उनके इबादत ,उनकी साधना का प्रमुख साधन है !

उतनी सघन साधना के साथ प्रस्तुत संगीत क्यों नहीं हृदय छुएगा , क्यों नहीं सुनने वालों की आँखों को नम करेगा ?, क्यों नहीं उनके रोम रोम को झंकृत कर देगा ?

प्रियजन, विश्वास करिये श्रोताओं को ऐसा भक्ति संगीत सुनकर अवश्य ही उनके अपने "इष्ट" का प्रत्यक्ष दर्शन हो जायेगा !

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निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

साधन- भजन कीर्तन # 2 8 8

हनुमत कृपा - अनुभव                                                 साधक साधन साधिये 

साधन- भजन कीर्तन                                                                       (२ ८ ८)

रामचरित मानस के उस अंश का भावार्थ ह्म दोनों को समझाते हुए बड़े भैया ने बताया कि ,दशरथनंदन श्रीराम के इस प्रश्न पर कि  बनवास की अवधि में रहने के लिए वह  किस स्थान पर  अपनी कुटिया बनाएं  , बाल्मीकि ऋषि  ने  कहा  :

" हे राम ! जो साधक अपने गुरु से प्राप्त महामंत्र  का जाप नियमित रूप से ,नित्यप्रति  करते हैं , जो  सपरिवार अति श्रृद्धा -भक्ति से  अपने "इष्टदेव" का सिमरन, अर्चन वन्दन पूजन , नामजाप , भजन और कीर्तन करते हैं , जो  अपने "इष्ट" से भी अधिक अपने गुरुदेव से प्रेम करते हैं और जिन्हें अपने "इष्टदेव" से उनकी कृपा करुणा एवं दया के अतिरिक्त और किसी भी सांसारिक सुख सुविधा की अपेक्षा नहीं होती ,-  हे मर्यादा पुरुषोत्तम ,आप जानकी और लक्ष्मण सहित ऐसे साधकों के "हृदय" में  निवास करिये!" 

भैया अवस्था में मुझसे बहुत  बड़े थे ! उनके पिता ने  बचपन में  ही उन्हें अपने कुलगुरु से  दीक्षित करवा दिया था !  उनका गुरु मन्त्र भी  "राम नाम" ही था !  बचपन से ही वह "राम नाम" के  उपासक थे , उनके गुरु ने उन्हें नाम दीक्षा ही दी थी ! अमृतवाणी पाठ  के बाद उन्होंने हमसे कहा " भोला ,इतना आनंद आया क़ि मैंने आज यह निश्चय  कर लिया  क़ि अब मैं  नित्य प्रति  अमृतवाणी  का पाठ करूँगा और यदि जीवन में कभी भी दिल्ली पोस्ट हुआ तो "श्रीराम शरणम"  अवश्य जाया करूंगा !"  

उन्होंने  यह भी कहा क़ि " तुम दोनों धन्य हो क़ि जीवन के प्रथम चरण  में ही तुम्हें ऐसे सिद्ध सद्गुरु मिल गये ! उनसे जुड़े रहो और लगे रहो अपनी साधना में ,तुम्हारा कल्याण निश्चित है " ! भैया का यह आशीर्वाद ह्म दोनों को बहुत अच्छा लगा ! हमें मानस का वह प्रसंग याद आ गया जब बड़े भाई श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भक्त-भक्ति के लक्षण बताते हुए कहा था :

जातें बेगि द्रवऊं मैं भाई ! सो मम भगति भगत सुखदाई !!
भगति तात अनुपम सुखमूला ! मिलइ जो संत होईं अनुकूला !!
मम गुण गावत पुलक सरीरा ! गदगद गिरा नयन भर  नीरा !!
वचन कर्म मन मोरि गति भजन करहि निहकाम !!
तिन्ह   के हृदय  कमल     महूँ करऊँ सदा विश्राम !!

