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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

पाठकों के नाम खुला पत्र # 3 4 8

एक सूचना 
इस ब्लॉग के पहले वाले ब्लॉग के प्रेषक अतुल जी ने जिन्हें "बाबू" कहकर संबोधित किया है वह  ग्वालियर के श्री जगन्नाथ प्रसाद जी ,स्वामी जी महराज के एक अतिशय प्रिय शिष्य 
और मेरी धर्म पत्नी कृष्णा जी के बड़े भाई थे ! १९५९  में इन्होने ही पहली बार 
मुझे स्वामी जी से मिलवाया था और मुझे उनसे "नाम" दिलवाया था ! 
"भोला"
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इस ब्लॉग की प्रथम वर्षगांठ पर 
पाठकों के  नाम  एक  खुला  पत्र
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किसी महापुरुष के प्रवचन में सुना कि "आज के मानव को,उसकी व्यस्त जीवनशैली के कारण विधिवत पूर्ण औपचारिकता के साथ ईश्वर की उपासना कर पाने का अवकाश ही नहीं मिलता, अपनी इस असमर्थता के कारण ऐसे लोगों को निराश हो कर बैठ जाने के बजाय साधना का यह सरलतम साधन अपना लेना चाहिए "!

महापुरुष ने आगे बताया कि  "प्रातः निंद्रा से उठते ही बिस्तर पर बैठे बैठे ही सर्व प्रथम अति प्रेम से अपने इष्ट देव का सिमरन चिन्तन करे ! अपने इष्ट देव को अपनी सारी उपलब्धियों, सफलताओं ,खुशियों की प्राप्ति में मददगार बनने के लिए ,उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आंसुओं से भरे नैनों और गदगद कंठ से उन्हें हार्दिक धन्यवाद दे ! करुणानिधान प्रभु इतने से ही प्रसन्न हो जायेंगे "!

इस सन्दर्भ में लीजिये मैं सबसे पहले अपनी ही प्रातःकालीन प्रार्थना आपको सुना दूं !इसके भाव तो नित्य एक ही होते हैं केवल शब्द बदलते रहते हैं !आज की शब्दावली इस प्रकार बन रही है  :


धन्यवाद  तेरा  प्रभु  तू  दाता सुख भोग 
जीवन की सब सफलता आनन्द के संयोग

जो कुछ मेरे पास है ,तेरा ही है दान
मैं इठलाता फिर रहा सब कुछ अपना मान

अर्पण करने को नहीं कुछ भी मेरे पास
खाली हाथ खडा यहाँ  ले दरसन की आस 

हर लो मेरा अहम् औ मेरे सभी विकार
भेंट समझ मेरी इसे, करलो प्रभु स्वीकार

धन्यवाद बस धन्यवाद बस धन्यवाद का गान  
मेरी पूजा मान कर , स्वीकारो भगवान  

"भोला"

प्रिय पाठकगण ,संदेशों का यह क्रम प्रारंभ करते समय मैंने स्पष्ट किया था कि 'स्वान्तः सुखाय" तथा सर्वथा निज स्वार्थ सिद्धि की लालसा से प्रेरित होकर मैं यह कार्य राम काज मान कर प्रारंभ कर रहा हूँ !

प्रियवर राजीव कुलश्रेष्ट जी , श्री भूपेंदर सिंह जी, श्री गोरख नाथ शाव जी श्री  चैतन्य शर्मा जी,"सारासच" जी ,Patali-the Village ji , तथा सुश्री  दिव्या जी  (ZEAL) , सुश्री शालिनी  जी, शिखा जी , संगीता स्वरूप जी --पिछले एक वर्ष में मैंने कितनी बार यह लेखन बंद करने पर विचार किया पर आपने मुझे रोक दिया! आप के प्रोत्साहन ने मुझे अपना यह विशेष "राम काम" करते रहने की प्रेरणा दी ! मेरी साधना चलती रही , मेरी उपासना होती रही !  मैं आपका कितना आभारी हूँ , कह नहीं सकता ! पर मुझे अटपटा लगता है ,आप में से कोई मुझे धन्यवाद देता है या कोई आभार प्रगट करता है मेरे इन आलेखों के लिए !

मेरे विचार में हम सबके धन्यवाद के पात्र तो हमारे प्यारे प्रभु "श्रीराम" हैं  जिन्होंने २००८ में मुझे जीवन दान देकर आदेश दिया था कि मैं अपनी और "उनकी " घनिष्ठ -परस्पर प्रीति के विषय में मुखर हो कर अपने अनुभवों को शब्द, सन्देश ,कविता, एवं स्वर संगीत (गायन) में परिणित करके "आत्म कथा" के रूप में संसार के समक्ष रखूँ !

प्रियजन, वास्तव में यह ब्लॉग लिख कर और उनमे अपनी भक्तिमय  रचनाएँ स्वयम गाकर  मैं "अपने इष्ट" के आदेश का पालन कर रहा हूँ !  मुझे उनका हुकुम बजाने में बहुत आनंद भी आरहा है !जितनी देर सन्देश लिखता हूँ मेरा  "हरि सुमिरन" और "नाम जाप" चलता ही रहता है ,और समापन के बाद भी  "नाम - खुमारी" टूटती नहीं !  इस शुभ विचार से कि मेरे सभी प्यारे प्यारे पाठक इस का पाठ करके अपने अपने इष्ट देवों को याद कर रहे होंगे ,मेरी खुमारी और बढ़ जाती है और मुझे  देर तक परमानंद का अनुभव होता रहता है ! 

इसलिए अपने सभी स्नेही स्वजन पाठकगण से मेरा करबद्ध निवेदन है कि आप मेरे  इन संदेशों में केवल अपने अपने इष्ट देवों का वैभव ,उनका सौन्दर्य और उनकी प्रतिभा के दर्शन करें ! उनका कृपा प्रसाद मान कर इनमें निहित दैविक आनंद ग्रहण करें ! आपको आपके "इष्ट" से मिला कर मैं पुण्य का भागी बन जाऊ , यह मेरा स्वार्थ है !

हाँ , लेकिन मुझे भुलाएँ नहीं ! हो सकता है कभी अहंकार के वशीभूत हो, मैं कुछ अनाप
शनाप लिख दूं ! प्रियजन निःसंकोच तत्काल मेरी भूल  मुझे बताइएगा !

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
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गुरुवार, 17 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 0

अनुभवों का रोजनामचा 

आत्म कथा 


भारत में विदेशी शासकों द्वारा देश भक्त भारतीयों पर की हुई बर्बरता की कहानियां विदेशी इतिहासकारों नें भी नहीं छुपायीं ! कलकत्ते का "ब्लैक होल" जिसमें तत्कालिक सरकार ने एक छोटी सी कोठरी  में अनेकों भारतीयों को बंद किया और उन्हें एक एक सांस के लिए मोहताज करके  तड़प तड़प  कर मरने को छोड़ दिया , क्या कोई भारतीय कभी भी भुला सकता है ? कानपुर के "मेमोरिअल वेल" को तो मैंने भी देखा है ,कहते हैं कि उस कुँए मे सैकड़ों लोगों को ढकेल कर लाशों से उसे पाट दिया गया था ! ठीक से याद नहीं कि उसमें विदेशी शासकों के समर्थकों की लाशें थीं अथवा देश भक्तों की !  इतना भव्य मेमोरिअल विदेशियों ने किस उद्देश्य से बनवाया और स्वतंत्रता के बाद देशी सरकार ने उसे क्यों तुड़वाया इस पर भी मैं कोई प्रकाश नहीं डाल पाऊंगा क्योंकि प्रियजन न तो मैं इतिहासकार हूँ न पोलिटीशियन !

प्यारेप्रभु के आदेश से "उनके" ही सञ्चालन में "उनकी" ही मन्त्रणा और प्रेरणा से उनकी कृपा से उपलब्ध संसाधनों के द्वारा , इस "बड़े सौभाग्य से पाए मानव तन " से जितना कुछ ,"अपने राम को रिझाने के बहाने - स्वान्तः सुखाय " बन पाता है , केवल उतना ही करता हूँ ! ( देखा आपने फिर कर्तापन का अहंकार ? भैया मैं कुछ नहीं करता ! मेरी  क्या औकात है ,सच पूछो तो जितना "वह" मुझसे करवा लेते हैं वह ही सम्पूर्ण हो पाता है ) 

इस ऐतिहासिक "ब्लैक  होल" की याद इसलिए आयी क्योंकि उस दिन की , तीन  नम्बर की लखनऊ कानपूर (3 LCपेसेंजर रेलगाड़ी के  सभी तीसरे दर्जे के डिब्बे "ब्लैक होल" के प्रतिरूप बने हुए थे ! और मित्रों उनमें  से एक डिब्बे में था आपका यह "राम का  प्यारा" शुभाकांक्षी मीत !

