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शुक्रवार, 27 मई 2011

हनुमान चालीसा का पाठ करे # 3 7 3

आत्म कथा # ३ ७ ३

एक अनाड़ी ब्लॉगर की व्यथा
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सर्व प्रथम आज शनिवार है , मेरा अनुरोध है कि आप हमारे पूरे परिवार के साथ मिलकर हनुमान चालीसा का पाठ करे ! आप भाव से गायेंगे तो आप भी वैसे ही रोमान्चित हो जायेंगे जैसे संकटमोचन और दिल्ली के क्नाट प्लेस वाले मन्दिर के महंत जी को हुआ था ! मेरे ब्लॉग के ऊपर बाये तरफ़ बने चालीसा को प्ले करिये! ये वही धुन है जो हमने काशी के संकटमोचन और कनाटप्लेस के मन्दिरो में गायी थी !
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(नये ब्लॉग लिख पाने मे मेरीअसमर्थता के कारण मुझे दुखी देख मेरे बच्चो ने मेरी मदद की, किसी प्रकार आज ही एक संदेश # ३७२ प्रेषित किया ! प्रियजन आत्म कथा का वह् अन्श भी अप्रासंगिक नही है ! लिखते समय USA में लोप हो कर आज मद्रास में प्रगट हो गया ! अगले संदेश मे उसके आगे की कथा उनकी " प्रेरणा से प्रेषित करूंगा )
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ब्लॉग जगत से पूरी तरह से संबन्ध भंग हुए अब पूरे चार दिन हो गये हैं ! कितने हाथ पैर पटके बात नही बनी !प्रियजन अपने को सर्व शक्ति सम्पन्न मानने वाला अहन्कारी मानव कितना असहाय है , कितना दुर्बल है , कितना निर्बल है शायद अब तक जो मेरी समझ मे नही आया था आज ८२ वर्ष की अवस्था में जान गया हूँ ।

किसी प्रकार ये ब्लॉग लिख रहा हूँ , एक नयी कोशिश कर रहा हूँ , गलतिया हो रही हैं , ट्रायल है , देखे सफ़ल होता हूँ कि नहीं ? मेरी कथा अधूरी पड़ी है , आप सोचते है , टी वी के सीरिअल जैसा suspense बना रहा हूँ ! मेरे प्यारे पाठको , विश्वास करे , ऐसा नहीं  है !

परमप्रिय पाठकगण

कहते हो SUSPENSE जिसे तुम कारस्तानी "उसकी" है
अब यह मेरी कथा नहीं ,संपूर्ण कहानी "उसकी" है !!
मै प्रियजन इक लिपिक मात्र हूँ ,"वह्" डिकटेटर है मेरा
अदना एक सिपाही हूँ मैं HITLER शाही "उसकी" है !!

जब जो "उसके" जी में आता वही लिखा लेता है "वह",
कम्प्यूटर कर क्रेश कभी सब लिखी मिटा देता है "वह्" !!
बन्द करा देता है ब्लोगर ,ड्राफ़्ट नही लिख पाता हूँ ,
कलम तोड देता है मेरी ink सुखा देता है "वह" !!

वास्तव मे प्रियजन स्थिति यह है कि

लिखवाता है मेरा स्वामी , बस मैं लिखता जाता हूँ ,
करता है वह सब , मैं ' तो बस , यूँ ही नाम कमाता हूँ !!
चाकर हूँ "उनका" प्रियजन मैं ,मान न कोई मुझको दो ,
केवल "उसको" धन्यवाद दो ,जो यह यन्त्र चलाता है !!

लिखता हूँ मैं वही कथा जो मेरा प्रभु लिखवाता है
वही गीत गाता हूँ जो मेरे स्वामी को भाता है !!

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बनी रहे ऐसी ही करुणा "उनकी" इस मानवता पर ,
मैं हरदम, मन ही मन "उनसे" केवल यही मनाता हूँ !!

"भोला"
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एक प्रार्थना है

जब् नया संदेश न पहुचे, मेरे पिछले संदेशो मे सद्गुरूओ मे सर्वोपरि मेरी अपनी अम्मा तथा ममतामयी श्री श्री माँ आनन्दमयी जी के मेरे संस्मरण देखे तथा मेरे ऊपर उनकी कृपा की कथाये पढ़ कर आनन्द पाये !

आज इतना ही --

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निवेदक : व्ही एन श्रीवास्तव "भोला"

मंगलवार, 4 मई 2010

आज मंगलवार की "महावीर वंदना"

आज मंगलवार की "महावीर  वंदना"

प्रियजन, , संकटमोचन श्री हनुमानजी युगों युगों से हमारे कष्ट हर रहे हैं  विपदाओं से हमारी रक्षा कर रहे हैं. भवरोगों से मुक्ति दिला रहे हैं.  याद करिये महान संत रामभक्त श्री  तुलसीदास के जीवन की सांझ जब वह अति भयंकर शारीरिक कष्ट से पीड़ित थे. उन्होंने कष्ट निवारण  हेतु श्री हनुमानजी को याद किया फलस्वरूप तुलसी स्वस्थ हो गये. उसी समय "हनुमान चालीसा" की रचना हुई. और तुलसी की प्रेरणा से भारतवर्ष भर में अनेकानेक हनुमान मन्दिरों का निर्माण हुआ ताकि जनसाधारण हनुमान भक्ति से उतने ही लाभान्वित हो जितने तुलसी स्वयं हुए थे. कलिकाल में हनुमान भक्ति की महत्ता और अधिक हो गयी है .

