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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

पाठकों के नाम खुला पत्र # 3 4 8

एक सूचना 
इस ब्लॉग के पहले वाले ब्लॉग के प्रेषक अतुल जी ने जिन्हें "बाबू" कहकर संबोधित किया है वह  ग्वालियर के श्री जगन्नाथ प्रसाद जी ,स्वामी जी महराज के एक अतिशय प्रिय शिष्य 
और मेरी धर्म पत्नी कृष्णा जी के बड़े भाई थे ! १९५९  में इन्होने ही पहली बार 
मुझे स्वामी जी से मिलवाया था और मुझे उनसे "नाम" दिलवाया था ! 
"भोला"
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इस ब्लॉग की प्रथम वर्षगांठ पर 
पाठकों के  नाम  एक  खुला  पत्र
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किसी महापुरुष के प्रवचन में सुना कि "आज के मानव को,उसकी व्यस्त जीवनशैली के कारण विधिवत पूर्ण औपचारिकता के साथ ईश्वर की उपासना कर पाने का अवकाश ही नहीं मिलता, अपनी इस असमर्थता के कारण ऐसे लोगों को निराश हो कर बैठ जाने के बजाय साधना का यह सरलतम साधन अपना लेना चाहिए "!

महापुरुष ने आगे बताया कि  "प्रातः निंद्रा से उठते ही बिस्तर पर बैठे बैठे ही सर्व प्रथम अति प्रेम से अपने इष्ट देव का सिमरन चिन्तन करे ! अपने इष्ट देव को अपनी सारी उपलब्धियों, सफलताओं ,खुशियों की प्राप्ति में मददगार बनने के लिए ,उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आंसुओं से भरे नैनों और गदगद कंठ से उन्हें हार्दिक धन्यवाद दे ! करुणानिधान प्रभु इतने से ही प्रसन्न हो जायेंगे "!

इस सन्दर्भ में लीजिये मैं सबसे पहले अपनी ही प्रातःकालीन प्रार्थना आपको सुना दूं !इसके भाव तो नित्य एक ही होते हैं केवल शब्द बदलते रहते हैं !आज की शब्दावली इस प्रकार बन रही है  :


धन्यवाद  तेरा  प्रभु  तू  दाता सुख भोग 
जीवन की सब सफलता आनन्द के संयोग

जो कुछ मेरे पास है ,तेरा ही है दान
मैं इठलाता फिर रहा सब कुछ अपना मान

अर्पण करने को नहीं कुछ भी मेरे पास
खाली हाथ खडा यहाँ  ले दरसन की आस 

हर लो मेरा अहम् औ मेरे सभी विकार
भेंट समझ मेरी इसे, करलो प्रभु स्वीकार

धन्यवाद बस धन्यवाद बस धन्यवाद का गान  
मेरी पूजा मान कर , स्वीकारो भगवान  

"भोला"

प्रिय पाठकगण ,संदेशों का यह क्रम प्रारंभ करते समय मैंने स्पष्ट किया था कि 'स्वान्तः सुखाय" तथा सर्वथा निज स्वार्थ सिद्धि की लालसा से प्रेरित होकर मैं यह कार्य राम काज मान कर प्रारंभ कर रहा हूँ !

प्रियवर राजीव कुलश्रेष्ट जी , श्री भूपेंदर सिंह जी, श्री गोरख नाथ शाव जी श्री  चैतन्य शर्मा जी,"सारासच" जी ,Patali-the Village ji , तथा सुश्री  दिव्या जी  (ZEAL) , सुश्री शालिनी  जी, शिखा जी , संगीता स्वरूप जी --पिछले एक वर्ष में मैंने कितनी बार यह लेखन बंद करने पर विचार किया पर आपने मुझे रोक दिया! आप के प्रोत्साहन ने मुझे अपना यह विशेष "राम काम" करते रहने की प्रेरणा दी ! मेरी साधना चलती रही , मेरी उपासना होती रही !  मैं आपका कितना आभारी हूँ , कह नहीं सकता ! पर मुझे अटपटा लगता है ,आप में से कोई मुझे धन्यवाद देता है या कोई आभार प्रगट करता है मेरे इन आलेखों के लिए !

मेरे विचार में हम सबके धन्यवाद के पात्र तो हमारे प्यारे प्रभु "श्रीराम" हैं  जिन्होंने २००८ में मुझे जीवन दान देकर आदेश दिया था कि मैं अपनी और "उनकी " घनिष्ठ -परस्पर प्रीति के विषय में मुखर हो कर अपने अनुभवों को शब्द, सन्देश ,कविता, एवं स्वर संगीत (गायन) में परिणित करके "आत्म कथा" के रूप में संसार के समक्ष रखूँ !

प्रियजन, वास्तव में यह ब्लॉग लिख कर और उनमे अपनी भक्तिमय  रचनाएँ स्वयम गाकर  मैं "अपने इष्ट" के आदेश का पालन कर रहा हूँ !  मुझे उनका हुकुम बजाने में बहुत आनंद भी आरहा है !जितनी देर सन्देश लिखता हूँ मेरा  "हरि सुमिरन" और "नाम जाप" चलता ही रहता है ,और समापन के बाद भी  "नाम - खुमारी" टूटती नहीं !  इस शुभ विचार से कि मेरे सभी प्यारे प्यारे पाठक इस का पाठ करके अपने अपने इष्ट देवों को याद कर रहे होंगे ,मेरी खुमारी और बढ़ जाती है और मुझे  देर तक परमानंद का अनुभव होता रहता है ! 

इसलिए अपने सभी स्नेही स्वजन पाठकगण से मेरा करबद्ध निवेदन है कि आप मेरे  इन संदेशों में केवल अपने अपने इष्ट देवों का वैभव ,उनका सौन्दर्य और उनकी प्रतिभा के दर्शन करें ! उनका कृपा प्रसाद मान कर इनमें निहित दैविक आनंद ग्रहण करें ! आपको आपके "इष्ट" से मिला कर मैं पुण्य का भागी बन जाऊ , यह मेरा स्वार्थ है !

हाँ , लेकिन मुझे भुलाएँ नहीं ! हो सकता है कभी अहंकार के वशीभूत हो, मैं कुछ अनाप
शनाप लिख दूं ! प्रियजन निःसंकोच तत्काल मेरी भूल  मुझे बताइएगा !

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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

महाराज जी की जयन्ती के अवसर पर उनके एक परम प्रिय शिष्य श्री जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के पुत्र अतुल श्रीवास्तव का पत्र

सभी परिवार जनों को यथा योग्य सादर चरण स्पर्श एवं राम राम

आज (दिनांक 18 अप्रेल 2011) परम पूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की 150 वीं जयन्ती एवं श्री हनुमान जयन्ती है. स्वामी जी महाराज का जन्म सन 1861 की चैत्र शुक्ल पूरणमासी के दिन प्रात: 5 बजे हुआ था. श्री हनुमान जी का जन्म भी प्रात: 5 बजे हुआ था. अतएव मेरी धारणा है कि स्वामी जी महाराज हनुमान जी के अवतार थे, जो कलियुग में हम सब को राम नाम का अति मीठा रस पिलाने के लिये अवतरित हुए थे. उनकी 150वीं जयंती की सबको बधाई. ईश्वर करे स्वामी जी महाराज का वरद हस्त हम सब के सिर पर सदा बना रहे. इस विशेष उत्सव पर हम सब अमृतवाणी का पाठ करेंगे और स्वामी जी महाराज के प्रिय भजन ‘राम अब स्नेह सुधा बरसा दे’, ‘दयामय मंगल मन्दिर खोलो’ आदि गायेंगे एवं जाप करेंगे.

2008 अप्रेल में स्वामी जी महाराज की कृपा से, हम लोग (सुनीता, स्तुति, अमित, छोटे से अथर्व करुणानिधान और मैं) डलहौज़ी गये थे. पूज्य स्वामी जी महाराज के जन्म दिन पर हम लोगों को ‘परम धाम’ में अमृतवाणी का पाठ करने का सुअवसर स्वामी जी महाराज की कृपा से मिला था. बहुत आनन्द आया था. कुछ भजन भी, जिनमें ऊपर लिखे हुए भजन भी थे, गाये थे.