ज़िन्दगी और मौत के कगार पर खड़े उस ट्रेन के सैकड़ों यात्री अपने इष्ट देवों को मना रहे थे , मुस्लमान भाई "अल्लाह" को, सिक्ख भाई " वाहे गुरु " और "बाबा जी" को तथा हिन्दू भाई अपनी अपनी मान्यतानुसार विविध देवी देवताओं को तथा उनके भी "इष्ट" सर्वव्यापी 'ब्रह्म' को मना रहे थे जो प्रत्येक जीवधारी के रोम रोम में रमा हुआ है !


रोम रोम पर आसीन सर्वशक्तिमान ब्रह्म के होते हुए स्वजनों कौन हमारा एक बाल  भी बांका कर सकता है ? एक हाल की कथा सुना देने की प्रेरणा हुई है : 


२००८ के अंत में,भारत के एक हस्पताल के एसी युक्त ,प्रदूषणों से मुक्त ,साफ सुथरे आई. सी.यू. में मेरे जीवन रक्षा के प्रयास चल रहे थे ! सांस का आवागमन बनाये रखने के लिए "ओक्सीजन मास्क" और electric shock का प्रयोग हो रहा था ! एक रात "कोमा" के बाहर आते ही मैं कुछ बडबड़ाया जिसे ड्यूटी नर्स ने एक पुर्जी पर नोट कर लिया !प्रियजन  अगले प्रातः धर्म पत्नी कृष्णा जी ने वह पर्ची पढ़ी , उसमे लिखा था 


रोम रोम 'श्रीराम' बिराजें धनुष बाण ले हाथ 
माता सीता लखनलाल अरु बजरंगी के साथ  
( आये कोई लगाये हाथ )

यहीं समाप्त करने का आदेश है , स्थानीय मारुती मन्दिर में जाना है ! वहां भजन कीर्तन  होंगे ! मैं तो अभी की प्रेरणानुसार , वहां पर प्राक्रतिक आपदाओं से जूझते जापान के दुखी  नागरिकों की सुरक्षा के लिए मन ही मन प्रार्थना करूँगा ! मेरे अतिशय प्रिय पाठक गण आप से अनुरोध है ,कृपया यह सन्देश पढ़ते समय इस प्रार्थना में मेरा साथ अवश्य दें   ! आपके सहयोग से मेरी भी अर्जी वहां तक पहुँच जायेगी ! धन्यवाद !

और हाँ , कोई चिंता मन में लेकर न सोइयेगा !-मुझे कुछ भी नहीं हुआ , न तब १९४५ में और न २००८ की बीमारी में ! भैया ,विश्वास करो ,धरती से ही पत्र भेज रहा हूँ ,अभी शून्य तक नहीं पहुंचा ! कल रेल गाड़ी वाली कहानी और होस्पिटल की वह रचना पूरी करूंगा , यदि हाई कमांड से आज्ञा हुई ! 

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क्रमशः 
निवेद्क: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
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रविवार, 13 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 1 6

अनुभवों का रोजनामचा

"कृपा करो श्री राम सब पर कृपा करो"


जापान के उत्तरी पूर्वी समुद्र तट में आयी भयंकर प्राकृतिक आपदा के विकराल रूप ने वहाँ के जन जीवन को पूर्णतः अस्त व्यस्त कर दिया है ! टी वी के समाचारों में वहां की तस्वीरें --सुनामी के प्रलयंकारी जल प्रवाह में पत्तों और तिनको के समान बहते जलपोत, जंगी और नागरिक वायुयान, मेट्रो रेल के डिब्बे ,यात्री बसें, अनगिनत कारें आदि वाहन ,तथा समुद्री ज्वालामुखी की प्रचंड लपटों में स्वाहा होते एटोमिक रिएक्टर्स, आकाश को  कालिमा  से भरता उन संयंत्रों से निकलता हुआ धुंआ अदि  भयावय दृश्य वहां पर चारों और व्याप्त दहशत  का  हृदय विदारक चित्र  प्रस्तुत करते हैं !जिन्हें देख  कर अहसास होता है कि प्रकृति के प्रकोप के आगे मानव की भौतिक प्रगति नगण्य है ! आप सबने भी यही महसूस किया  होगा !


प्रियजन महापुरुषों ने कहा है कि वास्तव में  धार्मिक व्यक्ति या श्रेष्ठपुरुष  वही है जो पर पीड़ा से पीड़ित हो, पर दुःख में दुखी हो!आज जहाँ  विभिन्न आधुनिक यंत्रों के प्रयोग और संसाधनों के सहारे समस्त विश्व जापान को संकट से उबारने का प्रयत्न कर रहा हैं वहीं वहां के नागरिकों के कुशल क्षेम के लिए स्थान -स्थान पर  प्रार्थनाएं भी की जा रहीं  हैं !


मैंने अपनी निजी प्रार्थना "हे प्रभु दया करो , सब पर दया करो" अपने सन्देश # ३१४ में  कर ली थी ! पर सामूहिक प्रार्थना की उपयोगिता के विचार से मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मेरा पूरा परिवार मेरे साथ प्रार्थना करता जो उस समय संभव नहीं था ! पर मेरे प्रियजन, प्रभु मुझे कैसे निराश करते ? उन्होंने कृपा कर दी मुझ पर तत्काल ! उस दिन उसी घड़ी जब मैं वह सन्देश भेज रहा था मेरी बड़ी बेटी श्री देवी ने चेन्नई (भारत)  से एक  इ.मेल भेजा जिसमें संलग्न (अटेच्ड) था ऑडियो विडिओ क्लिप एक ऐसे पद का जो हमारे सद्गुरु श्री सत्यानंदजी  महाराज को अतिप्रिय प्रिय था ! आजतक उस भजन के बोल कीर्तन धुन के समान विश्व भर में गाये जा रहे है ! वह प्रार्थना समान भजन है :                                                                                                                    
                      
                              कृपा करो श्री राम सब पर कृपा करो"


विश्वास करो प्यारे पाठकों कि  इस कृपा याचना में केवल मेरा पूरा परिवार ही नहीं बल्कि मेरा समस्त गुरुकुल भी शामिल है ! कैसे ? पहले  सुनने के लिए नीचे के चित्र में स्टार्ट के एरो पर क्लिक करिये !





कृपा करो श्री राम ,
सब पर कृपा करो==========

मैं ना जानु किस विधि रीझो 
अपनी नज़र मेहर की कीजो

आनंदघन  घनश्याम  ,
सब पर कृपा करो========


आज  तलक  तो  कोई सवाली    
तेरे  दर से गया न खाली

भर दो घर में धन धान्य, 
सब पर कृपा करो=======


गहरी   नदिया  निशा  अंधेरी      
ये निर्दोष  शरण है  तेरी

लो गिरते को  तुम  थाम , 
सब पर कृपा करो======



जो बिटिया गा रही है , मेरे बड़े भैया की बेटी "प्रीती"है  ,जो माइक पकड़े है मेरी बेटी श्री का बेटा है "आदी !गीतकार हैं हमारे दिवंगत सद्गुरु स्वामी जी महराज के कृपा पात्र स्वर्गीय कवि निर्दोष जी ! रेकोर्ड कर के मेरे पास भेजने वाली है मेरी बेटी श्री देवी जिसने (जब वह यहीं अमेरिका में थी )मुझे इस ब्लॉगिंग का विस्तृत ज्ञान कराया था! और आज जो मैं इसे आपकी सेवा में भेज पा रहा हूँ वह मेरे बेटे राघव जी के सहयोग से संभव हुआ है ! देखा आपने,चौबीसों घंटे हर अभियान में साथ देने वाली अपनी धर्मपत्नी कृष्णा जी को भूल गया ! उनका सहयोग सराहनीय है !