भ्राता राम के वचन सुन कर जिस प्रकार  लक्ष्मण आनंद से रोमांचित हो गये थे  वैसे ही ह्म भी अपने रामभक्त पूज्य  भैया का आशीर्वाद पा कर  आनंदित हुए ==  

भगति जोग सुनि अति सुख पावा !लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नवा !!

भैया ने आगे कहा " और हाँ मैं अगले रविवार फिर  आउंगा और तुम्हारी आवाज़  में पूरी अमृतवाणी का गायन अपने नये वाले फिलिप्स रेकारडर पर रिकार्ड कर लूँगा"!यह बात १९६१ -१९६२  की है ! उन दिनों रील वाले रेकार्डर एकाध लोगों के पास ही होते थे और तब तक मेरे पास भी कोई रेकार्डर नहीं था , मैं स्वयं उनका सेट देखना भी चाहता था ! हमारे  हाँ कहने पर अगले रविवार वह आये और उन्होंने पूरी अमृतवाणी रिकार्ड कर ली  ! 

इसके बाद भैया क़ी पोस्टिंग कानपूर के बाहर हो गयी , मैं भी देश विदेश आता जाता रहा बहुत दिनों तक उनसे भेंट नहीं हुई !  कुछ वर्षों के बाद भैया की  पोस्टिंग नयी दिल्ली हुई और इत्तेफाक से रहने के लिए उन्हें वेस्ट किदवई नगर में सरकारी फ्लेट एलोट हुआ ! श्री राम शरणम उनके फ्लेट से इतना निकट था कि वह  टहलते टहलते वहाँ पहुँच सकते थे  और वह प्रति दिन प्रातःकालीन सभा में जाने भी लगे ! ऎसी अनिर्वचनीय  कृपा होती है साधकों पर उनके गुरुजनों की !

पाठकगण ! आप सोच रहे होंगे क़ि मैं "भजन" की महत्ता बताते बताते कहाँ भटक गया !
ऐसा कुछ  नहीं है !वास्तव में मैं चर्चा कर रहा हूं ,स्वामीजी दारा रचित एवं  विश्व भर में  असंख्य साधकों द्वारा नियमित रूप से ,भजन कीर्तन सदृश्य ,स्वर-ताल में  गाई जाने वाली "अमृतवाणी " की ,जो गानेवालों के साथ साथ सुनने वालों पर भी एक अमिट प्रभाव डालती  है !
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आज इतना ही , शेष कल बताउँगा !
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

बुधवार, 26 जनवरी 2011

साधन -"भजन कीर्तन" # २ ७ ७


हनुमत कृपा -अनुभव                                           
साधक साधन साधिये                               साधन -"भजन कीर्तन"

प्रियजन ! मुझे मेरे इष्ट ने कृपा करके यह सौभाग्य दिया कि मैं सूरदास जी की भक्ति रचनाओं के अथाह सागर के तट पर ,गहरे जल से दूर बैठे बैठे ,अपनी ओर स्वतः आयी लहरों की बूंदों में भींग पाया ! मैंने कोई निजी प्रयास नहीं किया उस जल में डुबकी लगाने का ! जो भजन आकाशवाणी लखनऊ  से छोटी बहिन माधुरी के गाने के लिए आते थे हमारा ज्ञान उन तक ही सीमित  था ! हाँ कभी कभी अवश्य यह लिख कर आजाता था कि "सूरदास जी के"विनय  एवं  प्रेम" विषयक तीन भजन"! उस स्थिति में हमे "सूरसागर" के तट पर गहरे जल के थोड़े और निकट जाना पड़ता था ! पुस्तकों से भजन चुनने पड़ते थे और उन भजनों के शब्दार्थ और भावार्थ भली भांति समझने पड़ते थे जिससे उन भजनों के भावानुकूल  राग रागिनियों में उनकी धुन बना  सकूँ  !


इस प्रकार प्रभु की विशेष कृपा से  मुझे भक्त महात्माओं की भाव भरी रचनाओं को बार बार पढने का अवसर मिलता था जिससे मैं उनके "प्रभुप्रेम" , विरह वेदना एवं दीनता के भाव अपनी तथा सीखने वालों की गायन शैली में उतार सकूँ ! 