11 वर्ष पूर्व आज ही के दिन, स्वामी जी महाराज के परम शिष्य - परम पूज्य बाबू चोला छोड़ कर पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन हो गये थे. इस वर्ष हनुमान जयन्ति की हिन्दी एवं कलेंडर तिथियां वही हैं जो वर्ष 2000 में थीं – जब पूज्य बाबू स्वामी जी में लीन हो गये थे. बाबू ने अपना ऑपरेशन – अपने चित्त को राम नाम में लगाकर करवाया था. ऑपरेशन के लिये जाने से पहले उन्होंने अपने सारे भजन खूब जोर जोर से गाये थे. जो अंतिम भजन उन्होंने गाया था – वह था – “राम नाम लौ लागी” .

परम पूज्य स्वामी जी महाराज में लीन होने की यात्रा से पहले उन्होंने इस पृथ्वी लोक पर अपने ऊपर किये हुए उपकारों की ‘कृतज्ञता’ – भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को राधा से सुनकर की. ‘कृतज्ञता’ सुनते सुनते ही वे चोला छोड़कर चले गये थे. तो आइये, अपन सब भी आज अमृतवाणी के पाठ के बाद, भक्तिप्रकाश के ‘कृतज्ञता’ (पृष्ठ 102) को पढ़ें.

कृतज्ञता

उसका रहूँ कृतज्ञ मैं, मानूँ अति आभार; जिसने अति हित प्रेम से, मुझ पर कर उपकार .1. 
 दिया दीवा सुदीपता, परम दिव्य हरि नाम; पड़ी सूझ निज रूप की, जिससे सुधरे काम .2.
कर्म धर्म का बोध दे, जिसने बताया राम; उस के चरण सरोज पर, नत शिर हो प्रणाम .3.
धन्यवाद उस सुजन का, करूं आदर सम्मान; जिसने आत्मबोध का, दिया मुझे शुभ ज्ञान .4.
उस के गुण उपकार का, पा सकूं नहीं पार; रोम रोम कृतज्ञ हो, करे सुधन्य पुकार .5.
उस के द्वार कुटीर पर, मैं दूं तन सिर वार; नमस्कार बहु मान से करूं मैं बारम्बार .6.
बहते जन को पोत शुभ, दिया नाम का जाप; शब्द शरण को दान कर, नष्ट किये सब पाप .7. 
उस ने जड़ी सुनाम दे, हरे जन्म के रोग; संशय भ्रान्ति दूर कर, हरे मरण के सोग .8.
चिन्तामणि हरि नाम दे, चिन्ता की चकचूर; दिया चित्त को चांदना, चंचलता कर दूर .9.
वारे जाऊँ सन्त के, जो देवे शुभ नाम; बाँह पकड़ सुस्थिर करे, राम बतावे धाम .10. 
सत्संगति के लाभ से, ऐसा बने बनाव; रंग बहुत गूढ़ा चढ़े, बढ़े चौगुणा चाव .11.

कुछ वर्ष पूर्व मैं जब जयपुर गया था, तब अपनी बहन (बिशन मौसी की पुत्री) सुषमा के घर भी गया था. सुषमा के पति श्री शेखर हैं. वे बहुत अच्छे क्लासिकल सिंगर हैं एवं भजनों के कार्यक्रम रेडिओ आदि पर देते हैं. उन्होंने बताया था कि पूज्य बाबू ने उन्हें एक भजन लिखकर उसकी राग बनाने को दी थी. उस विज़िट में हम लोग उनसे वह भजन नहीं सुन पाये थे. परन्तु, जब इस वर्ष होली पर जयपुर गये थे, तब श्री शेखर से वह भजन सुना था. उस भजन के बोल हैं “प्रभु को बिसार किसकी आराधना करूं मैं

यह भजन मैने टेप कर लिया था. आप सब को आनन्द लेने के लिये यह भजन मैं संलग्न कर रहा हूं


प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मोती मिला जो मुझको मानस के मानसर में .  
कंकड़ बटोरने की  क्या चाहना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

सबका परमपिता जब घट घट में बस रहा है;
लघु जान क्यों किसीकी अवहेलना करूँ मैं.

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..

मुझको प्रकाश प्रतिपल  आनंद आंतरिक है .  
जग के अधिक सुखों की  क्या कामना करूं मैं ..

प्रभु को बिसार  किसकी आराधना करूं मैं .  
पा कल्पतरु किसीसे क्या याचना करूं मैं ..




श्री राम शरणम वयं प्रपन्ना: ; प्रसीद देवेश जगन्निवासत

आप सबका
अतुल

शनिवार, 19 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 2

अनुभवों  का  रोजनामचा 

आत्म कथा  

जून १९४५ की लक्खंनवाल (गुजरात - अविभाजित पंजाब ) से कानपूर तक की यात्रा का विवरण चल रहा था ! कलकत्ते के "ब्लैक होल" से भी अधिक भयानक और वास्तविक  कालिमा भरे रेल के डिब्बे में मेरे साथ साथ जीवन की आखिरी सांस लेते सैकड़ों यात्रियों की दुर्दशा का हाल बता रहा था ! 


अपने ग्रुप में मैं उम्र में सबसे छोटा था !पहली बार अपने "भोजपुरी" परिवार  से इतनी दूर एक विशुद्ध पंजाबी-भिन्न भाषा, संस्कृति, रहन सहन और धार्मिक मान्यता वाले परिवार के साथ डेढ़ महीने की लम्बी यात्रा पर गया था !मेरे मित्र का तो पूरा परिवार उसके साथ था ,केवल मैं ही एक ऐसा था जो अपने परिजनों को दूर से ही प्रणाम कर इस असार संसार से विदा होने जा रहा था !


उस छोटी अवस्था में ( १५ वर्ष का था मैं तब ) मेरी कोई निजी पुण्य की कमाई होने का प्रश्न ही नहीं था ! उस समय तक अपनी एकमात्र सम्पत्ति थी माता पिता एवं पितामहों से विरासत में मिली उनकी पुन्यायी और उनके संस्कारों की धरोहर ! बचपन में 'भागवत' के एक प्रसंग में अम्मा से सुना था कि पान्डु पत्नी महारानी कुंती ने अपने भतीजे श्री कृष्ण से एक विचित्र "वर" माँगा था :" मुझे प्रति पल इतने कष्ट दो कि मैं 'तुम्हे' एक पल को भी भुला नहीं पाऊँ "! यहाँ रेल के डिब्बे में इतने कष्ट झेलते हुए हम 'उन्हें' कैसे भुला पाते ? परिवार की याद आते ही मेरे को अपने परिवार के 'इष्टदेव' श्री हनुमान जी महाराज की याद  का आ जाना स्वाभाविक ही था !


विक्रम बजरंगी महाबीर जी महराज जिनकी लाल ध्वजा पताका हमारे पैत्रक घर 'हरवंश भवन', बलिया के आँगन में आज भी लहराती है ,भला "उन्हें" कैसे भुलाता मैं ? हमारे पितामहों तथा पिता और हमारी पीढी के बड़े 'कजिन' इलाहबाद शाखा के बड़े भैया पर "उनके" द्वारा समय समय पर की हुई कृपा की कथाएं एक एक कर के याद आयीं ! 


कैसे साक्षात प्रगट होकर उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे एक परदादा जी का मार्ग दर्शन कर के उन्हें अन्याय से मृत्यु दंड पाने से बचा लिया ! एक दूसरे पितामह को "उन्होंने" उनके परलोक गमन की पूर्व सूचना देकर सावधान किया और "उनके" ही कथनानुसार हमारे उन दादा जी  ने श्री जगन्नाथ पुरी में त्रिमूर्ति के समक्ष ही प्राण त्यागा ! ( विस्तार से पितामहों की कथाएं पहले दे चुका हूँ इसलिए दुहराउंगा नहीं ! कृपया पिछले सन्देश पढ़लें )


रेल के डिब्बे में प्राण रक्षा की कोई सम्भावना ही नहीं थी ! हमारा दम घुट रहा था  किसी पल कुछ भी हो सकता था ! सभी यात्रिओं को अब एक मात्र ईश्वर का सहारा था !अपने अपने ढंग से अपने अपने इष्टदेव को सब ही याद कर रहे थे !मैंने भी अपने इष्ट देव को मनाने की प्रक्रिया चालू की ! मैंने मन ही मन कहा :


श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार 
वरनऊ रघुबर बिमल यश जो दायक फल चार 
बुद्ध हीन तन जान के सुमिरों पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार  

और फिर हनुमान चालीसा का पाठ चालू हो गया ! तब १५ वर्ष की अवस्था में मैंने  कैसा गाया था ,कह नहीं सकता ! लेकिन आज "उनकी" आज्ञा से  ८ २  वर्ष की अवस्था में मैं आपको सुनाने का प्रयास कर रहा हूँ ! आपके मन मन्दिर के इष्टदेव मेरी यह अर्जी सुनें और हम सब पर अपनी ऎसी ही कृपा दृष्टि सर्वदा बनाये रखें कि हम सब मिल जुल कर उनका सिमरन इसी प्रकार करते रहें !

