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रविवार, 19 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 5

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे)


प्रियजन, अपनी अमृतवाणी में सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने हम साधकों   को समझाया है कि हमें अन्य धर्म, आस्था ,मत -मतान्तर वालो से उलझ कर वाद विवाद में पड़ कर अपनी "नाम - साधना" का बहुमूल्य समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये ! गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए हमें अपना स्वधर्म पालन करते रहना चाहिए !


महाराज जी ने कहा है कि मत मतान्तरों क़ी कपोल कल्पनाओं का मायाजाल कृत्रिम है, झूठा है ! मानव का किसी के प्रति किसी प्रकार का ,मोह ,बैर, विरोध , निंदा, हठ और  क्रोध,सभी मिथ्या हैं और सर्वथा त्याज्य हैं ! 


  • मिथ्या  मन कल्पित मतजाल , मिथ्या है मोह कुमुद बेताल !!
  • मिथ्या मन मुखिया  मनोराज ,सच्चा है राम नाम जप काज,!!  
  • मिथ्या  है वाद  विवाद  विरोध , मिथ्या है  वैर निंदा हठ क्रोध  !!
  • मिथ्या  द्रोह दुर्गुण  दुःख खान ,  राम नाम  जप सत्य निधान !! 
अन्य धर्मावलम्बियों को नीचा दिखाकर उन्हें अपने "मत" से प्रभावित करने के उद्देश्य से  कट्टर-धर्म-पंथियों को अक्सर एक दूसरे से अंतहीन वाद-विवाद में जूझते देखा गया है ! झूठे अहंकार से प्रेरित होकर, वैर भाव से केवल विरोध प्रदर्शन के लिए  अन्य मत वालों को हठ से ,अपना मत स्वीकार करवाने के लिए प्रयास करना और असफल होने पर क्रोधित एवं दुखित होना अनुचित है इससे  अंतत: अशांति  ह़ी मिलती है,! साधक की 
जितनी शक्ति और जितना बहुमूल्य समय इस झूठ मूठ के शास्त्रार्थ  में बर्बाद होता है वह समय यदि ,गुरुजन के कहे अनुसार श्रद्धा भक्ति सहित अपने  इष्ट -भगवान की आराधना में लगाया जाता है तो परम पुरुष की "कृपा का अवतरण" उसी क्षण हो जाताहै  ! उसकी   कृपा की अनुभूति  ही "उनकी अनुभूति"  है , उनका "दर्शन" है !

प्रियजन ,  इस समग्र "सृष्टि  वृक्ष" का सृजन एवं विस्तार "केवल एक बीज" और  एक ही "मूल" से हुआ है ! यह "बीज" विभिन्न  विशेषणों से जाना जाता है जैसे ईश्वर ,परमात्मा , परमपुरुष इत्यादि  ! इस बीजरूपी परमात्मा के व्यक्तिवाचक नामों की सूची अनंत है , कहाँ तक गिनाएं ? हर धर्मावलम्बी "उन्हें" अपनी श्रद्धा एवं मान्यता के अनुसार अपनी भाषा में ,भाव सहित, अपने गुरुजनों की मन्त्रणानुसार चाहे जिस नाम से भी पुकारे उसके  "निर्मल मन " से उठी वह पुकार सुन कर "परम प्रभु" नंगे पाँव आकर साधक पर अपनी कृपा वृष्टि अवश्य ही करेंगे ! "वह" किसी को भी निराश नहीं करते !


अस्तु बेकार के वाद-विवाद में समय बर्बाद करने के बजाय ह्म गुरुजनों द्वारा निर्धारित अपनी साधना चालू रख पायें ,ऎसी कृपा ह्मारे प्यारे प्रभु ह्म सब पर सदा सर्वदा बनाये रखें आज हमारी यह़ी प्रार्थना है !            


निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 4

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे )

श्री कृष्ण विषयक शंकाओं के समाधान करने में ह्मने उन देवाधिदेव के गृहस्थ -जीवन की माधुर्य एवं ऐश्वर्य लीला के दर्शन ,श्रीमद भागवत पुराण के आधार पर किये ! चलिए अब ह्म श्री कृष्णा अवतार से पहले , त्रेता युग में अवतरित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पर आरोपित शिकायतों के विषय में बात करें !
  • (a) श्री राम ने "जनक सुता  जग जननि  जानकी "  की, जो करुणा निधान - श्रीराम को अतिशय प्रिय भी थीं , इतनी निर्मंमता  से अग्नि परीक्षा क्यों ली ?
  • उत्तर : मर्यादापुरुषोत्तम  भगवान श्रीराम ने मानव शरीर में अवतार लिया था पर थे तो वह सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ , सर्वगुण सम्पन्न :
              राम ब्रह्म चिन्मय अविनासी, सर्व रहित सब उरपुर वासी !! 
               जगत प्रकास्य प्रकासक रामू ,मायाधीश  ज्ञान गुण  धामू !!
  • प्रियजन, अपनी दैवीशक्तियों से श्री राम जानते थे कि सीता निर्दोष हैं और स्वयं दैवी सम्पदा से सुसज्जित माँ को भी यह ज्ञान था कि अग्नि देवता उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचा सकते ! अस्तू दोनों की सहमति से अग्नि परीक्षा सम्पन्न हुई और जैसा सुनिश्चित था , सीता जी का एक बाल भी बांका नहीं हुआ ! दोनों को ही इस अग्नि परीक्षा में कोई  अनहोनी  नजर नहीं आई  ! 
  • (b) अयोध्या पति बन जाने के बाद राम राज्य स्थापित कर के श्री राम ने एक साधारण धोबी के उंगली उठाने पर अपनी धर्म परायण पतिव्रता पत्नी महारानी सीता को  बनबास दिया !क्या यह उचित है ?
  • उत्तर - मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम धर्म के विग्रह हैं ! राज-धर्म के मूल्य को गार्हस्थ जीवन के मूल्य से अधिक महत्व देकर और भावना से कर्त्तव्य को ऊंचा मान कर श्रीराम ने सीता का परित्याग किया था ! लेकिन उनके इस सांस्कृतिक आदर्श के इस निर्वहन से त्रेता युग क़ी भारतीय नारी के समक्ष यह प्रश्न मुंह बाये खड़ा हो गया कि " दुष्टों द्वारा  अपहरण होने के पश्चात  स्वतंत्र हो जाने पर  उस नारी का समाज में क्या स्थान है ?
  • संभवतः इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए द्वापर में श्री कृष्ण ने उदाहरण स्वरूप स्वयं ,इस प्रकार क़ी अपहृत तथा समाज एवं माता पिता तक से उपेक्षित ,एक दो नहीं ,सोलह हजार अबलाओं से विवाह करके , भविष्य के विशेषकर  कलि काल के अहंकारी, अभिमानी एवं स्त्री जाति के शोषक पुरुषों का मार्ग दर्शन किया कि वे भी ऎसी नारियों को अपनाने का पारमार्थिक कार्य करें !
  • (c)  श्री राम ने बाली को मार कर एक अति अनुचित कृत्य किया?  
  • उत्तर :- बाली श्री राम के मित्र सुग्रीव का बड़ा भाई था जिसने अपने छोटे भाई सुग्रीव के अधिकारों को छीन कर उसका निष्कासन कर दिया था ,जो अनुचित था !सुग्रीव सीताजी क़ी खोज में श्री राम की मदद कर रहा था ! राम द्वारा सुग्रीव जैसे मददगार मित्र की मदद करना क्या अनुचित कहा जाएगा ?   
  • और हाँ बलि को मार कर श्रीराम ने उसे स्वधाम दिया तथा मोक्ष प्रदान किया !श्री राम ने बाली की पत्नी तारा को सुन्दर उपदेश देकर उसकी पति वियोग की पीड़ा हर ली ! बाली के पुत्र अंगद को युवराज घोषित कर के उन्होंने  प्रमाणित कर दिया कि उन्होंने किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया !
प्रियजन इसके साथ हमारा शंका समाधानों का सिलसिला खतम होता है !