प्रियजन !  रियाज़ के दौरान ,भजनों में आये "प्रभु" के नाम का  उच्चारण हमे बार बार करना  पड्ता था और "नाम जाप" की  कोई  औपचारिकता निभाए बिना , अनजाने मे ही हमारी भाव भरी "नाम जाप" की  प्रक्रिया  घंटों चलती रहती थी ! सूरदास जी का वैसा ही एक पद है यह ,जिसे ह्म लोग बहुत गाते थे :-


हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो !
हरि चरणारविन्द उर धरो !!
हरि की कथा होय जब जहाँ , गंगा हूँ चलि आवे तहां !!
जमुना सिन्धु सरस्वती  आवे , गोदावरी विलम्ब न लावे !
सर्व तीर्थ को बासा तहाँ !  सूर हरि कथा होवे जहाँ !!
हरि हरि हरि हरि सुमिरन करो !!


इस पद को गाते गाते  हरि नाम की धुन लग जाती थी और हमारा सिमरन, जाप, कीर्तन सब का सब बस एक इसी भजन के रियाज़ से हो जाता था !


सूरदास जी का एक और पद जिसे पढ़ कर मन में विश्वास के साथ "प्रभु" के प्रति "श्रद्धा" के भाव जागृत होते थे -------"अजामिल, गणिका, गजराज जैसे पापियों का उद्धार  करने वाले तथा  द्रोपदी , ध्रुव एवं प्रह्लाद के कष्ट हरने वाले कृपा निधान "श्री हरि" क्या मेरी सहायता नहीं करेंगे  ?--


दीनन दुःख हरन देव , संतन सुखकारी !!
अलामील गीध व्याध , इनके कहु कौन साध, 
पंछी हूँ पद पढ़ात , गनिका सी तारी !!
गजको जब ग्राह गृस्यो , दुहसासन चीर खस्यो ,
सभा बीच कृष्ण कृष्ण द्रौपदी पुकारी  !!
इतने में हरि आइ गये, बसनन आरूढ़  भये ,
सूरदास द्वारे  ठाडो  आंधरो भिखारी  !!


"योगेश्वर ! आप इतनी दूर ,द्वारका से द्रौपदी बहेन की लाज बचाने आये , मैं तो आपके द्वार पर ही खड़ा हूं , मुझ पर भी कृपा करो हे नाथ !" 
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इनके अतिरिक्त अन्य भक्त कवियों की रचनाएँ भी ह्म लोगों ने गायीं जिनमें तुलसी
का यह भजन हमे अतिशय प्रिय लगता था :
          तू दयाल दीँन  हौं तु दानी  हौं भिखारी 
          हौं  प्रसिद्द  पातकी  तु पाप  पुँज हारी ! 
         तोहि मोहि  नाते अनेक मानिये जो भावे !
         ज्यों त्यों तुलसी कृपालु चरण शरण पावे !!
तथा मलूकदास जी की रचना :
      दीँनबन्धु दीनानाथ मेरी तन हेरिये ,
        कहत है  मलूकदास  छाड दे बिरानी आस ,
        राम धनी पाय के अब काकी सरन जाइये !!

सूफियाने "तू हि तू" भाव में रचित दादूदयाल जी की यह रचना कितनी सारगर्भित है :

तू हि मेरी रसना तूही मेरे बयना 
तूही मेरे श्रवना तूही मेरे नयना  
तुही मेरे नख शिख सकल सरीरा 
तु ही मेरे जियरे ज्यों जलनीरा 
तुम बिन मेरे और कोइ नाही 
तुही मेरी जीवनि दादू माही
=======++++++++======      
क्रमशः 
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प्रियजन उपरोक्त भजनों मे से एकाध को भी आपने यदि भाव सहित पढ़ लिया है तो आपके हृदय में अपने "उनके" (इष्ट देव के ) लिए श्रद्धा अवश्य उमड़ेगी और निश्चय ही "वह" आप पर कृपा वर्षा करेंगे !


निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

साधन-"भजन कीर्तन" # २ ७ ०

हनुमत कृपा -अनुभव                  साधक साधन साधिये                                                                               
                                                 साधन -"भजन कीर्तन"

प्रियजन ! यदि एक बार भी आपको आपके "इष्ट देव" का "स्मरण" हुआ ,एक एक कर के आपको उनकी असीम करूणा , अपार दया, उनके अनंत गुणों तथा असंख्य उपकारों की याद आयी ,जी हाँ यदि एक बार ,केवल एक बार भी आपके हृदयाकाश में उनकी "याद" पावस की काली घटाओं में बिजली की एक रजत रेखा के समान कौंध गयी , ( आपको "उनका" वास्तविक "सिमरन" हो गया)  , तो क्या बात है ,आपकी तो बात ही बन गयी ! उसके बाद आप चाहे योगासन में बैठ कर पातंजली  द्वारा प्रतिपादित एवं निर्धारित वैज्ञानिक योगिक क्रियाओं को करें, अथवा अपने "अधिष्ठान" के सन्मुख आँख मूदे बैठ कर विधि पूर्वक ध्यान लगायें ,या माला लेकर नाम जाप करें , प्रत्येक साधन से आपके सभी अनुष्ठान सफल होंगे !

पर मैं स्वयं उपरोक्त साधनों में से एक भी उचित ढंग से नहीं कर सका ! ६५ वर्ष की अवस्था से पहिले जब शरीर में शक्ति थी , सारे अंग प्रत्यंग ठीक ठाक थे ,नेत्रों को छोड़ अन्य सभी अवयव सुचारू रूप से गतिमान थे ,उन दिनों इमानदारी और इज्जत से परिवार पालन में चौबीसों घंटे जुटा मैं ,न तो "ध्यान" लगा पाया, न "योगिक क्रियाएँ " कर पाया , न विधिवत "जाप"  ही कर पाया ! और उसके बाद जब काम धंधे से छुट्टी मिली तब तक  शरीर ढीला पड़ गया था !

भक्ति का एकमात्र साधन जो मैंने बचपन से आज तक किया (या यूं कहें क़ि ,मैं कर पाया) वह है "भजन गायन" और "कीर्तन" ! शायद इसलिए क़ि मा के गर्भ में मैंने केवल भजन ही सुने ! भगवान का "रसरूप" इस प्रकार, अम्मा के हृदय से "आनंदरस" के रूप में परिवर्तित हो कर मेरे अंतर्मन में तभी से बस गया ! महापुरुषों से सुना है "नादोच्चारण "से "शब्द ब्रह्म" और "नाद एवं शब्द ब्रह्म" के  संयोग से "परब्रह्म" प्रकट होते हैं ! इसप्रकार मुझे ऐसा लगता है जैसे "सृष्टि सृजन  क्रम" के अनुसार अम्मा के भजन के स्वरों से ,"नाद ब्रह्म", नाद से "शब्द ब्रह्म" और अंत में प्रभु का "परम आनंदस्वरूप रस " - "रूप ब्रह्म" बन कर मेरे अंतर्मन में तब ही प्रकट हो गया होग़ा ! प्रियजन ! मैं यह अटकल "उनकी" प्रेरणा से ही कर रहा हूँ ! इससे अधिक और कुछ जानता समझता नहीं हूँ इस विषय में !