  

प्यारे प्रभु प्रेमियों , अब थक गया हूँ !आज यहीं समाप्त करता हूँ ! कल फिर मिलूंगा यदि "उनकी"आज्ञा हुई !

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निवेदक: 
व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

साधन-भजन कीर्तन # 2 8 6

 हनुमत कृपा - अनुभव                                            साधक साधन साधिये 

साधन-भजन कीर्तन                                                                      ( २ ८ ६ )

आज अभी अभी अपने सद्गुरु स्वामी सत्यानंद जी महाराज के आज के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी ,श्री राम शरणं ,रिंग रोड दिल्ली के वर्तमान गुरुदेव डाक्टर  विश्वामित्र महाजन जी महाराज को अपने इन संदेशो के विषय में सूचना दी और आज ही मेरा कल का लिखा पूरा संदेश पोस्ट होने से पहिले मेरे कम्प्यूटर जी की कृपा से पूरा का पूरा ऐसा गायब हुआ क़ि फिर उसे ह्म़ारे कम्प्यूटर एक्सपर्ट बच्चे भी खोज न पाए !

ऐसा पहिली बार तो हुआ नहीं , आप जानते ही हैं ,मेरे चीफ एडिटर महोदय , मेरे प्रेरणा स्रोत , मेरे इष्टदेव को मेरे लेख में ,जो कुछ अशोभनीय ,असत्य या  असंगत नजर आता है उसे वह निःसंकोच कैचिया देते हैं ! प्रियजन ह्म  पारिश्रमिक भोगी सेवक उनके खिलाफ इन्किलाब करने का साहस कैसे कर सकते हैं ! हरि इच्छा मान कर मुंह सिये पड़े रहते हैं! लगता है आज  उन्हें मेरे उस संदेश में कुछ भी अच्छा नहीं लगा और उन्होंने पूरा संदेश ही सेंसर कर दिया ! ऊपर से यह क्माल देखिये क़ि मेरी स्मृत भी मुझे धोखा दे रही है ! मुझे कुछ भी नहीं याद क़ि उस संदेश में मैंने क्या लिखा था ! बस याद है केवल यह क़ि उसमे मै अपने प्रथम सत्संग के अनुभव की बात कर रहा था ! चलिए उसी विषय में दोबारा कोशिश करले : 

१९५९ में मैंने पहिली बार श्री रामशरणं के पंच रात्रि सत्संग में भाग लिया ! यह सत्संग ग्वालियर में श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष हुआ था ! सत्संग के मोटे मोटे नियम मुझे मेरी ससुराल वालों ने बता दिये थे ! उनदिनों रेडिओ स्टेशन के संगीत विभाग से सम्बंधित था इससे ससुराल में मुझे एक ऊंचा गायक समझा जाता था ! स्वामी जी को भजन बहुत प्रिय हैं अस्तु मुझसे यह भी कहा गया क़ि सत्संग में गाने के लिए मैं बहुत से भजन तैयार करलूं ! स्वाभाविक है ऐसे में किसी के भी मन में अहंकार का होना ! मैं कैसे बचता ?

हाँ  तो मैं पूरी तैयारी के साथ , अपने सुंदर से सुंदर कुरते की जेब में भजनों की पर्चियां रखे  हर बैठक में महराज जी के निकटतम बैठने की आशा लिए , इस प्रकार सत्संग भवन में प्रवेश करता था कि स्वामी जी मुझे देखते ही दूर से इशारा कर के मुझे अपने पास बुलाएं    और अपने निकट बैठालें ! पर पहले दो दिनों में ऐसा कुछनहीं हुआ !

प्रिय पाठकगण मेरा यह सोचना क़ि पंडित राम अवतार शर्मा जी , बन्सलजी ,पवैया जी , शिवदयाल जी तथा जगन्नाथ प्रसाद श्रीवास्तव जी जैसे ग्वालियर के  पुराने साधकों के होते हुए महाराज जी मुझ जैसे नये साधक को सबसे आगे अपने निकट आमंत्रित कर के बैठाएंगे एक दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ न था ! 
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 प्रियजन , इस प्रसंग में ही हमे अभी बहुत कुछ कहना है ! लेकिन  इसके पहिले क़ि यह संदेश भी कहीं गुम  हो जाये आज इसे भेज देता हूं ! क्रमशः कहानी पूरी कर दूंगा !
हाँ आपने सुना ही होग़ा क़ि यहाँ ह्मारे नगर में आजकल इतनी जबर्दस्त बर्फबारी हो रही है जितनी पिछले पचास वर्षों में नहीं हुई !  घर के आगे पीछे बर्फ के पहाड़ खड़े हैं. !
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निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

साधन - भजन कीर्तन # 2 8 5

हनुमत कृपा - अनुभव                  साधक  साधन साधिये 
                                  
साधन- भजन कीर्तन                                                                                (२८५) 

श्री स्वामी जी महाराज के सानिध्य में होने वाले उस पंचरात्रि सत्संग के सभी बैठकों में   मैं अपनी गायकी की प्रवीणता प्रदर्शित करने को उतावला था ! मैं अपने नये नये रेशमी कुरतों  की जेब में भजनों की छोटी छोटी पर्चियां छुपाये , इस भाव भंगिमा से सत्संग भवन में प्रवेश करता था कि स्वामी जी महराज की दृष्टि मुझ पर पड़े और अपने आसन पर बैठे बैठे वह मुझे पुकार कर अपने निकट बैठालें !

काफी दिनों बाद  समझ पाया कि तब मैं कितना बड़ा मूर्ख था ! उस सभा में , पंडित राम अवतार शर्मा जी, श्री मुरारीलाल पवैया जी, श्री गुप्ता जी , श्री बंसल जी ,श्री बेरी जी ,श्री शिवदयाल जी तथा श्री जगन्नाथ प्रसाद जी जैसे  महान साधकों के  होते हुए ,मेरा यह सोचना कि श्री स्वामी जी  महाराज  मेरे जैसे नये साधक को आगे बुलाकर अपने निकट बैठाएंगे,  कितनी  बड़ी मूर्खता थी ? प्रियजन  ! मुझे  अब लगता है  कि  वास्तव में मेरी मूर्खता आँक कर ही मुझ पर अति करुणा करके श्री स्वामी जी ने मुझे सुधारने के लिए अपने संरक्षण  में ले लिया था ! कितना बड़ा सौभग्य था वह मेरे लिए ?  स्वामी जी के निम्नांकित शब्दों में मेरी मनोभावना प्रतिबिम्बित है  : 

भ्रम  भूल  में   भटकते  उदय   हुए  जब  भाग !
मिला अचानक गुरु मुझे लगी लगन की जाग !!

अब सुनिए कि आपके इस "तीसमार खान" साहेब की क्या गति हुई वहाँ ! नित्य  प्रति  हर   सभा में वह उतनी ही तैयारी के साथ जाते , उचक उचक कर अपना चेहरा स्वामी जी को दिखाते लेकिन  उनको अवसर  नहीं मिलता ! आखिर एक दिन महराजजी की कृपा दृष्टि उन पर पड़ ही गयी , महराजजी की उंगली उनकी ओर उठी ! वह गदगद हो गये ,अपनी  जेब से डायरी निकालने को झुके  पर तब तक महराज जी की उंगली उनके बगल में बैठे किसी और साधक की ओर घूम कर रुक गयी और उन्होंने उन साधक को  भजन सुनाने का आदेश भी दे दिया और तीसमार खान अपनी पर्चियां  सम्हाले हाथ मलते ही रह गये ! प्रियजन !अपने आप को सर्व श्रेष्ठ समझने वाले अहंकारी व्यक्तियों की अंततः ऎसी ही गति होती है !