सच पूछिए तो हमे ऐसे जंजाल में फंसना  ही नहीं चाहिए ! हमें चाहिए क़ी ह्म अपनी संस्कृति और मान्यताओं को समाज के उन्नयन के योग्य बनाकर उसे दृढ़ता से अपनाये रहें ! हमे अपने निजी विश्वास पर अटल रह कर अपने गुरुजन के आदेशानुसार अपनी आध्यात्मिक साधना चालू रखनी है !गुरुजन के आशीर्वाद से इसी में अपना कल्याण है !
 
निवेदक:- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"!
  

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 3

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे) 



प्रियजन! ह्म दोनों का कल वाला हनुमान चालीसा पाठ (मेरा मूक और कृष्णा जी का स-स्वर गायन ) सुन कर श्री हनुमान जी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने तुरंत ही "बल ,बुधि ,विद्या" में से चुनकर ,हम दोनों की अभी की सर्वोच्च जरूरत -"सुबुद्धि" प्रदान कर दी ! इसके द्वारा हमे -(खासकर मुझे -क्योंकि ज्यादा नवाबी मैं ही झाड़ता हूँ ) यह ज्ञान हो गया ,क़ि मौसम की खराबी और अपने शारीरिक कष्टों के बहाने हम दोनों का अपना संयुक्त सत्संग बंद कर देना उचित नहीं है ! और तभी ह्म ने  निर्णय लिया कि ह्म दोनों अपना दैनिक सत्संग पुनः चालू करेंगे ! वचन बद्ध हैं ,निभाना पड़ेगा ! वह कृपा करें आप भी दुआ करें ,-बड़ी कृपा होगी !
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चलिए अब श्रीकृष्ण जी की लीलाओं पर पिछले अंकों में अमेरिकी छात्रों द्वारा उठायी  उनकी १६००० रानियों के विषय की शंका का भी समाधान कर लें  !

  • (e) प्रश्न : श्री कृष्ण की आठ पटरानियों के अतिरिक्त सोलह हजार रानियाँ भी थीं , क्या यह सत्य है और क्या श्री कृष्ण द्वारा ऐसा करना उचित था  ?
  • उत्तर  : श्रीमदभागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय ६९ , श्लोक ३३ से ४२ में भागवत कार ने हजारों वर्ष पूर्व , इस प्रसंग का वर्णन पूरे विस्तार के साथ किया है ,इसके अनुसार :-
  • भगवान श्री कृष्ण ने विलासी राजा नरकासुर (भौमासुर) को मार कर जब उसके वैभवशाली महल में प्रवेश किया तो देखा कि भौमासुर ने देश के विभिन्न राज्यों से सोलह हजार राजकुमारियों को लाकर  बंदी बना रखा है  ! 
  • भौमासुर की मृत्यु के उपरांत इन राजकुमारियों को पुनः उनके अपने  परिवारों में लौट पाना असंभव लगा ! अस्तु , अन्तःपुर में पधारे ,नर श्रेष्ठ भगवान श्री कृष्ण को देखते ही उन्होंने उनसे अपने जीवन एवं मान सम्मान रक्षा के लिए प्रार्थना की !श्री कृष्ण की मनोहारी छवि के दर्शन से सबकी सब उनपर मोहित हो गयीं थीं यहाँ तक क़ी  उन्होंने उनकी अहेतुकी कृपा तथा अपना परम सौभाग्य मान कर ,मन ही मन उनको अपने प्रियतम पति के रूप में वरण भी कर लिया था !(श्लोक ३१,३२,३३) ! श्री कृष्ण ने भी उन कन्याओं की जीवन रक्षा के लिए  एवं समाज में उन्हें उचित सम्मान दिलाने के लिए स्वीकार कर लिया ! 
  • तदनन्तर भगवान श्री कृष्ण ने एक ही मुहूर्त में  विभिन्न महलों में , अलग अलग रूप धारण कर के ,एक ही साथ ,उन १६००० राजकुमारियों के साथ विधिवत विवाह (पाणिग्रहण) किया  ! सर्वशक्तिमान अविनाशी भगवान  के लिए इसमें आश्चर्य क़ी कौनसी बात है ? 
  • जब   देवर्षि  नारद ने श्रीकृष्ण क़ी इन १६००० रानियों के विषय में जाना तो उन्हें वैसी ह़ी शंका हुई जैसी आपको हमको या अमेरिकी बच्चों को हुई थी ! वे सोचने लगे कि यह कितने आश्चर्य की बात है क़ी श्रीकृष्ण एक ही शरीर से ,एक  ह़ी समय ,एक साथ इतनी कुमारियों से ब्याह रचा सके !अब द्वारका में १६१०८ रानियों के साथ उनका वैवाहिक जीवन कितना दुखद अथवा सुखद है यह जानने की उत्सुकता लिए नारदजी  भगवान कृष्ण की गृहस्थी का दर्शन करने स्वयं द्वारका पहुँच गये !
  • द्वारका में जो नारद जी ने देखा ,उससे उनकी आँखें खुली क़ी खुली रह गयीं !उन्होंने देखा कि भगवान श्री कृष्ण अपनी सभी रानियों के साथ गृहस्थों को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों  का आचरण कर रहे हैं !यद्यपि वह एक ह़ी थे पर नारदजी ने उन्हें उनकी प्रत्येक रानी के साथ अलग अलग देखा ! उन्होंने श्रीकृष्ण की योगमाया का परम ऐश्वर्य बार बार देखा और उनकी व्यापकता का अनुभव किया !यह सब देख सुन कर नारदजी के  विस्मय और कौतूहल की सीमा नहीं  रही ! 
  • रामावतार में मर्यादा का अत्याधिक पालन करने वाले भगवान ने जहाँ एक पत्नीव्रत धर्म का पालन किया था वहाँ कृष्णावतार में उन्होंने वैसा नहीं किया ! श्री कृष्ण जी ने १६१०८ देविओं से विधिपूर्वक विवाह किया !
  • कुछ विद्वानों का मत है कि ,गृहस्थाश्रम धर्म का वर्णन करने वालीं, वेद की १६००० ऋचाएं ,कृष्णावतार के समय , प्रभु सेवा की भावना से राजकुमारियां बनी और अंततः श्री कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हुईं !
  • अनेक महात्माओं का यह भी कहना है कि श्रीकृष्ण की १६००० रानियाँ लाक्षणिक भाषा में मानव शरीर की नाड़ियों का प्रतीक हैं ! 
इसके साथ साथ श्रीकृष्ण लीला से सम्बंधित शंकाओं के समाधान का अध्याय समाप्त हो रहा है !
इस  सम्बन्ध में गुरुजनों का सुझाव है कि श्रीकृष्ण का जीवन अथवा उनके द्वारा किये हुए कर्म अनुकरणीय नहीं हैं , स्वयं वैसे कर्म करने की कोशिश  न करें !
  • क्रमशः 
  • निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 2

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे)

प्रियजन !  आज १६ दिसम्बर २०१० है और आज मैं सबसे पहले अपना आज का ही एक ताज़ा ताज़ा अनुभव सुनाने जा रहा हूँ  ! कल का प्रसंग उसके बाद आगे बढ़ाऊंगा !

आपने समाचारों में सुना ही होग़ा क़ि इन दिनों समस्त उत्तरी गोलार्ध में, खासकर योरप और अमेरिका में भयंकर शीत लहर आयी हुई है ! U. S  A में यहाँ बोस्टन का तापमान भी सारे  दिन शून्य अंश सेल्सिउस से नीचे ह़ी रहता है लेकिन अभी बर्फ नहीं पड़ी  है ! शाम को चार बजे रात हो जाती है और सुबह पाँच बजे भी आसमान में तारे दिखाई देते हैं ! पर हमे मौसम की इस उतार-चढ़ाव से कोई अन्तर नहीं पड्ता ! आराम से देर तक सोते हैं ! चाय की प्याली में चम्मच की खनक सुन कर ७-८  बजे बिस्तर छोड़ते हैं ! लखनऊ के नवाबों की थोड़ी सी नवाबी ही ह्म जैसे कानपूर वालों को विरासत में मिली है ,उसे भी त्याग देना क्या मूर्खता नहीं होगी ?  