अब ये भी बता दूँ कि हम सब के सब सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के परिवार के सदस्य हैं और श्री रामशरणंम से जुड़े हैं ! 





मान लिया न कि इस भोले इन्सान पर उनकी कितनी कृपा है ? केवल सोचा और उन्होंने कृपा कर दी ! कृपा का इससे उत्तम व्यक्तिगत उदहारण और कहाँ खोजियेगा !
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निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती डोक्टर कृष्णा जी 
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बुधवार, 2 मार्च 2011

हमारे सद्गुरु # 3 0 7





Param Pujya Shree Swami Satyanand Ji Maharaj
हनुमत कृपा -अनुभव                                   

साधक साधन साधिये                              हमारे सद्गुरु 

(गतांक से आगे)                          स्वामी सत्यानन्द जी महाराज                     
                 
        




गुरुजनों की चर्चा चल रही थी कि बीच में कल 'सब गुरुओं के सद्गुरु'- देवाधिदेव "शिवजी महाराज" की 'महाशिवरात्रि' आगयी और अकस्मात मुझे आत्म-कथा के ४०-५० वर्ष पुराने प्रष्ठ पलटने ही पड़े ! आप जानते ही है,  मैं निज बल बुद्धि से कोई  भी कर्म नहीं करता ,मेरे द्वारा जो कुछ  होता है, कोई और ही करता और कराता हैं ! उसने जो लिखाया, मैंने वही  लिखा ! कुछ नागवार लगा हो तो माफ़ कर दीजियेगा !

हाँ तो उस्ताद साहेब द्वारा मुझे "स्वर से ईश्वर प्राप्ति" की राह बताना ,(पहली हनुमत कृपा) ! और  स्वर साधना से जन्मजात 'भजन गायन' की क्षमता में अप्रत्याशित निखार आना (दूसरी हनुमत कृपा) ! "भजन शब्द-स्वर  रचना एवं गायन" में आयी प्रवीणता के कारण मुझे सिद्ध  महात्माओं के दर्शन एवं निकटतम सम्पर्क में आने के सुअवसर प्राप्त होना   ( तीसरी सबसे बड़ी हनुमत कृपा)!

महावीर हनुमान जी की इस महती कृपा के फलस्वरूप मुझे सर्व प्रथम,१९५९ में हमारे सद्गुरु स्वामी जी महराज के दर्शन हुए और उन्होंने मुझे "नाम " प्राप्ति का अधिकारी पाया !(यह मेरे 'इष्ट' की मुझ पर सबसे बड़ी कृपा थी ) ! और उसके बाद सद्गुरु स्वामी जी के स्नेहिल आशीर्वाद से मेंरे जैसे अति साधारण व्यक्ति के जीवन में "आनंदस्वरुप प्रभु" से  मिलन का मार्ग दर्शन करवाने वाले अनेकों संतों के सत्संग का ताँता सा लग गया ! मेरा जीवन सार्थक करवा देने वाले अनेक महात्मा संतों , देवी सद्रश्य  साध्वी माताओं के दर्शन और उनके अति निकट आ पाने तथा  उनकी सेवा में अपने भजनों के नैवेद्य समर्पित  कर पाने के सुअवसर मुझे मिलते रहे ! जय गुरु देव !

चाहे आप जो भी कहें मैं उन महान विभूतियों के नाम आपको अवश्य बताऊंगा इस लिए कि मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि हम सब के"इष्ट" पालनहार, परमपिता, परमात्मदेव" कितने कृपालु हैं ! तभी तो हमारे जैसे साधारण सांसारिक , साधनहीन , गृहस्थ मनुष्य को केवल "स्वर साधना" द्वारा ही "ईश्वर" को याद कर लेने के कारण वरदान के रूप में उन्होंने हमे इतनी  सिद्ध आत्माओं के दर्शन करवा दिये !

इस सूची में मातृदेव,पितृदेव तथा आचार्यदेव को छोड़ कर उन सब विभूतियों के नाम हैं जिनके प्रत्यक्ष दर्शन एवं सत्संग से प्राप्त सुबुद्धि ,ज्ञान और शक्ति के सहारे, मैं आज
आपकी सेवा कर पा रहा हूँ !

श्री स्वामी सत्यानन्द जी      (१९५९) सद्गुरु , श्री राम शरणं ,दिल्ली
श्री प्रेमजी सेठी महाराज       (१९६१)     ,,              ,,        ,,     ,,
श्री स्वामी मुक्तानंद  जी      (१९७०)
श्री स्वामी अखंडानंद  जी       (१९७१)
श्री श्री माँ आनंदमयी जी       (१९७४)
श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी  (१९८३)
श्री डोक्टर विश्वामित्र जी  (वर्तमान सद्गुरु) , श्री राम शरणं ,दिल्ली

मेरी आत्म कथा में ,इन सब विभूतियों द्वारा मुझ पर की हुई उनकी अनन्य कृपाओं की कथाओं के अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है ! अस्तु चाहता तो हूँ की इन सभी गुरुजनों के साथ बिताये एक एक पल का हिसाब सविस्तार आपको दूं ! पर मेरे "वह" अनुमति दें , प्रेरणा के तरंग भेजें तभी यह सम्भव  हो पाएगा ! तब तक मौन रहना ही उचित है !

हाँ , प्रियजन , श्री श्री माँ आनंदमयी के सत्संग में व्यतीत किये कुछ दिव्य दिनों की कथा मैं  अपने ८ जुलाई २०१० के सन्देश से प्रारंभ करके अगस्त २०१० के प्रथम सप्ताह  के  संदेशों में सविस्तार दे चूका हूँ ! रोचक है ,शिक्षाप्रद है समय मिले तो पढ़ लीजियेगा !

शेष वहां से प्रेरणा प्राप्त होने के बाद !

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निवेदक:-  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

हमारे गुरुजन # 3 0 5

हनुमत कृपा - अनुभव                                                                                (३०५)
                                                   Param Pujya Shree Swami Satyanand Ji Maharaj                       
साधक साधन साधिये   

                                                     साधना के पथ प्रदर्शक -                    
         "हमारे सदगुरु"
                         
                पिछले अंकों में मैंने आत्मकथा द्वारा अपने ऊपर हुई एक महत्वपूर्ण "गुरु कृपा"
               (उस्ताद जी की नजरे इनायत) का वर्णन किया !
              औपचारिक रीति से उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहेब मेरे पहले 'विद्या गुरु' थे !
               इसके बाद १९५९ में मेरे परम सौभाग्य से मुझे मेरे आध्यात्मिक -धर्मगुरु 
       श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के दर्शन हुए!

जीवन का एक एक पल  मानव को प्रभु की अहेतुकी कृपा का अनुभव कराता हैं ! इन्सान को आनंद ,विषाद, पीड़ा , व्यथा , सुख-दुःख के सभी अनुभव "हरि-इच्छा" से होते हैं ! पर साधारण मानव (जिन पर उनके दुर्भाग्यवश गुरुजन की कृपा दृष्टी  नहीं होती ) वे नाना प्रकार की भ्रांतियों में भटकते रहते हैं ! ऐसे प्राणी आनंद और सुख के अनुभव का श्रेय  तो  अपने आप को देते हैं पर अपनी पीड़ा दुःख और विषाद के लिए ईश्वर को दोषी ठहराते हैं !

मैंने पहले कहीं कहा  है , एक बार फिर कहने को जी कर रहा है की मनुष्य को मानवजन्म प्रदान कर धरती पर भेजता तो परमेश्वर है लेकिन उसको इन्सान बनाता है ,उसको मुक्ति मोक्ष का मार्ग दिखाता है उसका "सद्गुरु" ! और यह सद्गुरु भी उसे उसके परम सौभाग्य 
से एकमात्र उस परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है !

युवावस्था में लगभग २५ वर्ष की आयु में "स्वर द्वारा" 'ईश्वर सिमरन' करने की शिक्षा पा कर , प्रातः सायं के कंठ संगीत का रियाज़ करते समय  प्रत्येक "षड्ज" के उच्चारण में उस परम प्रभु परमेश्वर को पुकारते रहने का जो अभ्यास मुझे उन ५-७ वर्षों में हुआ , उसके  फल स्वरूप मैं रेडिओ आर्टिस्ट या फिल्मो में प्ले बेक सिंगर तो नहीं बन सका पर मुझे जो अन्य उत्कृष्ट उपलब्धि हुई वह अविस्मरणीय है ,उससे मेरा जीवन धन्य हो गया सच पूछो तो मेरा यह जन्म सार्थक हो गया !