पर ऐसा नहीं है क़ि मैं पाँचों दिन उपेक्षित  ही पड़ा रहा ! अंततः महराज जी ने हमे मौका दिया पर  काफी लम्बी प्रतीक्षा के बाद ! यूं कहिये कि मन ही मन बहुत रोने धोने के बाद मुझ पर  विशेष कृपा कर के ह्मारे इष्ट देव श्री राम ने ही मुझे वह अवसर प्रदान किया क़ि मैं नैवेद्य  सरीखा अपना वह भजन उनके श्री चरणों पर अर्पित कर सकूं ! मैं तैयार तो था ही , बड़े भाव से पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ , मैंने हारमुनियम से तानपूरे का काम  लेते हुए ( तब मैं  इतनी निपुणता से बाजा नहीं बजा पाता था ) मुकेश जी का एक नया भजन गाया 

राम झरोखे बैठ कर  सब का मुजरा लेत 
जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको देत !!
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राम करे सो होय रे मनुआ राम करे सो होय !!

कोमल मन काहे को दुखाये, काहे भरे तोरे नैना ,
जैसी जाकी करनी होगी वैसा पड़ेगा भरना 
बदल सके ना कोय रे मनुआ ,बदल सके ना कोय !!
राम करे सो होय रे मनुआ !!

पतित पावन नाम है वाको रख मन में विश्वास ,
कर्म किये जा अपना रे बंदे ,छोड़ दे फल की आस ,
राह दिखाऊँ तोहे रे मनवा राह दिखावों तोहे !!  
राम करे सो होय रे मनुआ !!

जो भी जाके वाके द्वारे साची अलख जगाये ,
मेरो दाता ऐसो दाता ,खाली नहीं फिरावे,
काहे धीरज खोय रे मनुआ ,काहे धीरज खोय !!
राम करे सो होय रे मनुआ !!
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महराज जी के आशीर्वाद से तथा सभा भवन के आकाश में पहले से ही गूंजती भक्ति रस में सराबोर धुनों की तरंगों के कारण मेरा भजन भी खूब जमा और मुझे ऐसा लगा क़ि वहाँ उपस्थित सभी साधकों एवं महराज जी को भी वह बहुत पसंद आया ! महराज जी तो मेरी ओर देख कर थोड़ा सा मुस्कुराए ही पर मेरे लिए उतना ही काफी था !मुझे उस से ही रोमांच हो गया  मैं गद गद हो गया मेरी आँखें डबडबा गयीं ! मुझे लगा क़ि श्री गुरुदेव को मेरा वह प्रथम प्रयास पसंद आया है  और यह विश्वास भी हो गया क़ि , नैवेद्य स्वरुप अर्पित मेरी वह "भजन भेंट" मेरे "इष्टदेव" ने  स्वीकार कर ली है !


हाल से बाहर आते समय  एक अनजान सत्संगी साधक ने मुझसे कहा "आपने तो रुला ही दिया भैया, देखिये मेरे रोंगटे अभी तक खड़े हैं "!
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निवेदक:- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

साधन- "भजन कीर्तन" # 2 8 3








हनुमत कृपा-अनुभव "साधक साधन साधिये"              
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साधन- "भजन कीर्तन"                                      ( २ ८ ३ )


प्रियजन ! भजन शीर्षक से मैंने अपने पिछले ब्लॉग # २ ७ ७ में जो ४० - ५० वर्ष पूर्व गाये भजनों के आलेख लिखे थे उनके संदर्भ में दिल्ली से प्रियवर अतुल जी ने बड़ी सुंदर टिप्पणी की है ! प्रसन्नता हुई उनसे यह जान कर कि स्वामीजी महाराज की मंत्रणा से उनके पूज्यनीय ताऊ जी एवं पिताश्री ( दिवंगत न्यायमूर्ति श्री शिवदयाल जी तथा उनके छोटे भाई श्री जगन्नाथ प्रसाद जी ) भी "भजन - कीर्तन" को ही  साधना का सुगमतम साधन मानते थे ! प्रियजनों ! यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरे मन में भी यह विचार लाने वाले यही दोनों सज्जन थे , उनके सहयोग से ही मुझे स्वामी जी महराज के दर्शन प्राप्त हुए थे और कालान्तर में महाराज जी की कृपा और उनके आशीर्वाद  ने मुझे क्या बना दिया ,अपने मुंह  बखान करना अच्छा नहीं लगता ! सत्य तो यह है कि ------


रस्ते में  पड़ा  था मैं खाता था ठोकरें 
  पत्थर को सद्गुरू ने  हीरा बना  दिया !! 


शेरो शायरी के चक्कर में पड़ा तो गड़बड़ हो जायेगी इसलिए चलिए पहले अतुल जी के पत्र के प्रासंगिक अंश यहाँ ,ज्यों के त्यों उदधृत कर दूँ ! उन्होंने लिखा है -- 


आज आपके ब्लाग में इतने सारे पुराने भजन देखकर बचपन की और ग्वालियर के परमेश्वर  भवन में होने वाले अनेक पारिवारिक भजनों के कार्यक्रमों की बहुत याद आयी. कितने जोर शोर से भक्ति रस में डूबकर कीर्तन होते थे. आपने सही लिखा है -भजनों से कितनी साधना होती है - यह परम सत्य है कि ह्म लोगों ने ताऊ जी  , अम्मा बड़ी अम्मा मौसी जैसी साधना तो दूर दूर तक कभी भी नहीं करी. लेकिन उनके इन भजनों के कार्यक्रमों एवं आप के सानिध्य में भजनों से ह्म सब को भी अथाह प्रेम हो गया और ह्म भजनों के माध्यम से प्रभु  को प्रसन्न करना सीख गये.! इसका थोड़ा संस्कार अगली पीढ़ी पर भी पड़ा है.  तभी तो आज भी देश विदेश में  बसे राम परिवार के सब छोटे बड़े सदस्य मिलजुल कर स्काईप के द्वारा प्रेम से  पारिवारिक भजनों  के कार्यक्रम करते हैं ! 

लगभग ५० वर्ष पहले से अपने राम परिवार के बुज़ुर्ग- रमेश फूफा जी और आप भी  मुकेश जी का यह भजन बड़े प्रेम से गाते रहे हैं ! हमारी पीढी ने भी इस गीत को गाया है और आजकल हमारी रानी बेटी स्तुति भी इसे गाती है !:-
  
 सुर की गति मैं  क्या  जानूं एक  भजन करना जानू !!
  अर्थ भजन का है अति गहरा ,उसको भी मैं क्या जानू !
  प्रभु  प्रभु प्रभु  कहना जानू  नैना जल  भरना जानू !!
   सुर  की  गति मैं क्या जानू , एक भजन करना जानू !!

  फुलवारी  के फूल  फूल के  किसके गुण नित गाते हो !
  जब पूछा क्या कुछ पाते हो,  बोल उठे मैं क्या  जानूं !!
  प्रभु प्रभु प्रभु कहना जानूं ,  नैनां जल  भरना  जानूं’ !!
  सुर की गति मैं क्या जानू ,  एक भजन करना जानू !! 

जैसे अपने प्रिय जनों से बिछड़ने पर हमारे आँसू आ जाते हैं – वैसे ही भगवान से बिछड़ कर ,उनकी याद में "भजन" गाते गाते हमारी आँखे भी भर आयें ,आँखों से आँसूं की धारा बह निकले – तभी सिद्ध होगा कि ह्म अपने प्यारे प्रभु से सच्चा प्यार करते हैं और वास्तव में उनका सुमिरन कर रहे हैं ! उनके प्रति हमारा प्रेम प्रगाढ़ होकर अब "भक्ति" बन गया है और कदाचित ह्मारे "इष्ट" ने अति कृपा कर के हमें  अपना दास स्वीकार कर लिया है !