पिछली रात मुझे अन्य रातों से थोड़ी अच्छी नींद आयी ,इस कारण आज सबेरे चाय के प्याले की खनक कान में पड़ने से पहले ही मेरी नींद खुल गयी और मैं आँखे बंद किये मन ही मन श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा !
"श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधार ,
  बरनौ  रघुबर  बिमल  यश जो दायक फल चार !"
से प्रारम्भ कर मै -
"नाशे  रोग  हरे  सब  पीरा , जपत   निरंतर  हनुमत बीरा 
 संकट से हनुमान छुडावे ,मन क्रम बचन ध्यान जो लावे "
तक पहुचा था क़ि मेरे कान में धर्म पत्नी कृष्णा जी के स्वर में उसके आगे की लाइनें   "सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा "  
और मनोरथ  जो कोई  लावे ,सोई  अमित जीवन  पद पावे !!
सुनायी पड़ी ! पर  उसके बाद भी मैं पहले की तरह आँख मूदे बाक़ी चालीसा मन में ही गाता रहा और इस दोहे से पाठ पूरा किया 
"पवन  तनय  संकट हरण  मंगल  मूरत  रूप ,  
राम लखन सीता सहित हृदय  बसहु सुर भूप"


मन में ही पाठ पूरा कर के मैनें जब आँखें खोलीं तो देखा क़ि कृष्णा जी आज मंदिर मे नहीं गयीं थीं ,वहीं मेरे सिरहाने पलंग पर "सुखासन" लगाये बैठी हैं ,उनकी आँखे बंद हैं और बिना यह जाने क़ि मैं जगा हुआ हूँ और मन ही मन हनुमान चालीसा पाठ का समापन कर रहा हूँ ,उन्होंने भी मेरे साथ साथ ही समापन किया अन्तर केवल यह था क़ि मैं मूक था और वह मुखर !


एक बात और बताऊँ ,यह ब्लोगिंग का क्रम शुरू करने से पहले, ह्म दोनों पति पत्नी ,हर दिन ,कम से कम एक बार ,बिना नागा, बाजे - गाजे के साथ ,हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य कर लेते थे ! पर इधर वह क्रम बिल्कुल ही टूट गया है ! बहुत सबेरे उठ कर वह पाँच साढ़े पाँच बजे ,बिस्तर छोड़ देती हैं और फिर घर के मंदिर में ,अकेले ही अपनी पूजा आराधना करने बैठ जाती हैं ! अपनी मजबूरियों के कारण मैं सोता रहता हूँ ! जिससे इधर बहुत दिनों से  ,ह्म दोनों के पत्र-पुष्प ,एक साथ  हमारे इष्ट देव को नहीं मिले हैं ! मुझे तो ऐसा लगता है क़ि "वह" ह़ी ह्म दोनों से ,एक साथ ,चालीसा  सुनना चाहते होंगे इस कारण "उन्होंने" आज प्रातः वाला "अनुभव" हमे करवाया और मेरा मूक स्वर तथा कृष्णाजी का  सस्वर चालीसा गायन पत्र पुष्प समझ कर स्वीकार कर लिया ! 


प्रियजन ! मेरी समझ में क्या आएगा ,मैं ठहरा अनाडी ! आप ही सोच कर बताएं क़ि मेरी अर्ध-सुप्त अवस्था के मूक गायन के साथ साथ कृष्णा जी ने कैसे चालीसा का पाठ उसी  भाव से, उसी गति से सस्वर शुरू किया जिससे मैं अपने मन मे गा रहा था ? " क्या यह "इष्ट देव " का कोई चमत्कार था ? अथवा  "क्या इसी को "टेलीपेथी" कहते हैं ?"   


शंका समाधान प्रसंग फिर कल से , आज इतना ही --बाक़ी क्रमशः
निवेदक: व्ही. एन .श्रीवास्तव "भोला"
78, Clinton Road,Brookline.MA 02445.USA

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 1

राधा हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे)

मैंने पिछले अंकों में ,अमरीकी क्षात्रों द्वारा उठाये ,ह्मारे सर्वाधिक पूज्यनीय इष्ट - भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की  जीवन लीलाओं से चुने कुछ विवादास्पद प्रसंगों का वर्णन किया था !  प्रियजन ,ह्मारे ग्रंथों में उन सभी शंकाओं को समूल उखाड़ फेकने के तथ्य मौजूद हैं !मैंने उन्ही ग्रंथों से प्राप्त जानकारी के आधार पर वैसी लीलाओं से उभरी शंकाओं के समाधान खोज कर ,अपनी सीमित क्षमताओं से ,स्वयं समझने और अपने प्रिय स्वजनों को समझाने का प्रयास किया है ! समझ ,शक्ति ,समय और साधनों की कमी के कारण उस अथाह  ज्ञान के सागर से दो चार बूँद से अधिक नहीं ला पाया , फिर भी जितना बन पा रहा है ,कर रहा हूँ ! चलिए  कल से आगे बढ़ें :-

दो शंकाओं (a) और (b) के विषय में कल लिख चुका हूँ ! आज श्रीकृष्ण एवं वृषभानदुलारी   राधा रानी के सम्बन्ध की तीसरी शंका के समाधान से शुरू कर रहा हूँ  :-
  • (c) प्राचीन ग्रन्थों (विशेष  कर श्रीमद भागवत ) में हमे कहीं भी "राधा कृष्ण" के बीच दूर से भी पति पत्नी वाला सम्बन्ध नहीं दिखाई दिया ! राधा-कृष्ण के सांसारिक प्रेम की मिथ्या धारणा का उद्गम कहां है ,राम जाने ! 
  • श्रीराधा जी को "श्रीमदभागवद"  में "श्री कृष्ण" की "आद्य संयोजिका शक्ति", "ब्रह्मानंद  प्रदायिका शक्ति" एवं "आह्लादिनी शक्ति" तथा सर्वशक्तिमान भगवान श्री कृष्ण की "आराधिका" कहा गया है ! (स्क-दशम,.अ -३०, श्लोक २८ )      "श्रीराधाजी",  वृज की  अधीश्वरी देवी हैं ! ग्रंथों में उन्हें " श्री" नाम से भी सम्बोधित किया गया है जो आज तक प्रचिलित है !  श्रीमद भगवत में यह भी कहा गया है क़ि "श्रीकृष्ण" आत्मा हैं और श्रीराधाजी "आत्माकारवृत्ति" हैं !
  • बरसाने   गाँव में प्रचलित कथाओं के आधार पर  यह भी किम्वदंती है क़ि  वृषभान दुलारी  श्रीराधा के  पति का नाम "अनय" था जो स्वयं देव पुरुष थे और श्री कृष्ण जी के साथ साथ लीला करने के लिए अवतरित हुए थे !         
  • (d) चौथी शंका रुकमिणी हरण के विषय में थी 
  • रुकमिणी द्वारकाधीश श्री कृष्ण की प्रमुख आठ पटरानियों में से एक थीं !श्रीकृष्ण की ये आठों पटरानियाँ "अष्टधा प्रक्रति" की प्रतीक थीं जो सब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को अतिशय प्रिय थीं तथा सर्वदा--सर्वथा उनके आधीन थीं ! "गीताजी " में श्री भगवान ने  स्वयं अर्जुन को यह तथ्य समझाया था !श्री भगवान उवाच-
  • " पृथ्वी ,पवन ,जल , तेज , नभ .मन ,अहंकार व बुद्धि भी !
  •    इन  आठ  भागों  में  विभाजित  है  प्रक्रति   मेरी   सभी !!
  • ( भगवत गीता -श्री हरि गीता - अध्याय सातवाँ -श्लोक ४  ) 
  • राजकुमारी रुकमिणी विदर्भराज भीष्मक की पुत्री एवं युवराज रुक्मी की बहन थीं ! भाई रुक्मी उनका विवाह दुष्ट राजा शिशुपाल से करवाना चाहता था जो कुमारी को नापसंद था ! तनिक सोच कर  देखें ,कहाँ परम पवित्र "जीव" की प्रतीक रुकमिणी और कहाँ दुष्टता का साकार स्वरूप शिशुपाल ! प्रकृति  के नैसर्गिक नियमानुसार "जीव" का अंतिम गन्तव्य "ईश्वर मिलन" है ! सो रुक्मिणी "ईश्वर -श्रीकृष्ण  " को ही अपने पति के रूप में वरना चाहती थी! उन्होंने न्योता भेज कर कृष्ण को बुलाया था क़ि वह उनकी रक्षा करें , उन्हें आकर अपने साथ द्वारका ले जाएँ और विधिवत उनसे विवाह कर उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार करें ! प्रियजन ,आप कहें ,यह हरण कैसे हुआ ? दो व्यस्क व्यक्तियों का आपसी सहमति  से विवाह करना कैसे अनुचित है ?
  • साधारण परिस्थिति में,योगेश्वर शायद इस "हरण कांड" को अंजाम नहीं  देते ,पर हुआ ऐसा क़ि रुक्मणी के गुरु "सुदेव जी " ने सन्देशवाहक के रूप में द्वारका जाकर शास्त्र विधि से रुकमनी  का पानिग्रहन करने के लिए श्रीकृष्ण को प्रेरित किया !इस प्रकार सद्गुरु के आशीर्वाद से  ,लोक कल्याण हेतु  "जीव"-रुक्मणि  और "ईश्वर" -"श्री कृष्ण" का मिलन हुआ ! आज भी ,भौतिक जगत में एकमात्र "सद्गुरु" की कृपा से ही  योग्य शिष्य को "ईश्वर" मिल सकता है !
  • आज इतना ही , क्षमतानुसार ,शेष शंकाओं का समाधान कल करेंगे !
  • निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 4 0