सुना है भजन कीर्तन में तल्लीनता ,"मैं - तुम" अथवा "अहम तवम" का भेद मिटा देती है  जिससे एक अपूर्व आनंद रस का अनुभव होता है ! आनंद रस में सराबोर रसिया (साधक)
एक प्रकार से "समाधिस्थ  ही हो जाता है ! उस मीठे नाद में ऐसा रम जाता है ,इतना मस्त हो जाता है क़ि उसे तन मन की सुधि नहीं रहती ! कीर्तन में गायक साधकों के स्वरों के अतिशय मधुर नाद एवं वाद्यों की झंकार तथा करतल ध्वनि के संयोग से एक अद्भुत दिव्यता अवतरित होती है जिससे गायकों एवं श्रोताओं को "परब्रह्म" के परमानंद स्वरूप में "परब्रह्म"के दर्शन की अनुभूति होती  है ! गायक साधक की ऑंखें भर आतीं हैं , गला अवरुद्ध हो जाता है, मुंह से बोल नहीं निकलते , वह रोमांचित हो जाता है , शीत काल में भी स्वेद से उसके वस्त्र गीले हो जाते हैं उसका , शरीर कम्पायमान होता है अथवा सुन्न होकर मूर्तिवत पड़ा रह  जाता है !


इसी स्थिति के सम्बन्ध में स्वामी जी महाराज ने भक्ति प्रकाश में कहा है :


                  गीत गाय के प्रेम के जब जन गद गद होय !
खिले नयन रोमांच से ,भक्ति जानिए सोय !!

राम चरित मानस में भगवान श्री राम ने भाई लक्ष्मण को "भक्त- भक्ति" के लक्षण  समझाते हुए यह कहा क़ि "कीर्तन भजन" करते करते,जिस साधक की  ऎसी स्थिति हो जाये वही मेरा सच्चा भगत है और मैं निरंतर ऐसे भगत के वश में रहता हूँ !! 
मम गुन गावत पुलक सरीरा !गद गद गिरा नयन भर  नीरा !!
काम आदि मद दम्भ न जाकें ! तात निरंतर बस मैं ताके !!

क्रमशः 
निवेद्क: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : धर्मपत्नी - श्रीमती (डाक्टर) कृष्णा श्रीवास्तव 

रविवार, 16 जनवरी 2011

साधन - सिमरन # २ ६ ९

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हनुमत कृपा - अनुभव                      साधक  साधन साधिये 
                                                           साधन - सिमरन 


मैं पिछले कई दिनों से केवल "सिमरन" की बात कर रहा हूँ ! प्रियजन , व्यक्ति उसी विषय पर अधिक प्रकाश डालता है जिसका उसे वास्तविक ज्ञान होता है अथवा जिसकी सत्यता पर उसको पूर्ण विश्वास होता है या जिस विषय का उसे कुछ निजी अनुभव होता है ! मैं  "सिमरन" पर सर्वाधिक जोर दे रहा हूँ क्योंकि मुझे इस "साधन" पर अटूट भरोसा    है ! मैं भली भांति जानता हूँ क़ि मेरी समग्र सांसारिक ,आत्मिक,आध्यात्मिक सफलताओं के मूल में है उस शांति और आनंद की अनुभूति ,जो मुझे एकमात्र "सिमरन" के कारण ही उपलब्ध हुई है ! विश्वास करें प्रियजन "सिमरन" के अतिरिक्त और कोई साधन मैं आजीवन कर ही नहीं सका !


प्रियजन आप ही कहें क़ि मेरे जीवन में कहाँ इतना समय था क़ि मैं पूरी औपचारिक पूजा पाठ कर पाता ! मेरे पास  "काम करते हुए "सिमरन" करते रहने" के अलावा कोई और साधन था ही नहीं !  ६५ वर्ष की अवस्था तक मेरा केवल एक ही कर्म था -शत प्रतिशत ईमानदारी से भारत सरकार की सेवा द्वारा  जीवन निर्वाह करना ! गार्हस्थ  जीवन के  सभी उत्तरदायित्व ,अपने सामर्थ्य और सूझ बूझ से एकमात्र  प्रभु का आश्रय लेकर निभाना और जीवन का प्रेयपूरित लक्ष्य "गृह कारज  नाना जंजाला" में उलझे रहना ! ऐसे में मुझे आध्यात्मिक सिद्धि के अन्य कठिन  साधनों के मुकाबले "सिमरन" ही सबसे सहज और सुगम साधन प्रतीत हुआ और उसी का आधार ले कर मैंने अपने जीवन की बागडोर सर्वशक्तिमान प्रभु के हाथों  में सोंप  दी ! मेरी उनसे यही प्रार्थना रही : 


