पिताश्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पिताश्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जन्तर मन्तर का 'प्रेम महायज्ञ' # 3 4 0 - 0 5


भारत में 
जन्तर मन्तर का 
प्रेम महायज्ञ 

प्रेम - करुणा - सेवा - भक्ति 

दिल्ली के जंतर मंतर पर पिछले १०० घंटों से हो रहे विशाल "प्रेम महायज्ञ" के 'चल चित्र' यहाँ यू.एस. ए. के टी.वी न्यूज़ चेनल्स पर देख रहा हूँ ! उन्हें देख कर कानपूर में राष्ट्रपिता   "बापू" और "आचार्य विनोबा भावे जी" से सम्बन्धित वैसे ही चल चित्र सहसा मेरे स्मृति पटल पर उभर आये ! दोनों ही चित्रों में मुझे दिखा ,कोने में दुबका सहमा खड़ा एक "अन्डर टीन्स" बालक अपनी टोली के साथ ! बापू के यज्ञ में १५ वर्ष से छोटा था और विनोबाजी के यज्ञ के समय लगभग १८ वर्ष का !

क्षमा प्रार्थी हूँ ६०-७० वर्ष पुरानी घटनाओं के घटने का सही समय दिन तारीख़ नहीं याद रख सका,पर उन घटनाओं के अपने अनुभव नहीं भुला पाया हूँ ! आज जब मैं उन द्रश्यों की पुनरावृति पुनः अपनी आँखों से देख रहा हूँ ,निज अनुभव सुनाने की इच्छा जगी है ! 

बापू का एक प्रेम यज्ञ जो मैंने देखा 

कुरुक्षेत्र में पार्थ के सारथी कृष्ण के समान, निःशस्त्र निष्काम भाव से "सोनार बांग्ला" के जातीय धार्मिक हिंसा में जूझती जनता को हिंसा त्याग कर प्रेम से मिलजुल कर रहने का  सन्देश देने को 'बापू' दिल्ली से कोलकता जा रहे थे ! मैं १४-१५ वर्ष का रहा हूँगा ! मोहल्ले के एक कोंग्रेसी 'लेबर' नेता का लडका हमारा सहपाठी था ! उसने बताया कि बापू की ट्रेन कानपूर होकर जा रही थी और स्टेशन पर भीड़ को सम्हालने के लिए वह कोंग्रेस सेवादल के स्वयंसेवकों के साथ स्टेशन जा रहा था ! मैं भी उसके साथ चल कर  "बापू" के दर्शन कर सकता था ! पिताश्री से आज्ञा मिल गयी सो मैं उसके साथ निकल पड़ा !

घर से स्टेशन तक का रास्ता आदमी औरतों और बच्चों से ऐसे भरा था जैसे सावन के पहले सोमवार को गंगा स्नान के लिए परमट और सरसैया घाट की ओर जाने वाली सडकों पर स्नानार्थियों की भीड़ होती  है ! मेले जैसा वातावरण था ! ऐसा लग रहां था  जैसे सारा का सारा नगर ही कानपूर स्टेशन में समा जाना चाहता है ! हवा के झोके में जैसे पीपल के पत्ते छन भर में कहीं से कहीं पहुच जाते हैं वैसे ही स्टेशन के निकट पहुच कर हमे पैर भी नहीं चलाने पड़े और हम प्लेटफोर्म पर पहुंच गये ! क्या यह कोई जादू था ?

ट्रेन प्लेटफोर्म में दाखिल हुई ! जैसे जैसे ट्रेन आगे बढी जन समुदाय सैलाब की तरह आगे की ओर बढने लगा ! इतनी जबर्दस्त लहर चली कि उसमे हलके फुल्के शरीर वाले अनेकों दर्शनार्थी या तो कंधों पर लद गए या ----------  प्रियजन न पूछिए उनका क्या हुआ !  मैं सौभाग्यशाली था मुझे "प्यारे बापू" के दर्शन तो हुए पर उसके बाद जो हुआ उसकी याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े होने लगे हैं !

क्या नशा था, क्या दीवानापन था ? लोग पागलों की तरह उस तीसरे दर्जे के डिब्बे की ओर भाग रहे थे जिसपर एक तिरंगा लहरा रहा था और जिसके दरवाजे पर "बापू" खड़े थे ! मुझे दर्शन हो चुके थे, मैं भीड़ से निकल कर किनारे जाना चाहता था ! मैं हल्का फुल्का था ,रेले में अपने आप को सम्हाल न पाया ,मेरे पैर मेरा बोझ ढो न सके ,मैं लडखडा कर गिर गया और मेरे शरीर को लांघ लांघ कर न जाने कितने लोग गुजरे और कितनों के चरण चिन्ह मेरे अंग-प्रत्यंग पर बने नहीं कह सकता ! मेरा वह दोस्त गांवं का हट्टा कट्टा कुश्ती लड़ने वाला पहलवान था ! मेरे अचानक अंतर्ध्यान होने से वह चिंतित हुआ और जब थोड़ी देर बाद उसने मेरी दुर्दशा देखी , उसने झुक कर बमुश्किल तमाम मुझे उठाया और अन्य स्वयंसेवकों की मदद से  फर्स्ट एड करवा कर मुझे घर पहुंचा गया !

प्रियजन , राष्ट्र पिता बापू के प्रति भारत के आम जनता की यह पागलों जैसी प्रीति ही थी जिससे भय खाकर इतनी आसानी से ,अँगरेज़ बोरिया बिस्तर बांध कर अपने "यूनियन जैक" के साथ शांति पूर्वक भारत छोड़ कर चले गये ! यदि भारतवासियों में यह "प्रेम" की ताकत न होती तो अस्त्र शस्त्र के बल से क्या हम कभी उन्हें हरा सकते थे ? 

आचार्य विनोबा भावे जी के दर्शन की कथा इससे अधिक रोचक होगी - उसमे मुझे कोई आघात नहीं लगा था ! उसमे प्रेम है , संगीत है और भारतीय जन समुदाय की वैसी ही प्रेम-उन्मत्तता है जैसी "बापू" के प्रति थी !

आप भारतवासियों ने भी तो उस श्रेणी के "प्रेम" की एक अति जीवंत झांकी पिछले ५-६ दिनों में नईदिल्ली के 'जन्तर मन्तर' पर देख ली है ! कल उस पर भी अपनी जानकारी के अनुसार थोडा प्रकाश डालूँगा !

=========================
क्रमशः 
निवेदक :  व्ही .एन. श्रीवस्तव "भोला"
==========================


बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आत्म कथा - संकल्प # 3 3 9 / 0 4


आत्म कथा - संकल्प
प्रेम - करुणा- सेवा   


विश्व भर में सम्मानित भारत के दोनों पौराणिक ग्रन्थ "रामायण" और "गीता" में जन -कल्याण के जो विविध विचार प्रतिपादित हैं उनमे जो सबसे उल्लेखनीय मुझे लगा वह है: 

प्रेम 

आज से ८० -९० वर्ष पूर्व के भारतीय तथाकथित जागृत समाज में भी भोतिक धरातल पर  यह शब्द अश्लील माना जाता था ! मुझे याद है १९३५-३६ में जब 'शरतचंद्रजी' के नायक  "देवदास" का सर्वश्री  के . एल.  सहगल तथा पी. सी. बरुआ के रूप में रजतपट पर प्रथम अवतरण हुआ था तब  प्रेम के  उस विशुद्ध  स्वरूप का  अवलोकन  भी हमारे परिवार में माननीय नहीं था ! ध्यान रखने योग्य यह है कि हमारे मातापिता उन दिनों के सामाजिक  मानदंड  के स्तर पर  काफी मोडर्न माने जाते थे ,फिर भी वे  वह  "प्रेम प्रधान" सिनेमा देखने नहीं गये !जबकि  पिताश्री उस सिनेमा घर के पार्टनर थे, जिसमे देवदास फिल्म चल रही थी और हमारी शिफारिश पर पिताश्री हमारे स्कूल के अध्यापकों को फ्री पास देते रहते थे ! फिर भी  ऎसी  दुर्दशा थी बेचारे "प्रेम" की उस जमाने में ! मुझे प्रसन्नता है की आज अधिकाधिक मनीषी और संतजन अपने प्रवचनों में "प्रेम" के दिव्य स्वरुप का परिचय  देकर हमारा उचित मार्ग दर्शन कर रहे हैं !