निम्नांकित है एक मेरी टिप्पणी :-  
( अतुल जी इस सन्दर्भ में आपको याद दिलाऊँ : दादा ( श्री जगन्नाथ जी - आपके पिताश्री) के निधन के उपरांत  ह्म सब पानीपत में  पूज्यनीया शकुन्तलाजी के श्री राम शरणम गये थे तो श्रद्धेया दर्शी बहेन जी ने क्या कहा था " मैंने बचपन में जगन्नाथ जी को स्वामी जी के सन्मुख कीर्तन करते देखा है ! वह बड़ी तन्मयता से भजन - कीर्तन करते थे उसे देख कर देखने वालों का भी ध्यान लग जाता था ! कीर्तन के अंत में वह सुध बुध खो कर गिर जाते थे  ! महराज जी उनकी ओर मुस्कुराकर देखते थे और  उन्हें यूँही पड़ा रहने देते थे ! साधकों के लिए वह दृश्य बड़ा प्रेरणा  दायक होता था ! इसलिए आप यह न सोचो क़ि वह कहीं चले गये हैं वह यहीं श्री राम शरणं में हैं !"  -- अतुलजी ये है एक अश्रुपूरित नैन और गदगद कंठ से  भजन कीर्तन करने वाले साधक के सद्गति  की कथा ! वास्तविक साधक को इसके अतिरिक्त और क्या चाहिए !) 


अतुलजी के पत्र का शेष भाग :-
वर्षों से मेरी यह धारणा रही है कि परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने भजनों पर इसलिये जोर दिया है कि  भजनों के माध्यम से गायक साधक ईश्वर से बात करें – उसका सिमरन करें. और तो कोई साधन हमसे बनेगा नहीं – कीर्तन करके ही अपने प्रियतम को रिझा लें – उससे बातें कर लें.  मेरी इस बहुत पुरानी धारणा को आपके पिछले दो तीन ब्लाग ने पक्का कर दिया.



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अतुल जी को उनके उपरोक्त विचारों के लिए हार्दिक साधुवाद !


प्रियवर , ह्म सब एक ही  सदाबहार वृक्ष की फलती फूलती डालियाँ हैं ! ये शाखाएं जब तक अपने मूल से जुड़ी हैं , पुष्पित पल्लवित होती  रहेंगी !
                               
                                छोड़ेंगे  अगर   मूल  , हमे    शूल मिलेंगे ,
                               गर  जुड़े  रहे   यार  तो  भव  पार   करेंगे !!
अस्तु --------------     जोड़े  रहो  तुम  तार  गुरुजनों से  दोस्तों ,
                               छेड़े  रहो  झंकार यार  "राम  नाम" की !!
                          गर मिल न सका "वो" तुम्हे जप तप व यजन से ,
                          निश्चय   मिलेगा  "वो"  तुझे  श्री राम  भजन से  !!
                                                                                (भोला)
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निवेदक:- व्ही. एन श्रीवास्तव "भोला"

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

साधक साधन साधिये# 2 4 6

हनुमत कृपा
अनुभव

प्रियजन ! मैंने तो अपने इष्ट देव श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी के चरित्र पर अमेरिका के छात्रों द्वारा उठाई शंकाओं के समाधान का प्रकरण समाप्त ही कर दिया था क़ि आज अपने राम परिवार के दो अतिशय प्रिय सदस्यों के भावपूर्ण पत्र (इ.मेल) हमे मिले ! इन दोनों का पूरा परिवार सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज का परम भक्त है और इनके परिवार के सभी सदस्य श्री स्वामीजी, श्री प्रेम जी, श्री विस्वमित्र जी महराज,पिताश्री हंसराज जी ,माँ श्रीमती शकुन्तला जी अथवा दर्शी बहेन जी से "राम - नाम" दीक्षा प्राप्त कर चुके हैं !

मेल पढ़ कर ,कृष्णा जी एवं श्री देवी (जो आजकल चेन्नयी से यहाँ आयी हुई हैं ) ने सलाह दी क़ि मैं , इन प्रियजनों के विचारों से भी सभी पाठकों को अवगत करा दूँ , अस्तु दोनों पत्रों को ज्यों का त्यों नीचे उध्रत कर रहा हूँ :--
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पहला पत्र सिंगापुर से अनिल बेटे का है , उन्होंने लिखा है कि :-
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Saadar Charan Spursh!
Jai Sita Ram!
We returned from India last night. During last nine days, we did not access the internet and so could not read your messages. If you permit, I would like to add that:

1) In Shri Ramcharit Manas , Bhagwan Shri Ram has himself said that
अनुजवधू भगिनी सुत नारी ! सुनु शठ कन्या सम ए चारी !!
इन्ह्ही कुदृष्टि बिलोकइ जोई ! ताहि बधे कछु पाप न होई !!
Hence killing of Bali was justified. Yes in the Western world their moral Values are VERY different and hence they probably will not understand what the relations in INDIA mean.

2) Babuji had once mentioned that the 16,000 Ranian of Shri Krishna Bhagwan are symbolic to 16,000 veins of the Human Body. It is only PARMATMA Shri KRISHNA who can control all the 16,000 Veins of our Body and that is what was meant when we look at 16,000 Ranis.

This is what I could understand.

With Respects to Bua and yourself,
Anil
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दूसरा इ मेल "अतुल" बेटे का गाजिआबाद से आया है , उन्होंने लिखा है :-
++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
सादर चरण स्पर्श राम राम

मैं प्रतिदिन प्रात: काल में, कम्प्यूटर खोलने के बाद सबसे पहले " महावीर बिनवउँ हनुमाना" पढ़ता हूँ. !8.30 के लगभग यह आ जाता है.! गजाधर फूफाजी का प्रसंग एवं परमादरणीय दादी के अंतिम क्षणों के बारे में पढ़कर विश्वास करना कठिन हो गया कि हमने भी इन महान संतों के साथ जीवन के कुछ क्षण बिताये हैं. उनके चरणों में अनेकानेक प्रणाम .

आजकल श्री कृष्ण जी का प्रसंग चल रहा था, जिसे आपने आज विश्राम दिया है. आपको पता ही है कि परमादरणीय अम्मा कृष्ण जी की पुजारिन थीं. वे प्रतिवर्ष श्री जगन्नाथ जी की पूजा करती थीं. उन्होंने एक बार बताया था कि, श्री कृष्ण भगवान ने अंतिम प्रवास श्री जगन्नाथ पुरी में किया था. वहां की मूर्तियों के हाथ और पैर नहीं हैं. मूर्तियों के हाथ और पैर लकड़ी के हैं - मानो भगवान यह सन्देश दे रहे हैं कि, चोरी करने आदि के बाद यह स्थिति हो जाती है !.

जब आपने श्री कृष्ण जी के प्रसंग का समापन गुरुजनों की शिक्षा द्वारा किया तो मन में आया कि अम्मा के द्वारा बतायी हुई श्री जगन्नाथ जी की बात आप को भी बता दूं. वेदों में भी कहा है - अवगुण अपने देखो, गुण दूसरों के देखो.

एक और बात. राम और कृष्ण इस पृथ्वी पर लीला करने अवतरित हुए थे. इसी कारण वे गर्भ में भी आये थे. उस समय वे मानव रूप में थे एवं उस काल की परस्थितियों के अनुसार विविध लीलायें करते थे. इसी कारण उन्होंनें श्री वाल्मीकि जी से अपने रहने का स्थान बताने के लिये विनती की थी - एवं श्री लक्ष्मण जी को शक्ती लगने के बाद विलाप किया था और जटायू को गोद में लेकर आँसू बहाये थे.

तभी अपने देश के महान संतों ने लिखा है -

"न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं.
न रोये वन गमन में श्री पिता की वेदनाओं पर,
उठाकर गीध को निज गोद में आँसू बहाते हैं....."
एवं
"प्रबल प्रेम के पाले पढ़कर प्रभु को नियम बदलते देखा.
जिनका ध्यान विरंचि शम्भु सनकादिक से न सम्भलते देखा,
उनको ग्वाल सखा मंडल में लेकर गेन्द उछलते देखा.