हे राम मुझे दान कर अपना सिमरन आप !
लगन  प्रेम से मैं करूं परम पुन्यमय जाप !!
[भक्ति प्रकाश  ]


परमश्रद्ध्येय भाईजी श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार के इस पद  में उनका कुछ ऐसाही संदेश है :                            रे मन हरि सुमिरन कर लीजे !!
हरि को नाम प्रेमसों जपिए ,हरिरस रसना पीजे !!
हरि   गुन गाइय ,सुनिय निरंतर ,हरि चरणनि चित दीजे !!
हरि   भगतन क़ि सरन ग्रहण करि ,हरि संग प्रीत करीजे !! 


भक्त शिरोमणि सहजोबाई ने सिमरन की महत्ता दर्शाते हुए गाया है :
                        "जाग जाग जो सुमिरन करे !आप तरे  औरन ले तरे "!


परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास  ने अपने शब्दों में उद्घोषणा की है क़ि जो साधक अपने इष्टदेव  का निरंतर सुमिरन करते हुए अपने सारे सांसारिक कर्म करते हैं वे बिना किसी परिश्रम के मोह की प्रबल सेना को जीत लेते हैं ! उन्हें परमानंद की अनुभूति होती है,वे नाम सिमरन प्रसाद का रसास्वादन करते हुए सदा मगन रहते हैं --
                   
                  सेवक  सुमिरत नाम सुप्रीती ! बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती !!
                  फिरत स्नेह  मगन सुख अपने ! नाम प्रसाद  सोच नही सपने !!


प्रिय पाठकगण ! मेरी तो कट गयी !"सिमरन" के सहारे मेरी जीवन नैया मेरे खेवटिया "इष्ट देव" की अहेतुकी कृपा के बल पर भव सागर पार कर गयी ! 


आप भी इस सरलतम साधन "सिमरन" का सहारा लें! विश्वास दिलाता हूँ क़ि आपके इष्ट भी आपकी मदद करेंगे और अपने कार्य में आप अवश्य ही सफल होंगे ! केवल यह ध्यान रखियेगा क़ि अपने कर्तव्य पालन में आप कोई त्रुटि न आने दें ,आप अपना तन, मन, धन अपनी पूरी शक्ति और क्षमता लगादें ,जान बूझ कर कोई भूल न करें ,कोई ऐसा काम न करें जिसके कारण आपको नीचा देखना पड़े !


सिमरन प्रसंग का यहाँ समापन कर रहा हूँ ! कल क्या लिखूँगा , लिखवाने वाला जाने!


निवेदक:  व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

साधन-सिमरन # २ ६ ८

हनुमत कृपा 
अनुभव                                     साधक साधन साधिये 
                                                    साधन-सिमरन 

अमृतवाणी के ९३ दोहों में "स्मरण"तथा उससे संबधित शब्दों का सीधा उल्लेख केवल ९ ५  दोहों में हुआ है ! उपरोक्त ५ दोहों के अतिरिक्त सिमरन का प्रयोग अन्यत्र -दोहा # २०, ५२ , ६८  तथा  ९० में भी हुआ  है ! इससे ऐसा लगता है जैसे "सिमरन" कोई इतना महत्वपूर्ण साधन नहीं है ! पर मेरे विचार में यह सत्य नहीं है !  