वह उत्कृष्ट उपलब्धि थी "सद्गुरु दर्शन" एवं उनके "कृपा पात्र" बन पाने का सौभाग्य !

१९५६ में मेरा विवाह एक ऐसे नगर मे हुआ जिसके लगभग सभी  प्रतिष्ठित निवासी परम संत श्री स्वामी सत्यानंदजी महाराज के शिष्य थे तथा उनके परिवार के सभी व्यस्क जन महाराज जी से दीक्षित थे तथा "राम नाम" के उपासक थे !मेरा परम सौभाग्य था यह !

                      भ्रम  भूल   में   भटकते  उदय  हुए  जब  भाग ! 
                      मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग!!

स्वामी सत्यानन्द जी उस युग के महानतम धर्मवेत्ताओं में से एक थे ! लगभग ६५ वर्षों तक जैन धर्म तथा आर्य समाज से सघन सम्बन्ध रखने पर भी जब उन्हें उस आनंद का अनुभव नहीं हुआ जो परमेश्वर मिलन से होना चाहिए तो उन्होंने इन दोनों मतों के प्रमुख प्रचारक बने रहना निरर्थक जाना और १९२५ में हिमालय की सुरम्य एकांत गोद में उस निराकार ब्रह्म की (जिसकी महिमा वह आर्य समाज के प्रचार मंचों पर लगभग ३० वर्षों से अथक गाते रहे थे)  इतनी सघन उपासना की कि वह निर्गुण "ब्रह्म" स्वमेव उनके सन्मुख "नाद" स्वरूप में प्रगट हुआ और उसने स्वामीजी को " परम तेजोमय , प्रकाश रूप , ज्योतिर्मय,परमज्ञानानंद स्वरूप , देवाधिदेव श्री "राम नाम" के महिमा गान एवं एक मात्र उस "राम नाम" के प्रचार प्रसार में लग जाने  की दिव्य प्रेरणा दी "

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शेष अगले अंक में
निवेदक:   व्ही . एन . श्रीवास्तव  "भोला"
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रविवार, 27 फ़रवरी 2011

"स्वर ही ईश्वर है" # 304

"हनुमत कृपा - अनुभव                                                            साधक साधन साधिये 

हमारा साधन - भजन                                                                                 ( ३ ० ४ )
                                                  
                                                       "स्वर ही ईश्वर है"

उस्तादजी से प्राप्त उपरोक्त सूत्र,"गुरु मन्त्र" के समान मेरे मन बुद्धि पटल पर, सदा सदा के लिए ,फौलादी अक्षरों में अंकित हो गया ! उस दिन के बाद मैं, अपने निजी अनुभव के आधार पर ,सम्पर्क में आये सभी संगीत प्रेमी प्रियजनों को कभी न कभी इस परम सत्य सूत्र की सार्थकता एवं उपयोगिता से अवगत कराता रहा !

इस प्रथम पाठ के बाद उस्ताद जी की देख रेख में अधिक से अधिक स्वरसाधना करने का हमारा कार्यक्रम कुछ दिनों तक यथावत चलता रहा !इस बीच उस्तादजी के "जतिगायन" का शोध कार्य समाप्त हो गया और उनका कानपुर आना जाना भी धीरे धीरे कम हो गया! तभी १९५६ में मेरा विवाह हुआ जिससे संगीत की साधना से मेरा ध्यान थोडा घटा पर जब १९६० में ,मेरी छोटी बहन माधुरी का विवाह ,लखनऊ में ही हो गया तब हमारा रेडिओ से सम्बन्ध लगभग टूट सा ही गया ! सारांश यह है कि उसके बाद उस्तादजी से अनेकों वर्षों तक हमारी मुलाकात नहीं हुई !

इस बीच उस्तादजी पूरी तरह से मुम्बई में बस गए!संयोग से सन १९९७ में हम भी मुंबई पहुंच गए ! इस समय तक वह विश्वविख्यात हो चुके थे ,भारत सरकार द्वारा "पद्मश्री" उपाधि के लिए मनोनीत हो चुके थे, एक फिल्म में "बैजू बावरा" का किरदार निभा चुके थे ,एक में "उमरावजान" के उस्ताद बनने का मौका भी पा चुके थे ! अनेक फिल्मों में संगीत निर्देशन करने के प्रस्ताव भी उनके सन्मुख थे ! मुंबई के हरिहरन ,सोनू निगम , कविता कृष्ण मूर्ति जी आदि अनेक सुप्रसिद्ध गायक उनके शिष्य बन चुके थे ! उस्ताद जी की प्रसिद्धि एवं सफलता आकाश छू रही थी !

यह उस्ताद जी की महान उदारता थी की उन्होंने फोन पर मेरी आवाज़ पहचान ली और मुझसे भेंट करने के लिए वह खुद ही बांदरा से अल्तामाऊंट रोड तक हमारे घर आने को तैयार हो गये! यह अनुचित होता इसलिए मैं स्वयं उनके घर गया ! उन्होंने मुझे गले लगाया ! "मेरे भोला भाई" कहकर उन्होंने मेरा परिचय घर में सबसे कराया ! यह मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य की बात थी की मेरे जैसे साधारण शागिर्द को उन्होंने याद रखा !

मैं आपको बताऊ की बीच के इन ५० वर्षों में मैं भी संगीत क्षेत्र में निष्क्रिय नहीं रहा था ! मैं इस बीच अपने इन्हीं उस्ताद जी के बताये महान सूत्र के सहारे, "स्वर में ही ईश्वर" के दर्शन करता कराता अपनी संगीत साधना में जुटा रहा !

उनसे प्राप्त वह "गुरुमंत्र" जीवन भर मेरी संगीत साधना का मूलाधार-प्रेरणा सोत्र बना रहा और केवल उसका अनुकरण करते हुए मैंने भक्ति संगीत के क्षेत्र में जो सीखा, जो सिखाया वह किसी भी अनपढ़ अज्ञानी अशिक्षित संगीतग्य के लिए असंभव था !

प्रियजन,मुझे उस्तादजी की दुआओं के कारण इस बीच अप्रत्याशित सफलताएँ भी हुईं !"षड्ज" के उच्चारण से "ईश्वर" को पुकार कर "उनसे" ही प्राप्त दैविक प्रेरणा के बल पर भक्ति संगीत के क्षेत्र में मैंने सैकड़ों गीतों की शब्द एवं स्वर रचना की और संसार की दृष्टि से लुकते-छिपते १९७३ से आजतक रामायण एवं भजनो के सात एल पी एलबम और १०-१२ केसेटों तथा सीडियों में शब्द -स्वर- संगीत संयोजन किया ! सम्भवतः उन भजनों को सुनकर और गाकर, अनेको भक्त हृदयों को आनंद की अनुभूति भी हुई!

याचना करके कहता हूँ कि मेरा यह कथन अहंकार से प्रेरित न माने ! मैं इस कथन द्वारा अपना वह दृढ विश्वास व्यक्त कर रहा हूँ जो मुझे उस्ताद जी से प्राप्त उस मन्त्र पर तथा अपने "इष्ट"की स्नेहमयी अहेतुकी कृपा पर सदा से है और जो दिन पर दिन स्थायी भी होता जा रहा है !




 "स्वर ही ईश्वर है"
तथा   
   " एके    साधे  सब सधे , सब साधे सब जाय " 
जिसमे आज मैं जोड़ रहा हूँ 
   " जो जन साधे एक स्वर भवसागर तर जाय "

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क्रमशः 
निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

हमारा साधन - भजन # 3 0 3

हनुमत कृपा -अनुभव                                                                                                          

साधक साधन साधिये                                                                         # ३ ० ३


औपचारिक विधि से नियुक्त अपने प्रथम "संगीत गुरु" जनाब उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहेब से इस मिलन के पहले मैंने अपनी दीदी और छोटी  बहन के म्युज़िक टीचरों
से,जब वह बहनों को संगीत सिखाने हमारे घर आते थे , तब कमरे के परदे के पीछे से या बगल के कमरे में छिप छिप कर बहुत कुछ सीखा था ! वो बेशकीमती धरोहर भी मेरी स्मृति पिटारी के कोनों में तब से आज तक सहेजी पड़ी है ! 