आदर सहित
अतुल
================================================.
अनिल और अतुल बेटों को ह्म उनके इन अनमोल विचारों के लिए हृदय से धन्यवाद देते हैं ! अपने अति व्यस्त दैनिक कार्यक्रम में समय निकाल कर आप दोनों ही ने जो संदेश भेजे , सराहनीय है !

एक सलाह है क़ि जब मेल द्वारा मेरा संदेश न मिले तो आप अप्रिल ०१ , २०१० से भेजे मेरे पिछले २४४ संदेश भी कभी कभी पढ़ें ! उनमे मैंने अपनी प्रेममयी अम्मा के विषय में बहुत कुछ लिखा है इसके अतिरिक्त "पितामह की तीर्थ यात्रा" प्रसंग में मैंने पुरी के श्री जगन्नाथपुरी मंदिर में , देव मूर्तियों के ठीक सामने अपने दादाजी के देह त्यागने की पूरी कहानी लिखी है !

क्रमश:
निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
78, Clinton Road, Brookline,MA 02445, USA

सोमवार, 14 जून 2010

journey from FAITH to SURRENDER




विश्वास से समर्पण तक
पितामह की परमधाम यात्रा 

प्रपितामह की तीर्थ यात्रा की कथा ,अटल विशवास से समग्र समर्पण तक पहुँचने  की कथा है .मानव जन्म का लक्ष्य है- श्रीहरी के श्री चरणों का आश्रय लेना (श्रीमद भागवत अध्याय ७/६२ ) उन्हें  अपने इष्ट हनुमान जी की प्रेरणा से श्री जगन्नथजी के श्री चरणों में परम विश्राम प्राप्त हुआ. उन्हें अटल विश्वास था क़ी अजनबी आगंतुक कोई और नहीं  उनके इष्ट देव हनुमानजी ही थे.इसी कारण उनकी रहस्यमयी भविष्य वाणी सुन  कर वह न तो आवेश में आये ,न उनको अपशब्द कहे,न उनकी अवज्ञा की बल्कि उनकी  वाणी को देव वाणी ही मान लिया और अपनी जगन्नाथ पुरी क़ी परम धाम गमन यात्रा सपत्नीक की.सच तो यही है क़ी अपने इष्ट की दया दृष्टि भी ईशकृपा से ही मिलती है--  

                         
                             संत विसुद्ध मिलहिं पर तेही     
                             चितवहिं रामकृपा करि जेहीं

कब किस रूप में,कहाँ और कैसे जीवन की महा यात्रा अंतिम विश्राम लेगी यह तो कोई नह़ी जानता.तत्व की बात यह है क़ी  .विश्वास से निर्भयता आती है,धैर्य रखना आता है आत्म शक्ति प्रबुद्ध होती है,मानसिक संतुलन बना रहता है और अंततः चिंताओं से मुक्ति मिल जाती है.विश्वास प्रभु क़ी कृपा से  ही अचल  रहता .है  सच्चा भगत  सदैव अपने इष्ट देव के आश्रित ही रहता है.सत्कर्म और सत्संग से वह परमात्मा के परमधाम में पहुँच कर परम आनंद को प्राप्त करता  है.

                     तुलसी  या  संसार  में   पांच रतन हैं    सार 
                     संत मिलन अरु हरिभजन दया धर्म उपकार 

पितामह ने आजीवन उपरोक्त पांचो रत्नों को अपने आचार विचार से विलग नहीं होने दिया.परिजनों के समक्ष उन्होंने कभी कोई उपदेशात्मक प्रवचन नहीं दिया. ,उन्होंने अपने जीवन जीने की धर्म मय शैली से ,अपने नित्यप्रति के कार्य कलाप से और अपनी परोपकरी प्रवृत्ति  से अपने परिवार के सभी स्वजनों को  जनसेवा और सत्कर्म करने  को प्रेरित किया उन्होंने सब स्वजनों को एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए प्रेम के
साथ एक सूत्र में बंधे रहने का आशीर्वाद दिया.
                             
                   सच्चे  तेरे  कर्म  हों ,    सच्चा  हो    आचार,
                   सत्य सुनिश्चय हो सदा ,हो सच्चा व्यवहार 
         
निवेदन:डाक्टर श्रीमती कृष्णा एवं विश्वम्भर श्रीवास्तव "भोला"












मर्पन 

गुरुवार, 10 जून 2010

श्री हनुमान जी की अहैतुकी कृपा


गतांक के आगे :

श्री हनुमान जी की अहैतुकी कृपा के फल स्वरुप प्राप्त
मंगल दर्शन - समग्र समर्पण

प्रियजन .मिसिर जी थोड़ी थोड़ी देर में रो पड़ते हैं और कहानी रुक जाती है. अस्तु आगे की कहानी अब मैं स्वयं  ही सुना देता हूँ . वैसे रोअक्कड़ तो मैं भी कम नहीं हूँ पर कोशिश करूंगा उतना न रोऊँ.


किसी प्रकार की भी, कैसी भी सांसारिक अथवा आध्यात्मिक उपलब्धि की प्राप्ति के लिए  मनुष्य को सबसे पहले समुचित "प्रयास" करना पड़ता है. आपने अब तक देख लिया क़ि मन्मथ बाबू की दैहिक सहायता व मानसिक प्रोत्साहन से और अपने निजी प्रयास से यात्री मंदिर के गर्भ गृह तक पहुंच पाए हैं. सबको अब "प्रार्थना" करनी है क़ि कर्मफलदेनेवाला योगेश्वर कृष्ण उनको कर्मो का उचित फल दे.
 जैसा पुरातन-वैदिक काल से हम भारतीय करते आये हैं.



.सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु , सर्वेषां शान्तिर्भवतु 
सर्वेषां पूर्णं भवतु सर्वेषां ,मंगलम भवतु

सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चिद दुखः भाग्भवेत .


ॐ शांति शांति शंति: 
(गुरुजनों का कहना है क़ि हमारी कोई भी प्रार्थना मात्र स्वार्थ सिद्धि हेतु न हो. प्रार्थना बहुजन हिताय बहुजन सुखाय होनी चाहिए)

( हे प्रभु .सबका कल्याण हो,सबको शांति प्राप्त हो
सबमे पूर्णता आये, सब सौभाग्यशाली हों.
सब सुखी हों, सब योग्य हों,
सब परस्पर एक दूसरे का भला देखें , कोई भी दुःख से पीड़ित न हो.
भीतर शांति, बाहर शान्ति, सर्वत्र शांति )

आप कहेंगे इतनी लम्बी यात्रा कर के आये और अपने लिए कुछ भी नह़ी माँगा. भैया, जब पहली बार गुरुजन ने यह प्रार्थना मुझ से करवायी तब मेरे मन में भी यही प्रश्न उठा था., पर तुरंत ही मेरी शंका का समाधान हो गया. गुरु अम्मा के बाद हमारे दूसरे आध्यात्मिक पथ प्रदर्शक बाबू (स्वर्गीय माननीय चीफ जस्टिस श्रीयुक्त शिव दयाल जी श्रीवास्तव) ने तुरत समझा दिया. .उन्होंने कहा "भोला बाबू सर्व मे हम आप सभी शामिल हैं, सब के लिए वह देगा तो हमे भी कुछ ना कुछ तो मिलेगा ही ".


फिर भटक गया मैं. चलिए वापस कथा पर आजायें .


सब यात्रिओं ने अपनी अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुसार अपनी अपनी प्रार्थना की. पितामह बाबा ने भी त्रिमूर्ति के सामने खड़े होकर अपनी प्रार्थना की. पितामह उस स्थान पर खड़े थे जहाँ पर खड़े हो कर निमाई ठाकुर (चैतन्य महाप्रभु ) अपनी पूजा करते थे. मन्मथ बाबू मालिक के साथ खड़े थे. थोड़ी देर में पितामह वहीं जमीन पर बैठ गये..


कुछ समय तक वह खुली आँखों से त्रिमूर्ति के मनमोहक स्वरुप का दर्शन मंत्रमुग्ध हो कर रहे थे . फिर धीरे धीरे उनकी आँखें मुद गयीं और मन्मथ नाथ का हाथ पकड़े वह वहीं भूमि पर बैठ गये. उनकी बंद आँखों के कोनो से टप टप कर आंसुओं की बूंदें नीचे गिरने लगीं. पर उनके मुख मंडल पर चिंता या कष्ट का कोई चिन्ह नही था. उनका चेहरा एक अनोखे तेज से चमचमा रहा था.