अपने अनुभव के आधार पर मैं केवल यह ही कहूँगा कि  मेरे प्यारे स्वजनों ,"प्रेम" करो ! हृदय में प्रेम उमडेगा तो दीन दुखियों के प्रति "करुणा" जागेगी ,करुणा से "सेवा" की प्रेरणा होगी ,और आप परसेवा में स्वतः लग जाओगे ! इस प्रकार आप परम भक्त बन कर"प्रभु" के परम प्रिय  बन जाओगे उनका अथाह प्यार पाओगे और अंततः मुक्त होकर जल बिंदु सम जीव परमानंद के क्षीरसागर में अपना गंतव्य पालेगा !

और हमे क्या चाहिए प्यारे ?
सेवा 

प्रियजन , गुरुजन और इष्ट देव की कृपा से हमारे निर्मल हृदय में प्रेम और प्रेम के साथ साथ करुणा का प्राकट्य,समय आने पर आप से आप हो जाता है ! पर मेरे जैसा  निर्बल और रुग्ण काया वाला व्यक्ति , ह्रदय में अपार प्रेम और करुणा होते हुए भी " सेवा धर्म " नहीं निभा पाता ! ५-६ वर्ष से मैं अपनी इस असमर्थता के कारण दुखी और निराश हो रहा था कि सहसा मुझ पर श्री हरि कृपा हुई , विचार आया , आपको भी बताता हूँ ------

मेंरे हंम सफर , हमउम्र साथियों ! हम इसलिए निराश न हो कि हमारे हाथ पैर नहीं चलते, प्रभु की कृपा से हम जीवित तो हैं , हमारे सारे "वायटल्स" नियमित हैं ,हम सुन सकते हैं , सोच विचार कर लेते हैं ,थोडा बहुत लिख पढ़ लेते हैं ,गा बजा भी लेते  हैं ! इनके सहारे भी हम "परसेवा" कर सकते हैं ! आप पूछोगे कैसे ? किसी से कभी सुना था आप भी सुनिए : :

राह चलते किसी बृद्ध ,निर्बल ,नेत्रहीन ,रोगी व्यक्ति को कंधे पर उठा कर उसे सड़क न पार करवा सको तो कोई बात नहीं यदि तुम किसी नौजवान को उस सेवा के लिए प्रेरित कर दो प्यारे तुम्हें भी उस सेवा का सुफल मिल जायेगा !राह में पड़े केले के छिलके और कांच के 
टुकड़े को यदि स्वयं न फेक सको तो साथ चलते व्यक्ति से उठवाकर कूड़े दान में डलवा दो यह  भी परसेवा ही होगी ! ये भी नहीं कर पाओ तो ,तुम केवल मन में "परसेवा"  करने का भाव लाओ ,तुम्हे सेवा का पुण्य मिल जायेगा ! एक महापुरुष ने तो यहाँ तक कहा कि यदि तुम किसी "दुखी" प्राणी को देख कर मन में उसके "सुख " के लिए प्रभु से प्रार्थना करोगे  तो यह भी सेवा ही होगी !इस कलि काल में तो यदि तुम किसी को दुखी देखकर सुखी न हो तब भी तुम्हे भरपूर पुण्य मिल जाएगा ! इतने कन्शेसन पाकर  प्रियजन मैं तो बिलकुल  चिंता मुक्त हो गया हूँ ! आप तो निश्चिन्त होकर अपने "प्रेम" की परिधि बढ़ाते जाएँ ! करुणा और सेवा के पुण्य सुफल आपको स्वतः मिल जायेंगे !

करुणा  कृपा  व्  प्रेम  से जो सेवा  की जाय 
तज कर फल की कामना सो सेवा कहलाय  
  
========================  
क्रमशः 
निवेदक: व्ही , एन, श्रीवास्तव "भोला"
========================

बुधवार, 30 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 3

अनुभवों का रोजनामचा 

एक गृहस्थ संत , परम हनुमंत भक्त 

"नीम करोली बाबा" 

सिद्ध महापुरुषों की दिव्य शक्ति और उनके सामर्थ्य को पहिचान पाना और उसकी सीमा को आंकना हम साधारण जीवधारियों की क्षमता से परे ही नहीं अपितु कल्पना से भी परे है ! ऐसा अद्भुत चमत्कार पहिले कभी सुनने में नहीं आया था जैसा "रेल रोको" आन्दोलन उस नौजवान संत ने एक अकेले अपने बल से कर के दिखा दिया था ! जब यह घटना घटी थी मैं उन दिनों एक ऐसे स्कूल में पढ़ता था जिसके संचालक अपनी धार्मिक कट्टरता के  कारण ऎसी घटनाओं की सत्यता स्वीकार करना निरी मूर्खता मानते थे , पर मुझे इसकी सत्यता का पूरा विश्वास था क्योंकि हमारे चाचा जी इस के प्रत्यक्ष दर्शी थे !

कुछ दिनों बाद अखबारों में यह पूरी घटना सविस्तार छपी ! सरकार और रेल कम्पनी के अधिकारियों के बयान भी प्रकाशित हुए ! इसके बाद समस्त विश्व में इस घटना की चर्चा जोर शोर से हुई और अधिक से अधिक लोगों को इस पर विश्वास हुआ !  

सरकारी आदेश से उसी स्थान पर जहां उन सिद्ध संत का चिंमटा भूमि में गड़ा था एक नये स्टेशन की " नींव" पड़ी और उस स्टेशन का नाम "नींव करोरी स्टेशन" पड़ा ! यह स्थान  पश्चिंमी यू पी  के फरुक्खाबाद  जिले में  है ! यहीं पर उस नौजवान संत ने कुटिया बना कर अपनी किशोर अवस्था में श्री हनुमानजी की आराधना की थी ! कुछ समय बाद वह यहाँ से  पुनः अपने गाँव अकबरपुर वापिस आगये  जहाँ उन्होंने  अपने पिताश्री के आदेश का पालन करते हुए "गार्हस्थ तथा संत जीवन" का एक साथ  निर्वहण किया ,अपने समस्त  सांसारिक उत्तरदायित्व निभाये  ! तदनंतर सन १९५८ में उन्होंने सदा के लिये घर गृहस्थी का परित्याग कर दिया और लोक कल्याण हेतु देश- विदेश का भ्रमण करने निकल पड़े !

बाबा के अनेक नाम थे ! पिताश्री पंडित दुर्गा प्रसाद शर्मा जी द्वारा दिए "लक्ष्मी नारायण" नाम से तो उन्हें बहुत कम लोग जानते हैं ! बाबाने अपने भ्रमण के दौरान विभिन्न स्थानों पर जो अनूठे चमत्कार किये उनके आधार पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों तथा विदेशों में उन्हें अनेकों नामों से पुकारा जाने लगा ! उनके ऐसे प्रत्येक नाम से जुड़ी है कोई न कोई  चमत्कारिक कथा ! इन नामो में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ,"तलैया बाबा","डंडी बाबा", "चमत्कारी बाबा" "तिकोनिया बाबा" तथा "महाराज जी" और  कहीं कहीं पर कुछ लोग उन्हें "लक्ष्मणदास" के नाम से भी जानते हैं ! अवसर मिला और प्रेरणा हुई तो वो कहानियाँ भी सुनाऊंगा !

अपने स्नेही जनों द्वारा दिए गये विभिन्न नामों में से बाबा ने स्वयम जिस नाम को  मान्यता दी वह था "बाबा नीब करोरी'!  इसका प्रमाण यह है कि जहाँ कहीं  भी उन्होंने हस्ताक्षर किये उन्होंने "बाबा नीब करोरी" ही लिखा है ! पाश्चात्य -जगत में वे "बाबा नीब करोरी "और "नीम करोली बाबा" के नाम से ही प्रसिद्ध रहे !

सन १९६० -७० के दशक में बाबा की ख्याति और मान्यता देश की सीमाओं को लांघ कर सात समुन्द्र पार योरप , अमेरिका ,मेक्सिको आदि पाश्चात्य देशों में फैली ! इन देशों के   अनेकों प्रतिष्ठित नागरिकों ने बाबा की मंत्रणा से "हनुमत भक्ति " को अपनाया ! उन विदेशी हनुमान भक्तों के "बाबा" के द्वारा दिए नाम हैं , रामदास ,कृष्णदास ,भगवानदास और सगीतज्ञ जय उत्तल  तथा सुप्रसिद्ध सिने कलाकार जूलिया रोबर्ट्स आदि ! इन भक्तों ने केवल हनुमत भक्ति ही नहीं की बल्कि इन्होने बाबा को हनुमान का अवतार भी माना ! कुछ निष्ठावान  भक्तों ने तो "बाबा" में "श्रीहनुमानजी" के प्रत्यक्ष दर्शन  किये ! 