वह चोरी चोरी संगीत सीखने का अनुभव ,बालगोपाल कृष्ण कन्हैया  द्वारा गोकुल में गोप-गोपियों के घर से चुराए हुए माखन मिस्री की तरह बहुत मधुर था ! संगीत के प्रति मेरी रूचि बढाने और उसे स्थिर करने में वह मेरा बड़ा सहायक हुआ ! बहुत सी चीजें जो मैंने उन दिनों चोरी चोरी  सीखीं थीं मुझे आज ७०-७५  वर्ष बाद भी ज्यों की त्यों याद हैं ! उनकी चर्चा विस्तार से फिर कभी करुंगा अभी प्रियजन अपने उस्ताद , जी हाँ बिलकुल अपने ही उस्ताद "संगीत गुरु गुलाम मुस्तफा खान साहेब" से पाई शिक्षा के कुछ विशेष अंशों से आपको अवगत करा दूं !

उस दिन की कथा चल रही थी जिस दिन उस्ताद ने मुझे "गंडा" बांधा और कबीरदास जी की सद्गुरु संबंधी रचना अति सरसता से हमे सुनायी थी ! उसके बाद उन्होंने "सदगुरु" की भारतीय पुरातन ग्रंथों में वर्णित परिभाषा भी बतायीं !(सन्देश ३०१/३०२ देखें)

इसके उपरांत ही हमारी वास्तविक संगीत शिक्षा शुरू हुई ! प्रथम पाठ में उस्ताद ने हमेँ "स्वर साधना" का महत्व  बताया ! हमने पहली बार यह तथ्य उनसे ही सुना कि केवल एक स्वर "सा"( षड्ज) को ठीक से साध लेने से गायक के कंठ में सप्तक के सभी स्वर भली भांति सध जाते हैं ! उन्होंने यह समझाते हुए कहा था  : 

                               "एकै साधे सब सधे , सब साधे सब जाय " 

"एक" का महत्व समझाते हुए उन्होंने आगे कहा "भोला भाई ! हम इंसानों को दुनिया से यदि कुछ पाना है और अगर हमें बदले में इस दुनिया को कुछ भी देना है तो हमेँ "एक बस एक" सर्व शक्तिमान परमेश्वर  का  दामन पकड़ना होगा ! एक वह ही है जो हमें  सुबुद्धि देगा , हमें ऐसा मनोबल और शक्ति देगा जिसका प्रयोग कर के हम अपने उद्देश्य में सफल हो पाएंगे !"

"भोला भाई ! मुश्किल नहीं है यह ! तानपुरा उठाओ , अपने स्वर से मिलाओ, और फिर पूरे भाव-चाव से उस स्वर से स्वर मिला कर "सा" या "ॐ" या "राम"कहो तुम्हारा इष्ट  
चाहे जिस नाम का हो ,वह अविलम्ब  तुम्हारे सन्मुख प्रगट हो जायेगा क्योंकि 

                                               "स्वर ही ईश्वर है"

उस्ताद से सुने इस कथन की सत्यता का मैंने , तब १९५०-५५ से लेकर आज तक निजी रूप से कई बार अनुभव कर लिया है ! मैंने जब जब भी कोई उत्तम संगीत सुना अथवा किसी 'पहुंचे हुए' सिद्ध गायक के कंठ से निकला हुआ शुद्ध "सा" मेरे कानों में पड़ा मुझे रोमांच  हो गया , मेरी आँखें नम हो कर मुंद गयी और मन आनादित हो गया ! यह परम सत्य है कि समर्थ गायकों के अंतर्घट से उठे "षड्ज" स्वर की तरंगों के कानों में पड़ते ही श्रोताओं को उस परमानन्द की प्राप्ति होती है जो किसी प्रकार  भी साक्षात "हरिदर्शन" से कम नहीं है  ! गायक के "स्वर" में गूंजता "ईश्वर", श्रोताओं के हृदय झरोखों से झांकता हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देता है ! 

मुझे जीवन में इस प्रकार के "स्वर में ईश्वर दर्शन " के अनेको अनुभव हुए ,जो आपको आगे  कभी बताऊंगा ! हो सकता है आपने भी ऐसा अनुभव कभी न कभी अवश्य किया होगा ! कृपया उनके विषय में हमे बताएं जिससे अन्य  पाठकों को भी हमारे उस्ताद के इस परम सत्य कथन पर कि "स्वर ही ईश्वर है " दृढतम विश्वास हो जाये ! 


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क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

हमारी साधना - भजन # 3 0 2

हनुमत् कृपा - अनुभव                                                                                            साधक साधन सधिये
हमारा साधन - भजन                                                                                                                    # ३ ० २

"गुरु की महिमा":

सद्गुरु हो महाराज मो पे साँयी रंग डारा  !!

कबीर दास जी ने अपने इस पद में "सद्गुरू" को एक जादूगर बताया , एक रन्ग्रेज़ बताया , एक शक्तिशाली कुशल धनुर्धर बताया कबीर दास जी ने ! तब , १९५० के दशक के पूर्वार्ध तक मेरे कोई आध्यात्मिक गुरु नही थे ! सद्गुरु के महत्व को तब तक मैं तनिक भी नही जानता था ! गुलाम मुस्तफ़ा साहेब जो कुछ पल पहिले तक मेरे भाई सदृश्य थे, मेरी कलायी मे गण्डा बान्धने के साथ ही मेरे "संगीत के सदगुरु" बन गये थे ! और उस भजन द्वारा उन्होने हम दोनो नये शागिर्दो को गुरु महिमा का एक स्पष्ट संदेश दिया !

हमे अचरज तो तब् हुआ जब उन्होने ,"सद्गुरु की महिमा" दरशाते , भारत के प्राचीन ग्रन्थो से संस्कृत भाषा के अनेक श्लोक शास्त्रीय  रागो मे गा कर हमे सुनाये ! ये सभी श्लोक उन्हे कण्ठस्थ थे और वह अति दक्षता शुद्धता और मधुरता से उनका उच्चारण कर रहे थे ! हम दोनो शागिर्द मन्त्र मुग्ध हो कर सुनते रहे ! किसी श्लोक का भावार्थ हमे समझाते हुए उन्होने कहा,
सद्गुरु वह है जो तुम्हारे भाग्योदय का प्रतीक बन कर तुम्हारे जीवन मे तब आता है जब परमात्मा की असीम अनुकम्पा तुम पर होती है !
सद्गुरु वह है जिसके दर्शनमात्र से मन आनन्दित हो जाता है ! आँखें भर आती है !
सद्गुरु वह है जिसके चरन शरन मे एक बार आजाने के बाद , उनके चरणो पर से अपना मस्तक पल भर को भी हटाने को जी न चाहे !
सद्गुरु वह है जिसके अमृत वचन सुनने से मन कभी नही अघाये , अधिक से अधिक उनकी "अमृतवाणी" सुनते रहने को जी करे !
हमारे लिये तब तक सदगुरु को परिभाषित करने वाला ये सारा ज्ञान बिल्कुल नया ही था ! हम तब की परम्परा के अनुरूप गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश माता पिता तो मानते थे पर उनसे इतना प्रेम नही करते थे !

उस्ताद ने किस श्लोक के आधार पर हमे ये बताया था हमे नही मालूम !


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शेष अगले संदेश मे

निवेदक : व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"

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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

हमारी साधना - भजन # 3 0 1

हनुमत कृपा - अनुभव                                                           साधक साधन साधिये 

हमारी साधना - भजन                                                            ( ३ ० १ )


तारीख़ महीना साल अब कुछ भी याद  नहीं ! ५०-६० साल पुरानी डायरियां भी हमारे ७५ वर्ष पुराने मकान की अलमारियों से धीरे धीरे गायब होगयीं शायद दीमकों ने उन्हें स्वाहा कर दिया ! हाँ, तो १९५० के दशक में कभी ,हमारे बहत अनुरोध पर ग्वालटोली बाज़ार के किसी मकान की एक छोटी सी कोठरी में गुलाम मुस्तफा साहेब ने कानपूर में अपना एक छोटा सा अस्थायी विद्यालय बनाना स्वीकार किया ! 