हनुमत कृपा 
अनुभव  
(गतांक से आगे )


मुझे  पूरा विश्वास है प्रियजन क़ि आप अमेरिकन बच्चों  द्वारा पूछे  हुए  हिन्दुओं  के आराध्य देव श्रीकृष्ण और श्रीराम की तथाकथित अनुचित लीलाओं से संबंधित प्रश्नों के उचित उत्तर अवश्य जानते हैं ! अपने विषय में तो मैं कह ही चुका हूँ क़ि  आज से आठ दस वर्ष पूर्व जब वे  प्रश्न मेरे समक्ष आये थे मैं उत्तर देने में असमर्थ था ! मैं बच्चों की शंकाओं का समाधान नहीं कर पाया था ! पर विगत वर्षों में मुझ पर श्री हरि कृपा हुई ,और मुझे आप से आप उन सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गये ! जी हाँ "हनुमत कृपा" से ! 


बात ऎसी हुई कि यहाँ अमेरिका आने के कुछ वर्ष बाद मुझे हृदय रोग हुआ !गहन मेडिकल जांच के बाद शरीर के विभिन्न अंगों के रोगों का निदान हुआ और मुझे हर प्रकार के शारीरिक श्रम करने की मनाही हो गयी ! प्रति दिन , २०-३० मिनट मंथर गति से टहलने के अतिरिक्त और कुछ करने की न शक्ति मुझमे थी और न मुझे उसकी इजाजत थी  ! इत्तेफाक से धर्मपत्नी कृष्णा जी का भी उन्ही दिनों एक गम्भीर ओपरेशन हुआ और वह भी हमारी तरह " पूर्ण विश्राम" करने की अधिकारिणी बन गयी ! बस क्या था ,अपने को तो मज़ा आ गया ! चौबीसों घंटे केवल मैं और वह , जरा सोच के देखिये "क्या खूब गुज़री होगी जब मिले  दीवाने दो "  


ऐसे में समय बिताने के लिए अन्ताक्षरी का सहारा लेना पड़ा ! ह्म शुरू करते १९३४ -३५ की "अछूत कन्या"- में देविकारानी और अशोक कुमार के गीत "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन डोलूँ रे " से और कृष्णा जी "रा" से "सरस्वती चन्द्र" का गीत "राम करे ऐसा हो जाये , मेरी निदिया तोहे मिल जाये " गाकर मुझे "ये" से गाने को मजबूर करतीं और मैं "ये रातें ये मौसम ये हसना हसाना , हमे भूल जाना इन्हें ना भुलाना " गाता और उसके   साथ ही फिर झगड़ा शुरू हो जाता ! इन्साफ करने वाले (आज कल के बालकगण)कहते "ऐसा कोई फिल्मी गाना नहीं " और मेजोरिटी के बल पर वे मुझे हरा देते !बहुत दिनों तक यह खेल भी न चल सका , किसी और "टाइम पास विधि" की तलाश शुरू हुई !


कुछ और इंट्रेस्टिंग नहीं मिला तो मजबूरन टी वी पर "आस्था" चैनल देखने का समय  आप से आप बढ़ गया ! सच पूछिए तो "आस्था" चैनेल पर श्री मोरारी बापू, श्री रमेश भाई    ओज़ा आदि के प्रवचन सुन कर हमारी रूचि श्रीमदभागवत ,एवं रामायण के प्रति दिन पर दिन बढने लगी ! उनकी प्रेरणा से  ह्म दोनों का अधिक समय स्वाध्याय में बीतने लगा ! मेरी ऑंखें बीमारिओं के कारण कमजोर हो गयी  थीं इस कारण  धर्मपत्नी कृष्णा जी मुझे श्रीमद भागवत, राम चरित मानस ,श्री  भगवत गीता और ह्मारे सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महराज द्वारा रचित विभिन्न ग्रंथों को पढ़ कर  सुनाने लगीं ! इसी स्वाध्याय के द्वारा हमे श्री मदभागवत के दशम स्कन्ध के पाठ से उन अमेरिकी बच्चों की सभी "श्री कृष्ण" सम्बन्धी शंकाओं के समाधान एवं प्रश्नों के उत्तर मिल गये ! चलिए आपको भी बता दूं जो थोड़ा बहुत मुझे अभी भी याद है, इसी बहाने मेरा रिवीजन भी हो जायेगा ! मैं उसी क्रम में उत्तर दे रहा हूँ जिस क्रम में बच्चों ने प्रश्न पूछे  थे !    
  • (a) श्रीकृष्ण के माखन चोरी का उद्देश्य :बालक कृष्ण परमार्थ हेतु मक्खन चुराते थे !  अत्याचारी राजा कंस को टेक्स स्वरूप गोकुल का सारा मकखन पहुचाने के बजाय वही मकखन निर्धन  ग्वालों के भूखे बच्चों को खिला देना उन्हें उचित लगता था  !
  • (b)  यमुना तट पर गोपियों के वस्त्र छुपाने का उद्देश्य  :-गोपियाँ यमुना में नग्न स्नान करके शास्त्रीय मर्यादा भंग कर रहीं थीं !अस्तु  ६ से ६० वर्ष के आयु की उन गोपियों के अहंकार तथा उनकी बुद्धिगत दुर्वासनाओं को मिटाने के उद्देश्य से बालक कृष्ण ने ९  वर्ष की आयु में यह लीला की थी ! भ्रान्ति पूर्ण होगा यह सोचना कि इस लीला में काम भावना का कोई  प्रश्न भी है ! बाल कृष्ण की  चीरहरण लीला में वस्त्र  वासना स्वरूप आवरण का प्रतीक है जो जीव और ईश्वर के मिलन में बाधा डालता है  ( श्रीमद भागवत-दशम स्कन्ध -अध्याय २२-श्लोक २१ ) !
---------------आज इतना ही ,अन्य प्रश्नों के उत्तर ,क्रमश आगे के अंकों में :
 
निवेदक :- व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 9

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे)
  
उस दिन अमेरिका में बच्चों ने जो प्रश्न मुझसे पूछे थे वे सभी भारत के दो पुरातन ग्रन्थ श्रीमदभागवत एवं रामायण में वर्णित मानव जीवन से सम्बंधित अनोखीऔर रहस्यमयी परम्पराओं और मान्यताओं के विषय में थे! उन्हें यह जानने की जिज्ञासा थी कि--
  • (I) क्या सचमुच हिन्दुओं के तैंतीस करोड़ देवी देवता हैं जिन्हें वह ईश्वर मान कर पूजते हैं ?
  • (II) क्या हिन्दुओं द्वारा भगवान  माने जाने वाले योगेश्वर "श्री कृष्णा"-- 
  • (ए ) बचपन में गोकुल के घर घर में माखन मिशरी चुराते फिरते थे ?, 
  • (बी) क्या बचपन में उनका यमुना में स्नान करती गोपियों के वस्त्र गायब करके उन्हें सताना अनुचित नहीं था  ?  
  • (सी) क्या उनका अपने से उम्र में बड़ी विवाहिता स्त्री "राधा रानी" के साथ  प्रेम करना अशोभनीय और अनैतिक नहीं  था   ? 
  • (दी) क्या वह अपनी पटरानी "रुकमणी" को उनके माता पिता की स्वीकृति के बिना जबरदस्ती भगा कर द्वारिका नहीं लाये थे ? 
  • (इ) क्या सचमुच उनके सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ थीं ?