स्वतंत्र भारत सरकार के तत्कालीन डिफेन्स मिनिस्टर डोक्टर कैलाश नाथ काटजू ने बाबा जी को साक्षात् हनुमानजी की मंगलमूर्ति माना ! काटजू जी को विश्वास हो गया था कि बाबा आठों सिद्धिया प्राप्त कर चुके हैं ! उन्होंने बाबा द्वारा अधिकृत "अणिमा", "प्राप्ति", "महिमा" , "वशित्व" अदि सिद्धियों की चर्चा करते हुए प्रयाग में एक सार्वजनिक सभा में यह घोषणा की थी कि बाबा साक्षात हनुमानजी के अवतार हैं और मानवता के प्रति दया और करूणा के कारण सबकी पीड़ा हरने और जन जन का मंगल करने के लिए धरती पर अवतरित हुए हैं ! काटजू जी के समक्ष "बाबा" द्वारा अनेक चमत्कार हुए थे ! 

मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण ! यह सर्व मान्य सत्य है कि भारतभूमि योग भूमि है! यहाँ के योगियों की चमत्कारी सिद्धियों के विषय में समझ पाना असम्भव सा प्रतीत होता है !  पर मेरे प्रियजन मुझे अपने जीवन के ८२ वर्षीय लम्बे अनुभव के आधार पर  यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि इस संसार में साधारण से साधारण दिखने वाला जीवधारी भी परमात्मा का अंश होने के नाते एक सिद्ध महात्मा ,दिव्यात्मा , देवपुरुष अथवा परमात्मा का अवतार भी हो सकता है अस्तु किसी का तिरस्कार न करो :

तुलसी या  संसार में  सबसे मिलिए  धाय,
ना जाने किस वेश में नारायण मिल जायं!

क्रमशः 
=============================================
निवेदन: श्रीमती (डोक्टर) कृष्णा  एवं   व्ही. एन.  श्रीवास्तव "भोला"
============================================= 

रविवार, 27 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 3 0

अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा 


दुनिया वालों की नजर में पिताश्री को शनिदेव की कुदृष्टि के कारण कष्ट थे ! लेकिन वास्तव में उन्हें कोई कष्ट महसूस नहीं होता था ! वह अपने इष्टदेव श्री हनुमान जी की क्षत्रछाया में सदा आनंदित ही रहते थे ! जब कभी हम बच्चे और अम्मा तनिक भी दुखी दीखते वह हमें  समझाते और कहते थे कि, " बेटा जब "उन्होंने'" दिया हमने खुशी खुशी ले लिया , आज वापस मांग लिया तो हम दुखी क्यों हो रहे हैं ? मैंने किसी गलत तरीके से कमाई नहीं की थी ये बात 'उनसे' अच्छी तरह और कौन जानता  है ? हमे "उनकी" कृपा पर पूरा भरोसा है ! आप लोगों की भी सारी आवश्यकताएँ और उचित आकांक्षाएँ वह समय आने पर अवश्य पूरी करेंगे ! आप लोग भविष्य की सारी चिंता उन पर ही छोड़ दें !" 

नीम करौली बाबा 


मै वो कथा कहने जा रहा था जिसमे एक अन्य रेल दुर्घटना में श्री हनुमान जी ने मेरे ऊपर एक बार और कृपा की थी ! तभी कदाचित हनुमान जी की ही प्रेरणा ने मेरा ध्यान 'उनके' एक अति चमत्कारी भक्त की और घुमा दिया ! मुझे याद आयी वह विशेष घटना जिसने मानवता को एक ऐसे दिव्य संत से परिचित कराया जो कालान्तर में नीम करोली अथवा नीव करोरी बाबा के  नाम से विश्व विख्यात हुआ!लीजिये पहले वह कथा ही सुन लीजिये 


यह घटना भारत के स्वतंत्र होने से पहले की है ! मैं बहुत छोटा था ! मेरे एक चाचाजी उन दिनों मैनपुरी (यु.पी) में रहते थे , वह इस घटना के प्रत्यक्ष दर्शी थे मैंने उनसे ही यह कथा सुनी थी !चाचा जी ने बताया की एक दिन वह रेल में शिकोहाबाद से कहीं जा रहे थे ! एक बहुत छोटे बिना प्लेटफार्म वाले "halt" पर उनकी ट्रेन अकारण ही काफी देर के लिए खड़ी हो गयी !इंजिन ड्राइवर की लाख कोशिशो के बावजूद भी उसका कनेडियन इंजिन गाड़ी खींचने में असमर्थ हो गया था ! बार बार भट्टी में कोयला झोका गया , स्टीम का दबाव पूरा लगा दिया गया , गाड़ी टस से मस नहीं हुई ! 


ट्रेन का एंग्लो इंडियन गोरा गार्ड बार बार सीटी बजा कर हरी झंडी दिखा रहा था ! जब बहुत देर तक गाड़ी आगे नहीं बढी तब उसने एक टी सी को ड्राईवर के पास दौड़ाया ! ड्राइवर ने अपनी बेबसी बता कर टी सी को गार्ड के पास वापस भेज दिया ! काफी देर तक बेचारा  टी. सी., 'शटल कोक' की तरह आगे पीछे भागता रहा ! बौखलाकर गोरा गार्ड स्वयम इंजिन पर चढ़ कर अपने हाथ से इंजिन चालू करने का प्रयास करने लगा ! पर गाड़ी नही चली !


=======================================================
आज इतना ही ,पाठकों ,गाड़ी कल चल जायेगी और कहानी भी आगे बढ़ जायेगी !
निवेदक: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"
=======================================================

शनिवार, 26 मार्च 2011

अनुभवों का रोजनामचा # 3 2 9

अनुभवों का रोजनामचा 
आत्म कथा

काशी से आये चचेरे भतीजे जिन्हें उम्र में बड़े होने के कारण मैं 'बड़े भैया' सा आदर देता था  और उनके अन्य साथियों  के साथ पनकी में श्री हनुमान जी का दर्शन करके मैंने भी उन लोगों के साथ वहीं पनकी की कुछ औद्योगिक इकाइयों का भ्रमण किया !

तभी पड़ी मेरे भविष्य की वह 'करोड़ों' की "नींव" जो श्री हनुमंत कृपा से मुझे प्राप्त हुई !

उन दिनों मेरे बाबूजी ( पिता श्री ) विद्वान् ज्योतिषियों के मतानुसार ,"शनि देवता" के दोहरे प्रहार झेल रहे थे ! पहला प्रहार था "शनि की महादशा" का जो उन्हें १९३६ से दुखी कर रहा था  और दूसरा था "साढ़े साती" का जो अब उनके जले पर नमक जैसा प्रभाव छोड़ रहा था ! पिताश्री को "शनि" के उग्र प्रभाव ने एक विश्व विख्यात ब्रिटिश कम्पनी का स्थायी ऊंचा ओहदा , जिसपर वह निश्चिन्तिता से पिछले १० -१२ वर्षों से काम कर रहे थे ,एक झटके में छोड़ देने को मजबूर कर दिया ! 


चाटुकार मित्रों के बहकावे में आकर उन्होंने अपनी समस्त जमा पूंजी लगाकर अपनी ही दो लघु  इकाइयों की स्थापना की जिनमें नुकसान ही नुकसान हुआ ! यही नहीं उनकी कोई अतिरिक्त योजना भी सफल नहीं हुई ! मैं इतना छोटा था कि  चाह कर भी किसी प्रकार उनकी मदद नहीं कर पा रहा था ! मेरे सगे बड़े भइया,जो काशी से आये इन चचेरे भैया के हमउम्र थे , तब (१९४२-४३ में ) बम्बई  में रेडिओ इंजीनिरिंग की पढाई करने गये थे ! रेडिओ का कोर्स उन् दिनों उतना ही महत्वपूर्ण था जितना आज कल न्यूक्लिअर या इलेक्ट्रोनिक इंजीनिरिंग है ! साथसाथ क्योंकि वह देखने में बहुत आकर्षक थे और मधुर कंठ के धनी थे, वह बंबई के फिल्म जगत में भी अपना भाग्य आजमाते रहते थे !( पूरा विवरण पहले भी दे चूका हूँ ) ! इत्तेफाक से अन्तोगत्वा उनके हाथ भी कोई सफलता नही आई ! और पिताश्री हर तरफ से असफलता का ही सामना करते रहे ! इस प्रकार 'गुरु' की महादशा में  पूरा "राज योग" भोगने वाले परिवार को 'शनि महराज' ने निर्धनता के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया !
दुनिया वालों की नजर में पिताश्री को शनिदेव की कुदृष्टि के कारण कष्ट थे ! लेकिन वास्तव में उन्हें कोई कष्ट महसूस नहीं होता था ! वह अपने इष्टदेव श्री हनुमान जी की क्षत्रछाया में सदा आनंदित ही रहते थे ! जब कभी हम बच्चे और अम्मा तनिक भी दुखी दीखते वह हमें  समझाते और कहते थे कि, " बेटा जब "उन्होंने'" दिया हमने खुशी खुशी ले लिया , आज वापस मांग लिया तो हम दुखी क्यों हो रहे हैं ? मैंने किसी गलत तरीके से कमाई नहीं की थी ये बात 'उनसे' अच्छी तरह और कौन जानता  है ? हमे "उनकी" कृपा पर पूरा भरोसा है ! आप लोगों की भी सारी आवश्यकताएँ और उचित आकांक्षाएँ वह समय आने पर अवश्य पूरी करेंगे ! आप लोग भविष्य की सारी चिंता उन पर ही छोड़ दें !" 