आइये, हनुमान जी की वन्दना  मिल जुल कर करे. ,

   जय जय बजरंगी महावीर-हे संकटमोचन हरो पीर 

    अतुलित  बलशाली तव काया ---- गति पिता पवन का अपनाया
    शंकर से देवी गुन पाया --------------शिव पवन  पूत हे धीर वीर -
                              जय जय बजरंगी  महावीर 
     दुखभंजन सबके दुःख हरते -----------आरात्जन की सेवा करते,
     पलभर  बिलम्ब नाही करते ----- -जब जब भगतन पर पड़े भीर 
                            जय जय बजरंगी महावीर
     जब जामवंत ने ज्ञान दिया -- -सिय खोजन तूम स्वीकार किया
     सत योजन सागर पार किया ------- -देखा जब रघुबंरको अधीर
                             जय जय बजरंगी महावीर 
     शठ रावण त्रास दिया सिय को ,      भयभीत भई मईया जिय सो .
     मांगी कर जोर अगन तरु सो -------- -दे मुदरी माँ को दियो धीर
                            जय  जय बजरंगी महाबीर 
      लागा लछमन को शक्ति बान --- -अति दुखी हुए तब बन्धु राम 
      कपि तुम साचे सेवक समान ------------लाये बूटी मय द्रोंनगीर 
                             जय जय बजरंगी  महावीर 
       हम पर भी कृपा करो देवा --------दो भक्ति-दान सबको  देवा 
      है पास न अपने फल मेवा -------- स्वीकारो स्वामी नयन  नीर
       
              जय  जय बजरंगी महाबीर   हे संकटमोचन हरो पीर  


निवेदक  -   भोला 


             

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

"संकटमोचन महाबीर हनुमान" से प्रथम परिचय

छुटपन में ही जान गया हनुमान जी की महत्ता .

१९२९ में जब मेरा जन्म हुआ बलिया सिटी में बिजली नही थी और उसके बाद भी १०-१२ वर्षो तक वहां बिजली नहीं आयी. .अपना परिवार वकीलों और जज मजिस्ट्रेटों का था. अपनी बैठक आगन्तुको से भरी रहती थी, दरबार सा लगा रहता था. इसलिए रात के समय बाहर मर्दानखाने में तो लेन्टर्न और पेट्रोमेक्स की रोशिनी होंती थी पर भीतर जनानखाने के कमरों में या तो मिटटी के तेल की ढिबरियां या सरसों के तेल के मिटटी के दिए ही जलाये जाते थे..आंगन गलियारा बिलकुल अँधेरा रहता था. पर बच्चो का भीतर बाहरआना जाना लगा ही रहता था. बेचारे कभी दादी जी का संदेश दादा जी को देने जाते तो कभी चाची के आदेश से चाचा को जर्देवाला पान पहुचाते . उन्हें घने अँधेरे में जाना होता था.

बचपन में हम हर गर्मी के अवकाश में बलिया सिटी जाते थे.और वहां कभी कभार मुझे भी यह ड्यूटी बजानी पडती थी. हम कानपूर से जाते थे जहाँ बिजली ही बिजली थी (आज नही, उन दिनों). आप समझ सकते हैं कि  एक शहरी बालक उस अँधेरे घर में कैसे बिना डरे रह सकता था. सो मै भी अंधकार से भयभीत हो कर वह सेवा करने से कतराता था.

मेरी प्यारी अम्मा मेरी कमजोरी भांप गयीं. उनके भोला की बदनामी हो रही थी .गोरखपुर, इलाहबाद, मैंनपुरी के बच्चे दौड़दौड़ कर बड़ों की सेवा कर रहे हैं, भोला डरकर अम्मा से चिपके बैठे हैं. अम्मा ने तभी हमारा परिचय हमारे "कुलदेवता" महावीर जी से कराया. ऊँगली पकड़ कर वह हमे घर के एक पक्के आँगन में ले गयीं. जहाँ चबूतरे के बीचोबीच एक बहुत ऊँचा हरे बांस का झंडा गडा था जो अपने घर की ऊँचाई से भी ऊँचा था . उस बांस की चोटी पर लहरा रही थी एक लाल रंग की पताका जिस पर हनुमान जी का अति चमकीला सुनहरा कट आउट सिला हुआ था.