(III) इन बच्चों ने केवल योगेश्वर भगवान "श्री कृष्ण" की शिकायत ह़ी नहीं, उन्होंने  हिन्दुओं के सर्वाधिक मान्य देवता - मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान "श्री राम" के द्वारा  किये गये कुछ कार्यों को भी अनुचित बताया और  हमसे प्रश्न किया  कि " क्या आप भी ऐसे व्यक्ति को भगवान मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं ? !उन्हें "श्री राम" के जीवन में जो बातें अनुचित लगी वह थीं 
  • (ए) कोई भगवान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि वह अपनी धर्मपत्नी  को अपनी पवित्रता प्रमाणित करने के लिए जीते जी आग में जलने का आदेश दे  !
  • (बी) पवित्रता साबित कर देने के बाद भी वह अपनी गर्भवती स्त्री को त्याग दे और जीवन भर उसे नहीं अपनाए  , क्या देवता माने जाने वाले "श्री राम" का यह कृत्य उनकी पत्नी के प्रति अन्याय नहीं था ?
  • (सी) मर्यादा  पुरुषोत्तम कहलाने वाले "राम" ने क्या "सुग्रीव"से मित्रता निभाने के लिए  उसके बड़े भाई "बाली" को छलपूर्वक नहीं मारा ?क्या उन्होंने  "बाली" के साथ अन्याय नहीं किया ?,क्या यह करके उन्होंने अपनी मर्यादाओं का  उल्लंघन नहीं किया ?
प्रियजन ! ह्म चाहते थे कि  बच्चों के इन प्रश्नों के सटीक उत्तर दें ,पर ह्म उस दिन  उतने तैयार नहीं थे और समय भी कम था इस कारण बच्चे असंतुष्ट रह गये और फिर हमने सोचा कि कुछ दिनों बाद दोबारा मौका मिलने पर पूरी तैयारी से आकर बच्चों को समझाने का प्रयास करेंगे  पर वह अवसर आया ही नहीं .!

(हमने इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा था पर इष्ट देव की शुभेच्छा से वह सब अदृश्य हो गया है ! मैं तो इसे भी श्री  हनुमत कृपा ही समझता हूँ ! धन्यवाद भी देता हूँ "उन्हें" ! ह्म खोजने की कोशिश कर रहे हैं , "उनकी" कृपा से  मिल गया तो कल आपकी सेवा में प्रेषित कर देंगे अन्यथा "उनकी" इच्छानुसार कुछ नया लिखेंगे )

क्रमशः 
निवेदक: व्ही.एन. श्रीवास्तव "भोला"

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 8

 हनुमत  कृपा

अनुभव   (गतांक से आगे)

मैं बार बार अपने आप को "अज्ञानी" कहता हूँ ,प्रियजन ,आप हँसे अथवा जो भी सोंचे ,पर मैं निश्चित्तता से जानता हूँ क़ि अपने विषय में मेरा यह निष्कर्ष पूर्णतः सत्य है क्योंकि मेरा यह कथन मेरे निजी अनुभव पर आधारित है ! मुझे अपनी अज्ञानता का ज्ञान कैसे हुआ सुनिए: 

भारत सरकार की सेवा से १९८९ में पूर्णतः निवृत होने के बाद ,आज से लगभग १० वर्ष पूर्व ह्म भारत छोड़ कर अपने तीन बड़े बच्चों के साथ रहने के लिए U.S.A.आ गये ! 

प्रियजन आपको आश्चर्य होग़ा यह जानकर क़ि यहाँ अमेरिका में अपने पौत्र पौत्रियों के साथ रह कर मुझे अपनी बहुत सी न्यूनताओं का पता चला ! 

यहाँ अमेरिकन स्कूल वाले अक्सर स्कूल में पढने वाले विदेशी बच्चों के अभिभावकों को  निमंत्रित करते हैं क़ि वे अपने देश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक एवं भौगोलिक विशेषताओं के विषय में क्लास के सभी बच्चों को बताएं तथा उनके प्रश्नों के उत्तर दे कर उनकी अन्य उत्कंठाओं को शांत करें ! 

हमे ठीक से याद नहीं क़ि यह घटना ह्युरोंन(साउथ  डकोटा), लेंज़िंग (मिशिगन ),पिट्सबर्ग (पेन्सिल्वेनिया) या ब्रुक्लाइन (मेसेच्युटिस्ट) की है अथवा कही और की ! छोडिये इसे ,पहले मेरा अनुभव सुन लीजिये !

एक बार हमे भी अपनी किसी पौत्री की छोटी कक्षा में आ कर उसके नन्हे नन्हे मित्रों को अपने देश -भारत के विषय में जानकारी देने का निमंत्रण मिला ! हम पूरी तैयारी के साथ ,भूगोल के नक्शे,ग्लोब ,ताज महल, क़ुतुब मीनार की तस्वीरें और बच्चों के आग्रह  पर, शाहरुख़ खान और ऐश्वर्या राय के बड़े बड़े पोस्टर लेकर स्कूल गये ! बच्चों से हमारी खूब  विस्तार से बातचीत हुई ! हमने चित्रों द्वारा ही उन्हें भारत दर्शन करवा दिया !  मैंने गाया और मेरी गुडिया (पौत्री) ने ,भारतीय परिधान में सज धज कर ,"राधा ना बोले ना बोले ना बोले रे" वाले गीत पर नृत्य भी किया !बच्चों का भरपूर मनोरंजन हुआ ! उन्होंने सारी बातें बड़े ध्यान से सुनी और गुडिया के नृत्य की खूब सराहना भी की !

प्रश्नोत्तर काल में जो सवाल उन नन्हे नन्हे बच्चों ने मुझसे पूछे मैं उनके संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया ! जी हाँ नही दे पाया ,क्योंकि मैं उत्तर जानता ही नहीं था ! प्रियजन मैं अपने इसी अनुभव के आधार पर तो कहता हूँ क़ि मैं अभी तक सर्वथा "अज्ञानी" हूँ !

अमेरिकी बच्चों ने क्या प्रश्न किये थे फिर कभी बताऊंगा ! अभी आज मैं केवल अपनी "अज्ञानता" के "ज्ञान" तक ही सीमित रहूँगा !

 निवेदक:  व्ही. एन. श्रीवास्तव  "भोला"

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 7

हनुमत कृपा 
अनुभव 

मैं स्वयं पूर्णतः अज्ञानी हूँ और मेरी बुद्धि भी उतनी प्रखर नहीं है !.कुछ करने धरने की क्षमता  मुझ में न पहले कभी थी और न अब है ! फिर भी यह शरीर इतने वर्ष कायम रह कर कुछ न कुछ करता ही रहा ! यही देखिये यहाँ  U S A में भारतीय N R I s के ह्मारे जैसे बुज़ुर्ग माँ बाप अक्सर यहाँ की भयंकर शीत का बहाना बनाकर भारत लौट जाते हैं और ह्म हैं कि यहाँ की बर्फीली सर्दी में भी जम कर बैठे हुए हैं ! 