प्यारे प्रभु ने कहा " वत्स ! अनुकरणीय है तुम्हारे पिताश्री की रहनी ! सुख एवं दुःख दोनों ही स्थिति में तुम्हारे पिता मेरे प्रति गहन अनुराग,विश्वास,अवलंब और भरोसा बनाये रहे किसी दशा में भी उनकी मेरे प्रति प्रीतिऔर निष्ठां  शिथिल नहीं हुई !जरा सोच कर देखो "   

"उनका" आदेश पालन करके मैंने सोचा और पाया कि सचमुच ही उतनी कष्टप्रद स्थिति में भी पिताश्री ने अपने कुलदेवता श्रीहनुमान जी का अवलम्ब  नहीं छोड़ा ! बुरे दिनों में भी वह नित्यप्रति  हनुमान चालीसा और अष्टक का पाठ उतनी ही भक्ति के साथ करते रहे  जितनी भक्ति से ओतप्रोत हो कर  वह अपने अच्छे दिनों में करते थे ! उनकी प्रार्थना में हमें  कभी भी किसी प्रकार का आक्रोश अथवा गिला शिकवा और पीड़ा की प्रतीति नहीं हुई ! वह पूर्ववत उसी विश्वास के साथ श्री हनुमान जी से कहते रहे :

कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नही जात है टारो
बेगि हरो हनुमान महा प्रभु जो कछु संकट होंयं हमारो 
को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तुम्हारो

सांसारिक दृष्टि में उनका जीवन कष्टप्रद था, क्योंकि जो व्यक्ति अनेको नौकर चाकरों से
घिरा रहता था, अब स्वयम हाथ में झोला लटका कर बाज़ार जाता था !जिसके घर में आने जाने वालों और भिक्षा देने के लिए ठेलों में लाद कर महीने भर का खाने पीने का सामान आया करता था उसके घर मे अब रसोई बनते समय गली की दूकान से सामान मंगवाना पड़ता था  !जो व्यक्ति मक्खन जीन के सूट पहनता था वह अब मोटी धोती और कुरता पहन कर सब जगह आता जाता था !उनकी विशेषता यह थी कि उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं आई और उन्होंने कभी किसी व्यक्ति को अपनी उस दुर्दशा का कारण नही बताया ! उलटे परिवार के और सदस्यों को वह यह शिक्षा देते रहते थे कि ,शत्रु मित्र , मान अपमान ,सुख दुःख ,शीत एवं उष्णता में 'प्रभु विश्वासी' व्यक्तियों को सम रहना चाहिए ! गीता जी का यह श्लोक वह अक्सर हम सब लोगों को सुनाया करते थे ! 

समः शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो:
शीतोष्णसुख दू:खेषु समःसंग विवर्जित:
(श्रीमद भगवद्गीता - १२/१८) 

============================
निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला" 
============================  


मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

साधन- "भजन कीर्तन" # 2 8 3








हनुमत कृपा-अनुभव "साधक साधन साधिये"              
===========================================================
साधन- "भजन कीर्तन"                                      ( २ ८ ३ )


प्रियजन ! भजन शीर्षक से मैंने अपने पिछले ब्लॉग # २ ७ ७ में जो ४० - ५० वर्ष पूर्व गाये भजनों के आलेख लिखे थे उनके संदर्भ में दिल्ली से प्रियवर अतुल जी ने बड़ी सुंदर टिप्पणी की है ! प्रसन्नता हुई उनसे यह जान कर कि स्वामीजी महाराज की मंत्रणा से उनके पूज्यनीय ताऊ जी एवं पिताश्री ( दिवंगत न्यायमूर्ति श्री शिवदयाल जी तथा उनके छोटे भाई श्री जगन्नाथ प्रसाद जी ) भी "भजन - कीर्तन" को ही  साधना का सुगमतम साधन मानते थे ! प्रियजनों ! यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरे मन में भी यह विचार लाने वाले यही दोनों सज्जन थे , उनके सहयोग से ही मुझे स्वामी जी महराज के दर्शन प्राप्त हुए थे और कालान्तर में महाराज जी की कृपा और उनके आशीर्वाद  ने मुझे क्या बना दिया ,अपने मुंह  बखान करना अच्छा नहीं लगता ! सत्य तो यह है कि ------


रस्ते में  पड़ा  था मैं खाता था ठोकरें 
  पत्थर को सद्गुरू ने  हीरा बना  दिया !! 


शेरो शायरी के चक्कर में पड़ा तो गड़बड़ हो जायेगी इसलिए चलिए पहले अतुल जी के पत्र के प्रासंगिक अंश यहाँ ,ज्यों के त्यों उदधृत कर दूँ ! उन्होंने लिखा है -- 


आज आपके ब्लाग में इतने सारे पुराने भजन देखकर बचपन की और ग्वालियर के परमेश्वर  भवन में होने वाले अनेक पारिवारिक भजनों के कार्यक्रमों की बहुत याद आयी. कितने जोर शोर से भक्ति रस में डूबकर कीर्तन होते थे. आपने सही लिखा है -भजनों से कितनी साधना होती है - यह परम सत्य है कि ह्म लोगों ने ताऊ जी  , अम्मा बड़ी अम्मा मौसी जैसी साधना तो दूर दूर तक कभी भी नहीं करी. लेकिन उनके इन भजनों के कार्यक्रमों एवं आप के सानिध्य में भजनों से ह्म सब को भी अथाह प्रेम हो गया और ह्म भजनों के माध्यम से प्रभु  को प्रसन्न करना सीख गये.! इसका थोड़ा संस्कार अगली पीढ़ी पर भी पड़ा है.  तभी तो आज भी देश विदेश में  बसे राम परिवार के सब छोटे बड़े सदस्य मिलजुल कर स्काईप के द्वारा प्रेम से  पारिवारिक भजनों  के कार्यक्रम करते हैं ! 

लगभग ५० वर्ष पहले से अपने राम परिवार के बुज़ुर्ग- रमेश फूफा जी और आप भी  मुकेश जी का यह भजन बड़े प्रेम से गाते रहे हैं ! हमारी पीढी ने भी इस गीत को गाया है और आजकल हमारी रानी बेटी स्तुति भी इसे गाती है !:-
  
 सुर की गति मैं  क्या  जानूं एक  भजन करना जानू !!
  अर्थ भजन का है अति गहरा ,उसको भी मैं क्या जानू !
  प्रभु  प्रभु प्रभु  कहना जानू  नैना जल  भरना जानू !!
   सुर  की  गति मैं क्या जानू , एक भजन करना जानू !!

  फुलवारी  के फूल  फूल के  किसके गुण नित गाते हो !
  जब पूछा क्या कुछ पाते हो,  बोल उठे मैं क्या  जानूं !!
  प्रभु प्रभु प्रभु कहना जानूं ,  नैनां जल  भरना  जानूं’ !!
  सुर की गति मैं क्या जानू ,  एक भजन करना जानू !! 

जैसे अपने प्रिय जनों से बिछड़ने पर हमारे आँसू आ जाते हैं – वैसे ही भगवान से बिछड़ कर ,उनकी याद में "भजन" गाते गाते हमारी आँखे भी भर आयें ,आँखों से आँसूं की धारा बह निकले – तभी सिद्ध होगा कि ह्म अपने प्यारे प्रभु से सच्चा प्यार करते हैं और वास्तव में उनका सुमिरन कर रहे हैं ! उनके प्रति हमारा प्रेम प्रगाढ़ होकर अब "भक्ति" बन गया है और कदाचित ह्मारे "इष्ट" ने अति कृपा कर के हमें  अपना दास स्वीकार कर लिया है !