धीरे धीरे पितामह का शरीर शिथिल पड़ने लगा. मन्मथ बाबू चिंतित हो कर जोर से बोले " दादा मोशाई की होच्चे आपोनाय , चोख्ह टा खोलून. कीछू बोलूँन ना मोशायी " (दादाजी आपको क्या हो रहा है., आँखे खोलिए, कुछ बोलिए तो श्रीमान.) इस बीच पृथ्वी पर शांति से पड़े पितामह के शरीर को अन्य यात्रियों ने घेर लिया . दादी माँ मूर्छित हो गयीं मिसिर जी कहीं से एक डॉक्टर खोज के ले आये.


डॉक्टर ने जांच कर के पितामह को मृत घोषित कर दिया. मंदिर में मौजूद सभी यात्री और पंडे पुरोहित उदास हो गये . होश आने पर दादी माँ पहले तो जोर जोर से रोईं फिर आश्वस्त हो कर उन्होंने मिसिर जी को आदेश दिया क़ि दादा जी का दाह एवं अंतिम सारे संस्कार विधि विधान से वही जगन्नाथपुरी धाम में ही किये जायें . बलिया साइड के सभी यात्रिओं की मदद से दादाजी का काम विधिवत सम्पन्न करवा के दादी जी, मिसिरजी और मिसराइन सब बलिया वालों के साथ वहां से वापस लौटे


प्रियजन, अभी तक आपको हम, श्री हनुमान जी की उस विशेष कृपा के विषय में कुछ बता ही नही पाए हैं. विश्वास करिये अगले अंक में, उन्ही की कृपा से आपको सब कुछ बता देंगे. .






निवेदक. व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"

बुधवार, 9 जून 2010

कृपा प्रसाद

गतांक से आगे
अखंड आनंदस्वरुप हरि दर्शन
श्री हनुमान जी की विशेष कृपा से प्राप्त

तीर्थ-यात्रिंयों की दर्शन-प्रतीक्षा और हमारी-आपकी कथा-प्रतीक्षा अब समापन की ओर बढ़ रही है. मिसिर जी आगे बोले:

"अन्ततोगत्वा वह मंगल दिवस आ ही गया . सूर्योदय से पहले ही सब जग कर उठ बैठे. विश्राम चट्टी पर काफी पहले से ही चहल पहल मची हुई थी. गौडिया वैष्णव भगत ढोल मजीरा बजा बजा कर "हरे कृष्ण" मन्त्र का कीर्तन, और भजन गायन कर रहे थे.

काफी दूर की एक चट्टी से किसी महिला सन्यासिनी की.प्रेमाभक्ति में ओतप्रोत मधुर वाणी कभी कभी सुनाई पड़ जाती थी. वह बड़े प्रेम से कोई कृष्ण भक्ति रचना गा रही थी. श्री जगन्नाथजी से सम्बन्धित वह पद कदाचित कृष्णोपासक कवी विद्यापति जी का है.

जगन्नाथ मन मोह लियो री

गाते बजाते, हम लोगों ने भी चट्टी से प्रस्थान किया. मंदिर के पूर्व दिशा वाले सिंघद्वार से हमने उस भव्य प्रांगण में प्रवेश किया जहाँ पहुचने क़ी इच्छा अधिकाधिक हिन्दुओं को होती ही होती है. श्री जगन्नाथ पुरी धाम भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है .

मंदिर का विशाल प्रांगण  श्री जगन्नाथ , बलभद्र एवं सुभद्रा जी के जय कारों से गूंज गया. साथ ही "हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे -हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे " की सुमधुर धुन भी वातावरण को कृष्ण मय बना रही थी .

कहाँ कहाँ के भगत वहां एक प्रांगण में इकठ्ठा खड़े थे. हमारे ही जत्थे में जहाँ एक तरफ अवध के गंगा किनारे यू.पी. के दोकती बाजिदपुर बलिया के निवासी और कहाँ सुदूर पूर्व में मेघना-ब्रम्हपुत्र तट वाले , बालुरघाट-दिनाजपुर बंगाल के यात्री एक जुट होकर, एक ही परमेश्वर की कृपा प्राप्ति हेतु ,मिलजुल कर एक साथ समवेत स्वरों में एक ही भगवान को आवाज़ लगा रहे थे. कितने एकांकियों का एकीकरण श्री जगन्नाथ पुरी धाम में हो रहा था. .

बालूरघाट वाले मन्मथ सेन बाबू कई बार पुरी आ चुके थे. वह मालिक का हाथ पकड़ कर उन्हें सब मन्दिरों में ले जा रहे थे . महालक्ष्मी मन्दिर में उन्होंने माँ का दर्शन करवाने के बाद हमे महाप्रसाद बनने वाला स्थान दिखाया. उसके बाद वह हमे विघ्नविनाशक श्री कांचीगणेश का दर्शन कराने ले गये.

मन्मथ बाबू मालिक का हाथ पकड कर उन्हें गर्भ-गृह की सीढियां चढ़ा रहे थे . मालिक मलकिन का हाथ थामे थे. और मलकिन हमारी वाली का. हम पीछे पीछे पूजा की सामिग्री लेकर चल रहे थे. मालिक बिलकुल स्वस्थ थे . भैया, हमारी तो सांस फूल गयी थी लेकिन उनको तो कुच्छो नही भया था .

ऊपर पहुंच कर मालिक ने मन्मथ बाबू से कहा , "अरे वह महाप्रभु का आसन तो आपने अभी तक दिखाया ही नही." मन्मथ बाबू ने इशारे से उन्हें वह स्थान दिखाया और वहीं से उस आसन को साष्टांग प्रणाम किया. मालिक ने भी वहीं से उस स्थान को प्रणाम किया और फिर उसकी ओर चल पड़े."


शेष कल

निवेदक: वही एन श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 8 जून 2010

दिव्य दर्शन

गतांक से आगे:
श्री हनुमानजी की कृपा से प्रेरित
बाबा जी की तीर्थ यात्रा

मिसिर जी से आधी अधूरी कहानी सुनी .असली बात पता नही चली. बालक रात भर जगे बेताबी से सूर्योदय की प्रतीक्षा करते रहे. सुबह होते ही मिसिर जी को बुलाया गया चाचा लोग भी आगये. मिसिर जी ने आगे कहना शरू किया:

" भैया , गंगासागर के तट पर मालिक ने रौनक लगा दी. उस दिन हम लोगो के अलावा देश विदेश के अनेक जगन्नाथ भक्त वही रेती पर बैठकर बाबाजी का सारगर्भित भजन मन लगा कर सुन रहे थे. उनमे से एक उड़िया भगत ने मालिक से अर्ज किया क़ि तुलसी के अनुग्रह वाले भजन का सरल हिंदी भावार्थ अहिन्दी भाषी भक्तो के लाभार्थ बताने की कृपा करें. भैया , मालिक पर तो जैसे भगवान जी ने अपनी सारी ज्ञान-गगरी एक साथ ही उड़ेल दी थी. उन्होंने उस पद की बड़ी सरल, सटीक सुंदर व्याख्या की .

मालिक ने कहा था " प्रभु हम सब प्राणियों पर , हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी कृपा वर्षा करता रहता है - जरा सोचो , हमे पेड़ पौधे कीड़े मकोड़े और जानवरों का रूप न देकर मानव देह देने वाले परमपिता परमात्मा ने हम पर कितनी मेहरबानी की है . यह कितना बड़ा अनुग्रह है, उनका हम पर.? अब वह ही, अपनी अहेतुकी कृपा से हमारे माया मोह के बन्धनों को काटेंगे और हमे आवागमन के चक्कर से मुक्त करवाएंगे"

मालिक की उस दिन की चर्चा सुन कर अनेक जिज्ञासु हमारे साथी बन गये जिनके साथ हमने गंगा सागर से जगन्नाथ पुरी तक क़ी यात्रा भजन कीर्तन और सत्संग करते करते बड़ी सुगमता से तय करली.