उपरोक्त बात मेरे प्रेरणास्रोत ने मुझसे क्यों कहलवाई ,वह ही जानें !शायद बाद में कभी हमे बताएँ और उसके आगे कुछ और लिखवाएं ! तब आगे लिखूँगा !"विषय" बदल देने की उनकी पुरानी आदत है , इतना सब कहलाकर  देखिये अब मजबूर कर रहे हैं कि कुछ शेरोशायरी हो जाये ! ठीक है ,जो "उनकी" इच्छा ! "वह":अपनी आदत से मजबूर हैं , ह्म अपनी आदत से ! मैं तो उनसे केवल इतनी अर्ज़ कर सकता हूँ कि  


जब तक तु रख सके तुरख चालू ये सिलसिला !
मैं कुछ न कहूंगा  तु    खुशी  दे  या गम पिला  !! 
(Continue harassing me as long as U can, Shall not complain even if U give me pains)
जब   सौंप  दिया  भार  सभी   यार   तेरे हाथ !
मैं क्यों करूं शिकवा बता क्यों कर करुं गिला !! 
(I have surrendered to U unconditionally  Why should then I object or complain of any suffering )
आदत से तू मजबूर है  पर मैं भी कम नहीं !
सौ  बार  मरुंगा  कि तू   लेगा   मुझे जिला !!
( I know U R helpless but I M no less ,.Shall like to die a hundred times ,knowing that U R there to save me.)


चलिए अपने कल के विषय पर लौट आयें  ! पिछले संदेशों में ह्मारे बीच  वैदिक काल की भारतीय  उपलब्धियों की बात चल रही थी ! कह रहा था  कि  आज से हजारों वर्ष पूर्व भारतीयों नें  ब्रह्मनाद "ॐ" तथा "वेद" के शब्द सुने थे जिसे उन्होंने स्मृति एवं श्रुतियों के सहारे सारी मानवता तक  पहुँचाने  का प्रयास किया था इस प्रकार ह्मारे ब्रह्म ज्ञान की ख्याति दूर दूर तक फैली ! प्रियजन ! एक बात बताऊँ मुझे हाल ही में यहाँ U S A  में एक शोधकर्ता  से पता चला कि  मसीहा बनने से पहिले  ईसाई धर्म  (Christianity)  के जनक ईसा मसीह ( Lord Jisus Christ ) भी वेदों मे निहित भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म का अध्धयन करने भारत गये थे !


अब जब  इष्ट देव श्री हनुमान जी के आशीर्वाद से  कल के विषय "ओंकार" पर एक बार फिर चर्चा चल ही गयी तो क्यों न थोड़ा और आगे बढ़ें ! प्रियजन ! ! ह्मारे ऋषि मुनियों ने आद्य (श्रुति) ग्रंथों में दिव्य "ॐ" शब्द की "अनंत उर्जा" में निहित प्रचंड शक्ति का प्रतिपादन/वर्णन किया है !आज के वैज्ञानिकों ने शारीरिक ,मानसिक एवं आध्यात्मिक कोणों से गहन खोज के द्वारा "ॐ" की सार्थकता पर प्रकाश डाला है और समग्र मानवता के लिए आज "ॐ" अभिनंदनीय हो गया है ! 

यहाँ अमरीका में ,जहाँ धर्म विषयक शिक्षा वर्जित है ,बहुत से शिक्षा संस्थानों में  नन्हे नन्हे बच्चों से योग कराया जाता है ,आँख बंद करके "मौन" बैठने की क्रिया का अभ्यास कराया जाता है और कहीं कहीं तो "ॐ" शब्द का उच्चारण करवा कर ध्यान लगवाने की भी कोशिश की जाती है ! खास बात यह है क़ी ऐसे विद्यालय हिन्दुओं द्वारा नहीं बल्कि क्रिस्चियन यूनानी,और यहूदी मतावलंबियों द्वारा संचालित हैं !यहाँ के किसी   किसी जिमनेशियुम् में भी "ॐ" कह कर ध्यान लगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है !


क्रमशः 
निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला" 

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 6

हनुमत कृपा
अनुभव 
(गतांक से आगे)                                  "ॐ"  

यह अनुमान लगाना असंभव है कि कितने हजार,लाख अथवा करोड़ वर्ष पूर्व इस सृष्टि (universe) का निर्माण हुआ ! लेकिन इसके तो प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध हैं कि हजारों वर्ष पूर्व भारत के ब्रह्मज्ञानी ऋषि मुनियों ने प्रकृति की प्रयोगशाला में उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करके ,अनेकानेक दिव्य अनुभव किये और अपनी अनुभूतियों के आधार पर उपलब्ध इस ज्ञान के  अपूर्व भंडार को  उन्होंने मानवता की जानकारी  और  उन्नयन के  के लिए  धरोहर के रूप में छोड़  दिया  .! 

अनुभूतियों के आधार पर उन दिव्यदृष्टा ऋषि -मुनियों ने बताया कि अदृश्य  विद्युत् अथवा ध्वनि तरंगों के अपने सूक्षतम  स्वरुप में आपस में एक दूसरे से टकराने से सृष्टि का  निर्माण हुआ ! इस टकराव से जो प्रचंड ऊर्जा प्रगट हुई उसके ताप को और जो मधुर ध्वनि लहरी उठी उसके  माधुर्य को  ह्मारे महर्षियों ने अनुभव किया ! उस ध्वनि को उन्होंने "ब्रह्मनाद"की संज्ञा दी !कालान्तर में यही  नाद "ॐ" नाद हुआ और उस नाद में ही अन्तोगत्वा उन्हें  वैदिक सूत्रों की शब्दावली सुनायी पड़ी जो आगे चल कर वेद ,पुराण ,उपनिषद आदि ग्रन्थों में निबद्ध हुई !

कालानुक्रम की  दृष्टि से हिन्दू धर्म के इन मूलभूत ग्रंथों में  श्रेष्ठतम है आद्य ग्रन्थ "वेद" जो हजारों वर्षों से संहिता ,ब्राह्मण एवं  उपनिषद को संजो कर आज भी भारत क़ी अनमोल  सांस्कृतिक धरोहर है ! वैदिक धर्म में परिवर्तन आने पर देवी-देवताओं की उपासना चालू हुई और उसको बढावा देने के लिए "पुराणों" का जन्म हुआ ! महाभारत तथा रामायण में इतिहास के रूप में हमारी तत्कालीन सांस्कृतिक  परम्पराओं तथा मान्यताओं का दिग्दर्शन हुआ !
क्रमशः 
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प्रियजन !उपरोक्त कथन कपोल कल्पित नहीं है ! सत्य है पर  ह्ममें से अधिकाधिक लोगों को इसका ज्ञान नहीं है ! मैं केवल अपने अनुभव से कह रहा हूँ कि मैंने अपनी स्कूल  कालेज की पढ़ाई मेंAtomic Theory तो पढ़ी थी लेकिन हजारों वर्ष पहले  इस विषय की भारतीय ऋषियों की खोजों के विषय में कुछ भी नहीं पढ़ा था ! घर में मेरे माता पिता तथा  स्वजनों ने भी मुझे कोई ऎसी जानकारी नहीं दी थी !,

आपने देखा पाश्चत्य  वैज्ञानिकों ने जो तथ्य अभी १९ वीं और २० वीं शताब्दी A.D.में जाना वह भारत के ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व जान लिया था ! हद्द तो ये है क़ी अब यहाँ अमेरिका के मनीषी भारत के इस महान ज्ञान भंडार की सार्थकता की सराहना करते हैं लेकिन अधिकतर भारतवासी अभी भी अपनी उन पुरातन उप्लाबधियों से अनिभिज्ञ हैं मेरी  प्रार्थना है प्रियजनों क़ी आप हमारी तरह भूल न करें ,अपने बच्चों को इन सब तथ्यों से अवगत कराते रहें !


निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 5

हनुमत कृपा 
अनुभव 
(गतांक से आगे)                               
                                                          "ॐ "
अपने युग के जाने माने महापुरुषों , महात्माओं एवं  शोधकर्ताओं से हमने सुना है कि 
हजारों वर्ष पूर्व जब विश्व पर पशुता का एकछत्र आधिपत्य था तब पर्वतों की कन्दराओं में लुकी छुपी ,विशिष्ट मानवता अपने पुरुषार्थ और तपोबल से निज संरक्षण हेतु मानव क्षमताओं के विकास एवं उत्थान के  विविध उपाय खोज रही थी उस जमाने की प्रदूषण  मुक्त "प्रकृति" की प्रयोगशाला में प्रभुप्रदत्त नैसर्गिक संसाधनों से अनुसन्धान कर के विश्व के इसी भूखंड (भारत)के ऋषि मुनियों ने जो सत्य उजागर किये वे आज हजारों वर्ष बाद भी पूर्णतः प्रासंगिक है !वैज्ञानिक दृष्टि से  भी  आज की परिस्थिति में वे सब उतने  ही खरे उतर रहे हैं जितने  तब थे ! 