निम्नांकित है एक मेरी टिप्पणी :-  
( अतुल जी इस सन्दर्भ में आपको याद दिलाऊँ : दादा ( श्री जगन्नाथ जी - आपके पिताश्री) के निधन के उपरांत  ह्म सब पानीपत में  पूज्यनीया शकुन्तलाजी के श्री राम शरणम गये थे तो श्रद्धेया दर्शी बहेन जी ने क्या कहा था " मैंने बचपन में जगन्नाथ जी को स्वामी जी के सन्मुख कीर्तन करते देखा है ! वह बड़ी तन्मयता से भजन - कीर्तन करते थे उसे देख कर देखने वालों का भी ध्यान लग जाता था ! कीर्तन के अंत में वह सुध बुध खो कर गिर जाते थे  ! महराज जी उनकी ओर मुस्कुराकर देखते थे और  उन्हें यूँही पड़ा रहने देते थे ! साधकों के लिए वह दृश्य बड़ा प्रेरणा  दायक होता था ! इसलिए आप यह न सोचो क़ि वह कहीं चले गये हैं वह यहीं श्री राम शरणं में हैं !"  -- अतुलजी ये है एक अश्रुपूरित नैन और गदगद कंठ से  भजन कीर्तन करने वाले साधक के सद्गति  की कथा ! वास्तविक साधक को इसके अतिरिक्त और क्या चाहिए !) 


अतुलजी के पत्र का शेष भाग :-
वर्षों से मेरी यह धारणा रही है कि परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने भजनों पर इसलिये जोर दिया है कि  भजनों के माध्यम से गायक साधक ईश्वर से बात करें – उसका सिमरन करें. और तो कोई साधन हमसे बनेगा नहीं – कीर्तन करके ही अपने प्रियतम को रिझा लें – उससे बातें कर लें.  मेरी इस बहुत पुरानी धारणा को आपके पिछले दो तीन ब्लाग ने पक्का कर दिया.



==========================================================
अतुल जी को उनके उपरोक्त विचारों के लिए हार्दिक साधुवाद !


प्रियवर , ह्म सब एक ही  सदाबहार वृक्ष की फलती फूलती डालियाँ हैं ! ये शाखाएं जब तक अपने मूल से जुड़ी हैं , पुष्पित पल्लवित होती  रहेंगी !
                               
                                छोड़ेंगे  अगर   मूल  , हमे    शूल मिलेंगे ,
                               गर  जुड़े  रहे   यार  तो  भव  पार   करेंगे !!
अस्तु --------------     जोड़े  रहो  तुम  तार  गुरुजनों से  दोस्तों ,
                               छेड़े  रहो  झंकार यार  "राम  नाम" की !!
                          गर मिल न सका "वो" तुम्हे जप तप व यजन से ,
                          निश्चय   मिलेगा  "वो"  तुझे  श्री राम  भजन से  !!
                                                                                (भोला)
=========================================================
निवेदक:- व्ही. एन श्रीवास्तव "भोला"

बुधवार, 5 जनवरी 2011

साधक साधन साधिये # २ ६ ०

हनुमत कृपा                                                       
अनुभव  
                                               साधक साधन साधिये
                                            प्रभु कृपा प्राप्ति के साधन 
                        ( स्वमी सत्यानन्द जी महराज के प्रवचनों से संकलित )


महापुरुषों का कथन है कि  ध्यान के समय किसी और का चिन्तन मत करो ! ईश्वर के जिस किसी रूप में आस्था और रूचि हो ,उसी रूप का ध्यान  करो !ध्यान में तन्मयता हो जाने पर "मेरापन "मिट जाता है ! ध्यान में तन्मयता होने पर गोपियां सब कुछ में  ही  श्रीकृष्ण का दर्शन करने लगीं ! वास्तविक "ध्यान"  करते करते संसार का ऐसा विस्मरण हो जाता  है ! ( श्री डोंगरे महाराज के श्रीमदभागवत -रहस्य से )

हमारे जैसे साधकों के लिए गोपियों के समान "ध्यान" लगाना असम्भव है  इस  कारण ह्म जैसे साधको के लिए ,जो विधि पूर्वक "ध्यान" नहीं लगा पाते ,गुरुदेव  ब्रह्मलीन श्री स्वामी सत्यानन्द जी  महाराज  ने एक सहज और सुलभ साधन प्रतिपादित किया और  कहा  कि  "अपने नित्य के क्रिया कलापों के साथ साथ लगातार नाम जाप करने से भी  साधकों को अति सुगमता से "प्रभु -कृपा-प्राप्ति" हो सकती है ! अपनी  "अमृतवाणी" की ६१ वीं और ६२ वीं चौपाइयों में महाराज जी ने  यह सूत्र दिया है ---:
                       
                       राम राम  भज कर श्री राम ! करिए नित्य ही उत्तम काम !!
                       जितने कर्तव्य कर्म कलाप !  करिये  राम  राम  कर  जाप !!६१!!
                       करिये   गमनागम के काल ! राम जाप जो  करता निहाल !!
                       सोते जगते सब दिन याम   ! जपिए   राम  राम  अभिराम !!६२!!

भक्ति प्रकाश में भी महाराज जी का संदेश है
                             कर्म करो  त्यों जगत के ,धुन में धारे   राम !
                             हाथ पाँव से काम हो ,मुख में मधुमय  नाम !!


श्रीमदभगवदगीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मोह ,संशय ,नैराश्य और कायरता में पड़े अपने सखा पार्थ के माध्यम से सम्पूर्ण मानवता को "प्रभु" का नाम स्मरण करते हुए प्रसन्नता से ,पूरी दक्षता और सम्पूर्ण क्षमता के साथ  पुरुषार्थ करते हुए अपने जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त करने का आदेश दिया है !
                        
                         हे पार्थ तू कायर न बन ,मुझको सुमिर ,उठ युद्ध कर 
                         निश्चय विजय होगी तुम्हारी , हे  सखे  विश्वास कर  


इस उपर्युक्त विवेचन से हमारी समझ में यह आ रहा है  की  आगम ,निगम और पुराण  में वर्णित प्रभु -कृपा प्राप्ति के तीन साधन ध्यान ,अर्चन और वंदन में से केवल प्रभु की  अखंड स्मृति रखते हुए हम संसार में शुभ सत्कर्म करते रहें तो हमें   प्रभु की असीम कृपा मिलती रहेगी और उसकी अनुभूति भी होती रहेगी !


आज जनवरी ५, है ! प्रियजन यह मेरे पिताश्री की पुण्य  तिथि है ! आज से ३९  वर्ष पूर्व  कानपूर में ,रात के समय ,जब सारा परिवार ,उन्हें आराम से सुला कर ,घर से दूर ,"माता  के जागरण" में सम्मिलित होने गया था ,पिताश्री ने बिना किसी को किसी प्रकार का कष्ट दिए, एकांत में ,शांति पूर्वक अपने इष्ट "महाबीर विक्रम बजरंगी "को याद करते करते अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया था ! प्रातः काल जब रात भर अखंड भजन कीर्तन कर के भाई साहेब जब उन्हें जगराते का वशेष प्रसाद देने के लिए उनके पास गये तब तक वह परलोक सिधार चुके थे !  


आज उनके जीवन की यह झांकी अनायास ही मेरे स्मृति-पटल पर साकार  हो  रही है! भयंकर से भयंकर परिस्थिति में भी उन्होंने "गीता के ज्ञान" तथा "रामायण" से ग्रहण की हुई सुनीतियों का परित्याग नहीं किया !  


                        सरल सुभाव न  मन कुटिलाई ,  यथा लाभ संतोष सदाई "
                        बैर न बिग्रह आस न त्रासा ,सुखमय ताहि सदा सब आसा 
                   सम दम नियत नीति नहीं डोलहिं परुष वचन कबहू नहिं बोलहिं
                       देत लेत मन  संक न धरई  , बल अनुमान सदा हित करई   


यही थी उनके व्यक्तित्व की विशेषता जिसके परिप्रेक्ष्य में वे सदैव सत्कर्म और परहित करते रहे !,यहाँ तक कि उन्होंने अपने को धोखा देने वालोँ का कभी बुरा नहीं चाहा अपितु  " हानि लाभ जो भी हुआ हरि इच्छा से हुआ " इस भावना से उन्होंने उनको क्षमा भी  कर दिया ! परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल , उन्होंने अपने इष्टदेव  हनुमानजी का आश्रय  कभी नही छोड़ा ! सच पूछिये  तो अपने इष्ट के सम्बल पर ही उन्होंने अपनी  सभी समस्याओं का  धैर्य और साहस के साथ सामना किया ! उन्होंने कभी किसी से कोई  शिकवा-शिकायत नहीं की ! उन्हें अपने इष्ट की कृपा का भरोसा आजीवन बना रहा ! केवल कीर्तन ,भजन सिमरन और नाम जाप की कमायी उन्होंने जीवन भर की जिसका सुफल , ह्म ,उनके सभी वंशज आज तक भोग रहे हैं !