अम्मा ने कहा जिस घर में ऐसी महाबीरी ध्वजा लहराती है उस घर मे "भूत पिशाच निकट नहीं आवे , महावीर जब नाम सुनावे" उन्होंने आश्वस्त किया कि महावीर जी के सिमिरण मात्र से "नाशे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा"

उस दिन हीअम्मा ने हमे कंठस्थ कराया "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीश तिहु लोक उजागर" . इस प्रकार हमारी अम्मा ने ही हमे हमारा प्रथम गुरुमंत्र दिया . भारत में माता-पिता को संतान का प्रथम गुरु माना जाता है.


क्रमशः

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

राम नाम से मुक्ति

जीव की एकमात्र मांग है "मोक्ष" -- बार बार के आवागमन से सदा सदा की "मुक्ति" तथा "परमविश्राम" की ,  प्राप्ति.  नीलकंठ शंकर ने विष कंठ में रोका,राम नाम का उच्चारण किया, "विष एवं राम" के मिलन से शंकर को परम विश्राम मिला.हम भी इस कलिकाल में केवल नामोच्चारण तथा राम गुण गान द्वारा परम विश्राम पा सकते हैं. आपने सुना ही होगा-

"कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना
एक अधार राम गुन गाना
" . 

हमारे कुलदेवता श्री महावीर हनुमानजी के मतानुसार हम "उनके" स्वामी श्री राम जी को मनाये बिना "उनकी" कृपा नहीं पा सकते. अस्तु हम "चालीसा" गायन के साथ राम धुन और "मानस" का निम्नांकित अंतिम छंद अवश्य गाते हैं. चमत्कार होता है. आप भी प्रयत्न करे उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होगी.

पाई न केहि गति पतित पावन राम भज सुनु शठ मना .
गनिका अजामिल व्याध गीध गजादि खल तारे घना..

आभीर यमन किरात खस स्वपचादि अति अघ रूप जे .
कही नाम वारक तेपि पावन होइं राम नमामि ते..

रघुवंश भूषण चरित जे नर कहाहि सुनहि जे गावहीं.
कलिमल मनोमल धोय बिनु श्रम राम धाम सिधावही ..

सत पञ्च चौपाई मनोहर जानि जे नर उर धरें.
दारुण अविद्या पञ्च जनित विकार श्री रघुबर हरें..

सुंदर सुजान कृपानिधान अनाथ पर कर प्रीति जो.
सो एक राम अकाम हित निर्वाण पद सम आन को ..

जाकी कृपा लव लेस ते मतिमंद तुलसीदास हूँ.
पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ..

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मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुबीर ,
अस बिचारी रघुबंस मनी हरहु बिसम भव भीर ..

कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम .
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम..

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आइये, मिल कर गायें -  MP3 Audio

रविवार, 4 अप्रैल 2010

हनुमान जी के अनुकरणीय सद्गुण

हनुमान जी "अहंकार" मुक्त हैं . कर्तापन का "अभिमान" उन्हें कभी हुआ ही नहीं . उन्हें जीवन में जो कुछ कार्य करने को मिले उन्होने सभी कार्य "राम काज" समझ कर किये ." कर्ता " वह केवल अपने स्वामी "श्री राम " को ही मानते थे और स्वयं को "राम काज करिबे को आतुर" एक आज्ञाकारी सेवक! अपने स्वामी की क्षमताओं में उन्हें पूरा भरोसा था .

रीछराज जामवंत के प्रेरणाप्रद प्रोत्साहन से की "हे बलवान हनुमान , तुम क्यों चुप साधे बैठे हो ? तुम्हारा बल-"पवन" के समान है ! "राम काजि लग तव अवतारा " सुनते ही वह पर्वताकार हो गए. अपने से जेष्ठ- वयस्क गुरु जनों की मंत्रणा "बिनहि बिचारि "स्वीकार कर लेना भी भारतीय संस्कृति की एक अनुकर्णीय परम्परा है.

और वह स्वयं अडिग "आत्मविश्वास" और "सकारात्मक सोच" के धनी थे. हनुमान ने सीताजी की खोज प्रारंभ करने से पहले भरपूर आत्मविश्वास से सिंहनाद किया "मै इस खारे सागर को खेल खेल में ही लांघ सकता हूँ, पर गुरुजन उचित सलाह दें की मैं क्या करूँ". विभिन्न परिस्थियों में उनके स्वभाव की शालीनता और सौम्यता सराहनीय है .

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में हनुमान जी को "बुद्धि विवेक विज्ञानं निधाना" की उपाधि दी है और "हनुमान चालीसा" के प्रारंभिक दोहे में "पवन कुमार "का सुमिरन करते हुए उनसे प्रार्थना की है : "बल बुधि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेश विकार " .

अवश्य ही श्री हनुमान जी के पास "बल,बुद्धि,विद्या, विवेक और विज्ञान" तथा "रिद्धि सिद्धि " का अनंत भण्डार हैं तभी तो युगों युगों से संतजन उनसे इन सद्गुणों की मांग करते जा रहे हैं और "वह" उनकी यह मांग अविलम्ब पूरी किये जा रहे हैं. प्रत्येक हनुमान भक्त को जीवन में कभी न कभी हनुमान जी की ऐसी अहेतुकी कृपा का अनुभव होता ही होता है. इसमें कोई संदेह नहीं .