मुझे गर्व है कि उन्होंने कानपूर में अपने प्रथम शागिर्द के रूप में मुझे और मेरे छोटे भाई जैसे स्थानीय सुगम संगीत प्रेमी पड़ोसी संतू श्रीवास्तव को स्वीकार किया ! मुस्लिम काल के संगीत घरानों की परंपरा के अनुसार हम दोनों शागिर्दों को दीक्षा देने  की सारी व्यवस्था उस्ताद की मन्त्रणा अनुसार संतू भाई  ने की !

पारम्परिक हिन्दू गुरुजन जिस प्रकार रोली टीका कर के कलाई में 'कलावा' बांधते हैं वैसे ही हमारी कलायी में मुस्तफा साहेब ने "गण्डा" बाँधा ! हम दोनों उनके शागिर्द हो गये ! इसके अतिरिक्त और क्या क्या हुआ वह कुछ भी याद नहीं ! संतू ,लाल कुँए के पास के हलावाई की जलेबिओं का एक बड़ा दोना , हनुमान जी के मंदिर में प्रसाद चढ़ा कर ले आया ! हम सब ने बड़े प्रेम से प्रसाद पाया ,तब तक पास का चायवाला मिट्टी के सकोरों में चाय भी दे गया !  

संगीत विद्यालय था , कुछ संगीत तो होना ही था ! इधर उधर से मांगमूंग कर तानपूरा  तबला और बाजा लाया गया था ! आप सोच ही सकते हैं कि साधारण हिन्दू गृहस्थों के घर के साज़ किस स्टेंडर्ड के होंगे ! तानपुरा स्त्रियों की गायकी में काम आने भर का था! पुरुषों के ऊँचे स्वर तक उसे मिला पाना कठिन था !

उस्तादजी ने कुछ आपत्ति नहीं की ! उसी तानपुरे को किसी प्रकार मर्दाने स्वरों तक चढा कर मिला लिया ,और आँखें मूँद कर गर्दन नीचे झुकाए हुए ,अपने कंठ से जो स्वर उन्होंने भरा तो , मेरी आँखें भर आयीं ! कैसे बताऊं ,कितनी मिठास थी, कितनी तडप थी, कितना दर्द था, कितनी पीड़ा थी, उस एक स्वर में ? स्वर साधन करने के बाद उन्होंने मेरी रूचि का आदर करते हुए कबीरदास जी  का यह भजन गाया ! हमे आज वह भजन इसलिए याद आ गया क्योंकि इसके लगभग ४० वर्ष बाद ,१९८० =९० के दशक में वह एक बार कानपूर आये थे और  हमारे घर के सत्संग भवन में हमारे आध्यात्मिक गुरुदेव के चित्र के समक्ष उन्होंने वही भजन गाया था जो हम सब को बहुत अच्छा लगा ! हमारे माधव जी तो उस दिन से यह भजन अक्सर गाते रहते हैं !हमने उस दिन यह भजन रिकार्ड भी कर लिया था और वह रेकार्डिंग अभी भी हमारे पास है ! व्यवस्था हो जायेगी तो प्रियजन किसी दिन आपको सुनाऊंगा भी ! वह भजन था :-

 सतगुरु हो महाराज मोपे सांई रंग डारा !
शब्द की चोट लगी मेरे मन में बेंध गया तन सारा !
औषधि  मूल  कछू नहीं लागे  का करे  बैद बिचारा ! 
सुर नर  मुनि जन  पीर औलिया कोई न पावे पारा !
कहत  कबीर  सरव रंग  रंगिया  सभी रंग ते न्यारा!  
                                    सतगुरु हो महाराज मोपे सांई रंग डारा !

इसके अतिरिक्त उस्ताद ने एक और भजन सुनाया था , वह भी फिर कभी बताऊंगा ! आज इतना ही !

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क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

हमारी साधना - भजन # 300

Ustad Ghulam Mustafa Khan                                 हनुमत कृपा - अनुभव 
पद्म भूषण
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान  
     
       साधक साधन साधिये                       हमारी साधना - भजन कीर्तन   (३ ० ० )


जब १९५०-६० के दशक में  मैं पहली बार मुस्तफा साहेब से मिला तब मेरी उम्र रही होगी २४-२५ के दरमियाँ और उस्ताद मुझसे एकाध वर्ष छोटे २२ -२३ वर्ष के रहे होंगे ! उन दिनों मैं अपनी छोटी बहन माधुरी श्रीवास्तव का अभिभावक और संगीत शिक्षक बनकर उनका  रेडिओ कार्यक्रम करवाने  जाया करता था ! अन्य कलाकारों की अपेक्षा माधुरी उस समय उम्र में काफी छोटी थी ! वह १५ - १६ वर्ष की अवस्था में ही रेडिओ पर  गाने लगी थी  और हाँ थोड़ा जादू मेरी सरस "शब्द एवं स्वर रचनाओं " का भी था  (क्षमा प्रार्थी हूँ ,अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने का अपराध जो कर रहा हूँ ) जिसके कारण हम दोनों भाई बहन ," भोला माधुरी", उन दिनों लखनऊ रेडिओ स्टेशन में काफी प्रसिद्द हो गये थे !

शायद उन्ही दिनों मुस्तफा साहेब भी रेडिओ स्टेशन से जुड़े थे ! अस्तु हम दोनो 'हमउम्र' व्यक्तियों में भाइयों का सा सम्बन्ध होना स्वाभाविक ही था ! और एक बात थी कि दोनों ही संगीत में रूचि रखते थे ! अंग्रेज़ी में एक मशहूर कहावत है "Birds of the same feather flock together" (इसके बराबर की हिंदी कहावत नहीं याद आ रही है, कृपया कोई बताये प्लीज़) ! हम दोनों - गुलाम मुस्तफा साहेब और मैं,उस समय से आज तक इस कथन को भली भांति चरितार्थ कर रहे  हैं !

प्रियजन , वह मुझे मित्रों जैसा भरपूर स्नेह देकर मुझे "भोला भाई" कह कर संबोधित करते थे ! "मौसीकी' के किसी कोण से मैं उनका मुकाबला नहीं कर सकता !सच पूछिए तो वह तब (आज से ५०-६० वर्ष पहले भी ) संगीत के आकाश में वैसे ही प्रकाशमान थे ! मैं मानता हूँ कि वह संगीत के सूर्य हैं और मैं एक जुगनू भी नहीं हूँ ! 

अनेकों पीढ़ियों से संगीत की सेवा करने वाले बदायूं के इस होनहार संगीतग्य का मित्र कहला पाना भी मेरे लिए बड़े गर्व की बात तब भी थी और आज भी है ! मेरे विषय में तो आप सब जानते ही हैं कि मैं , सांसारिक उत्तरदायित्व निभाने और अपने परिवार की परवरिश करने के लिए ज़िन्दगी भर, पेशे से "चर्मकार" बना रहा और रोज़ी रोटी के सिलसिले में देश-विदेश भटकता रहा , और परमात्मा की इच्छा से मेरा "संगीत" केवल भजन लेखन और गायन तक सीमित रहा जिनमे मुझे असाधारन उपलब्धियां भी हुई,!
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                    सो सब तव प्रताप रघुराई , नाथ न कछू मोरि प्रभुताई 

अब मुझे ऐसा लगता है जैसे ईश्वर ने मुझे "संगीत" का दान केवल सन्मार्ग दिखाने  और उस राह पर चलते हुए स्वयम स्वधर्म पालन करने और अपने प्रिय स्वजनों  को भी उस पथ पर सतत चला कर उनके साथ मिलकर समवेत स्वरों में "हरि गुणगान"  करने के लिए ही दिया है !

हाँ ,तब १९५०-५५ में ,जब मैं कानपूर में ही था,मेरे पुरजोर अनुरोध पर गुलाम मुस्तफा साहेब  मुझे संगीत सिखाने को राजी हो गये ! यह मेरा सौभाग्य था और मेरे लिए बड़े गर्व की बात थी ! 