राम राम , कल फिर जब नयी प्रेरणा प्राप्त होगी आपको संदेश  दूंगा !
निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

साधक साधन साधिये# 2 4 6

हनुमत कृपा
अनुभव

प्रियजन ! मैंने तो अपने इष्ट देव श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी के चरित्र पर अमेरिका के छात्रों द्वारा उठाई शंकाओं के समाधान का प्रकरण समाप्त ही कर दिया था क़ि आज अपने राम परिवार के दो अतिशय प्रिय सदस्यों के भावपूर्ण पत्र (इ.मेल) हमे मिले ! इन दोनों का पूरा परिवार सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज का परम भक्त है और इनके परिवार के सभी सदस्य श्री स्वामीजी, श्री प्रेम जी, श्री विस्वमित्र जी महराज,पिताश्री हंसराज जी ,माँ श्रीमती शकुन्तला जी अथवा दर्शी बहेन जी से "राम - नाम" दीक्षा प्राप्त कर चुके हैं !

मेल पढ़ कर ,कृष्णा जी एवं श्री देवी (जो आजकल चेन्नयी से यहाँ आयी हुई हैं ) ने सलाह दी क़ि मैं , इन प्रियजनों के विचारों से भी सभी पाठकों को अवगत करा दूँ , अस्तु दोनों पत्रों को ज्यों का त्यों नीचे उध्रत कर रहा हूँ :--
===============================================
पहला पत्र सिंगापुर से अनिल बेटे का है , उन्होंने लिखा है कि :-
++++++++++++++++++++++++++++++++_
Saadar Charan Spursh!
Jai Sita Ram!
We returned from India last night. During last nine days, we did not access the internet and so could not read your messages. If you permit, I would like to add that:

1) In Shri Ramcharit Manas , Bhagwan Shri Ram has himself said that
अनुजवधू भगिनी सुत नारी ! सुनु शठ कन्या सम ए चारी !!
इन्ह्ही कुदृष्टि बिलोकइ जोई ! ताहि बधे कछु पाप न होई !!
Hence killing of Bali was justified. Yes in the Western world their moral Values are VERY different and hence they probably will not understand what the relations in INDIA mean.

2) Babuji had once mentioned that the 16,000 Ranian of Shri Krishna Bhagwan are symbolic to 16,000 veins of the Human Body. It is only PARMATMA Shri KRISHNA who can control all the 16,000 Veins of our Body and that is what was meant when we look at 16,000 Ranis.

This is what I could understand.

With Respects to Bua and yourself,
Anil
==========================================
दूसरा इ मेल "अतुल" बेटे का गाजिआबाद से आया है , उन्होंने लिखा है :-
++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
सादर चरण स्पर्श राम राम

मैं प्रतिदिन प्रात: काल में, कम्प्यूटर खोलने के बाद सबसे पहले " महावीर बिनवउँ हनुमाना" पढ़ता हूँ. !8.30 के लगभग यह आ जाता है.! गजाधर फूफाजी का प्रसंग एवं परमादरणीय दादी के अंतिम क्षणों के बारे में पढ़कर विश्वास करना कठिन हो गया कि हमने भी इन महान संतों के साथ जीवन के कुछ क्षण बिताये हैं. उनके चरणों में अनेकानेक प्रणाम .

आजकल श्री कृष्ण जी का प्रसंग चल रहा था, जिसे आपने आज विश्राम दिया है. आपको पता ही है कि परमादरणीय अम्मा कृष्ण जी की पुजारिन थीं. वे प्रतिवर्ष श्री जगन्नाथ जी की पूजा करती थीं. उन्होंने एक बार बताया था कि, श्री कृष्ण भगवान ने अंतिम प्रवास श्री जगन्नाथ पुरी में किया था. वहां की मूर्तियों के हाथ और पैर नहीं हैं. मूर्तियों के हाथ और पैर लकड़ी के हैं - मानो भगवान यह सन्देश दे रहे हैं कि, चोरी करने आदि के बाद यह स्थिति हो जाती है !.

जब आपने श्री कृष्ण जी के प्रसंग का समापन गुरुजनों की शिक्षा द्वारा किया तो मन में आया कि अम्मा के द्वारा बतायी हुई श्री जगन्नाथ जी की बात आप को भी बता दूं. वेदों में भी कहा है - अवगुण अपने देखो, गुण दूसरों के देखो.

एक और बात. राम और कृष्ण इस पृथ्वी पर लीला करने अवतरित हुए थे. इसी कारण वे गर्भ में भी आये थे. उस समय वे मानव रूप में थे एवं उस काल की परस्थितियों के अनुसार विविध लीलायें करते थे. इसी कारण उन्होंनें श्री वाल्मीकि जी से अपने रहने का स्थान बताने के लिये विनती की थी - एवं श्री लक्ष्मण जी को शक्ती लगने के बाद विलाप किया था और जटायू को गोद में लेकर आँसू बहाये थे.

तभी अपने देश के महान संतों ने लिखा है -

"न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं.
न रोये वन गमन में श्री पिता की वेदनाओं पर,
उठाकर गीध को निज गोद में आँसू बहाते हैं....."
एवं
"प्रबल प्रेम के पाले पढ़कर प्रभु को नियम बदलते देखा.
जिनका ध्यान विरंचि शम्भु सनकादिक से न सम्भलते देखा,
उनको ग्वाल सखा मंडल में लेकर गेन्द उछलते देखा.

आदर सहित
अतुल
================================================.
अनिल और अतुल बेटों को ह्म उनके इन अनमोल विचारों के लिए हृदय से धन्यवाद देते हैं ! अपने अति व्यस्त दैनिक कार्यक्रम में समय निकाल कर आप दोनों ही ने जो संदेश भेजे , सराहनीय है !

एक सलाह है क़ि जब मेल द्वारा मेरा संदेश न मिले तो आप अप्रिल ०१ , २०१० से भेजे मेरे पिछले २४४ संदेश भी कभी कभी पढ़ें ! उनमे मैंने अपनी प्रेममयी अम्मा के विषय में बहुत कुछ लिखा है इसके अतिरिक्त "पितामह की तीर्थ यात्रा" प्रसंग में मैंने पुरी के श्री जगन्नाथपुरी मंदिर में , देव मूर्तियों के ठीक सामने अपने दादाजी के देह त्यागने की पूरी कहानी लिखी है !

क्रमश:
निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
78, Clinton Road, Brookline,MA 02445, USA

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 225

ऐसे विश्व विख्यात सिने जौहरी श्री व्ही .शांताराम जी ने भली भांति कसौटी कर के, नाप जोख करके , हर तरह से परख कर ,हमारे बड़े भैया को अपनी "शकुन्तला" में कोई अति महत्वपूर्ण रोल निभाने के लिए सिलेक्ट कर लिया था ! शांताराम जी ने कहा था क़ि वह बड़े भैया को शकुन्तला में कोई न कोई अति महत्वपूर्ण रोल अवाश्य देंगे ! उन्हें जयश्री जी के अपोजिट, महाराजा दुष्यंत का रोल मिल सकता था , मेनका के साथ विश्वमित्र का रोल अथवा शकुंतला के पिताश्री "कणव ऋषि" का रोल भी मिल सकता था !

कानपूर में ह्म सब बंबई से प्राप्त उपरोक्त उत्साहवर्धक समाचार सुन कर बहुत प्रसन्न थे t अम्मा बाबूजी के मन में बड़े पुत्र से बिछड़ने की थोड़ी कसक थी लेकिन ह्म छोटे बच्चों में बड़ा उत्साह था ! थोड़ा बहुत अहंकार तो हमे हो ही रहा था क़ि ह्मारे बड़े भैया हीरो बन रहे थे ! स्कूल में भी विद्यार्थी हमे अधिक मान सम्मान देने लगे थे !

अपने - (मेरे निजी बारह तेरह वर्षीय) मन में तो बहुत सारे गुलगुले फूट रहे थे ! मैं नित्य प्रति भगवान जी से बड़े भैया की सफलता की प्रार्थना करता रहता था ! यह केवल भात्र प्रेम से प्रेरित नहीं था ! कितनी ही निजी आकांक्षाएं उस प्रार्थना में निहित थीं जो आपको कल बताउंगा !

