शनिवार, 4 दिसंबर 2010

JAI JAI JAI KAPISUR # 2 3 2

हनुमत कृपा 
अनुभव 

घर के आँगन में अम्मा  द्वारा परोसे अन्न के दाने चुगते समय हरि नाम सुनाती गौरईयों की टोलियों के उतरने से बहुत पहले "लाल विला" के बाहर वाली  बैठक में,ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व ही ,भैया के नेतृत्व में ह्म तीनो बच्चों द्वारा "ओमोच्चारण" शुरू हो जाता था !

अपनी छोटी उम्र मे ,तब ह्म इस महान मंत्र "ओमकार" का विषिस्ट महत्व नहीं समझते थे! तब ह्म केवल इतना जानते थे क़ि "रामोपासक हमारी प्यारी अम्मा"  कभी कभी बैठक के दरवाजे पर खड़ी ,उनके बच्चों द्वारा की जा रही वह "ओममयी" आध्यात्मिक स्वरसाधना चुपके चुपके सुनती थीं ! तब ह्म उनका मन तो परख नहीं सकते थे लेकिन उनकी प्यारी प्यारी आँखों की आद्रता हमे बता देती थी क़ि उस  रियाज़ में हमारा स्वर कितना सधा और उस प्रातःहमारी स्वर-साधना कितनी सफल हुई !
  
बाल सुलभ उत्सुकता वश ,एक दिन मैंने  उनसे पूछा क़ि हमारे "ओमोच्चारण" से उनकी आँखों में आंसू क्यों आ जाते हैं ? हिंदी, भोजपुरी,और उर्दू मिश्रित अपनी सहज भाषा में उन्होंने जो हमे बताया उसका सारांश ह्म आपको अवश्य बतायेंगे लेकिन एक छोटे से अंतराल के बाद क्योंकि अभी अभी जब मैं ॐ के विषय में यह संदेश लिख रहा हूँ यहाँ पर यू. एस. ए. में  टी . वी के आस्था चेनल पर ॐ विषयक एक भजन आ रहा है ,तो लीजिये पहले पेश है इष्ट देव अर्थात प्रमुख सम्पादक  हनुमान जी की प्रेरणानुसार आस्था से अभी सुनी  यह रचना 
हरि हरि ॐ 
शंकर जी का डमरू बोले हरि हरि ॐ 
ब्रह्मा जी का वेद बोले हरि हरि ॐ 
हरि हरि ॐ 
मीरा का इकतारा बोले  हरि हरि ॐ 
नारद जी क़ि वीणा बोले हरि हरि ॐ 
हरि हरि ॐ 
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यह था ॐ क़ि अलौकिकता बताता आस्था द्वारा प्रसारित एक शब्द   
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अब ॐ विषयक स्वरचित वह शब्द जो उपरोक्त आस्था वाले भजन से पहले मैं आपको सुनाना चाहता था लिख दूं ! आशा है इष्टदेव की आज्ञा हमे मिल जायेगी ! तो लीजिये :  

"ओमोच्चारण" अति सुखदायक  ."प्रणवाक्षर" है मोक्ष प्रदायक
ब्रम्ह  मुहूरत  उठते  ही जन ,मन से  ॐ  नाम उच्चारो ,
नभ मंडल तक नाद गुंजा कर स्वयं तरो औरों को तारो !!

ऋषि मुनियों के ॐ नाद से विविध ऋचाएं भू पर आयीं ,
मानवता को धर्म कर्म की जिसने वैदिक विधा बतायीं  !!
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इस रचना को पूरा लिखना कठिन लग रहा है ,अस्तु यहीं समाप्त करता हूँ ! पर अभी  इस विषय  में बहुत कुछ कहना है ! अम्मा के ॐ विषयक विचार भी बताने हैं !अस्तु अगले संदेश की प्रतीक्षा कर लीजिये ,तब तक ह्म भी थोड़ा विश्राम कर लेंगे ! 

निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"

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