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क्रमशः 
निवेदक: वही. एन. श्रीवास्तव "भोला"                                        

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन # 2 9 9

हनुमत कृपा - अनुभव                                            साधक साधन साधिये 

साधन - भजन कीर्तन                                                                  २ ९ ९ 



"संगीत शिक्षा"


उस जमाने में ( १९३०-४० के दशक में ) मध्यम वर्ग के कायस्थ परिवार में यदि विवाह के योग्य एक कन्या हो तो ,यह आवश्यक हो जाता था की घर पर ही एक म्यूजिक टीचर लगाकर बिटिया को बाजे  पर "स रे ग म प ------"  निकालना सिखा दिया जाय ! ऐसा था कि उन्रदिनों अधिक वर पक्ष वाले ,कन्या  में अन्य गुणों के साथ साथ यह भी चाहते थे की कन्या को थोडा बहुत गाना बजाना जरुर आना चाहिए !

मेरी उषा जीजी  अभी १२ वर्ष की ही थीं जब उनके विवाह की चिंता घर वालों को सताने लगी ! कलकत्ते से हार्मोनियम मंगवाया गया और उन्हें संगीत सिखाने के लिए म्यूजिक मास्टर की तलाश शुरू हुई ! कानपूर में उन दिनों तो तीन संगीत टीचर ही थे !जोगलेकर जी , बलवा जोशी जी और बोडस जी ! इन  तीनों में से नेत्रहीन श्री जोगलेकर जी हमारे घर के पास में रहते थे और उन्होंने उषा जीजी को संगीत सिखाना शुरू किया !जब वह सीखती थीं , तब ८-१० वर्ष का मैं भी उनके निकट बैठ जाता था ! समझिये इस प्रकार मेरी संगीत शिक्षा का  शुभारम्भ हुआ ! जीजी का विवाह हो जाने तक रुक रुक कर यह शिक्षा चली.

बाकायदा मेरी संगीत सिक्षा शुरू हुई बहुत बाद में ,१९५० के दशक में !

पद्मभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहिब का उन दिनों (१९५० के दशक में) अक्सर  कानपुर आना जाना  होता था ! उस्ताद तब कानपूर के प्रोफेसर ब्रहस्पति जी के साथ मिलकर , आज  से लगभग ८०० वर्ष पूर्व  मतंग ऋषि द्वारा रचित नाट्य शाश्त्र में वर्णित "जति गायन" की भूली बिसरी पद्धति का व्यावहारिक प्रयोग करके उस गायन पद्धति की पुनर्जीवित  करने का प्रयास कर रहे थे !

सहसवान-रामपुर -ग्वालियर घरानो से सम्बन्धित गुलाम मुस्तफा खान साहेब ,बदायूं के (मरहूम) उस्ताद इनायत हुसैन खान के बेटे और रामपुर के (मरहूम) फिदाहुसैन साहेब के नाती हैं ! उनके  मामू (मरहूम) निसार हुसैन खान साहेब ने उन्हें अपनी शागिर्दी में लेकर उनसे इतनी सुंदर तैयारी करवायी की छोटी अवस्था में ही वो अति सुगमता से संगीत के चार स्वर सप्तकों पर सुगमता से विचरण कर लेते थे ! उनका कंठ अति मधुर था ! थोड़े समय में ही वह तराना गायकी में अपने मामू साहेब के समानंतर हो गये !

उन दिनों मैं अपनी छोटी बहेंन माधुरी को उसके सुगम संगीत के प्रोग्राम प्रसारित करने के लिए अपने साथ आकाशवाणी लखनऊ ले जाया करता था ! अभी याद नहीं कि किसने हमें गुलाम मुस्तफा साहेब से मिलवाया था पर बहुत संभव है कि रेडिओ स्टेशन के संगीत विभाग के  जनाब शफाअत अली साहिब ने हमारी मुलाकात उनसे करायी होगी !


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क्रमशः
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
  

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

साधन-भजन कीर्तन # 2 9 8

हनुमत कृपा -अनुभव                                                          साधक साधन साधिये

साधन-भजन कीर्तन                                                                              ( २ ९ ८ )

भक्ति संगीत (भजन) का प्रभाव

संगीत मार्तण्ड पन्डित ओमकारनाथ जी हमारे बी.एच .यू. के संगीत महाविद्यालय के संस्थापक और प्रथम प्राचार्य थे ! उन्होंने महामना मालवीय जी की मन्त्रणा से भारतीय शाश्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार हेतु इस विद्यालय की स्थापना करवायी थी !

यह उनके दिव्य ( जी हाँ दिव्य ) संगीत का आकर्षण था जिसने सैकड़ों संगीत प्रेमियों को ,विश्वविद्यालय के रुरिया  हॉस्टल के सामने वाले  घास के मैदान में, बिना किसी तम्बू-कनात के , डायरेक्ट "नीले गगन के तले ,तारों की छैयां में " शीतकाल की शीतल ओस में भींगते हुए,बिना किसी शिकवा शिकायत के सारी रात बिठाये रखा !

मेरे जीवन का यह पहिला अवसर था जब मुझे ऐसे दिव्य गायक के इतने निकट बैठकर   उनका संगीत सुनने का सुअवसर मिला ! पंडित जी के गायन में जो एक प्रमुख विशेषता मुझे उस समय लगी , वह यह थी की वह कोई भी गायन (ख्याल - भजन कुछ भी ) शुरू  करने के पूर्व कुछ समय को आँखें बंद कर के "ध्यान" लगाते थे और जो पहिली ध्वनी उनके कंठ से निकलती थी वह प्रनवाक्ष्रर "ॐ" जैसी थी ! गुरु से प्राप्त "मन्त्र" के समान मेरे जहन में उसी   समय यह बात बस गयी कि अपना कार्यक्रम प्रारम्भ करने से पहले हर गायक को अपने "इष्ट"का सिमरन अवश्य कर लेना चाहिए !

प्रियजन ! मेरा ये "ओब्ज़रवेशन" १९४७-४८ का है ! मैंने उस समय तक इतने निकट से  किसी अन्य विख्यात संगीतग्य को गाते हुए नहीं देखा था ! हो सकता है की उस जमाने में  अन्य गायक भी ऐसा करते रहे होंगे !

सुगम संगीत तथा काव्य में मेरी रूचि के कारण आकाशवाणी से सम्बन्धित हो जाने पर मुझे ,१९४७ से आज २०११ के बीच , ६४-६५ वर्षों में भारत के अन्य बड़े बड़े संगीतज्ञों से मिलने का मौका मिला !और मैंने देखा कि एक तरह से सभी स्वर-संयोजक , गायक , वादक अपना प्रोग्राम शुरू करने से पहिले "स्टेज" को सर नवाते हैं और  श्रद्धा से अपनीं आँखें मूँदकर अपने ईश्वर-खुदा को याद करते हैं !

अत्यंत निकट से, परिवार के माहौल में घर पर ही मुझे नौशाद साहेब , पंडित जसराज जी, गुलाम मुस्तफा साहेब, मुकेशजी,कविता कृष्णमूर्ति जी,हरिओम शरणजी, वाणी जयराम जी तथा पंकज उदास जीआदि अनेक जाने माने संगीतज्ञों से मिलने का अवसर मिला !मैंने इन सभी प्रतिष्ठित संगीतज्ञों को कार्यक्रम के पहिले अपने इष्ट को उसी भाव से याद करते हुए पाया ! संगीत उनके इबादत ,उनकी साधना का प्रमुख साधन है !

उतनी सघन साधना के साथ प्रस्तुत संगीत क्यों नहीं हृदय छुएगा , क्यों नहीं सुनने वालों की आँखों को नम करेगा ?, क्यों नहीं उनके रोम रोम को झंकृत कर देगा ?

प्रियजन, विश्वास करिये श्रोताओं को ऐसा भक्ति संगीत सुनकर अवश्य ही उनके अपने "इष्ट" का प्रत्यक्ष दर्शन हो जायेगा !

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निवेदक: व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन - # 2 9 7

हनुमत कृपा - अनुभव                                                      साधक साधन साधिये 

साधन-"भजन कीर्तन"                                                                         ( २ ९ ७ )

"भजन साधना"

"भजन साधना"  से आध्यात्म के क्षेत्र में सच्चे साधक के लिए कोई भी उपलब्धि असंभव नहीं इस बात पर मुझे पूरा विश्वास है ! बात केवल इतनी  है कि जहाँ मैं अपने निजी साधारण अनुभव भी पूरे भरोसे के साथ आपको बता सकता हूँ ,दुसरे लोगों के अनुभव उतने भरोसे से नहीं बता पाउँगा ! इसी से मैं अपने संदेशों को अपने निजी अनुभवों तक ही सीमित रखता हूँ !