प्रियजन  ! जरा सोंच कर देखिये क़ि बिना यह "स्मरण" क़िये ,क़ि उसे ,साधना करनी है कोई भी जिज्ञासु साधक अपनी साधना कैसे चालू कर सकता है ? इस प्रकार मेरा तो यह दृढ विश्वास है क़ि "सिमरन" सब प्रकार के साधनों के मूल में स्थित  है ! मुझे तो  ऐसा लगता है  क़ि   सिमरन के बिना कोई भी साधना चालू ही नहीं हो सकती  ! चिन्तन, जाप, ध्यान ,भजन - कीर्तन ,कुछ भी शुरू करने से पहिले साधक अपने गुरुजन के आदेश का ,या यूं कहें उनकी मन्त्रणा का "सिमरन" अवश्य करता  है !
चलिए अब ह्म अमृतवाणी के "सिमरन" विषयक बाकी चार दोहों के भावार्थ भी समझ लें 


सिमरन राम नाम है संगी, सखा स्नेही सुहृद शुभ अंगी !
युग युग का है राम सहेला , राम भक्त नहिं रहे अकेला !!२०!

दोहे का भावार्थ : " जिस प्रकार सगे संबंधी ,सच्चे मित्र साथी और प्रेमी हमे छोड़  कर नहीं जाते ,हर हालत में हमारा साथ देते हैं,उसी तरह "नाम सिमरन" भी हर दशा में ह्मारे संग रहता है ! राम नाम को सतत सिमरन करने वाला साधक कभी अकेला नहीं होता ! "राम"  सर्वदा उस के साथ रहते हैं !"

विश्व वृक्ष का राम है मूल , उसको तु प्राणी कभी न भूल !
सांस सांस से सिमर सुजान , राम राम प्रभु राम महान  !!५२!
दोहे का भावार्थ : " हे जीवधारी प्रानी (मनुष्य) तू यह कभी न भूल क़ि इस समस्त जगत, (ब्रह्माण्ड / संसार) रूपी वृक्ष के स्रजन का मूल (आदिकारण) और उसका सिरजनहार एवं   उसकी उत्पत्ति का हेतु केवल एक "राम" ही है ! हे ज्ञानी (सज्जन मानव)तू अपनी सांस 
सांस में उस महान स्वामी का सुमिरन कर !"
राम नाम को सिमरिये ,राम राम एक  तार !                                                             परम पाठ पावन परम, पतित अधम दे तार !!६८!!

दोहे का भावार्थ : " रे मन ! तू राम नाम का लगातार (निरंतर )सुमिरन कर !राम नाम का 
नियमिक जाप अधमाधम एवं पतित प्राणियों को भी पवित्रता प्रदान कर देता है ,और उन्हें भवसागर से पार कर देता है - अर्थात उन्हें सद्गति दिला देता है ! "
जपू मैं राम राम  प्रभु राम, ध्याऊं मैं राम राम हरे राम !
सिमरूं मैं राम राम प्रभु राम, गाऊं मैं राम राम श्री राम !!९०!!"
दोहे का भावार्थ : अमृतवाणी  पाठ के समापन पर साधक सुनिश्चित कर लेता है क़ि "वह 
अपने इष्ट का नाम (राम नाम) निरंतर जपता रहेगा , सदा उसके ध्यान में मग्न रहेगा ,  उनका लगातार सिमरन करता रहेगा और सदा सर्वदा अपने इष्टदेव श्री राम नाम का ही गुनगान करेगा !"
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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला "


गुरुवार, 13 जनवरी 2011

साधन - सिमरन # २ ६ ७

हनुमत कृपा 
अनुभव                                        साधक साधन साधिये                                         
                                                        साधन - सिमरन

मेरा परम सौभाग्य था,या यूं कहें,परमात्मा की विशेष कृपा हुई मुझपर क़ि मुझे गुरुदेव स्वामी सत्यानंद जी महराज का शिष्यत्व प्राप्त हुआ ! स्वमी जी ने अपनी "परम धाम" डलहौज़ी की तपश्चर्या से प्रसादस्वरुप प्राप्त " नाम ज्योति दर्शन " तथा "राम नाद श्रवण" से प्रेरित "नाम दान" से मुझे अनुग्रहीत किया !