अगले दिन सुबह हमे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर जाना था .सोने से पहले देर रात तक मालिक ने हरिचर्चा की और बहुत ज़ोरदार भजन कीर्तन किया. एक बंगाली भक्त ने चैतन्य महाप्रभु का सिद्धमन्त्र समान, सर्व शुभफल दायी कीर्तन बड़ी तल्लीनता से गाया :

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

उन्ही बंगाली संत ने बताया कि मंदिर में , ठीक जगन्नथ जी के गर्भ गृह के सामने ही वह पत्थर का चबूतरा है जहाँ खड़े होकर चैतन्य महाप्रभु बंद नेत्रों से ही जगन्नाथ जी के विग्रह का दर्शन करते थे. कहते हैं कि महाप्रभु के प्रेमाश्रु की झड़ी से उस चबूतरे के पत्थर में अनेकों छिद्र हो गये हैं और गौरांग के श्री चरणों के चिन्ह अभी भी उस पर अंकित हैं. मालिक ने उन संत से अनुरोध किया कि वह उन्हें उस पत्थर का दर्शन अवश्य कराये."


शेष कथा कल देखिएगा .

निवेदक: वही एन श्रीवास्तव "भोला"

शनिवार, 5 जून 2010

जय जय जगन्नाथ सुरधाम

गतांक से आगे
बाबाजी की तीर्थ यात्रा
श्री हनुमान जी द्वारा मार्ग दर्शन


श्री श्री जगन्नाथ पुऱी धाम के प्रति श्रद्धेय बाबा जी के हृदयोद्गार

जय जय जगन्नाथ सुरधाम

बहिनी संग पुऱी चलि आये किशन और बलराम.
तीनों के आये से बनि गयि जगन्नाथ सुखधाम..

गोकुल मथुरा बिंद्राबन तज गये द्वारिका धाम .
सब के छोड़ इहाँ चलि आये काहे हे घनश्याम ..

तनिको सुचला नाहि क़ि कैसे अइहें भगत तोहार.
जम्मू कोची मारवाड़ के सबल अबल नर नार..

नीलचक्र पर ध्वजा सुहाए मस्तक साजे तीरा.
गऊरंग चेतन नाचे बाह उठाय नयन भर नीरा..

हमरो ऊपर कृपा करा प्रभु दर्शनं दे द हमके.
बहुत दूर से हम अइनीहा आस पूरावह मन के..

बाबा जी ऐसे ही कुछ भोजपुरी पारम्परिक गीत गंगासागर से पुऱी के रास्ते में गुनगुनाते रहे.



निवेदन. व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"

गुरुवार, 3 जून 2010

परहित सरिस धरम नहि भाई

बाबाजी की तीर्थ यात्रा
हनुमानजी द्वारा मार्ग दर्शन


परहित सरिस धरम नहि भाई

तुलसी - मानस की इस अर्धाली मे बतायी "धर्म" की परिभाषा को चरितार्थ करते हुए पितामह बाबाने अपना पूरा जीवन् जिया। गांव के हर घर मे जब तक चूल्हा नही जला उन्होने स्वयम् भोजन नही किया। उनकी प्रजा कभी भूखी न सोयी । उन्होने एक मात्र यही धर्म निभाया।यही उनकी पूजा थी, यही आराधना l

ऐसे धर्म परायण व्यक्ति पर उनके कुल- देवता हनुमान जी तो अवश्य ही प्रसन्न होंगे. महावीर जी, जो स्वयम् पूर्णतः समर्पित हैं सदा सदा ,समस्त मानवता के कल्याण हेतु, वह क्यो उनके जैसे ही भक्त को अपनी कृपा दृष्टि से वन्चित रखेंगे ?

अस्तु यात्रा प्रारम्भ करने से पहले बाबा जी ने सपरिवार जो प्रार्थना की थी वह क्या अनसुनी रही होगी? कदापि नही ,महाबली हनुमान जी ने अवश्य ही उन्हे अपने आशीर्वाद से नवाज़ा होगा।क्या रहा होगा वह आशीर्वाद? क्या केवल मार्ग दर्शन अथवा कुछ और? , चलिये आगे पता चल ही जायेगा .

लगभग चार सप्ताह बीत गये, बाबा जी की यात्रा के विषय मे कोई समाचार नही मिला।सब जानते थे इतनी जल्दी कोई खबर नही मिल सकती । फिर भी चिन्ता करना मानव का जन्म सिद्ध अधिकार मान कर , केवल घर वाले ही नही वरन सभी गाँव वाले भी बाबाजी की चिन्ता कर रहे थे। गाव के नन्हे नन्हे बालक अपनी माँ से रात मे पूछते "ए माई, घोड़ा वाला बाबा कहा चल गैले , कब अइ ह्इ ?"

फिर एक दिन एक कार्ड आया, इस शुभ समाचार के साथ कि यात्री श्री गंगासागर पहुँच गये, वहाँ सागर मे स्नान किया और विधिवत पितरो का तर्पण भी कर लिया। एक गन्गाजली मे गंगा सागर का पवित्र जल भी भर लिया है । अब चारों यात्री श्री जगन्नाथ पुरी की ओर प्रस्थान करने वाले हैं। सबकी कुशलता का समाचार जान कर सारा परिवार या यूँ कहिये सारा गाँव ही खुश हो गया । पर इसके बाद बहुत दिनो तक कोई समाचार नही मिला ।

आँगन के महाबीरी ध्वजा के नीचे रोज़ रोज़ की पूजा , हनुमानचालीसा का पाठ और साप्ताहिक सत्य नारायण व्रत कथा विधिवत होती रही । सब् प्रियजन अगले समाचार की प्रतीक्षा मे रहे । और एक दिन किसी ने समाचार दिया कि यात्रीगण वापिस आ रहे हैं ।

शेष कल....

निवेदक- व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"

शनिवार, 29 मई 2010

श्री हनुमान जी द्वारा मार्गदर्शन

गतांक से आगे:
बाबा-दादी की तीर्थयात्रा
श्री हनुमान जी द्वारा मार्गदर्शन

गंतव्य बदल गया. पश्चिमोत्तर हिमांचल में गंगोत्री न जा कर बाबा-दादी अब पूर्वांचल में बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित , मां गंगा और हिंद महासागर के संगम पर स्थित मौक्ष प्रदायक तीर्थ "गंगासागर" जाने का अपना स्वप्न साकार कर रहे थे. दोनों गंगासागर में एक साथ एक दूसरे का सहारा लिए ,  डुबकी लगाकर ,सात जन्मो तक पति पत्नी बने रहने की अपनी चिर कामना सत्य करवाना चाहते थे. साथ ही वह पुरी स्थित श्रीजगन्नाथजी के मंदिर में श्री कृष्ण ,श्री बलराम एवं सुश्री सुभद्रा जी की सर्व मंगलकारिनी त्रिमूर्ति का दर्शन करना चाहते थे.

हाँ एक अन्य संकल्प भी उनके मन में उठा था. श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमाश्रु से पवित्र हुई कलिंग की उस पावन धूलि को अपने मस्तक पर लगा कर वह प्रेम-योग द्वारा अपने कुटुंब के प्रियतम इष्ट श्री महाबीर जी को रिझाना चाहते थे. उन्हें विश्वास था क़ि उनके इष्ट रामभक्त हनुमान को, "श्रीराम" के समान "प्रेमीभक्त" ही प्रिय हैं ..

रामहि केवल प्रेम पियारा
जान लेहु जो जाननिहारा .


यात्रा की व्यवस्था कुछ परिवर्तित हुई. ऊंनी कपड़ों की जगह सूती कपड़ों ने ली. गर्मी में बिगड़ने वाले खाद्य पदार्थों की जगह ठेकुआ ,मठरी, सेव दालमोठ , तेलवाले अचार , सत्तू, लईया, चबेना, चूरन और अमृतांजन के साथ साथ कुछ अन्य दवाइयाँ भी पोटलियों में बाँध ली गयीं. अब अधिक यात्रा रेल और पानी के जहाज़ से करनी थी.

शेष विवरण कल के लेख में---

-- निवेदन :श्रीमती डॉ कृष्णा एवं व्ही. एन. श्रीवास्त भोला"