मेरे जीवन में "भजन साधना" का शुभारम्भ 

पिछले सन्देश में मैंने आपको कुछ ऐसे ही दिव्यआत्माओं के नाम बताये जिन से प्रेरणा पाकर मैंने अपनी किशोरअवस्था में ही गायन के क्षेत्र में फिल्मी गीतों के साथ ही भजनों को और पारम्परिक गीतों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी ! १८ वर्ष की अवस्था में  हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्धयन के दौरान (१९४७ - १९५१ में)मैं केवल मुकेश जी और जनाब  रफी साहेब के फिल्मी गाने ही गाता था ! पर वहीं मुझमे एक चमत्कारिक परिवर्तन हुआ !

उन्हीं दिनों मुझे बी.एच. यु. में आयोजित संगीत मार्तण्ड ठाकुर ओमकार नाथ जी के एक शास्त्रीय   संगीत के कार्यक्रम में वालन्टिअरिन्ग के बहाने शामिल होने का अवसर मिला!    जाड़े की वह पूरी रात  मैंने शून्य से उतरती पूर्ण चन्द्र की शीतल ओस सनी सजल किरणों में भींज कर काटी ! ठाकुर जी के स्वरों की गर्माहट ने उस शीतल रात्रि को इतना गरमा दिया था कि किसी को भी कोई ठिठुरन नहीं हुई ! उनके सधे हुए स्वरों के उतार चढ़ाव से हम सब श्रोताओं के रोम रोम एक विचित्र सिहरन से थिरक गये और हम सबकी आँखों से झरती गर्म अश्रु धारा से वह सारी महफिल गरमा गयी ! संगीत से प्रवाहित आनन्द -रस से सभी अपनी सुध -बुध  भूल गये ! श्रोताओं  की  सारी रात पंडित ओमकारनाथजी  की हृदय की गहराइयों को छूने  वाली  संगीत -कला का आनन्द लेते हुए कट गई ! 

प्रातः कालीन सूर्य की सुनहरी किरणे नीलाकाश में  पूर्व दिशा से झाकनें  को उद्धयत हो  रहीं थीं ! बचे हुए प्रबल संगीत प्रेमी पंडाल से उठने को तैयार न थे ! पर समापन तो होना ही था ! श्रोताओं के विशेष अनुरोध पर पंडित जी ने सूरदास जी का वह पद गाया जिसका उल्लेख मैंने अपने पिछले सन्देश में किया है --

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
भोर  भयो  गैयन  के  पाछे  मधुबन  मोहि   पठायो !
चार  पहर  बंसी  बन    भटक्यो  साँझ परे घर आयो !!
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यह ले अपनी लकुटी कमरिया बहुत ही नाच नचायो ,
सूरदास तब  बिहंसि  जसोदा , ले उर  कंठ   लगायो !!
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सूरदास जी की इस रचना में माता यशोदा और बालक कृष्ण के बीच हुई नोकझोंक में जो     जो भाव प्रगट हुए पंडित जी ने अपने कंठ से उन सब भावों का अलग अलग शास्त्रीय   राग-रागिनियों और पारंपरिक धुनों द्वारा ऐसा सजीव  चित्रण  किया कि श्रोतागण को ऐसा लगा जैसे वे "नंदालय" के आंगन में बैठे हैं और वह "बाल लीला" उनके सन्मुख ही  हो रही है ! वहां का सारा वातावरण परमानन्द मग्न हो गया !

अनुमान लगाओ प्रियजन ! कि उस पल वहां उपस्थित हम सब संगीत प्रेमियों की मनः  स्थिति कैसी रही होगी ?  सबकी छोडिये , मेरी सुनिए मुझे  तत्काल जो आनंद मिला था वह प्रत्यक्ष कृष्ण दर्शन से किसी भांति कम न था ! यह आनंद वैसा ही था जैसा कदाचित मेरी अम्मा को तब प्राप्त हुआ था जब मैं ५-६ वर्ष का था और मैंने उन्हें "ध्यान" में अपने बालगोपाल के दर्शन के बाद मुस्कुराते हुए देख लिया था (विस्तृत वर्णन पहिले दे चुका हूँ)

इसके अतिरिक्त पंडित जी के उस कार्यक्रम ने मेरे मन में भजन गायन के भाव जागृत  करा दिए और संगीत के लिए एक नयी उमंग ऊर्जा मुझमें प्रवाहित हो गयी !

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निवेदक :- वही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन # 2 9 6


हनुमत कृपा                                                              साधक साधन साधिये 

साधन - भजन कीर्तन                                                                   ( २ ९ ६ ) 


                                           


भजनों का दिव्य प्रभाव

भजनों के शब्दकार  तथा गायकों की आध्यात्मिक स्थिति के विषय में चर्चा करते हुए 
किसी  महापुरुष ने अपने एक प्रवचन में कहा कि गाने योग्य, भगवत प्रेम से  ओतप्रोत 
साहित्य की रचना करने वाले तथा गेय रचनाओं को संगीत बद्ध कर के गानेवाले साधारण 
जीवधारियों जैसे दिखने वाले व्यक्ति वास्तव में दिव्यगुण संपन्न महात्मा  होते हैं !प्रभु उनसे अतिशय प्रीती करते हैं ! ऐसे गायक भक्तों में उन्होंने आदि शंकराचार्य ,तुलसी ,मीरा ,सूर ,कबीर, स्वामी हरिदास आदि अनेक नाम बताये ! ये सब महापुरुष तो सदियों पूर्व इस धरती पर आये थे !

मैं अपनी याददास्त से उपरोक्त गायकों के अतिरिक्त इस शताब्दी में जन्मे , पर अब दिवंगत महागायकों के नाम तथा उनके प्रेरणादायक अमर भजनों की सूची यहाँ दे रहा हूँ जिन भजनों को सुन कर मुझे  भजन गाने की प्रेरणा मिली :
  • पंडित ओंकार नाथ ठाकुर जी :   "मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ",
  • श्री डी. वी . पलुस्कर जी :   " पायो जी मैंने राम रतन धन पायो "
  • श्री भीमसेन जोशी जी :   " जो भजे हरी को सदा ,वो परम पद पायेगा "
  • श्री दिलीप  राय:  " तुने क्या किया ये बता तो सही मेरा चैन गया मेरी नींद गयी"
  • श्री  के .एल .सहगल जी :   " नैन हींन को राह दिखा प्रभु पग पग ठोकर खाऊं मैं "
  • श्री हरिओम शरण जी :  " ऐसा प्यार बहा दो मैया " 
  • श्री  मुकेश जी :   " सुर की गति मैं क्या जानू  एक भजन करना जानू " 
  • जनाब रफी साहेब :   " पांव पडूँ तोरे श्याम ब्रिज में लौट चलो "
आज भी अपनी मधुर वाणी से हम सब को दिव्य आनंद प्रदान करने वाले निम्नलिखित संगीतज्ञ गायकों के भजन हमारे हृदय में भक्ति भाव का अनायास ही संचार करवा देते हैं 

पंडित जसराज जी, मिश्र बंधू राजन-साजन जी , जगजीत सिंह जी, पुरुषोत्तम दास जलोटा जी एवं उनके पुत्र अनूप जी, पंकज उधास जी, आदि  पुरुष गायक !  देवियों में   मेरी जानकारी में प्रमुख हैं बंगाल की सुश्री जूथिका राय , श्रीमती दीपाली ताल्लुकदार जी, संध्या मुखेर्जी जी ! विश्वप्रसिद्द गायिका  एम् एस सुब्बुलक्ष्मी किशोरी अमोनकर जी , लताजी, आशाजी, कविता कृष्णमूर्ति जी ,आदि के मधुर भजनों को कौन भुला सकता है.!

बचपन से केवल उपरोक्त भजनों को सुन सुन कर मैंने भजन गाना सीखा है ! अस्तु ये सभी गायक मेरे संगीत गुरु हैं ! मैं सब को ही श्रद्धा सहित प्रणाम करता हूँ ! अवश्य ही बहुत से प्रमुख गायकों के नाम मेरे स्मृत पटल से मिट चुके होंगे ! अब इस उम्र में सब कुछ याद रख पाना असंभव है ! उनसे क्षमा मांगता हूँ !

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निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"