हजारों वर्ष पहले अर्जित उस ज्ञान को आज का संसार  "वेद, पुराण, उपनिषद ,भागवत,  रामायण,आदि ग्रन्थों के नाम से जानता है ! ऐसे  सद्ग्रंथों में सबसे पुरातन है "चार वेद"   जो सबसे महत्वपूर्ण भी हैं ! कठिन साधना और  अनवरत  तपस्या के बाद महर्षियों और मुनियों की अलौकिक अनुभूतियों के फलस्वरूप उनके  मुखारविंद से अकस्मात ही विभिन्न वैदिक ऋचाएं प्रस्फुटित हुईं थीं ! कहते हैं क़ी उस समय लिखा पढ़ी की सुविधा नहीं थी अस्तु श्रुति ,स्मृति ,उपनिषद एवं पौराणिक कथानकों के सहारे इस  ज्ञान को आम जनता तक पहुंचाया गया !उन्होंने जो "अनहद नाद" सुना उसका प्रसाद इन सद्ग्रंथों के रूप में समस्त मानवता को दिया  गया !

इक धुन सहज उपजती है   जब साधक करते जाप
"अनहद नाद" कहाती है वह  मन  करती निष्पाप 

अनहद से है "ॐ" उपजता और प्रगटता ज्ञान 
वेद ऋचाएं सहसा पड़ती  हैं  साधक  के  कान   

(जीव जब अपनी सभी वृत्तियों को वश में कर के हरि चिन्तन मे लग जाता है तब उसे शून्य से आता हुआ "अनहद नाद" सुनाई देता है ! इस "अनहद नाद"  में  "न केवल  "ॐ"   प्रगट होता है बल्कि उसके साथ साथ वैदिक ऋचाएं भी सुनायी देंतीं हैं )

                                                   " ॐ "   
ॐ है जीवन हमारा ,ॐ प्राणाधार है !
ॐ है कर्ता विधाता ॐ पालनहार है !!
                      ॐ है दुःख-शोक नाशक ,ॐ परमानंद है !
                      ॐ है बल-बुद्धि धारी , ॐ    करुनाकंद है!!
ॐ   है गुरु  मन्त्र   जपने से   रहेगा  शुद्ध  मन !
प्रखर होगी बुद्धि औ लग जायगी हरि से लगन!!
                   ॐ  के  जप से  हमारा  ज्ञान  बढ़ता  जायेगा !
                   अंत में यह ॐ हमको मुक्ति तक पहुंचाएगा!!
                   (एक पारम्परिक रचना)

प्रियजन ,हमारे गुरुदेव ने तो छूट दे दी है क़ि हम उस "परम"को "राम" नाम से भी पुकार सकते हैं ,आवश्यक नहीं क़ि हम उन्हें "ॐ" से ही संबोधित करें , महाराज जी ने कहा है :
सर्वाधार ओमकार जो निराकार बिन पार
उसे राम श्री राम  कह  नमूँ  मैं  बारम्बार
(स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ) 
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क्रमशः 
निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
                                           

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 4


हनुमत कृपा 
अनुभव 
"ॐ"

कार  बिंदु संयुक्तं नित्यं  ध्यायन्ति योगिनः 
  कामदं  मोक्षदं  चैव  ॐ काराय  नमो नमः      

"हरि ॐ हरि ॐ  मेरा बोले रोम रोम"

बचपन में  अम्मा के साथ कानपूर के हेलेट होस्पिटल कम्पाउन्ड में " श्री स्वामी नारायण मंदिर"से पधारे किसी संत  का सत्संग सुनने गया जहाँ उपरोक्त ॐ नाम का संकीर्तन सुना था !  उस समय  मैं "ॐ" का अर्थ नहीं समझता था ! बड़ा हुआ तो अम्मा से ॐ के विषय में कुछ समझा ! तदन्तर जीवन में संत जनों से जो कुछ सुन कर जाना ,उसमें भी अब जितना याद रह गया है ,उसे आपको बताने का प्रयास कितने दिनों से कर रहा था  लेकिन कोई न कोई व्यवधान आता रहा ! ऐसे में "हरि इच्छा" से जो कुछ मेरा कम्प्यूटर  लिखता गया मैं वह़ी संदेश आपको भेजता रहा !  आज भी जो प्रेरणा  ह्मारे इष्ट देव से मिलेगी  उसे आप तक प्रेषित कर दूंगा !

                                                      " ॐ " 

"ॐ" तीन अक्षरों - "अ + उ+ म " के संयोग से बना है जिसमे, अ = अनंत ,उ = ऊर्जा  तथा म = मय , अर्थात "ॐ" -"अनंत ऊर्जा मय" ! मानव जीवन में "ॐ " अथवा "अनंत उर्जा" का अनंत महत्व है जिसको थोड़े में समझाना अथवा समझ पाना दोनों ही अति कठिन है ! देखने में यह जितना छोटा है उतना ही व्यापक है इसका प्रभाव ! सच्चे साधक के हृदय से उठ कर इस शब्द की शक्तिशाली तरंगे सम्पूर्ण त्रिलोकी में व्याप्त हो जाती हैं और अन्तोगत्वा वह शब्द-तरंग स्वयं तो ब्रह्मलीन होती ही है ,साथ में ,साधक को भी वह  अखंड आनंद से परिपूरित कर देती है !   संतों से जाना क़ि :--

"ॐ" शब्द के हजारों अर्थ हैं ! 
"ॐ" वेदों द्वारा प्रतिपादित महाशक्तिशाली मन्त्र है !
 ॐ  मन्त्रसम्राट है और ह्मारे सभी मन्त्रों में श्रेष्ठ है !
ॐ ह्मारे सब मन्त्रों की आत्मा है   ,ह्मारे सब मन्त्रों का जीवन है !
ॐ के उच्चारण से सभी वैदिक ,पंचाक्षरी ,अष्टाक्षरी तथा गायत्री मन्त्र ,प्रारम्भ होते हैं  !  
ॐ जीव को आवागमन से छुटकारा दिलाने वाला मन्त्र है.!
ॐ  मन्त्र के उच्चारण से साधक मोक्ष प्राप्त कर सकता है !

प्रियजन ,ॐ के विषय में अभी बहुत कुछ कहना है पर आज नहीं ! फ़िलहाल चलिए  ॐ उच्चारण करके थोड़ा  विश्राम कर लें !

निवेदक:-  व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

रविवार, 5 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 3

हनुमत कृपा 
अनुभव 

देखा आपने ,कल मैं ॐ के विषय में संदेश लिख रहा था और ह्मारे इष्ट देव ने तत्काल ह्म पर अपनी विशेष कृपा कर दी ! हुआ ऐसा क़ि उसी समय ,"हनुमत कृपा" से ,लोक धुन में,बहुत ही आसान शब्दों का एक ॐ संबंधी भजन , "आस्था" चेनेल पर आ गया जिसने ॐ शब्द का सर्वभौमिक स्वरूप हमे दिखा दिया !  ब्रह्मा विष्णु महेश एवं नारदादि देवताओं से लेकर इस युग के तुलसी,मीरा,सूर ,कबीर आदि महात्माओं पर उस परम शक्तिशाली एकाक्षर मन्त्र का जादुई प्रभाव उसमे प्रदर्शित हुआ! 