प्रियजन मैंने "नाम" के उस मधुर प्रसाद का रसास्वादन स्वयं किया है ! थोड़ी मधुरता आप को दे सकूं इस भावना से ,"ऊपर" से ही मिली प्रेरणा से इन लेखों द्वारा आपकी सेवा कर रहा हूँ !  मेरा समस्त कथन "निज अनुभव जन्य" है और अक्षरशः सत्य हैं ! इन्हें प्रकाशित करने का मेरा एक मात्र उद्देश्य  है क़ि मेरे स्वजन ,मेर परिवार के सदस्य ,मेरे मित्र , मुहल्ले टोले , नगर , देश वाले सभी जिज्ञासु जन "नाम" का वैसा ही मधुर स्वाद चखें जो मेरे सद्गुरु ने स्वयम चखा और अपने प्रिय शिष्यों को चखाया !

प्रियजन ! असली रस और आनंद तो "नाम सिमरन" में है ! सद्गुरु के आशीर्वाद से मेरे   लिए वह नाम है "राम" ! यह वह नाम है जिसके गुण स्वयं सर्वशक्तिमान परमात्मा भी  नहीं गा सकते ! तुलसी ने कहा ही है - " राम न सकहिं नाम गुन गाई " ! हिन्दी भाषा का भक्ति साहित्य , राम नाम गुन गान से भरा पड़ा है ! अनंत है नाम  महिमा !  इस विषय पर लम्बी बात करनी है ,फिर कभी कर लेंगे ! अभी "सिमरन" की चर्चा चल रही है पहिले उसे पूरा करलें !


महराजजी की अमृतवाणी के "सिमरन" विषयक अंशों  पर ह्म विचार कर रहे थे !


१६ वें १७ वें और १८ वें दोहों में महाराज जी ने कहा है 


जिसमें बस जाये नाम सुनाम ,   होवे वह जन पूर्ण काम !
चित्त में राम नाम जो सिमरे , निश्चय भव सागर से तरे!!१६!!
                         राम  सिमरन  होवे  सहाई  , राम  सिमरन है सुखदाई  !
                         राम सिमरन सबसे ऊंचा, राम शक्ति सुख ज्ञान समूचा !!१७!!
राम राम ही सिमर मन ,राम राम  श्री राम! 
राम राम श्री राम भज  ,राम राम हरि नाम !!१८!!

१६ वें दोहे का भावार्थ है क़ि "जिस व्यक्ति के चित्त में "नाम"  स्थायी   रूप में टिक जाता है  उसकी सारी इच्छाएं स्वतः तृप्त हो जातीं हैं !  जो व्यक्ति अपने चित्त में सतत "नाम"  सिमरन करता है वह निःसंदेह "बिनु श्रम" इस संसार रूपी सागर से पार हो जाता है ,बार बार के  जन्म मरण के चक्कर से बच जाता है और सदगति प्राप्त कर लेता है !" 


१७ वें दोहे का भावार्थ है क़ि "नाम सिमरन सहायक है ,अतिशय सुखदायक और सर्व श्रेष्ठ है! नाम सिमरन की शक्ति से व्यक्ति में बड़े से बड़े विकार रूपी शत्रु को पराजित करने का बल प्रगट हो आता है और वह आतंरिक प्रेरणा से वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान (तत्व ज्ञान / सम्यक ज्ञान ) प्राप्त कर लेता है !"


१८ वें दोहे का भावार्थ है " हे मन ! तू राम राम ही स्मरण किया कर ! राम राम श्री राम का भजन कर, राम राम श्री राम रटा कर तथा  राम राम का ही जाप किया कर ! " 


मतलब "नाम सिमरन" से है ! वह "नाम" किस देवता का है ,यह महत्व की बात नहीं है ! ह्मारे इष्ट "राम" हैं सो ह्म उनका नाम सिमिरन करते हैं ! आपके इष्ट जो भी हों आप उनका ही नाम लें ! फल आपको भी वही मिलेगा , उतनी ही शांति , उतना ही आनंद आपको प्राप्त होग़ा जितना हमे !


क्रमशः 
निवेदक :- व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"