१९४२ के "भोला बाबू"  (यानी क़ि मैं ) - उम्र १३ वर्ष मन ही मन  बड़े बड़े मंसूबे बना रहा था !बड़े भैयाजयश्री  के साथ शांताराम जी की फिल्म शकुन्तला में काम करेंगे उनका खूब नाम होग़ा तो उनके छोटे भाई (यानी क़ि मुझे) कम से कम हीरोइन अथवा हीरो के छोटे भाई का रोल तो मिल ही जायेगा !और मैं "बंधन"के मास्टर  सुरेश की तरह हिरोइन लीला चिटनिस  के छोटे भाई के रोल में नई सायकिल पर घंटी बजाते बजाते स्कूल जाऊंगा और स्कूल के मास्टर हीरो अशोक कुमार के साथ मिल कर प्रदीप जी की यह अम्रर रचना गा  गा  कर देश के नौजवानों को जगाऊंगा और उन्हें जीवन पथ पर आगे  बढने को प्रोत्साहित करूँगा .

चल चल रे नौजवान , कहना मेरा मान मान !!
चल रे नौजवान ----
दूर तेरा गाँव ,और थके पांव- फिर भी तु हरदम ,आगे बढ़ा कदम ,
रुकना तेरा काम नहीं , चलना तेरी शान .
चल रे नौजवान  ----
तू  आगे    बढ़े  जा ,  आफत  से  लडे  जा ,  
आंधी हो या तूफ़ान , फटता हो आसमान ,
रुकना तेरा काम नहीं ,  चलना तेरी शान,

सोमवार, 15 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 1 9

हनुमत कृपा 
अनुभव  

है कृपा  बरसा  रहा जिस धरनि पर  हनुमान   
फिर भला उस खेत का हो क्यों नहीं कल्यान 


बलिया में हरवंश भवन के आँगन वाले हनुमान जी की ध्वजा तले बारह वर्ष तक की हुई भावभरी प्रार्थनाओं के फलस्वरुप हमारी अम्मा को  प्राप्त हुए "बड़े भैया" उनके लिए किसी अनमोल "मणि" से कम न थे ! सो जब बहुत प्यार उमड़ता था तब वह उन्हें बड़े दुलार से "मन्नीलाल" कह कर पुकारती  थीं ! इतना प्यार करतीं थीं अम्मा उनसे क़ि वह भैया से थोड़े समय का भी बिछोह सहन नहीं कर सकती थीं ! पर "ऊपरवाले" (Navigator) की योजना के अनुसार बड़े भैया को अम्मा से दूर जाना था ,वह बंबई गये और वहाँ श्री हनुमान जी की कृपा से उन्हें पहली कोशिश में ही सफलता भी मिल गयी !


अम्मा ने भैया को बंबई इस विश्वास से भेजा था क़ि वह उलटे पाँव वहाँ से लौट आएंगे !सब जानते थे क़ि वह घर की सुख सुविधा छोड़ कर बहुत दिन बाहर नहीं रह सकेंगे ! उन दिनों ,पिताश्री को भी मैंने बार बार यह कहते हुए सुना था क़ि हफ्ते "दो हफ्ते बम्बई की पक्की सडकों पर जूते घिस के ,दादर अंधेरी, मलाड में  स्टूडियोज में धक्के खा के बबुआ लौट ही आयेंगे!" धोबी तलाव में  नुक्कड़ वाले इरानी रेस्तोरांत की चाय मस्का पाव आमलेट या   वर्ली में "फेमस बिल्डिंग" के बाहर ,फुटपाथ की दुकानों पर  और चलती फिरती गाडिओं पर बिकने वाली डालडा वनस्पती घी में तली मिर्च मसाले से भरी बम्बैया पाँव भाजी वह बहुत दिनों तक नहीं झेल पायेंगे !
  
भैया को फिल्म जगत में सहजता से मिली उनकी सफलता  से अम्मा बाबूजी प्रसन्न तो थे पर बम्बई की फिल्मी चमक धमक में उनके बिगड़ जाने का डर उनके मन से निकल नहीं पा रहा था ! किसी प्रकार उन्हें जल्दी ही कानपूर वापस बुला लेने की प्रबल इच्छा उनके मन में जम कर बैठी हुई  थी! अपनी प्रत्येक प्रार्थना में वे इष्टदेव हनुमान जी से यही अर्ज़ करते थे क़ि कोई अनिष्ट होने से पहले भैया बंबई छोड़  कर कानपूर लौट आयें !


 प्रभात" से अलग होने के बाद शांताराम जी द्वारा स्थापित की गयी ,नयी फिल्म कम्पनी "राजकमल कला मंदिर" के दफ्तर में ,उनकी नई हीरोइन (latest discovery) "जयश्री" के पदार्पण से वैसे ही काफी चहल पहल मची रहती थी पर अब उन्हें लेकर बनने वाली "शकुन्तला" के मुहूर्त की तैयारी के कारण वहाँ की रौनक और भी बढ़ गयी थी ! प्लान ये था क़ी  बरसात के बाद नवरात्रि में शूटिंग शुरू होगी !


जून जुलाई की भयंकर बम्बैया वर्षा और उमस ने भैया को त्रस्त तो किया लेकिन उनसे वह निरुत्साहित नहीं हुए ! शांताराम जी की फिल्म मे काम करने का अवसर मिलना बड़े सौभाग्य की बात थी ! वह किसी प्रकार भी यह सुनहरा मौका गंवाना नहीं चाहते थे ! अपनी सफलता की कामना लिए वह बिना नागा निश्चित दिनों पर मुम्बादेवी, सिद्धविनायक ,हाजीअली , हनुमान जी एवं महालक्ष्मी मंदिर अवश्य जाते थे !


अगस्त के पहले सप्ताह में एक दिन ओपेरा हाउस सिनेमा से निकल कर समुद्र की  ठंढी  हवा का आनंद लेने और भेलपूरी खाकर नारियल का पानी पीने के इरादे से वह चौपाटी क़ी
तरफ  मुड गये ! वहाँ काफी रौनक भी थी ,रोज़ से कहीं अधिक भीड़ वहाँ जमा थी ! ज़रूर आज यहाँ कोई खास बात है ! वह सोचने लगे -------


क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 1 7

 हनुमत कृपा- अनुभव 

हम बड़े भैया की कथा कह रहे थे!आज भी उन्ही की कथा होगी क्योंकि "ऊपरवाले"ने हरी झंडी उसी लाइन पर गाड़ी ले जाने को दी है ! आप की भी आज्ञा हो तो आगे चलें,,,,,,
चित्रकला ,आधुनिक संगीत और लेखन आदि में तो वह पारंगत थे ही साथ साथ वह एक अति स्वरुपवांन व्यक्तित्व के धनी थे! गौरवर्ण सुडौल काठी ,घने ,काले, घुंघुराले बाल, कागज़ी बादाम सा धवल सन्तुलित नाकनक्शे दार चेहरा ! अड़ोसी पड़ोसी ,स्कूल के मित्रगण ,निकट और दूर के संबंधी खास कर जान पहचान के युवक - युवतियां हर समय उन्हें घेरे रहते थे !उनके स्कूल  के मित्रों में सबसे प्रिय थे ,नगर के दो उच्च शिक्षसन्स्थानो के मराठी मूल के अध्यापकों के पुत्र अशोक हुब्लीकर और वसन्त अठावले ! मोहल्ले की गली में ईंटों के विकेट बना कर लकड़ी के तख्ते के बल्ले से क्रिकेट खेलना उन्हें पसंद नहीं था ! खाली समय में वह ग्रामाफोंन पर नये नये फिल्मों के गाने सुनते थे और उस के साथ साथ गा कर सीख लेते थे !
स्कूल में ,१९३७ से १९४१ तक बड़े भैया अपने आकर्षक व्यक्तित्व और संगीत कला के कारण हमेशा प्रशंसकों से घिरे रहते थे ! वह अपनी मित्रमंडली को नयी फिल्मों की कहानियाँ और गाने सुनाते थे और "सिने संसार" की ताज़ी खबरे बताते थे !  मित्रमंडली की हर ऎसी बैठक के बाद भैया के मित्रगण एक स्वर में  उन्हें बम्बई जा कर फ़िल्मो  मे काम करने की मन्त्राणा देते थे !
यहाँ एक विशेष बात बता दूँ , विवाह के बारह वर्ष बाद तक ह्मारे अम्मा पिताश्री  निःसंतान थे !!ह्मारे भैया लम्बी प्रतीक्षा कराके के ,बड़ी मनौतियों के फलस्वरूप मिले थे !प समझ सकते हैं कि इसीलिये  कुछ न कुछ विशेषता तो उनमें थी ही ! हमारे माता पिता के लिए वह "कोहिनूर" हीरे के समान अनमोल थे ! कभी कभी पिताश्री उन्हें Prince of Wales  कहकर पुकारते थे ! उनकी सारी इच्छाएं व्यक्त करने से पहले ही पूरी कर दी  जातीं थीं !अस्तु ,१७ वर्ष की छोटी अवस्था में ही उन्हें  सन.१९४१-४२ में सिनेमा जगत में प्रवेश करने के लिए  बंबई जाने की अनुमति मिल गयी !