चलिए ,अन्तराल के बाद ,अब आप को बता ही दूं  क़ि हमारी अम्मा ने ॐ  के विषय में 
बचपन में हमें क्या क्या बताया था ! अपनी सहज भाषा में उन्होंने हमसे कहा था -लेकिन उससे पहले ,जरा ठहरिये , --"उनकी" प्रेरणा से अभी एक अन्य तरंग उठ रही है 

प्रियजन हंसियेगा नहीं -- एक राज़ की बात बताऊँ  --अम्मा ने  ह्म सभी बच्चों को कई कई नाम दे रखे थे ! दुलरा कर मुझे भी वह बहुत सारे नामों से पुकारती थीं -- "भोला" के अतिरिक्त , "भोलंग" (तैमूर लंग से "राइम" करता ) , एक और "कन्हैया जी" (क्यूंकि कृष्ण के समान मैं ,उनकी चारोँ संतानों मे सबसे सावला था) ,हाँ एक और विचित्र नाम उन्होंने मुझे दिया था "तेर तेर तेर" !प्रिय जन , मैं  इस नाम की "origin " के विषय में जानता तो हूँ पर बताउंगा कुछ भी नहीं क्योंकि  I am not an English man who makes others laugh at his cost ! अवश्य यदि आपको उस जमाने का कोई मिले तो उससे पूछ लीजियेगा 


अंग्रेजियत की बात चली तो याद आया क़ि अम्मा ने एक विलायती नाम भी मुझे दिया था   "ए. बी . भोवा" ! उन्हें जब बहुत प्यार उमड़ता था तब वह मुझे इस नाम " ए. बी. भोवा " से ही पुकारती थीं ! क्यों वह नाम दिया था उन्होंने मुझे यह मैं उनसे कभी पूछ नही  पाया ! मेरे इस विशेष विलायती नाम का राज़ १९६२ में आज के ही दिन ५  दिसम्बर को अम्मा के साथ  ही परलोक सिधार गया


अतिशय प्रिय मेरे स्वजनों, क्या यह एक अद्भुत बात नहीं है क़ि आज जब मैं "ॐ" के विषय में अपनी दिवंगत अम्मा के विचार लिखने बैठा, तो मुझे याद आया क़ि आज वही  दिवस है जब आज से अडतीस वर्ष पूर्व हमारी प्यारी अम्मा हम सब को छोड़ कर अपने गोपाल जी के धाम गयी थीं.! उदर के केंसर की भयंकर पीड़ा सहते हुए भी ,उन्होंने एक अत्यंत मधुर मुस्कान के साथ शारीर त्यागा था ! जाते जाते वह हमे समझा गयी थीं क़ि"रोना मत बच्चों ,मैं हँसते हुए जाउंगी ,तुम हंस हंस कर हमे विदा करना "! तदन्तर   परिवार सहित ह्म चारोँ बच्चों ने उनकी इच्छानुसार उनके समक्ष खड़े होकर अखंड हरि कीर्तन किया उस क्षण तक जब तक ह्मारे साथ साथ उनके होठ भी हिलते रहे ,उनकी 
ऑंखें खुली रहीं और उनकी साँस चलती रही ! ह्म तो कीर्तन करते ही रहते क़ि पडोस के चाचाजी ने हमे बताया क़ि "बेटा वह चली गयी हैं "! हमे विश्वास नहीं हुआ क्योंकि माँ के  मुखारविंद की मुस्कराहट तब भी लोप नहीं हुई थी !


प्रिय जन ,अपना वचन निभाकर वह तो मुस्कुराते मुस्कुराते विदा हो गयीं थीं ! और फिर 
हमने वैसा  ह़ी किया ,जैसा अम्मा चाहतीं थीं ! बयान नहीं कर पाउँगा क़ि कितनी मधुर मुस्कान थी उनके प्रफुल्लित मुखारविंद पर , हल्की गुलाबी बनारसी परिधान में वह एक "बालिका वधू" सी  लग रहीं थीं ! "लाल विला" से उसकी स्वामिनी "लाल मुखी देवी " जा रहीं थीं ! बाबूजी अस्वस्थ थे , ह्म दोनों भाइयों को उन्हें ,घर की सकरी सीढ़ी से उतारना था ! दोनों भाई एक साथ उन सीढियों पर उन्हें सम्हाल नहीं पाए अस्तु मैंने अकेले ही उन्हें गोदी में उठा लिया ! ऐसा लगा जैसे मैं अम्मा के परम प्रिय इष्ट "गिरिधर गोपाल"जी के श्री चरणों पर चढ़ाने के लिए गुलाब की एक पंखुरी लेकर सीढ़ी से नीचे उतर रहा हूँ ! तबसे लेकर उस घड़ी तक जब अम्मा की पार्थिव काया अग्नि को समर्पित हुई , ह्म दोनों भाई अपनी मित्र मंडली के सहयोग से निरंतर  "श्री राम जय राम जय जय राम"  का संकीर्तन करते रहे !    


इसके आगे अब कुछ न कह पाऊंगा ! कल जो भी प्रेरणा "वह" देंगे ,जो लिखवायेंगे वह लिख कर आपकी सेवा मे प्रेषित करूँगा !


निवेदक: व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"
78,Clinton Road,
BROOKLINE, MA 02445, USA 

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 2

हनुमत कृपा 
अनुभव 

घर के आँगन में अम्मा  द्वारा परोसे अन्न के दाने चुगते समय हरि नाम सुनाती गौरईयों की टोलियों के उतरने से बहुत पहले "लाल विला" के बाहर वाली  बैठक में,ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व ही ,भैया के नेतृत्व में ह्म तीनो बच्चों द्वारा "ओमोच्चारण" शुरू हो जाता था !

अपनी छोटी उम्र मे ,तब ह्म इस महान मंत्र "ओमकार" का विषिस्ट महत्व नहीं समझते थे! तब ह्म केवल इतना जानते थे क़ि "रामोपासक हमारी प्यारी अम्मा"  कभी कभी बैठक के दरवाजे पर खड़ी ,उनके बच्चों द्वारा की जा रही वह "ओममयी" आध्यात्मिक स्वरसाधना चुपके चुपके सुनती थीं ! तब ह्म उनका मन तो परख नहीं सकते थे लेकिन उनकी प्यारी प्यारी आँखों की आद्रता हमे बता देती थी क़ि उस  रियाज़ में हमारा स्वर कितना सधा और उस प्रातःहमारी स्वर-साधना कितनी सफल हुई !
  
बाल सुलभ उत्सुकता वश ,एक दिन मैंने  उनसे पूछा क़ि हमारे "ओमोच्चारण" से उनकी आँखों में आंसू क्यों आ जाते हैं ? हिंदी, भोजपुरी,और उर्दू मिश्रित अपनी सहज भाषा में उन्होंने जो हमे बताया उसका सारांश ह्म आपको अवश्य बतायेंगे लेकिन एक छोटे से अंतराल के बाद क्योंकि अभी अभी जब मैं ॐ के विषय में यह संदेश लिख रहा हूँ यहाँ पर यू. एस. ए. में  टी . वी के आस्था चेनल पर ॐ विषयक एक भजन आ रहा है ,तो लीजिये पहले पेश है इष्ट देव अर्थात प्रमुख सम्पादक  हनुमान जी की प्रेरणानुसार आस्था से अभी सुनी  यह रचना 
हरि हरि ॐ 
शंकर जी का डमरू बोले हरि हरि ॐ 
ब्रह्मा जी का वेद बोले हरि हरि ॐ 
हरि हरि ॐ 
मीरा का इकतारा बोले  हरि हरि ॐ 
नारद जी क़ि वीणा बोले हरि हरि ॐ 
हरि हरि ॐ 
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यह था ॐ क़ि अलौकिकता बताता आस्था द्वारा प्रसारित एक शब्द   
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अब ॐ विषयक स्वरचित वह शब्द जो उपरोक्त आस्था वाले भजन से पहले मैं आपको सुनाना चाहता था लिख दूं ! आशा है इष्टदेव की आज्ञा हमे मिल जायेगी ! तो लीजिये :  

"ओमोच्चारण" अति सुखदायक  ."प्रणवाक्षर" है मोक्ष प्रदायक
ब्रम्ह  मुहूरत  उठते  ही जन ,मन से  ॐ  नाम उच्चारो ,
नभ मंडल तक नाद गुंजा कर स्वयं तरो औरों को तारो !!

ऋषि मुनियों के ॐ नाद से विविध ऋचाएं भू पर आयीं ,
मानवता को धर्म कर्म की जिसने वैदिक विधा बतायीं  !!
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इस रचना को पूरा लिखना कठिन लग रहा है ,अस्तु यहीं समाप्त करता हूँ ! पर अभी  इस विषय  में बहुत कुछ कहना है ! अम्मा के ॐ विषयक विचार भी बताने हैं !अस्तु अगले संदेश की प्रतीक्षा कर लीजिये ,तब तक ह्म भी थोड़ा विश्राम कर लेंगे ! 

निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"