क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"




गुरुवार, 11 नवंबर 2010

जय जय जय कपिसूर # 2 1 6

हनुमत कृपा - निज अनुभव
HANUMAAN's GRACE - EXPERIENCE

प्रियजन ! किसी कथा के प्रारंभ में उसके अंत का अनुमान नहीं लग सकता.! कथा की समाप्ति पर ही उसमे निहित नैतिक उपदेश उजागर होता है ! चलिए बड़े भैया की कथा आगे बढायें !ह्मारे भैया केवल संगीतज्ञ ही नहीं थे ! वह लेखन में भी प्रवीण थे !मुझे याद आ रहा है ,१९३४-३५ में जब वह ११ -१२ वर्ष के थे और मैं  ६-७ वर्ष का ,वह घर से ह़ी एक  हस्त लिखित मासिक बालोपयोगी पत्रिका निकालते थे ! उस पत्रिका में समाचारों के अतिरिक्त ज्ञान विज्ञानं धर्म और सिनेमा की जानकारी होती थी ! हिन्दी बोलती फिल्मे (talkies) हाल में ही भारत में चालू हुईं थीं ,उनके latest समाचार भी वह उस पत्रिका में देते थे ! कैसे ? (पिताश्री कानपुर के रीगल और निशात टाकीज के पार्टनर थे !सिनेमा के मेनेजर भैया को नयी फिल्मों के पोस्टर ,पेम्फलेट और चित्र आदि समय समय पर पहुंचाते रहते थे ) 


पत्रिका पढने वालों में सर्वप्रथम थे ह्म उनके तीनो भाई बहेन ! लगभग ६- ७ वर्ष का मैं ,मेरी बड़ी दीदी जो ह्म से दो वर्ष बड़ी हैं और हमारी छोटी बहेन जो तब साल भर की थी ! इसके अतिरिक्त उनके मित्रगण और अडोस पडोस के बालवृन्द मांग मांग कर उसे पढ़ते थे !तब  मुझे हिन्दी का अक्षर ज्ञान तो था पर मेरे लिए उस पत्रिका के सब विषयों को समझ पाना कठिन था !अस्तु जितना वह जानते थे,वह सब हमे बता देने के लिए और मुझे Well Informed बनाने के लिए वह मुझे अपने डेस्क पर साथ में बैठा कर अपनी मैगज़ीन का एक एक पृष्ठ  पढ़ कर सुनाते और समझाते थे ! इसके अतिरिक्त पिताश्री के म्योर मिल वाले बंगले के ड्राइव वे पर ,सायंकाल सूर्यास्त के बाद अंगुली पकड़ कर मुझे टहलाते हुए गृह नक्षत्रों,आकाश गंगा ,सप्त ऋषि एवं ध्रुव तारे के दर्शन करवाते थे और उनसे सम्बंधित जानकारी देते थे !इस प्रकार बारह वर्ष की छोटी अवस्था में वह मुझे अपनी छत्र छाया में रख कर अपने अनुभवों द्वारा  मेरी प्रभु दत्त प्रतिभाओं  का उन्नयन करन चाहते थे ! 


पाठकगण यह ब्लॉग मूलतः मेरी "आत्म कथा" है जिसे मैं अपने प्यारे प्रभु की आज्ञा से उनसे ही प्राप्त प्रेरणा के सहारे लिख रहा हूँ ! उनका कहना है क़ि प्रत्येक जीवन कथा में कुछ न कुछ अनुकरणीय होता ही है और वह मुझसे वही लिखवा रहे हैं जिसे वह उचित मानते हैं! हमारे बड़े भैया के जीवन में भी उन्होंने जो कुछ अनुकरणीय जाना मुझसे लिखवा दिया !   आज इतना ही शेष a,गले अंकों में क्रमशः 


निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"



मंगलवार, 9 नवंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 1 4




हनुमत कृपा - अनुभव


पिताश्री के समक्ष उनके इष्टदेव महावीर जी ,साकार प्रगट हुए ! एक साधारण ग्रामीण के रूप  में  अवतरित हो कर उन्होंने उनका मार्ग दर्शन किया! उन्होंने वह अख़बार  भी  अति नाटकीय ढंग से उपलब्ध कराया जिसमें उस एकमात्र  विलायती सिलेबस वाले स्कूल का विज्ञापन  था जिसे पिताश्री ज्वाइन कर सकते थे !और उन्होंने पिताश्री को अभयदान देकरलगभग धकेल कर बड़े पिताश्री के पास भेजा! एकमात्र  उन देवपुरुष की मंत्रणा के कारण ही ह्मारे पिताश्री का जीवन संवरा ! हनुमत कृपा का यह अनुभव ह्मारे पिताश्री एवं ह्मारे समूचे परिवार के लिए अविस्मरनीय  है! - यहाँ यह मनन करने योग्य है क़ि मेरे समक्ष मेरे कुलदेवता साकार तो नहीं आये पर उनके शब्द मेरे पिताश्री की वाणी में सूक्ष्म रूप में  अवतरित होकर मेरा मार्ग दर्शन कर गये !जानते हैं प्रियजन पिताश्री ने अपने इष्ट देव श्रीहनुमान जी की प्रेरणा से मुझे वही मन्त्रणा दी जैसी "उन्होंने" पिताश्री को दी थी! पिताश्री ने मुझे बताया क़ि हनुमान जी के प्रतिरूप उन ग्रामीण बाबा जी ने उनसे क्या कहा था !










केवल इस जन्म के ही नहीं पिछले अनगिनत जन्मों के ह्मारे निजी और ह्मारे वंशजों के समाहित कर्मों एवं संस्कारों का मिश्रित फल ह्म अपने वर्तमान जीवन में अनुभव करते हैं !विभिन्न जन्मों में की कमायी के आधार पर सब प्राणियों को जीवन में विलग विलग कर्म करने पड़ते हैं! 

कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता !संसार मे जीवों  को अपने अपने प्रारब्धानुसार और विगत जन्मों की कमाई के आधार पर वर्तमान जन्म में  जीवन जीने के विभिन्न साधन सुविधाएँ प्राप्त होती हैं .!आवश्यक नहीं क़ि एक परिवार  में सभी प्राणी एक से गुणों अवगुणों के स्वामी हों ,एक से काम करें,एक सी कमाई करें !इसलिए वर्तमान काल में ,प्यारे प्रभु ,तुमसे जो कार्य करवाना चाहते हैं उसे सहर्ष स्वीकार कर ,उसे प्रभु का आदेश, प्रभु की सेवा मान कर अपनी पूरी योग्यता ,बल बुद्धि लगा कर करो! अन्तोगत्वा वह परम पुरुष, सर्व शक्तिमान तुम्हारा हाथ बटा कर तुम्हे सफलता प्रदान करवा देगा !


१९१५ में ह्मारे पिताश्री खानदानी लिखापढ़ी का पेशा छोड़ कर मिल कारखाने में "रंगरेज़" का काम करने जा रहे थे और १९५० में मैं 




अपने मन पसंद कार्य भजन गीत रचना गायन निदेशन और शिक्षण के सुवासित कलात्मक कार्यों से हटकर उसके बिल्कुल  विपरीत अतिदुर्गन्धमय  चर्मशोधन का कार्य करने जा रहा था !

एक २० वर्ष का होनहार  युवक जिसकी हिन्दी गीत रचनाएँ तब आकाशवाणी के प्रमुख कलाकारों द्वारा गायीं जाती थीं, जिसके प्रतिभाशाली शिष्य आकाशवाणी व फिल्मों के  नामी गायक बने ,एकाध फिल्मों एवं केसेट कम्पनियों के संगीत निदेशक भी बन गये वह युवक रोज़ी रोटी के चक्कर में  Leather Industry में Apprenticeship करने जा रहा था !     


इष्ट देव ने पिताश्री को हरी झंडी दिखायी थी और "उनकी" ही प्रेरणा से पिताश्री  ने मेरा मार्ग दर्शन किया !सद्गुरु और इष्टदेव की कृपा से पिताश्री Unpaid Apprentice से अपनी कम्पनी के Chairman cum Managing Director बने और मैं भी एक साधारण  Under Training Officer से Leather Expert to the Government of -----(a South American Country)  बना  तथा अन्तोगत्वा पिताश्री के समान ही मैं भी भारत के सबसे बड़े सरकारी     चर्म शोधन कारखाने का C.M.D बना ! प्यारे प्रभु की इस असीम कृपा के लिए उनसे केवल इतना ही कह सकता हूँ  


मेरे प्रभु "तेरे गुण उपकार का पा सकूं नहीं पार, 
रोम रोम कृतग्य हो करे सुधन्य पुकार "